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Hindi Section ( 17 Aug 2011, NewAgeIslam.Com)

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The holy Quran: The Protector of A Peaceful Multicultural Society क़ुरान पाकः एक शांतिपूर्ण बहुसांस्कृतिक समाज का रक्षक


सुहैल अरशद, न्यु एज इस्लाम डाट काम

इस्लाम में ईमान का एक हिस्सा ये भी है कि मुसलमान आखिरी नबी पैग़म्बर मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) पर ईमान लाने के साथ - साथ सभी पैग़म्बरों और उन पर अवतरित हुई किताबों पर भी ईमान लायें। इस्लाम धर्म की आसमानी किताब क़ुरान मजीद ने दूसरे धर्मों और उनके खुदाओं को बुरा भला कहने से भी मना किया है। इस प्रकार क़ुरान एक बहुसांस्कृतिक समाज की वकालत करता है, जहाँ सभी धर्मों के मानने वाले शांतिपूर्ण सहअस्तित्व में  विश्वास रखने वाले हों।

अल्लाह ने आदम और हव्वा को ज़मीन पर उतारा औऱ उनसे इंसानी नस्ल को फैलाया। फिर इंसानों की विभिन्न नस्लें पैदा कीं, जिनकी शारीरिक रचना, डील-डौल और रंग अलग कर दिये। इनमें क़बीले और विभिन्न भाषायी समाज पैदा किये, क्योंकि अल्लाह इस विशाल धरती को एक समानता से बचाना चाहता था। एक हदीस में है कि अल्लाह सुन्दर और सुन्दरता को पसंद फरमाता है, इसलिए सुन्दरता कई रंगों और विविधता में होती है। इसलिए प्राणियों के लाखों प्रकार पैदा किये। इंसानों को भी विभिन्न क़द-काठी, शक्ल व सूरत और रंगों में पैदा किया, ताकि दुनिया एकसमान होने से बच जाये। क़ुरान कहता हैः

और क्या तूने न देखा, कि अल्लाह ने उतारा आसमान से पानी, फिर हम ने निकाले उस से मेवे तरह तरह के उनके रंग और पहाड़ो में घाटियाँ हैं सफेद और लाल तरह तरह के उनके रंग और घना काला। और आदमियों में और कपड़ों में और चौपायों में कितने रंग हैं इस तरह। (27) फातिर

इसी प्रकार इंसानों को भी एकरंगी से बचाने के लिए उनमें नस्लें, जाति और क़बीले अल्लाह ने पैदा फरमाये। इसमें अल्लाह को इंसानों की परीक्षा लेना उद्देश्य था, ताकि वो देखे कि इंसान अपनी इच्छा के खिलाफ आल्लाह के आदेशों का पालन करता है या नहीं। कुरान में अल्लाह फरमाता हैः

ऐ आदमियों, हम ने तुमको बनाया एक मर्द और एक औरत से और रखीं तुम्हारी जाति और क़बीले ताकि आपस में पहचान हो। अल्लाह के समक्ष उसका मान ज़्यादा जिसका तक़्वा (परहेजगारी) बड़ा, अल्लाह सबकुछ जानता है, खबरदार है। (अलहुजरातः13)

यानि इंसानों के कबीले, जाति और नस्लें बनाने के बाद अल्लाह फरमाता है कि इंसानों में वही सबसे अधिक मान-सम्मान का अधिकारी होगा, जिसमें परहेज़गारी ज़्यादा होगी, और परहेज़गार वही ज़्यादा है, जो बंदों के अधिकारों को पूरी तरह अदा करता है। प्राणियों पर दया करता है, अत्याचार और नाइंसाफी के विरुध्द सत्य का साथ देता है और बुरे कामों से दूर रहता है। क़बीले और जाति तो सिर्फ पहचान के लिए हैं।

इतनी अधिक विविधता के बावजूद कुरान सभी इंसानों को एक धागे में बाँध कर एक शांतिपूर्ण बहुसांस्कृतिक समाज की बुनियाद डालने का निर्देश निम्नलिखित आधार पर करता है।

