सीमा मुस्तफ़ा
[उर्दू से हिंदी अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम]
मैं कई दशकों से सुब्रमनियम स्वामी को जानती हूँ। वो स्वतंत्र विचार वाले ऐसे व्यक्ति हैं जो अपने लेख में कुछ पाबंदियों का लिहाज़ रखते हैं, लेकिन उस वक्त मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब एक ऐसे लेख के साथ उनका नाम जुड़ा हुआ देखा, जिस पर पूरी तरह सांप्रदायिकता का रंग चढ़ा हुआ था, और ये पूरी तरह सहिष्णुता के विरुध्द था। ये लेख एक जुनूनी विचारधारा को प्रस्तुत कर रहा था। जनता पार्टी का नेतृत्व करने वाले एक राजनीतिज्ञ ने लेख में जिस भाषा का प्रयोग किया है, उसकी बुनियाद पर उन्हें गिरफ्तार भी किया जा सकता है। देश में ऐसे क़ानून मौजूद हैं जिनके तहत बेबुनियाद और झूठी दलीलों के ज़रिए भड़काने वाले लेख लिखने पर उनसे जवाब भी तलब किया जा सकता है।
मुम्बई धमाकों की गुत्थियां सुलझाने में पुलिस अब तक नाकाम है। पुलिस जांच के दौरान एक ग़रीब व्यक्ति की जान जाने से ये केस पहले ही एक नाज़ुक मोड़ पर आ चुका है, जहाँ ज़िम्मेदारी से लिखने के बजाय जनता का प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले एक राजनीतिज्ञ ने ऐसी सामग्री लिखी, जिसमें सिर्फ मुसलमानों को निशाना बनाया गया है। इस लेख में मुसलमानों को ज़ोरदार ढंग से निशाना बनाते हुए कहा गया है कि मुसलमानों का उद्देश्य “हलाल तरीके से मुल्क के हिंदुओ को कत्ल करना है”, जब तक वो भारतीय संविधान के विरुध्द कोई प्रतिक्रिया नहीं देते और इस लोकतांत्रिक धरती के खिलाफ कोई क़दम नहीं उठाते हैं।
डाक्टर स्वामी के लेख का देशवासियों ने खूब जवाब दिया है, और जवाब देने वालों में ज़्यादातर गैरमुस्लिम हैं। इसके विपरीत स्वामी ने ऐसे मंद बुध्दि होने का प्रमाण दिया है, जो मुम्बई बम धमाकों के बाद जनता में फैले दुःख और ग़ुस्से को और बढ़ाना चाहता हो। बम धमाकों के बाद जो हालात पैदा हुए हैं और जैसा वक्त आन पड़ा है, सुब्रमनियम स्वामी ने उस समय और हालात का जनता को जोड़ने के बजाए उन्हें भड़काने के लिए प्रयोग किया है। एक राजनीतिज्ञ और जनता के प्रतिनिधि होने के नाते उनकी ज़िम्मेदारी थी कि शांति की भाषा का इस्तेमाल करके जनता को एकता के सूत्र में पिरोने की कोशिश करते लेकिन इसके विपरीत उन्होंने भड़काऊ भाषा का प्रयोग किया और जनता में फूट डालने और मतभेद को गहरा करने की कोशिश की। उन्होंने बहुत अधिक गैरज़िमम्मेदारी का सुबूत देते हुए इस्लाम और मुसलमानों को निशाना बनाया।
अपने लेख में उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि बम धमाकों के ज़रिए हिंदुओं को निशाना बनाया जाता है, लेकिन डा. स्वामी, जब मुम्बई और देश के किसी अन्य शहर में किसी भरे बाज़ार में बम धमाका होता है तो उसके ज़रिए देश की जनता को निशाना बनाया जाता है। धमाके में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, पारसी, ब्राह्मण और दलित सभी मारे जाते हैं, क्योंकि बम जाति और धर्म में विभेद नहीं कर सकता है। इस हिंदुस्तान को जिसमें हम पले-बढ़े हैं, हम एक सेकुलर और लोकतांत्रिक देश के रूप में जानते हैं, और ये सब उसकी मिलकियत है, जो यहाँ रहते हैं। ये सभी धर्मों का घर है और ये ऐसा लोकतंत्र है जो विविधता के बावजूद तरक्की कर रहा है और आगे बढ़ रहा है। असीमानंद, लश्कर और अलकायदा जैसे आतंकवादी इसे टुकड़ो में बाँटना चाहते हैं, ताकि यहाँ बर्बादी और तबाही की ऐसी कहानी लिखी जा सके, जिसमें हिंदू और मुसलमान एक दूसरे को निशाना बनायें और एकदूसरे के खून के प्यासे हो जाएं।
