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Hindi Section ( 14 Dec 2012, NewAgeIslam.Com)

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The Truth behind Taliban's Fatwa Justifying Killings of Innocent Civilians Part-4 नवाये अफगान जिहाद का फतवा और उसकी वास्तविकता: (किस्त 4): तालिबानी आलिम का गैर मुसलमानों के क़त्ल का गैर इस्लामी फ़तवा

 

सोहेल अरशद, न्यु एज इस्लाम

13 दिसम्बर, 2012

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

आतंकवादी संगठन अल कायदा के संस्थापक ओसामा बिन लादेन के क़रीबी आलिम 'शेख यूसुफ अलउबैरी के लेख, वो हालतें कि जिनमें कुफ़्फ़ार के आम लोगों का क़त्ल जायज़ हो जाता है, की पहली किस्त में लेख से पहले एडिटर ने एक नोट लगाया है जो इस तरह है।

'' शेख यूसुफ अलउबैरी रहिमतुल्लाह अलैहि अरब प्रायद्वीप के प्रसिद्ध और बड़े आलिमे दीन थे। शेख ओसामा रहिमतुल्लाह अलैहि (ओसामा बिन लादेन) से आपका निकट संबंध और दिली लगाव था। ग्यारह सितंबर की घटना के बाद आप ने मुजाहिदीन की इस बड़ी कार्रवाई का बिना डरे समर्थन किया और इस अमल को शरीअते इस्लाम की रौशनी में जायज़ ठहराया। सच बोलने के इसी इल्ज़ाम में आपको सऊदी सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। आप पर ज़ुल्म किया गया और आप कैद के दौरान ही शहीद कर दिये गये।

ऊपरोक्त एडिटोरियल नोट में इस बात को स्वीकार किया गया है कि 11 सितंबर का हमला 'मुजाहिदीन की बड़ी कार्रवाई' थी जिसका समर्थन ओसामा बिन लादेन के क़रीबी आलिम ने किया। दूसरे तालिबान की नज़र में सऊदी अधिकारी और पुलिस ज़ालिम या शैतान थे। और यही वो रवैय्या है जो उन्हें खारिजियों की श्रेणी में ला खड़ा करता है। खारिजी भी अपने आप को हक़ पर और दूसरे सभी लोगों को काफ़िर और ज़ालिम बताते हैं। वो किसी भी मुसलमान सरकार को स्वीकार नहीं करते और न अपने सिवा दूसरे समुदायों को मुसलमान मानते हैं।

उलमा और मोफस्सिरीन (व्याख्या करने वालों) की नज़र में तालिबान और दूसरे आतंकवादी गिरोह खारिजी समुदाय हैं जो कुरान और हदीस की अपनी तौर पर व्याख्या और अनुमान पेश करते हैं और अतिवादी और हिंसक व्यवहार में विश्वास करते हैं। खारिजियों का अस्तित्व हुजूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की ज़िंदगी में ही अमल में आ चुका था और कुरान में कुछ आयतें हदीस के मुताबिक़ खारिजियों के सम्बंध में ही हैं। उन्होंने हज़रत उसमान रज़ियल्लाहू अन्हू का क़त्ल किया और हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू के दौर में ये एक महत्वपूर्ण समुदाय के रूप में खुल कर सामने आए और आख़िरकार हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू ने उनको शिकस्त दी और उनका खत्मा किया। लेकिन अंततः एक खारिजी इब्ने मुलजम ने उनका क़त्ल कर डाला। उन्होंने हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहू अन्हू की खिलाफ़त को मानने से इनकार किया और सामंजस्य और समझौते की तमाम कोशिशों को ठुकरा कर जंग व टकराव की राह अख्तियार की और जमीन में फसाद फैलाया। आज भी ये इस्लामी सरकार की स्थापना के नाम पर ज़मीन पर फसाद और क़त्ल और खून फैलाते हैं और सभी मुसलमान सरकारों को क्रूर समझते हैं।