(1)      सभी पैग़म्बरों और उनकी किताबों पर विश्वास और सभी धर्मों का आदर

क़ुरान की ये विशेषता है कि वो एक ओर तो ये इस्लाम धर्म के मानने वालों के जीवन का संविधान है, तो दूसरी ओर इसका उद्देश्य दुनिया के सभी राष्ट्रों में प्रेम और एकता स्थापित करना है। ये अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए किसी भी दूसरी आसमानी किताब को नकारता नहीं है और उन्हें झूठा भी नहीं बताता है बल्कि उनको सत्यापित करता है, क्योंकि सभी पैग़म्बर अल्लाह के भेजे हुए संदेशवाहक थे और अल्लाह ने उन पर वही नाज़िल की थी। अर्थात आदम(अलैहिस्सलाम=अलै.) से लेकर हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) तक सभी पैग़म्बर एक ही धर्म लेकर आये, और बुनियादी तौर पर सभी का संदेश एक ही था, एक ईश्वर में विश्वास और शिर्क (बहुदेववाद) से परहेज़। इसलिए क़ुरान कहता है कि इसका संदेश पिछली सभी आसमानी किताबों से अलग नहीं है, बल्कि उसकी व्याख्या और पूर्णता है। क़ुरान के बारे में अल्लाह फरमाता है किः

और जो हमने तुझ पर उतारी किताब (क़ुरान) वही ठीक है, अपने से पहले की किताबों को प्रमाणित करने वाली (फातिरः31)

दूसरी जगह अल्लाह फरमाता है किः

और इससे पहले किताब मूसा (अलै.) की थी, राह डालने वाली और रहमत और ये किताब है उसको प्रमाणित करती

एक और जगह अल्लाह फरमाता हैः

फिर हमने दी मूसा (अलै.) को किताब वास्ते पूरा करने नेमत के और नेक काम करने वालों पर और वास्ते तफसील हर शै के और हिदायत और रहमत के ताकि वो लोग अपने रब से मिलने का यक़ीन करें। (आलअनामः154)

सूरे आलइमरान में भी क़ुरान के बारे में ज़िक्र हुआ है।

उतारी तुझ पर किताब, सच्ची तस्दीक करती है, अगली किताबों की और उतारा तौरेत और इंजील को इस किताब से पहले लोगों की हिदायत के लिए। (आलइमरानः3-4)

हज़रत दाऊद पर ज़बूर अवतरित हुआ। क़ुरान भी इसकी तस्दीक (प्रमाणित) करता है

और हमने लिख दिया है ज़बूर में नसीहत के पीछे कि आखिर ज़मीन के मालिक होंगें मेरे नेक बंदे (अम्बियाः105)

उपरोक्त आयतों के पढ़ने से पता चलता है कि क़ुरान पिछली तीनो किताबों को प्रमाणित करता है, और इसके अलावा वो सभी पैग़म्बरों और उनकी सच्चाई की भी गवाही देता है।

और हमने दी थी मूसा (अलै.) और हारून (अलै.) को क़ज़ये चुकाने वाली किताब और रौशनी और नसीहत डरने वालों को। (अलनिसाः48)

और आगे दी थी हमने इब्राहीम (अलै.) को उसकी नेक राह (शरीअत) और हम रखते हैं उसकी खबर। (अम्बियाः51)

हमने वही भेजी तेरी तरफ जैसे वही भेजी नूह (अलै.) और उन नबियों पर जो उसके बाद हुए और वही भेजी इब्राहीम पर और इस्माईल पर और इस्हाक़ पर और याक़ूब पर और उसकी औलाद पर और ईसा पर और अय्यूब पर और यूनुस पर और हारून पर और सलमान पर और हमने दी दाऊद को ज़बूर और भेजे ऐसे रसूल जिनका अहवाल सुनाया तुझको इससे पहले और ऐसे रसूल जिनका अहवाल नहीं सुनाया तुझको और बातें कीं आल्लाह ने मूसा से बोलकर  (नेसाः164)

