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Hindi Section ( 31 Dec 2012, NewAgeIslam.Com)

Religious Fanaticism मज़हबी जुनूनियत

 

हुसैन अमीर फ़रहाद

दिसम्बर 2012

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

आजकल ईसाई लड़की रमशा का मामला चर्चा में नहीं रहा। मगर अभी तक चिंताजनक है। इसी के संदर्भ में एक घटना पेश है। ये घटना है तो अप्रैल 1994 की मगर सीख देने वाली है। इसलिए प्रकाशित कर रहा हूँ ताकि धार्मिक जुनूनी इससे सबक सीखें और भविष्य में ऐसी घटना पेश न आए। ईसाई बिरादरी से मेरी गुज़ारिश है कि हम एक ही जमीन के रहने वाले हैं। हम लोगों को यहाँ मिलकर रहना है ये तभी हो सकता है कि हम एक दूसरे का, एक दूसरे के जज़्बात का, एक दूसरे की किताब, बुजुर्गों और पैग़म्बरों का सम्मान करें। ईसाइयों को हमसे कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए कि हम पहले उनके पैगंबर को मानते हैं और अंतिम पैगम्बर मोहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को मानते हैं और हम अन्य धर्मों के मानने वालो के खुदा को बुरा भला नहीं कह सकते, क्योंकि अल्लाह का फरमान है-  वला तसुब्बुल लज़ीना यदऊना मिन दूनिल्लाहे फयासुब्बुल्लाह अद वा-बेगैरे इल्मिन (6-108) मत गालियाँ दो उन लोगों को जो अल्लाह के सिवा किसी और को मानने वाले हैं, वो बेइल्मी (अज्ञानता) के कारण तुम्हारे खुदा को बुरा भला कहेंगे यानी गालियां देंगे। यानी वही कुछ तुम्हारे रब के बारे कहेंगे जो तुम उनके खुदाओं के बारे कहोगे।

कोई मुसलमान अल्लाह के महान पैगंबर ईसा अलैहिस्सलाम का नाम बिना अलैहिस्सलाम के नहीं लेता और यही रवैय्या उन पैगंबरों के संबंध में है जिन्हें यहूदी आदि मानते हैं बल्कि हम अपने पैगम्बर को इब्राहीम और इस्माइल अलैहिस्सलाम की नस्ल (बच्चों) में मानते हैं। तो फिर झगड़ा हमारी तरफ से नहीं है। कभी किसी ने सुना या देखा कि मुसलमान ने हज़रत इब्राहीम, हज़रत इस्माईल, हज़रत मूसा, हज़रत ईसा, हज़रते मरियम की शान में अपमानजनक शब्द कहे हों? या ये कि अमुक जगह किसी मुसलमान ने बाइबल या तौरेत जला दी हो? तो आप भी ऐसी कोई हरकत न करें कि हम सबke एक रहना मुश्किल हो जाये। और हम इस बात का खयाल रखें कि आप लोगों के खिलाफ कोई झूठा केस न बना लें। जैसे रमशा का केस या जैसे मैं आपकी खिदमत में पेश कर रहा हूँ।

इस तरह की घटनाएं क़ौम के अलावा देश के लिए भी शर्मिंदगी और बदनामी का कारण बनती हैं। अल्लाह का हुक्म है कि,  या अय्योह्लज़ीना आमनू इन जा अकुमफासेकुम बेनबाइम फतबैय्यनू अनतोसीबू क़ौमम बेजहालतिन फतुस्बेहू अला मा फअलतुम नादेमीन (49- 6) ऐ ईमान वालो! अगर कोई फ़ासिक तुम्हारे पास खबर लेकर आये तो तहक़ीक़ (जाँच) कर लिया करो और कहीं ऐसा न हो कि जिहालत में तुम किसी का नुकसान कर बैठो और फिर तुम्हें अपने किए पर नादिम (शर्मिंदा) होना पड़े। जिस उम्मत को उनका रब कदम कदम पर हिदायत देता है और उनकी रहनुमाई करता है, वो कहाँ सुनी सुनाई बातों पर बिना तहक़ीक़ एतबार करता है। लेकिन ये भी एक तथ्य है कि हुक्म (या अय्योहल्लज़ीना आमनू) उनके लिए है जो ईमान रखते हैं और जो इस हुक्मे इलाही के खिलाफ कदम उठाते हैं, ज़ाहिर वो बे-ईमान होंगे। और नेक लोग न होंगे। फ़रमाते हैं कि औरतों और- वल्लज़ीना एज़ा ज़ुक्केरू बेआयाते रब्बेहिम लम यखिर्रू अलैहा सुम्मा (25- 73) मेरे सालेह बन्दों के सामने जब अल्लाह की आयतें पेश की जाती हैं तो वो गूंगे बहरे बन कर उस पर नहीं गिरते। (तहक़ीक़ करते हैं)