इमाम मुहम्मद बिन अब्दुल करीम अलशहरस्तानी अपनी मशहूर किताब अलमलल व अलनहल में लिखते हैं।

'' हर वो व्यक्ति जो जनता के बहुमत का समर्थन प्राप्त मुस्लिम सरकार के खिलाफ विद्रोह करता है, वो खारिजी कहलाता है। चाहे वो सहाबा के दौर में खुल्फाए राशिदीन के खिलाफ हो या ताबेईन के खिलाफ या बाद के ज़माने के मुस्लिम शासकों के खिलाफ हो। '' (पेज- 114)

सूरे फ़ातिर में इन्हीं लोगों के बारे अल्लाह फरमाता है।

'' फिर एक वो शख्स है जिसकी नज़र में उसकी बुराई को पुरकशिश (आकर्षक) बना दिया गया है, तो वो उसको अच्छा समझता है। (फ़ातिर: 8)

इसलिए, इन मौजूदा दौर के खारिजियों की नज़र में मुसलमानों का खून बहाना और दौलत को लूटना जायज़ है अबु हफस अलहम्बली ने फरमाया,'' इनमें वो खारिजी हैं जो मुसलमानों के खून और उनकी जायदाद को हलाल करार देते हैं। (अललबाब फी उलूम अलकिताब- 132-175)

और अपने इसी खारिजी नज़रिए के आधार पर तालिबान के आलिम यूसुफ अलउबैरी ने अपने मिशन को आगे बढ़ाने के लिए न सिर्फ गैर मुस्लिमों बल्कि मुसलमान औरतों, बच्चों और बूढ़ों और निहत्थे लोगों को बेखबरी में क़त्ल को जायज़ बताया है। इस लेख में उन्होंने उन हालातों का ज़िक्र किया है जब उनके मुताबिक़ कुफ़्फ़ार के बेकुसूर लोगों का क़त्ल जायज़ होता है।

पहली हालत,  उनके मुताबिक़ ये है कि मुसलमान कुफ़्फ़ार को भी वही सजा दें जो उन्हें दी गई। इसलिए अगर कुफ़्फ़ार मुसलमानों की औरतों, बच्चों और बूढ़ों का क़त्ल करते हैं तो इस हालत में जायज़ है कि उन (कुफ़्फ़ार) के साथ भी यही काम किया जाये। दलील अल्लाह का फरमान है कि,

'अगर कोई तुम पर ज़्यादती करे तो जैसी ज़्यादती वो तुम पर करे वैसी ही तुम उस पर करो।

ऊपरोक्त आयत को तालिबान के आलिम ने गैर मुस्लिमों के बेकसूर लोगों (बच्चों और औरतों और बुज़ुर्गों) के क़त्ल के औचित्य के रूप में पेश किया है जबकि ये समाज में व्यक्ति के साथ होने वाली ज़्यादती की स्थिति में उसके द्वारा बदला लेने के फैसले के बारे में किया गया है और इस सिद्धांत में मुस्लिम और गैर मुस्लिम का विभेद नहीं है। कुरान की नज़र में मुसलमान और गैर मुस्लिम के अधिकार बराबर हैं। इसलिए अगर कोई किसी पर ज़्यादती या ज़ुल्म करे तो उसको हक़ है वो भी उसी मिक़दार (मात्रा) में बदला ले सकता है और इस सिलसिले में कुरान कसास और मसला का सिद्धांत पेश करता है।

इस सिलसिले में हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू का क़ौल (कथन) है।

'' अगर कोई मुस्लिम किसी ईसाई को क़त्ल कर दे तो उसे भी कसास में क़त्ल किया जाएगा।

लेकिन कुरान ने ये नहीं कहा कि ज़्यादती करने वाले के भाई, बेटे या उसकी जाति के असम्बद्ध या बेकसूर लोगों से उसका बदला लो। बल्कि इस सम्बंध में कुरान स्पष्ट तौर पर कहता है।