इस प्रकार कुरान में अन्य पैग़म्बरों का ज़िक्र भी क़ुरान में विभिन्न स्थानों पर आया है। इन पैग़म्बरों ने इंसानों को गुनाहों से परहेज़ करने और अल्लाह को एक मानने पर ईमान लाने और शिर्क और कुफ्र से दूर रहने की शिक्षा दी। इस तरह क़ुरान स्पष्ट कर देता है कि उसकी शिक्षा नई नहीं है और वो जो धर्म लेकर आया है, वो नया नहीं है बल्कि पिछले दौर के धर्मों का चरम बिंदु है। इसलिए वो मुसलमानों को आदेश देता है कि वो सभी पैग़मबरों पर ईमान ले आयें और उनकी किताबों ज़बूर, तौरेत और इंजील पर भी ईमान ले आयें उनके धर्मों के बारे में बुरा न कहें, क्योंकि इससे क़ुरान के सभी उम्मतों को एकजुट करने की कोशिशों पर बुरा असर पड़ता है।

और तुम लोग बुरा न कहो, क्योंकि उनको जिनकी ये पूजा करते हैं सिवा अल्लाह के, बस वो बुरा कहने लगेंगे, अल्लाह को बेअदबी से बदून समझे। (इनआमः108)

क़ुरान कहता है कि दुनिया की हर क़ौम किसी न किसी रसूल की उम्मत है, क्योंकि अल्लाह ने अपना संदेश एक लाख चौबीस हज़ार पैग़म्बरों की मदद से दुनिया के हर इंसान तक पहुँचा दिया है।

और हर फिरके का एक रसूल है। (यूनुसः47)

इसलिए दुनिया की विभिन्न क़ौमों के बीच एकता स्थापित करने के लिए ये ज़रूरी है कि एक नबी के मानने वाले दूसरे नबी के मानने वालों का आदर करें। क़ुरान खुद भी पिछले पैग़म्बरों की प्रशंसा करता है। वो हज़रत मूसा(अलै.) और हज़रत ईसा(अलै.) का वर्णन विस्तार से करता है।

हज़रत ईसा(अलै.) और ईसाईयों का क़ुरान में वर्णनः

क़ुरान बार बार हज़रत ईसा (अलै.) और उन पर अवतरित हुई किताब इंजील का वर्णन बड़े अच्छे अंदाज़ में पेश किया गया है। और उनके मानने वालों (ईसाईयों) के बेहतरीन इंसानी गुणों का भी वर्णन अच्छे शब्दों में किया गया है। (सूरे आलमायदा आयत 110 में वर्णित)

जब कहेगा अल्लाह ऐ ईसा मरियम के बेटे याद कर मेरा एहसान, जो हुआ है तुझ पर और तेरी माँ पर, जब मदद की थी मैंने तेरी रूह पाक से तो कलाम करना था, लोगों से गोद में और बड़ी उम्र में और जब सिखाई मैंने तुझको किताब और तह की बातें और तौरेत और इंजील और तू जब बनाता था गारे से जानवर की सूरत, मेरे हुक्म से फिर फूँक मारता था उसमें, तो हो जाता उड़ने वाला और मेरे हुक्म से और अच्छा करता था। मादरज़ाद अंधे को और कोढ़ी को मेरे हुक्म से और जब निकाल खड़ा करता था मुर्दों को मेरे हुक्म से और जब रोका बनी इसराईल को तुझसे, जब तू लेकर आया उनके पास निशानियां तो कहने लगे जो काफिर थे उनमें और कुछ नहीं ये तो सिर्फ जादू है।