पंजाबी ज़बान में कहते हैं (वेली जटी ओन वएले) हमारी मस्जिदों में बाद नमाज़ जो तहक़ीक़ी काम होता है वो ये है कि नबी नूर थे या बशर, इब्ने मरियम मर गया या ज़िंदा जावेद है, इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने जो दुंबा ज़बह किया था, उसके गोश्त का क्या बना? आयशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहू अन्हा की उम्र शादी के वक्त कितनी थी? अगर रब यही सवालात हमसे पूछे और हम जवाब देने में नाकाम रहे तो क्या रब फरमाएगा, लानत है तुम्हारी शक्लों पर, इतनी उम्र में रहे और ये भी पता न लगा सके कि नबी नूर थे या बशर और न ही आयशा सिद्दीक़ा की उम्र का पता चला सके? हमसे ये पूछ ताछ नहीं होगी। हमसे ये सवाल होगा कि मैंने अपने रसूल पर जो किताब भेजी थी, उस पर तुमने अमल किया? सवाल ये पूछा जाएगा तो हम असम्बद्ध मुद्दों पर समय क्यों बर्बाद करें, लेकिन यक़ीन कीजिए अक्सर मस्जिदों में इन्हीं मामलों पर बहस होती है। अगर आप उनसे असहमत हैं तो आपको गोली या बम से उड़ा दिया जाता है।

हमारी मस्जिदों में जो आए दिन धमाके होते हैं और कुछ नमाज़ियों को बा-जमात उड़ा देते हैं और जिम्मेदार ये कहकर ज़िम्दारी से अलग हो जाते हैं कि इसमें विदेशी हाथ होगा। एक ज़माना था कि मस्जिदें अमन का गहवारा होती थीं आज विरोधी को ठिकाने लगाने के लिए मस्जिद से अच्छी जगह कोई और नहीं। अगर धार्मिक ठेकेदारों ने अपना रवैय्या नहीं बदला तो एक दिन मस्जिदें वीरान हो जाएंगी।

गुजरान वाला के गांव ख्याली में डॉक्टर सज्जाद फारूक नामक एक व्यक्ति अपने छह बच्चों और पत्नी के साथ रहता था जो हाफ़िज़ कुरान था और अपने घर में बच्चों को कुरान भी पढ़ाता था। पड़ोस वालों से बैर था। 21.04.1994 को वो कुरान पाक की तिलावत रहा था। पत्नी दो बच्चों को साथ लेकर अगर बत्ती और दूध लेने गई थी। चूल्हे पर रखी चाय उबल गयी तो ये चायदानी को उठाने के लिए झुका, कुरान जो उसकी झोली में था वो चूल्हे पर गिरा उसने जल्दी से उठाया इसके दो पेज झुलस गए थे। उसके मुताबिक उसने अपने आप से कहा ये मैंने क्या किया? कुरान साड़ दिता (कुरान जला दिया) पड़ोसन उसी वक्त दीवार पर सिर उठाकर देख रही थी उसने सुना तो घर में सब को संबोधित कर कहा कि डॉक्टर ने कुरान साड़ दिता। पड़ोस में मैय्यत की फातेहा ख्वानी के लिए लोग शामियाने के नीचे बैठे थे। बात उन तक पहुंची। सब उठकर आ गये। जब डॉक्टर की पत्नी अगर बत्ती और दूध लेकर आई तो उसने देखा कि आंगन लोगों से भरा है और उसका पति डॉक्टर कमरे में बंद खिड़की में खड़ा लोगों को सफाई पेश कर रहा है।