'और कोई भी बोझ ढोने वाला दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा (अलइसरा: 15)

अपनी रचना किताबुल नहराज पेज 78 पर अबू यूसुफ फरमाते हैं-

किसी भी गैर मुस्लिम अमन पसंद नागरिक को उसके किसी सहधर्मी के अत्याचारों के इल्ज़ाम में सजा नहीं दी जाएगी।

गैर मुसलमानों के अधिकारों के बारे में एक हदीस इस प्रकार है-

'सुन रखो, जो कोई भी किसी गैर मुस्लिम नागरिक पर ज़ुल्म करेगा या उसके किसी अधिकार को छीनेगा या उस पर उसकी ताक़त से अधिक बोझ डालेगा या उसकी इजाज़त के बिना उसकी कोई चीज़ ले लेगा तो क़यामत के दिन उसकी तरफ से मैं वकालत करूंगा। (अबु दाऊद)

अब्दुल्ला बिन मसूद ने रवायत की, कि हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया,

'' जो कोई किसी गैर मुस्लिम को तकलीफ देगा मैं उसका हरीफ़ (प्रतिद्वंद्वी) होऊँगा, और जब मैं किसी का हरीफ होऊँगा तो क़यामत के दिन उस पर ग़ालिब आऊँगा। (तारीखे बग़दाद)

इसलिए कुरान हदीस और फिक़ह बेकसूर गैर मुस्लिम नागरिकों से बदला लेने या क़त्ल करने या उनकी जायदाद को नुकसान पहुंचाने का विरोध और निन्दा करता है और उसे सबसे बड़ा गुनाह करार देते हैं। इस बारे में यूसुफ अलउबैरी कुरान के सूरे अलशूरा की निम्नलिखित आयतें दलील के रूप में पेश करते हैं।

'और जो ऐसे हैं कि जब उन पर जुल्म  व ज़्यादती हो, तो (मुनासिब तरीके से) बदला लेते हैं और बुराई का बदला तो उसी तरह की बुराई है, लेकिन जो दरगुज़र (माफ़) करे और (मामले को) सही कर दे तो उसका बदला खुदा के ज़िम्मे है। इसमें शक नहीं कि वो ज़ुल्म करने वालों को पसंद नहीं करता और जिस पर ज़ुल्म हुआ हो अगर वो उसके बाद इंतेकाम ले तो ऐसे लोगों पर कुछ इल्ज़ाम नहीं। इल्ज़ाम तो उन लोगों पर है जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और मुल्क में नाहक फसाद फैलाते हैं। यही लोग हैं जिनको तकलीफ देने वाला अज़ाब होगा। (अलशूरा: 39-42)

इस सम्बंध में इसी अर्थ की दूसरी आयत भी पेश करते हैं।

'और अगर तुम उन्हें तकलीफ देनी चाहो तो उतनी ही तकलीफ दो जितनी तकलीफ तुमको उनसे पहुंची और अगर सब्र करो तो सब्र करने वालों के लिए बहुत अच्छा है और सब्र ही करो और तुम्हारा सब्र भी खुदा ही की मदद से है और उनके बारे में ग़म न करो और जो ये बदअंदेशी करते हैं उससे तंग दिल न होना। कुछ शक नहीं कि जो लोग परहेज़गार और नेकोकार हैं खुदा उनका मददगार है। (अलनहल- 126-128 )

