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Hindi Section ( 26 Dec 2012, NewAgeIslam.Com)

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The Truth behind Taliban's Fatwa Justifying Killings of Innocent Civilians Part-8 नवाये अफगान जिहाद फतवा और उसकी वास्तविकता- (किस्त 8)


व्यापार केन्द्रों में गैर-मोताहारिबीन (न लड़ने वाले) पर हमला ग़ैर इस्लामी है

सोहेल अरशद, न्यु एज इस्लाम

21 दिसम्बर, 2012

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

अपने लेख की 5 वीं किस्त में शेख अलउबैरी ने दुश्मन पर हमलों में गैर मोहारिब औरतों और बच्चों के क़त्ल को जायज़ करार देते हुए लिखा है कि दुश्मन के गैर मोहारिबीन का क़त्ल उस स्थिति में जायज़ है कि वो उन मोहारिबीन के साथ ऐसी जगहों और मजबूत किलों में निशाना बनें कि जिनकी वजह से मोहारिब और गैर मोहारिब में तमीज़ (भेद) न किया जा सके। उसके समर्थन में ये हदीस नक़ल करते हैं

'अलसअब बिन जसामा से मरवी है कि उन्होंने कहा कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से मुशरिकीन की औलादों के बारे में सवाल किया गया कि जब मुजाहिदीन रात के वक्त मुशरिकीन पर हमला करते हैं तो उनकी औरतें और बच्चे भी निशाना बनते हैं तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया वो उन्हीं में से हैं। वो मुस्लिम (हदीस) की एक रिवायत भी नक़ल करते हैं जिसमें हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया, वो अपने बापों में से हैं। इस सिलसिले में शेख अलउबैरी ने इमाम हजर असक़लानी, इमाम अलनोवी, इब्ने एसर और इब्ने क़दामा की तशरीहें (व्याख्या) नकल की हैं, जिनमें दुश्मन पर हमले के दौरान औरतों और बच्चों को गैर इरादी तौर पर क़त्ल करने को जायज़ करार दिया गया है। वो इमाम मुस्लिम का क़ौल नक़ल करते हैं जिसमें वो कहते हैं कि इस हदीस में शब (रात) खून मारने की दलील और ऐसे लोगों को सूचना दिये बगैर उन पर हमला करने का औचित्य है जिन्हें दावत (इस्लाम) पहुंच चुकी हो।

उपरोक्त सभी दलीलों का मतलब ये है कि अगर दुश्मन के हमले के दौरान अगर उनमें औरतें और बच्चे भी हों और दुश्मन के क़त्ल के नतीजे में औरतें और बच्चे भी मारे जाएं तो वो जायज़ है। लेकिन कई हदीसें हैं जिनमें हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने जंग के दौरान औरतों और बच्चों के क़त्ल से मना फरमाया है।

सही बुखारी, वाल्यूम 4, हदीस नम्बर 257 में अब्दुल्ला से रवायत है कि एक घटना के दौरान एक औरत की लाश मिली। हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इस मौके पर औरतों और बच्चों के क़त्ल को नापसंद किया। इसी घटना से संबंधित एक और हदीस है।

रियाह इब्ने रबी से मरवी है कि जब हम अल्लाह के रसूल के साथ थे, उन्होंने देखा कि एक जगह कुछ लोग जमा थे। उन्होंने एक व्यक्ति को वहां भेजा कि देख कर आए कि वो किस चीज के आसपास इकट्ठा हुए हैं। वो वहां देखकर वापस आया और बोला या रसूलुल्लाह वो एक औरत के आसपास खड़े हैं, जो क़त्ल कर दी गई है। आप (स.अ.व.) ने कहा कि लेकिन वो तो लड़ने में सक्षम नहीं थी। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने एक व्यक्ति से कहा,'' जाओ और जाकर खालिद से कह दो औरत और नौकर को क़त्ल न किया जाय। (अबु दाऊद हदीस नम्बर 2669)