उपरोक्त पंक्तियों में क़ुरान बड़ी फ़राख़दिली से हज़रत ईसा के चमत्कारों (मोजज़ों) का वर्णन करता है, जो उन्होंने अल्लाह के आदेश से दिखाये। अंधों को रौशनी और कोढ़ियों को कोढ़ से मुक्ति प्रदान की, यहां तक कि पक्षियों की मूर्ति बनाकर उनमें जान फूँकी ताकि लोग अल्लाह के एक होने पर ईमान ले आयें। मगर काफिरों ने ईमान लाने से इंकार किया। बहरहाल हज़रत ईसा के मानने वालों में आज भी वही विशेषताएं पायी जाती हैं। उनके मानने वाले (ईसाई) आज भी पूरी दुनिया में कल्याणकारी कामों के लिए जाने जाते हैं। बीमारों का इलाज, कोढ़ियों की सेवा और बेसहारों की मदद व देखभाल इनका स्वाभाव बन चुका है। इसलिए इनकी रहमदिली और मेहरबानियों का वर्णन क़ुरान भी करता है

और हमने भेजा नूह को और इब्राहीम को और ठहरा दी दोनों की औलाद में पैग़म्बरी और किताब, फिर इनमें कोई राह पर है और बहुत इनमें नाफरमान हैं। फिर पीछे भेजे इनके क़दमों पर रसूल और पीछे भेजा हमने ईसा मरियम के बेटे को और उसको हमने दी इंजील और रख दी उसके साथ चलने वालों के दिलों में रहम और मेहरबानी। (अलहदीदः26-27)

इसी तरह क़ुरान जानता है कि दूसरी उम्मतें भी क़ुरान की, हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) की और मुसलमानों की तस्दीक (प्रमाणित) और इनका आदर करें। वो कहता है कि हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) और मुसलमानों की स्पष्ट निशानियाँ तौरेत और इंजील में बयान कर दी गयीं हैं।

मोहम्मद रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) का और जो लोग उनके साथ है, ज़ोरावर (शक्तिशाली) हैं काफिरो पर, नर्म दिल हैं आपस में, तो देखे उनके रुकू में सज्दा में, ढ़ूढ़ते हैं अल्लाह का फज़ल (कृपा) और उसकी खुशी, निशानी उनकी उनके मुँह पर है, सज्दे के असर से, ये निशान है, उनकी तौरात में और मिसाल उनकी इंजील में। (अलफतहः29)

(2)      सभी धर्मों में कुछ मूल्य एकसमान

क़ुरान कहता है कि ईसा (अलै.) का धर्म, मूसा (अलै.) का धर्म और मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) का धर्म औऱ उनसे पहले की उम्मतों के कई मज़हबी अरकान एक जैसे हैं, जैसे  नमाज़ , रोजा, ज़कात, हज और क़ुरबानी। इनके तरीकों और समय में अंतर हो सकता है। इस्लाम चूंकि सभी पैग़म्बरों और उनकी पवित्र किताबों की तस्दीक करता है और उनका आदर करता है। इसलिए इसने पिछले पैग़म्बरों की सुन्नतों को भी दीन के अरकान में शामिल किया है। इस तरह ये अरकान सभी उम्मतों को एक कड़ी में जोड़ने का काम करते हैं। क़ुरान में कई आयतें इस संदर्भ में आयी हैं।

नमाज़, रोज़ाः

और ज़िक्र करके किताब में इस्माईल का वो था वादे का सच्चा और था रसूले नबी और हुक्म करता था अपने घर वालों को नामज़ और ज़कात का और था अपने रब के यहाँ पसंदीदा। (मरियमः55)

और ले चुका है अल्लाह वादा बनी इसराईल से और मोक़रर्र किये हैं इनमें 12 सरदार और कहा अल्लाह ने मैं तुम्हारे साथ हूँ, अगर क़ायम रखोगे नमाज़ और देते रहोगे ज़कात और यक़ीन दिलाओगे मेरे पैग़म्बरों पर और मदद करोगे उनकी। (अलमायेदाः12)