उपरोक्त दोनों अंशों में कहीं ये स्पष्ट नहीं होता कि इसमें गैर मुस्लिमों के मासूम लोगों के क़त्ल और उनकी जायदादों को नुकसान पहुंचाने की प्रेरणा या इजाज़त दी गई है। इसमें सिर्फ ज़्यादती होने पर बदला लेने में संतुलन से काम लेने का आदेश दिया गया है और बदले में हद से आगे जाने से मना किया गया है और इसमें मुस्लिम और गैर मुस्लिम का विभेद नहीं है। बल्कि सूरे अलशूरा और सूरे अलनहल दोनों में दरगुज़र (माफ़ करना) करने और सब्र करने को बेहतर बताया गया है। इतना ही नहीं सूरे अलनहल में तो ये भी कहा गया है कि, और सब्र ही करो। यानी बदला लेने का अधिकार भी दिया गया है और सब्र करने का सुझाव भी दिया गया है, लेकिन सब्र करने पर अल्लाह की तरफ से ज़्यादा ज़ोर दिया गया है।

इस तरह यूसुफ अलउबैरी इन सभी आयतों के द्वारा ये साबित नहीं कर सके कि कुरान गैर मुसलमानों के बेकसूर लोगों से, उनके देशवासियों के ज़ुल्म का बदला उनकी औरतों और बच्चों को क़त्ल करके लिया जा सकता है। बल्कि सूरे अलशूरा में खुद तालिबानियों जैसे मुफसिदों के लिए कहा गया है, इल्ज़ाम तो उन पर है जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और मुल्क में नाहक फसाद फैलाते हैं। यही लोग हैं जिनको तकलीफ देने वाला अज़ाब होगा। जाहिर है तालिबान और उनके जैसे समूह ही ज़मीन में फसाद फैलाते हैं और लोगों पर ज़ुल्म करते हैं। इसलिए कुरान उन्हें दर्दनाक अज़ाब की खुश खबरी सुनाता है।

दौरे नबूवत में इस्लामी सेनाओं को सख्ती से हुक्म था कि लाशों का मसला न करें और बच्चों और औरतों और गैर मुसलमानों के धार्मिक नेताओं को क़त्ल न करें।

हज़रत अब्दुल्ला इब्ने अब्बास फरमाते हैं,

'' जब हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम फौजों को रवाना होने का हुक्म फ़रमाते तो उनसे कहते '' दगा फरेब से काम न लो, माले ग़नीमत में खयानत से काम न लो, लाशों का मसला न करो और बच्चों और धार्मिक नेताओं को क़त्ल मत करो। (अलमसनद)

हदीसों और खुल्फाए राशिदीन की हिदायतों से स्पष्ट होता है कि इस्लामी फौजों को रवानागी के वक्त इस बात की ताकीद की जाती थी कि जंग के दौरान गैर मोताहारिब (न लड़ने वाले) औरतों, बच्चों और बूढ़ों को क़त्ल न करें।

'अब्दुल्ला बिन उमर ने रवायत की, कि हज़रत अबु बकर मुस्लिम फौज को सीरिया रवाना करते वक़्त दो मील सेना के साथ पैदल चले फिर उनको संबोधित करते हुए कहा।

मैं तुम्हें हुक्म देता हूँ कि खुदा से डरो (कमांडर की) नाफरमानी न करो और न बुज़दिली न दिखाओ। खजूर के पेड़ों को बर्बाद न करो और फसलों को आग न लगाओ। जानवरों को तकलीफ न पहुँचाओ और फलदार पेड़ों को न काटो '' (अलमरवाज़ी: मसनद अबी बकर)

मसला यानी लाशों के नाक, कान और दूसरे अंगों को काटना या उनके अपमान के बारे में भी खुद यूसुफ अलउबैरी हदीस नक़ल करते हैं जिसमें मसला से मना किया गया है, लेकिन फिर बाद में कहते हैं, लेकिन अगर दुश्मन मुसलमानों के क़त्ल होने वाले लोगों का मसला करे तो मुसलमानों के लिए जायज़ हो जाता है कि वो दुश्मन के क़त्ल होने वालों का मसला करें और इस स्थिति में उसकी हुर्मत (गरिमा) खत्म हो जाती है।