स्वामी जैसे लोगों से दहशतगर्द खुश होते हैं, क्योंकि वो बम की भाषा बोलते हैं। दहशतगर्दी से होने वाली तबाही को वो नफरत और गुस्से के शब्दों में ढालते हैं। यानि कोई व्यक्ति अगर आतंकवादी कारवाई के पीछे के उद्देश्य को समझ नही सका तो, स्वामी जैसे लोग उसे समझाते हैं। वो धमाकों को तुरंत शब्दों में पिरोयेगें कि ‘इस्लामी दहशतगर्दी के खिलाफ खड़े होने के लिए हर हिंदू को एक विराट हिंदू बन जाना चाहिए’। दूसरे शब्दों में सिर्फ हिंदू ही हिंदुस्तान की रक्षा कर सकता है, और स्वामी के अनुसार ‘ये हिंदुओं का हिंदुस्तान है’ और मुसलमान यहाँ सिर्फ देश पर क़ब्ज़ा करने के लिए हैं। वो मंदिरों में धमाका करना चाहते हैं, और हिंदुओं का कत्ल करना उनका उद्देश्य है। इसलिए हिंदुओं को मुसलमानों से बदला लेना चाहिए और उनकी मस्जिदों को तबाह करके मंदिर बनाना चाहिए।
स्वामी को मालूम नहीं इसलिए उन्होंने ऐसी बातें कहीं हैं। उन्हें चाहिए कि वो हमारे सामने अपने लेख का स्पष्टीकरण दें, और उस विचारधारा से कुछ समझाएं, इस देश पर कब्ज़ा करने का मुसलमानों की योजना क्या है, क्योंकि इस योजना के बारे में तो कुछ नहीं कहा जा सकता, बल्कि ऐसा लगने लगा है कि स्वामी जैसे लोग आतंकवाद के ज़रिए इस देश को एक धार्मिक देश में बदल देना चाहते हैं। उनका कहना है कि मुसलमानों को इस देश में सिर्फ इस बुनियाद पर कुबूल किया जा सकता है कि वो हिंदुस्तान को हिंदू देश के तौर पर स्वीकार करें।
स्वामी एक पढ़े लिख व्यक्ति हैं, लेकिन कहा जा सकता है कि उन्होंने हिंदुस्तान का कानून नहीं पढ़ा है, और उसके बारे में उन्हें कुछ मालूम भी नहीं है। मुसलमानों के संदर्भ में उनके बयान को इसी कानून के तहत चैलेंज भी किया जा सकता है, जो धर्म, जाति और नस्ल में भेद नहीं करता है। खुशकिस्मती की बात है कि आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले मर्द और औरतों के विचार पहाड़ जैसे विशाल थे, चूहों जैसे नहीं । इसलिए इन लोगों ने कई आधार पर देश को हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं किया, और ये आधार ऐसे थे, जिन्हें हालात और समय के मद्देनज़र खारिज नहीं किया जा सकता है। हिंदुस्तान पाकिस्तान के जैसा नहीं है जिसने इस्लाम को राष्ट्र धर्म के तौर पर अपनाया। इसके बाद देश में ज़ियाउल हक़ जैसे शासक आये, जिन्होंने धर्म और आतंकवाद के बीच फर्क मिटाने वाली रेखा ही मिटा दी।
डा. स्वामी , मैं एक हिंदू या मुसलमान नहीं बल्कि एक हिंदुस्तानी हूँ, और आप जिस देश भक्ति और राष्ट्र प्रेम की बात कर रहे हैं, उसकी शक्ल बहुत भयानक और बदसूरत है। देश में अगर ये जज़्बा पैदा हो गया, तो ऐसी आग उठेगी कि, जो अपने आगे आने वाली हर चीज़ को जलाकर खाक कर देगी। हिंदुस्तान की जनता आतंकवादियों के खिलाफ एकजुट होकर खड़ी है, और ये जनता इस आग में जलने से इंकार कर रही है, जो आप और आप जैसे लोग लगाने की कोशिश कर रहे हैं। हर शक्ल में वो आतंकवाद के खिलाफ एक होकर आवाज़ उठा रहे हैं, हिंदू या मुसलमान की हैसियत से नहीं। हिंदुस्तान को अगर एक संप्रभु ,सेकुलर और प्रजातांत्रिक देश के तौर पर बरकरार रहना है तो आप और आपकी तरह आवाज़ उठाने वालों की ज़रूरत नहीं।
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