क़ुरबानीः

और हर उम्मत के वास्ते हमने मोक़रर्र कर दी है क़ुरबानी कि याद करें अल्लाह के नाम ज़बह पर चौपायों के जो उन (अल्लाह) ने दिये। (अलहजः34)

हजः

ऐ परवरदिगार हमारे और कर हमको हुक्म सरदार अपना और हमारी औलाद में भी कर एक फरमांबरदार अपना और बतला हमको कायदा हज करने के और हमको माफ कर, बेशक तू ही तौबा कुबूल करने वाला है, मेहरबान। (अलबक़राः128)

(3)      उम्मत एक बंदगी के तरीके अलग-अलगः

जब सारे नबियों ने एक ही पैग़ाम यानि अल्लाह की वहदानियत (अल्लाह एक है) की इशाअत की, तो सारे नबियों की उम्मतें सामूहिक रूप से एक उम्मत करार पायीं, चूंकि पैग़म्बर इसांन थे और उन्हें एक आयु प्राप्त हुई थी, इसलिए एक नबी के बाद अल्लाह के पैगाम को लोगों तक पहुँचाने के लिए दूसरा नबी अल्लाह के हुक्म से इस ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए आते। बहरहाल, हर उम्मत की बंदगी के तरीके अल्लाह ने जानबूझकर अलग रखे, और इंसानों ने भी आपस में मतभेद के बिना पर अपने अपने धर्म में राह निकाली। क़ुरान कहता है कि

सो एक ही उम्मत है, पीछे जुदा जुदा हो गये। (यूनुसः19)

दूसरी जगह क़ुरान कहता है कि

ये लोग हैं तुम्हारे धर्म के, सबके सब एक धर्म पर और मैं हूँ रब तुम्हारा, सो मेरी बंदगी करो, और टुकड़े टुकड़े बांट लिया लोगों ने आपस में अपना काम, सब हमारे पास फिर आयेंगें। (अम्बियाः93)

यहूदी और नसरानी भी मुसलमानः

 जो धर्म बाक़ायदा हज़रत इब्राहीम (अलै.) पर उतरा, वो धर्म ब्राहमी कहलाया और सारे धर्म इस्लाम समेत हज़रत इब्राहीम (अलै.) के कहलाये और उनके मानने वालों को मुसलमान कहा गया। इस तरह यहूदी भी मुसलमान हैं और नसरानी भी, क्योंकि हज़रत मूसा (अलै.) और हज़रत ईसा (अलै.) ने भी इस धर्म का प्रचार किया, जिसका प्रचार हज़रत इब्राहीम (अलै.) ने किया। इसलिए क़ुरान स्पष्ट शब्दों में कहता है

ऐ ईमान वालो रुकु करो और सज्दा करो, और बंदगी करो अपने रब की, और भलाई करो ताकि तुम्हारी भलाई हो। और मेहनत करो अल्लाह के वास्ते जैसे कि चाहिए उसके वास्ते मेहनत, उसने तुमको पसंद किया और नहीं रखा है तुम पर धर्म में मुश्किल। धर्म तुम्हारे बाप इब्राहीम (अलै.) का और उसी ने तुम्हारा नाम रखा मुसलमान पहले से और उस कुरान में ताकि रसूल हो बताने वाला तुम पर और तुम हो बताने वाले लोगों पर। सो क़ायम रखो नमाज़ और देते रहो ज़कात और मज़बूत पकड़ो अल्लाह को, वो तुम्हारा मालिक है और खूब मददगार।(अलहजः77-78)