मसला के मना करने के बारे वो ये हदीस नक़ल करते हैं।

'बुखारी में अब्दुल्ला बिन यज़ीद रहिमतुल्लाह अलैहि से रवायत है कि' नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने लूट खसोट और मसला से मना किया है।''

उन्होंने ये हदीस भी नक़ल की है । सही मुस्लिम में हज़रत बरीदा रज़ियल्लाहू अन्हू से रवायत है कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अपने लशकरों और दस्तों के कमांडरों को ये कहकर विदा करते थे कि:

'' अल्लाह के नाम से हमला करो, अल्लाह से कुफ्र करने वाले से लड़ो और न गद्दारी करो, न मसला करो और न किसी नवजात को क़त्ल करो।

उपरोक्त हदीस का ज़िक्र करने के बावजूद मौलाना अलउबैरी अपना अतार्किक फतवा भी जारी करते हुए कहते हैं।

'लेकिन अगर दुश्मन मुसलमानों के मक़तूलों (क़त्ल होने वालों) का मसला करें तो मुसलमानों के लिए जायज़ हो जाता है कि वह दुश्मन के मक़तूलों का मसला करें। और इस सूरत में उसकी हुर्मत (गरिमा) खत्म हो जाती है।

अपनी इस राय के समर्थन में उन्होंने न कोई कुरानी आयत पेश की है और न ही हदीस और फ़िक़ह की किताबों से हवाला पेश किया है बल्कि अपनी हिंसक मानसिकता के आधार पर कह दिया कि अगर दुश्मन मुसलमानों के मक़तूलों का मसला करें तो मुसलमानों के लिए जायज़ हो जाता है कि वो दुश्मन के मक़तूलों का मसला करें। खुद उन्हीं के द्वारा पेश की गई हदीस उनके इस विरोधाभास की पोल खोलती है। इसके अलावा मक्का पर जीत के दिन जब आम मुसलमानों में बहुत ग़म और गुस्सा था और वो मक्का वालों से अपने ऊपर किए गए ज़ुल्म और अपने दोस्तों के क़त्ल का बदला लेने के लिए मचल रहे थे यहां तक ​​कि खुद हुजूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के चाचा हज़रत हम्ज़ा रज़ियल्लाहू अन्हू के दर्दनाक क़त्ल और उनके शव के मसले का ग़म भी हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को था फिर भी हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने आम माफी का ऐलान किया और मसला से मना फरमाया। खुद कुरान में इस मौक़े के बारे में कहा गया है कि अगर मुसलमान इस दिन लड़ाई करते तो पूरे मक्का को पीस डालते। मगर इस सूरत में कई बेकसूर भी मारे जाते और वो मुसलमान भी मारे जाते जिन्होंने कुफ़्फ़ार के डर से इस्लाम लाने का इज़हार नहीं किया था इसलिए मुसलमानों की नज़रों में वो भी कुफ़्फ़ार थे और वो भी मुसलमानों के हाथों मारे जाते जिसका ज़िम्मा उन पर पड़ता। इस तरह अल्लाह ने हुजूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के दिल में सब्र डाल दिया और मुसलमानों को भी सब्र अता किया।

इस तरह कुफ़्फ़ार के ज़ालिमों के ज़ुल्म की सजा सभी मक्का के कुफ़्फ़ार को देने से हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने मना फरमाया।

इसलिए कुरान की जिन आयतों और जिन हदीसों को मौलाना अलउबैरी ने अपने दृष्टिकोण के समर्थन में पेश किया है वो उनका खंडन करती हैं और कुरान, हदीस और फ़िक़ह के मुताबिक़ कुफ़्फ़ार के बेकसूर लोगों, औरतों, बच्चों, बुज़ुर्गों और मज़हबी लीडरों के क़त्ल से न सिर्फ मना किया है बल्कि ये शरीअत के खिलाफ और सबसे बड़ा गुनाह है। (जारी)

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