मालिक के मोता में मरवी है कि, यह्या ने मुझे मालिक से उन्होंने इब्ने शहाब से रिवायत की कि कअब इब्ने मालिक (मालिक का मानना ​​है कि इब्ने शहाब ने अब्दुल रहमान बिन कअब कहा) ने कहा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने वादा खिलाफ यहूदी इब्ने अबी हुक़ैक़ के खिलाफ लड़ने वालों को औरतों और बच्चों के क़त्ल से मना फरमाया। उन्होंने कहा कि जंग में एक व्यक्ति ने कहा कि इब्ने अबी हुक़ैक़ की बीवी चीख़ने लगी और मैंने कई बार उस पर तलवार उठायी और हर बार मुझे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का मना करना याद आया। और मैं हाथ रोक लेता। अगर ऐसा न होता तो मैं उसे खत्म कर देता'' (मोता: किताब 08, हदीस नम्बर 8)

इसके अलावा पिछली किस्तों में हदीसें और हज़रत अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हू के बयान गुजर चुके हैं जिनमें उन्होंने इस्लामी फौजों को जंग के दौरान औरतों और बच्चों के क़त्ल से मना फरमाया।

बहरहाल अलसअब बिन जसामा की हदीस जिसमें हुजूर सल्लल्लाहू अलहि वसल्ल्म मुशरिकीन की औरतों और बच्चों के बारे में फरमाया कि, वह उन्हीं में से हैं।'' अपवाद वाली हैसियत रखती हैं, सिद्धांत की नहीं, क्योंकि हदीसों में जंग के दौरान औरतों और बच्चों को जानबूझ कर क़त्ल से मना फरमाया है, जैसा कि घटना में मारी गई औरत के क़त्ल के बारे में हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने नाराज़गी का इज़हार किया है। यहां ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि सहाबा रज़ियल्लाहू अन्हू ने हुजूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से जंग के दौरान औरतों और बच्चों के निशाना बनने से संबंधित पूछा या उसकी इजाज़त मांगी। इसका मतलब है कि हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम औरतों और बच्चों को क़त्ल करने से मना फरमाते थे। अगर जंग में औरतों और बच्चों को क़त्ल करने की सख्ती से मनाही न होती और उनका क़त्ल कोई मसला नहीं होता तो सहाबा रज़ियल्लाहू अन्हू हुजूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से इस बारे में पूछते ही क्यों? ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि सहाबा ने ये नहीं पूछा कि जंग के दौरान वो औरतों और बच्चों को जानबूझ कर मार सकते हैं या नहीं, बल्कि इस बात का ज़िक्र किया कि कभी कभी जब वो लड़ने वाले मर्दों पर हमला करते हैं तो औरतें और बच्चे भी चपेट में आ जाते हैं।

शेख अलउबैरी ने इमाम इब्ने हजर असक़लानी की इस हदीस पर तफ्सीर (व्याख्या) नकल की है कि औरतों और बच्चों को जानबूझ कर निशाना बनाना जायज़ नहीं है लेकिन जब लड़ने वालों के साथ उनका गठबंधन हो और उनके क़त्ल के नतीजे में औरतें और बच्चे भी चपेट में आ जाएं तो ऐसी स्थित में उनका क़त्ल जायज़ है।

लेकिन इमाम इब्ने हजर असक़लानी ने इसी मसले पर आगे जो बात कही है वो शेख अलउबैरी हज़म कर गये। उन्होंने इब्ने हजर असक़लानी का केवल वही अंश नक़ल किया जो उनके मतलब या तालिबान के मतलब का था। इब्ने हजर असक़लानी ये भी फरमाते हैं।

ये भी मुमकिन हो सकता है कि ये हदीस रद्द कर दी गई हो और ये कि अगर औरतें और बच्चे जंगके दौरान दुश्मन के साथ हों तब भी उनका क़त्ल न किया जाए।

हदीसों से ये भी साबित है कि हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम रात के वक्त हमले का हुक्म नहीं देते थे शायद इसकी वजह यही हो रात को औरतों और मोहारिब (लड़ने वाले) मर्दों और गैर मोहारब मर्दों में तमीज़ मुश्किल है। सही बुखारी में हज़रत अनस से रवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम रात के वक्त ख़ैबर पहुंचे और आमतौर पर वो ऐसा करते थे कि जब भी दुश्मन के करीब रात को पहुँचते थे तो सुबह से पहले हमला नहीं करते थे। जब सुबह हुई, तो यहूदी कुदाल और बालटियाँ लिए हुए बाहर आए जब उन्होंने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को देखा तो बोले 'मोहम्मद! ख़ुदा की कसम मोहम्मद और उसकी फौज '! पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया 'ख़ैबर तबाह हो गया क्योंकि हम जब भी किसी आक्रामक क़ौम (राष्ट्र) से मुक़ाबला करते हैं तो उनके लिए वो सुबह खराबी लेकर आती है जिनको चेतावनी दी गई है। (सही बुखारी, वाल्यूम- 005 किताब- 009 हदीस नम्बर 510)