हर उम्मत के नेक लोग कामयाब हैः

आज धर्म से जितनी दूरी बढ़ रही है, धर्म के नाम पर हत्याएं उतनी ही बढ़ रही हैं। हर धर्म के लोग ये समझते है कि वो ही सत्य के मार्ग पर है और बाकी सभी लोग असत्य पर है और नर्क के भोगने वाले हैं। क़ुरान कहता है कि जिस धर्म के मानने वालों ने अपने पैग़म्बर के बताये रास्ते पर अमल किया और अल्लाह की वहदानियत पर यक़ीन किया और क़यामत के दिन पर यक़ीन लाया, और बुराईयों से बचता रहा, दरअसल कामयाब है। क़ुरान एक तरफ उन लोगों पर तंज़ करता है, जो सिर्फ अपने फिरके की सच्चाई पर यक़ीन रखते हैं, और दूसरी तरफ हर उम्मत के नेक लोगों को खुशखबरी सुनाता है।

और ये लोग हैं तुम्हारे धर्म के, सबके सब एक धर्म पर और मैं हू तुम्हारा रब, सो मुझसे डरते रहो, फिर फूट डालकर कर लिया अपना काम आपस में टुकड़े, हर फिरका जो उनके पास है, खुश हो रहे हैं। (अलमोमेनूनः52-53)

बेशक जो लोग मुसलमान हुए और जो लोग यहूदी हुए और नसारा और सायबीन और जो ईमान लाया अल्लाह पर और क़यामत के दिन पर और काम किये नेक तो उनके लिए है इनका सवाब उनके रब के पास और नहीं उन पर कुछ खौफ़ और न वो ग़मग़ीन होंगें (अलबक़राः62)

इसी बात को क़ुरान एक दूसरी जगह दोहराता हैः

बेशक जो मुसलमान हैं जो यहूदी हैं और सितारा परस्त और नसारा, जो कोई ईमान लाये अल्लाह पर क़यामत के दिन पर और अमल नेक करे न उन पर डर है और न वो ग़मग़ीन होंगें। (अलमायेदा-69)

(4)      दीन में ज़ोरज़बर्दस्ती नहीः

एक और बात जिस पर क़ुरान ज़ोर देता है वो ये कि धर्म में कोई ज़ोरज़बर्दस्ती नहीं। दुनिया में विभिन्न धर्म हैं जिनके मानने वाले अपने धर्म का प्रचार करते हैं।  इस्लाम ने भी अपने मानने वालों को धर्म प्रचार का हुक्म दिया है, और मुसलमानों को बेहतरीन उम्मत और इस्लाम को बेहतरीन धर्म करार दिया है कि वो लोगों को भलाई के लिए कहते हैं और बुरी बातों से मना करते हैं। हज़रत मूसा के भी क़ौम में एक समूह था जो लोगों को भलाई की ओर बुलाता था।

तुम हो बेहतर सब उम्मतों से जो भेजी गई आलम में, हुक्म करते हो अच्छे कामों का और मना करते हो बुरे कामों से और ईमान लाते हो अल्लाह पर(आलइमरानः115)

लेकिन जैसा कि अल्लाह खुद कहता है कि दुनिया में विभिन्न फिरके और धर्मों में इसकी मसलहत है, ताकि इसके ज़रिए वो इंसानों को आज़माए। वो अगर चाहता तो सारी दुनिया में एक मज़हब होता और कोई भी खुदा का इंकार करने वाला नहीं होता, और सारे लोग खुदा की पूजा करते और कुफ्र व शिर्क से बचने वाले होते। इसने दुनिया में इंसानों की आज़माइश के लिए नेकी बुराई, ज्ञान-अज्ञानता, इंसाफ-अत्याचार, अंधेरा उजाला दोनों रखा है। अल्लाह चाहता है कि बंदा अपने कर्तव्यों का निर्वहन सच्चाई और ईमानदारी से करता रहे और नतीजे और इंसानों की हिदायत की फिक्र उस पर छोड़ दे। क़ुरान कहता है कि

और अल्लाह चाहता तो तुम सबको एक ही फिरका कर देता लेकिन राह बतलाता है जिसको चाहे और समझाता है जिसके चाहे और तुम से पूछ होगी, जो काम तुम करते थे(अलनहेलः93)

