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Hindi Section ( 26 Jan 2021, NewAgeIslam.Com)

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Fake News Game and Islamic Guidance फेक न्यूज़ का खेल और इस्लाम की रहनुमाई

अब्दुल वाहिद रहमानी, न्यू एज इस्लाम

फेक न्यूज़ और झूटी ख़बरों का खेल नया नहीं है, यह सदैव से जारी है और अंत तक जारी रहेगा। सुचना के आधुनिक इंक़लाब ने इसे और आसान बना दिया है, गोदी मीडिया जिस तरह से फेक न्यूज़ को फैला रहा है और कच्चे ज़हनों को नफरत के हथियार से लैस कर रहा है, वह सबके सामने है। इसका प्रयोग हथियार के तौर पर किया जा रहा है। यहाँ ऐसी निराधार ख़बरों पर केवल इसलिए आँखें बंद कर के विश्वास कर लिया जाता है कि वह किसी के भावनाओं को सुकून प्रदान करता है, या फिर वह पारंपरिक अकीदों और आइडियालोजी के अनुसार होता है। हिटलर के प्रचार मंत्री, जोसेफ गोएबल्स ने बार-बार कहा, "इतनी बार झूठ बोलो कि यह सच हो जाएगा और हर कोई इस पर विश्वास करेगा।" इन दिनों भारत में यही स्थिति है। सत्ता के शीर्ष पर नेताओं से लेकर आम आदमी तक, वे बेहद साफ-सुथरे तरीके से झूठ बोलते हैं और झूठ की दुनिया में जीते हैं। वे इतनी दृढ़ता और आत्मविश्वास के साथ अपने झूठ को रखते हैं कि मामला सच लगने लगता है। इन दिनों हमारा देश झूट और सच की गुत्थियों में उलझ कर सुलग रहा है, अंध भक्त झूट का पलड़ा झुकाने में लगे हैं और सच की देवी हाशिये पर खड़ी बेबसी की तस्वीर बनी हुई है। उत्तर प्रदेश में लव जिहाद की मन गढ़त कहानी में परेशान जनता हो या दिल्ली सीमा पर बैठे किसान सभी सच का पलड़ा झुकाने में अपनी ताकत खर्च कर रहे हैं।

नकली समाचार स्वीकार करते समय, न तो पृष्ठभूमि और न ही दावों की सत्यता पर विचार किया जाता है। ऐसे समय में जब नकली समाचार बनाने और प्रसारित करने का व्यवसाय फलफूल रहा है, और इसका उपयोग निर्दोषों के खिलाफ एक हथियार के रूप में किया जा रहा है। शांति कार्यकर्ता, विशेष रूप से मुस्लिम को अत्यंत बुद्धिमत्ता का सबुत देना चाहिए, न केवल किसी भी खबर के बारे में सावधान रहना चाहिए, बल्कि इसे बिना शोध के आगे भी नहीं बढ़ाना चाहिए। इस्लाम के मानने वालों को तो स्पष्ट रूप से चेतावनी दी गई है, कुरआन कहता है:

ऐ ईमान वालों! अगर कोई फासिक तुम्हारे पास खबर लाए तो तुम अच्छी तरह शोद्ध कर लिया करो, कहीं ऐसा ना हो कि तुम किसी गिरोह को नादानी से नुक्सान पहुंचा दो, फिर तुमको अपने किये पर पछताना पड़े। (६:४९) रिवायतों में आता है कि जब सहाबा किराम रज़िअल्लाहु अन्हुम ने अपने घर बार छोड़ कर हबशा हिजरत की और पनाह ले कर रहने लगे तो, किसी ने फर्जी खबर फैला दी कि मक्का में काफिर कुरैश मुसलमान हो गए हैं, इस खबर पर कुछ सहाबा मक्का वापिस लौट गए, जहां उन्हें पता चला कि यह खबर झूटी थी, फिर क्या था वापिस लौटने वालों को काफिरों ने बहुत सताया, तकलीफें दीं और यह सब अफवाहों के कारण हुआ। इस पृष्ठभूमि में कुरआन पाक की उल्लेखित आयत नाज़िल हुई और मुसलामानों को आगाह किया गया कि खबरदार! कोई भी खबर हो पहले उसकी छान बीन कर लिया करो।