शेख अलउबैरी अपूर्ण और गैर प्रमाणित निष्कर्ष निकालते है कि ''इस हदीस में शब (रात) खून मारने की दलील और ऐसे लोगों को इत्तेला (सूचना) दिए बिना उन पर हमला करने का औचित्य है जिन्हें दावत (इस्लाम) पहुंच चुकी हो।

जबकि ख़ैबर से संबंधित हदीस शेख अलउबैरी के इस औचित्य का खंडन करती है क्योंकि हुजूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ख़ैबर के क़रीब फौज के साथ रात के वक़्त ही पहुंच चुके थे और अगर दुश्मन को इत्तेला (सूचना) दिए बिना हमला करने को वो सही मानते तो सुबह तक इंतेज़ार नहीं करते।

लेख के अंतिम भाग में आकर शेख अलउबैरी की बिल्ली थैले से बाहर आ गई। वो कहते हैं कि जब मुसलमान देखें कि उन्हें अचानक हमला करने की ज़रूरत है तो उनके लिए ऐसा करना जायज़ है चाहे इसके नतीजे में औरतों, बच्चे और बूढ़े आदि मारे जाएं। अब तक तो वो कह रहे थे कि दुश्मन पर हमले की सूरत में गैर इरादी तौर पर औरतें और बच्चे भी क़त्ल हो सकते हैं मगर अब खुलकर इस बिंदु पर आ गए कि दुश्मन की रक्षा को तबाह करने के लिए उसके सामरिक केंद्रों (वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, पेंटागन, व्हाइट हाउस आदि) पर हमला करना और इसके नतीजे में गैर मोहारिब (न लड़ने वाली) औरतों, मर्दों और बच्चों का क़त्ल जायज़ है और ये दुश्मन के 20 हजार लड़ाकों के क़त्ल से अधिक भारी है। यानी दुश्मन के वो महत्वपूर्ण व्यापार केन्द्रों जहां फौजी न भी लेकिन वहां पर हमला करने पर अगर दुश्मन को आर्थिक और मनोवैज्ञानिक नुकसान अपेक्षाकृत अधिक हो तो ऐसे केंद्रों पर हमला करना जायज़ है। चाहे इसके नतीजे में गैर मोहारिब मर्द, औरतें और बच्चे ही क्यों मारे न जाएं। मुल्ला अलउबैरी के मुताबिक़ दुश्मन के किसी व्यापारिक केंद्र को तबाह करना और उसके नतीजे में गैर मोहारिब लोगों का मारा जाना शरई उसूल (सिद्धांत) के अनुरूप है। इसलिए, वो ये नतीजा या निष्कर्ष निकालते हैं कि,

''सो जिसने लड़ाकुओं से विभेद न होने के कारण निर्दोष लोगों के क़त्ल की इजाज़त दी तो वो इन हमलों के कारण क़त्ल होने वाले लोगों के क़त्ल को भी जायज़ करार देगा। क्योंकि, वो भी सामरिक केन्द्रों में नहीं पहचाने गए। ये स्पष्ट है कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में सैनिक नहीं थे बल्कि गैर मोहारिब लोग थे इसलिए उनके मोहारिब लोगों से विभेद न होने का सवाल ही कहाँ उठता है। दरअसल इस लेख का सारा ताना बाना वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमले के नतीजे में मारे गए नागरिकों के क़त्ल को जायज़ ठहराने के लिए बनाया गया है और इसका आधार एक हदीस पर रखा गया है जिसके बारे खुद इमाम अलहजर असक़लानी कहते हैं कि मुमकिन है कि वो हदीस बाद में रद्द कर दी गयी हो और इसके साथ ये भी फरमाया कि अगर औरतों और बच्चे दुश्मन के साथ हों तब भी उन्हें क़त्ल नहीं किया जाना चाहिए।

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