एक दूसरी जगह क़ुरान इसी विषय को इस प्रकार बयान करता हैः

हर एक को तुम में से दिया हमने एक संविधान और राह, और अल्लाह चाहता तो तुमको एक धर्म पर कर देता, लेकिन तुमको आज़माना चाहता है अपने दिये हुए हुक्मों में सो तुम डर कर लो खूबियाँ, अल्लाह के पास तुम सबको पहुँचना है फिर जता देगा तुमको जिस बात में मतभेद था(अलमायेदाः48)

धार्मिक पुलिस मत बनोः

इसलिए क़ुरान गुमराह लोगों, अत्याचारियों, मुशरिकों और कुफ्र करने वालों तक अल्लाह का संदेश पहुँचाने का शांतिपूर्ण रास्ता चुनने की शिक्षा देता है, क्योंकि हिदायत देना सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के हाथ में है, इसलिए बेवजह अत्याचार से सिवाय नुक्सान के और कुछ हासिल होने वाला नहीं है। इससे विभिन्न फिरकों में आपसी रंजिश, लड़ाई और और हत्याएं होने की सम्भावनाएं होती हैं, जो क़ुरान के प्रस्तावित बहुसांस्कृतिक समाज की राह में बहुत बड़ी रुकावट है। क़ुरान हर हाल में इंसानों को मज़हबी दारोग़ा बनने से मना करता है।

 और अगर तेरा रब चाहता बेशक ईमान ले आते जितने लोग कि ज़मीन में हैं, सारे तमाम। अब तू क्या ज़बर्दस्ती करेगा लोगों पर कि हो जाएं ईमान वाले। और किसी से नहीं हो सकता कि ईमान लाए मगर अल्लाह के हुक्म से और वो डालता है गंदगी उन पर जो नहीं सोचते(यूनुसः100)

एक दूसरी जगह क़ुरान में अल्लाह फरमाता हैः

और कह दे किताब वालों को और अनपढ़ों को कि तुम मानने वाले हुए हो? फिर अगर वो मानने वाले हुए तो उन्होंने सीधी राह पाई और अगर मुँह फेरे तो तेरे ज़िम्मे सिर्फ पहुँचा देना है और अल्लाह की निगाह में हैं बंदे(आलइमरानः20)

एक और जगह स्पष्ट रूप से इंसानों को धार्मिक दारोग़ा बनने से रोकता हैः

और अगर अल्लाह चाहता तो वो लोग शिर्क न करते और हमने नहीं किया तुझको इन पर निगहबान और नहीं है तू इन पर दारोग़ा(इनामः107)

इसी सूरे में इससे पहले अल्लाह फरमा चुका हैः

रम चक ह

और उसको झूठ बतलाया तेरी क़ौम ने हालांकि वो हक़ है तो कह दे मैं नहीं तुम पर दारोग़ा

(इनामः66)

इसलिए उपरोक्त आयतों के पढ़ने से क़ुरान का रुख़ पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि वो धर्म के मामले में ज़बर्दस्ती और हिंसा के पूरी तरह खिलाफ है। इस्लाम धर्म के मामले में धैर्य से काम लेने की शिक्षा देता है, गर बदक़िस्मती से आज के मुसलमानों के एक समूह का व्यवहार इसके विपरीत है, जो ग़ैरमुस्लिमों को ज़बर्दस्ती और हिंसा के ज़रिए इस्लाम स्वीकार करा देना चाहते हैं, या फिर मुसलमानों के अन्य सम्प्रदायों के लोगों को बेवजह क़त्ल करने को धर्म की सेवा मानते हैं, जो कि वास्तव में धर्म के खिलाफ है, और क़ुरान के आदेश के भी विरुध्द है। क़ुरान ऐसे ही हिंसा में विश्वास रखने वाले समूहों के बारे में कहता हैः

और जब कहा जाता है इनको, फसाद न डालो मुल्क में तो ये कहते हैं कि हम तो सुधार करने वाले हैं, जान लो वही हैं खराबी करने वाले मगर नहीं समझते(अलबक़राः11-12)