बात पुलिस तक पहुंची उधर मस्जिद से ऐलान हुआ कि ईसाई डॉक्टर ने कुरान पाक शहीद किया। लोग आते गए। पुलिस आई, उग्र भीड़ को सांत्वना दी और डॉक्टर फ़ारूक़ को पुलिस चौकी ले गई। लेकिन इस घड़ी करीब की मस्जिद (जहां डॉक्टर फ़ारूक़ का आना जाना नहीं था) से ऐलान हुआ कि ईसाई डॉक्टर ने कुरान पाक को शहीद किया, उसकी हत्या उचित है। बाद में मौलवी ने कहा मैंने अताई डॉक्टर कहा था लोगों ने ईसाई समझा। उग्र भीड़ पुलिस चौकी पहुंची, जहां डॉक्टर हथकड़ियों में बैठा था उसे निकाला और मारना शुरू किया उसकी कोई बात नहीं सुनी गई। करीब ही ईंटों की भरी ट्राली जा रही थी नौजवानों ने उसे रुकवाया और ईंटें उठा उठा कर उसे मारी गईं। उसके हाथ तोड़े गए। ज़्यादातर मारने वालों को पता भी नहीं था कि मामला क्या है। उन्होंने सवाब के लिए इसमें शिरकत की। जब डॉक्टर फ़ारूक़ ने दम तोड़ दिया तो उस पर तेल छिड़क कर आग लगा दी गई। उसे आग लगा दी गई जिसके सीने में कुरान था। दो जवानों ने उसकी लाश को मोटर साइकिल के पीछे बांधा और बाजारों में घसीटते फिरे, तब कहीं पुलिस ने हस्तक्षेप किया और शव को कब्जे में लिया। लड़कों को हिरासत में लिया। अखबारों की सूचना के मुताबिक कमिश्नर अपनी गाड़ी से सभी कार्रवाई देखते रहे और उतरे नहीं। बाद में इसी मस्जिद में डॉक्टर के लिए कुरान ख्वानी हुई और क़ुल पढ़े गए जिसमें मौत का फ़तवा देने वाला मौलवी भी आगे आगे था। इसे कहते हैं-

वही ज़बह भी करे है वही ले सवाब उल्टा

पूरे मोहल्ला वालों ने कहा कि डॉ. नेक और दीनदार आदमी था। उससे ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती कि उसने कुरान पाक शहीद किया है। डॉ. फारूक की पत्नी ने बताया कि सिर्फ पड़ोसन से बैर था जिसकी वजह से मेरे पति की हत्या कर दी गयी। कमाल की बात ये है कि पूरे समय सरकार खामोश रही लेकिन पांच मई को असिस्टेंट कमिश्नर गुजरान वाला ने रिपोर्ट पूरी की और कहा हाफ़िज़ सज्जाद फारूक ने कुरान पाक जलाया है। पड़ोसन जिसने बात मस्जिद तक पहुंचाई वो लापता हो गई।

पाठकों, कुछ भी हो जाँच और अदालती हुक्म के बाद सजा देना सरकार का काम है न कि जनता का। हम जिस धर्म के पैरोकार हैं, उसके जितने भी ताज़िराती हुक्म हैं किसी एक ही व्यक्ति के लिए नहीं हैं। मिसा के लिए अगर चोर के हाथ काटने की बात तो ये हर व्यक्ति का काम नहीं यहां तक ​​कि उसका भी नहीं जिसकी चोरी हुई। ये काम अदालत का है, लोगों का नहीं। सज़ा का उद्देश्य अपराधी का सुधार और शांति स्थापित करना है न कि बदला (स्पष्ट रहे कि इस दुखद घटना में भी मस्जिद, मौलवी और लाउडस्पीकर शामिल था)

आइए देखते हैं कि कुरान इस मामले में हमारी क्या रहनुमाई करता है। सबसे पहले तो ये ध्यान रखना चाहिए कि किसी पर आरोप, तोहमत लगाना गुनाह है। इससे बचना चाहिए और अगर किसी पर आरोप लगा दिया जाए तो तहक़ीक़ (जाँच) अनिवार्य है। फरमाने इलाही है-

वला तलमज़ू अनफ़ुसाकुम (49-11) और किसी पर ऐब तोहमत न लगाओ।

दूसरी जगह पर इरशाद है। वैलिल लेकुल्ले आफाकिन असीम (45- 7) हर झूठे इल्ज़ाम लगाने वाले पर अफसोस है।

लौला इज़ समेतोमूहुम ज़न्नल मोमेनूना वलमोमेनाते बेअन्फोसेहिम खैरा वक़ालू हाज़ा इफ्कुम मुबीन (24- 12) जब तुम लोगों ने सुना था तो उसी वक्त क्यों नहीं मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों ने उनके बारे में नेक गुमान किया और क्यों न कहा कि ये जानबूझ कर बोहतान  (इल्ज़ाम) है। ये है अल्लाह का हुक्म। मेरा मानना ​​है तमाम मस्जिद वाले अल्लाह का ये हुक्म बाकी मुसलमानों से बेहतर जानते होंगे।

दिसम्बर 2012, स्रोत: माहनामा सूतुल हक़, कराची

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