देश के सुलगते माहौल में जब कुछ अज्ञानी लोग मुसलमानों को फंसाने और उन्हें धोखा देने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में, मुसलमानों को हमेशा किसी भी व्यक्ति द्वारा लाई गई खबर की पुष्टि करनी चाहिए। नकली और फर्जी खबरें फैलाना असामान्य नहीं है लेकिन यह हमेशा गंभीर होता है, भले ही यह सिर्फ मनोरंजन के लिए ही क्यों न हो। इसके हानिकारक और नकारात्मक प्रभाव दूर तक जाते हैं, एक व्यक्ति प्रभावित नहीं होता है, पूरे समुदाय को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। इस्लाम ऐसी खबरों से बहुत नफरत करता है, इसलिए इस दुर्भावना और अफवाहों को फैलाने से रोकने का आग्रह किया गया है। समाचार को सुन और देख कर सबसे पहले उसकी पुष्टि की जानी चाहिए। एक मुसलमान के रूप में, सत्य की पुष्टि, पूछताछ का तरीका और सही ज्ञान प्राप्त करना इस्लाम के आवश्यक घटक हैं। इसके लिए स्थायी पुस्तकें लिखीं गई हैं। इमाम मुस्लिम और इमाम बुखारी ने अपने हदीसों में केवल उन हदीसों को शामिल किया जिनके पास केवल विश्वसनीय स्रोत और प्रामाणिक कथन थे। इस सिद्धांत के बाद, उन्होंने कथावाचक से पूछताछ की, उसके शब्दों और कर्मों को देखा और उन्हें परखा। उनका मानना था कि कलम तलवार से अधिक शक्तिशाली है, इसलिए इसके उपयोग में अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता है।

इस्लाम ने अपने शुरू के दिनों से ही फर्जी समाचारों के फैलाने पर रोक लगाई है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: इंसान के झुटा होने के लिए यह काफी है कि वह जो कुछ सुने (बिना छान-बीन के) उसे फैला दे (मुस्लिम ४४८२)। दुसरे खलीफा हज़रत उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु बार बार रास्तगोई (सच कहने) की तलकीन करते और फरमाते फितने से बच कर रहो। किसी भी समाज के लिए अमन और सलामती बहुत बड़ी दौलत है, इसलिए सामाजिक शांति तबाह करने वाली किसी भी खबर को त्वरित रूप से ख़त्म कर देना चाहिए। हर व्यक्ति को अफवाहों को फैलने से रोकना चाहिए, क्योंकि यह अफवाहें अमन व सलामती को प्रभावित करती हैं, और डर को बढ़ावा देती हैं।

सूचना क्रांति का आगमन, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रसार, और नई तकनीकों जैसे सोशल मीडिया की शुरूआत ने सूचना के कई द्वार खोले हैं। पहले जानकारी पैदल और बैलगाड़ियों पर आती थी, गति धीमी थी, एक निश्चित प्रक्रिया के माध्यम से लोगों तक खबर पहुंचती थी, लोग ट्रांसमीटर तक सीमित थे, लेकिन आधुनिक तकनीक और इंटरनेट नेटवर्क ने सब कुछ बदल दिया है। हर व्यक्ति अब अपने आप में एक प्रकाशक और एक मीडिया है। सूचना के स्रोत बढ़ रहे हैं। जाहिर है, अब हर कोई अपने तरीके से जीना और अपने मन की बात कहना चाहता है। आम आदमी उलझन में है कि कौन सही है और कौन गलत। ज्यादातर लोग आँख बंद करके मीडिया में उपलब्ध हर चीज़ पर विश्वास करते हैं और इसे जाँचने की जहमत नहीं उठाते हैं। हितधारक इसका इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए करते हैं और राजनीतिक नेता इसका इस्तेमाल अपनी दुकान चमकाने के लिए करते हैं। लोगों का यह भी मानना है कि जिन समाचारों के गंभीर परिणाम होते हैं। विकसित देशों में लोग शिक्षित होते हैं, वे अक्सर अपने विवेक से निर्णय लेते हैं कि क्या सही है और क्या गलत है। लेकिन भारत जैसे विकासशील देश में, जहां शिक्षा और जागरूकता का स्तर समान नहीं है, लोग समाचार और सूचना चुनने में भ्रमित हो जाते हैं। कई बार वे तथ्यों की जांच करने में विफल हो जाते हैं और गलत को सही समझ बैठते हैं।

अनुभव से पता चला है कि झूठी खबरों से भारत के लोगों को बहुत परेशानी हुई है। जब तक सच्चाई सामने आती है, तब तक समाज को बहुत बड़ी और अपूरणीय क्षति हो चुकी  होती है। अब से यह करें कि, संतुष्ट होने के बाद ख़बरों को आगे बढाएं और अफवाहों से दूर रहें। यह हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है और हमारा धार्मिक कर्तव्य भी है। वे कहते हैं कि झूठ के पैर नहीं होते, वे दूर तक नहीं जा सकते और सत्य में शक्ति होती है और सत्य अंततः विजई होती है।

(एडिटर: अवामी न्यूज़ पटना ९४३०२९४०३५)

URL for Urdu article: https://www.newageislam.com/urdu-section/fake-news-game-islamic-guidance/d/124110

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