आगे चलकर फिर याद दिलाता हैः

खाओ और पियो अल्लाह की रोज़ी और न फिरो मुल्क में फसाद (दंगा) मचाते(अलबक़राः60)

आज मुस्लिम समाज में और विशेषकर जहां वो बहुसंख्यक हैं, मुसलमानों में ऐसे हिंसक गिरोह पैदा हो गये हैं जो धर्म प्रचार और धरती पर अल्लाह का शासन स्थापित करने के नाम पर हत्या, खून बहाना, अपहरण, और आत्मघाती बम के और गैरमुस्लिमों को जबरन मुसलमान बनाने जैसे गैरइस्लामी और वहशियाना कार्यों में लगे हैं। इससे विभिन्न धर्मों के बीच की दूरियाँ बढ़ रही हैं और इस्लाम की छवि भी एक हिंसा पसंद करने वाले धर्म की बन रही है, जबकि क़ुरान के समक्ष लड़ाई या सभ्यताओं के युध्द के बिल्कुल खिलाफ है। वो सिर्फ अल्लाह के संदेश को बंदों तक पहुँचा देने के पक्ष में है, इसके बाद इसे मानना या न मानना बंदे पर छोड़ दिया गया है, क्योंकि हक(सत्य) मानने में उसी की भलाई है। जो जैसा करेगा उसके वैसा फल मिलेगा। इसलिए वो कहता है कि हम में तुम में कोई झगड़ा नहीं है।

अल्लाह रब है हमारा और तुम्हारा, हमको मिलेगें हमारे काम और तुमको मिलेगें तुम्हारे काम। कुछ झगड़ा नहीं है हममें और तुममें(अलशूराः15)

इसी तरह मुसलमानों में संप्रदायिक मतभेद भी इतने बढ़ चुके हैं कि एक संप्रदाय का मुसलमान दूसरे संप्रदाय के लोगों को काफिर और इस्लाम का दुश्मन करार देकर उन्हें नर्क का भोगी मान रहे हैं। इसी पर बस नहीं बल्कि वो उन्हें दुनिया में ही क़त्ल करके उन्हें नर्क में भेजने को इस्लामी कार्य और पुण्य का काम समझते हैं, जबकि वो अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) की नज़र में मुसलमान है, और अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) पर, पवित्र किताबों पर, क़यामत के दिन पर, और सभी पैग़म्बरों पर ईमान लाने का ऐलान कर चुके हैं। इसके बाद भी जो लोग सांप्रदायिक मतभेद की बुनियाद पर मुसलमानों में झगड़ा डालते हैं, क़ुरान उन्हें कड़े शब्दों में अज़ाब की पेशनगोई (भविष्यवाणी) करता है।

और जो लोग झगड़ा डालते हैं अल्लाह की बात में जब लोग इसको मान चुके, नका झगड़ा झूठा है, उनके रब के यहाँ उन पर ग़ुस्सा है और उनके सख्त अज़ाब है(अलशूराः16)

इस प्रकार क़ुरान के पढने से ये बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि क़ुरान शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर आधारित मानव समाज के निर्माण पर ज़ोर देता है, जहाँ लोग एक दूसरे के धर्म का आदर करें, एक दूसरे के पैग़म्बरों को आदर करें, और धर्म का प्रचार- प्रसार, गुमराह लोगों का सुधार ज़ोर जबर्दस्ती से नहीं, बल्कि प्रेम, धैर्य और शांतिपूर्ण तरीके से करें क्योंकि क़ुरान कहता हैः लकुम दीनोकुम वले यदीन (तुम्हारा धर्म तुम्हारे साथ और मेरा धर्म मेरे साथ)(अलकाफेरूनः6)

 

सुहैल अरशद, न्यु एज इस्लाम डाट काम के नियमित स्तम्भकार हैं

(उर्दू से हिंदी अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

URL: https://newageislam.com/hindi-section/the-holy-quran-protector-peaceful/d/5273


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