मुफ्ती मोहम्मद ज़ाहिद क़मरुल क़ासमी
क़ुरान मजीद जिस समय और जिस समाज में अवतरित हुआ, उसका सबसे तकलीफदेह (कष्टदायक) पहलू, अराजकता, अशांति और खून खराबा था। अराजकता का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि अरब में नियमित तौर से किसी शासन का वजूद नहीं था, अरब के आसपास जो शासन स्थापित थे, वो नस्ल के वर्चस्व पर विश्वास रखते थे, और जो इंसानी समाज जन्मजात महानता और तिरस्कार के विचार पर स्थापित हो, वहाँ न्याय का स्थापित होना सम्भव नहीं। ऐसे माहौल में अल्लाह की आखरी किताब क़ुरान मजीद के अवतरित होने की शुरुआत हुई। इस किताब में जो सबसे पहली आयत अवतरित हुई उसमें शिक्षा और कलम की अहमियत को बताया गया, कि तुम इंसानों के निर्माण का पदार्थ एक ही है। इसमें इंसान के एक होने की ओर इशारा था। शिक्षा इंसान को कानून का पाबंद बनाता है, और इंसानी बराबरी के विचार से न्याय का जज़्बा उभरता है, और इंसानियत के आदर करने का विश्वास परवान चढ़ता है। इसलिए एक ऐसा देश जो शांति से वंचित था, और जहाँ अत्याचार और दहशतगर्दी ने कानून का दर्जा हासिल कर लिया था, इस्लाम ने उसको शांति, सुरक्षा से परिचित कराया, इंसानी भाईचारा का सबक़ पढ़ाया और रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) की भविष्यवाणी पूरी हुई कि एक महिला अकेली ऊँटनी पर सवार होकर सन्आ से यमन तक का सफर करेगी।
इसने अपने मानने वालों के लिए दो ऐसी ताबीरात अख्तियार कीं , जिनके अर्थ ही शांति, सुरक्षा और मिलाप के हैं, यानि मोमिन और मुस्लिम। मोमिन का अर्थ शांति देने वाले के है और मुस्लिम का अर्थ सुलह और दूसरों की सलामती का लिहाज़ रखने वाले के हैं। इस किताब की शुरुआत बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम से हुई है, जिसमें अल्लाह की सबके लिए रहमत और आप (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के मेहरबान होने का वर्णन है, और पहली सूरत की पहली आयत में ही खुदा को पूरी ‘कायनात का रब’ करार दिया गया है। रब शब्द बहुत की अधिक स्नेह, ममता को ज़ाहिर करता है और पूरे आलम का रब कह कर पूरी कायनात को भाईचारे के रिश्ते में बांध दिया गया है, और ऐसा व्यापक विचार दिया गया है कि पूरी इंसानियत एक परिवार और खानदान का दर्जा रखती है। इस तरह क़ुरान शांति, इंसानी प्रेम और आफाकियत को आम करने वाली है, लेकिन बदक़िस्मती से सूरज पर थूकने की कोशिश की जा रही है और कुछ संकीर्ण विचार के लोग ये कहने का प्रयास कर रहे हैं कि क़ुरान में कुछ कमी है, जिसकी वजह से इस किताब के पढ़ने वालों में दहशतगर्दी का रुझान पैदा होता है। ये ऐसा आरोप है कि कोई व्यक्ति सरसरी तौर पर क़ुरान पढ़ा होगा वो बिल्कुल भी इससे प्रभावित नहीं हो सकता, ये दिन को रात और बर्फ को आग कहने के बराबर है।
अरबी भाषा में दहशतगर्दी के लिए ‘अरहाब’ शब्द का प्रयोग होता है। क़ुरान ने हर मुसलमान को ये शिक्षा दी है कि उनके पास ऐसी ताक़त मौजूद रहनी चाहिए कि उनके दुश्मनों को अत्याचार करने की हिम्मत न हो, और वो प्रभावित रहें। इसे क़ुरान ने ‘क़ूवते मरहबा’ कहा है, इसलिए इस बारे में कहा गया हैः “उनके लिए जिस कदर हो ताकत और घोडे तैयार करके रखो, ताकि तुम उसके ज़रिए अल्लाह और अपने दुश्मन और दूसरे लोग जिन्हें तुम नहीं जानते, लेकिन अल्लाह उन्हें जानता है, को प्रभावित रख सको”। क़ुरान के इस बयान से स्पष्ट है कि ताकत दुश्मनों को प्रभावित रखने और उनके अत्याचार न करने देने के लिए है, न कि बेकसूर लोगों को निशाना बनाने और तबाही व बर्बादी फैलाने के लिए।
क़ुरान के आदेश जिहाद से ये गलतफहमी पैदा की जाती है कि वो बेकसूर, किसी भी ग़ैरमुस्लिम पर हमला करने और उसकी हत्या कर देने की आज्ञा देता है। इसलिए इस आयत को पेश किया जाता है, जिसमें काफिरों को आमतौर से कत्ल कर देने का हुक्म है। ये महज़ गलतफहमी है, इस आयत का सम्बंध मुशरिकीने मक्का से है। वो हर वक्त मुसलमानों से युध्दरत थे, और मुसलमानों की ओर से की जाने वाली संधि की कोशिशों को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे, इसलिए जो मुसलमानो से युध्दरत न हों, और जिन लोगों ने उनको घर से बेघर और शहर से शहर बदर नहीं किया था, क़ुरान उनके साथ बेहतरीन व्यवहार, न्याय और उपकार करने का हुक्म देता है। इसलिए इरशाद हैः “अल्लाह तुमको उन लोगों के साथ बेहतर व्यवहार और न्याय करने से नहीं रोकता, जो तुमसे धर्म के मामले में लड़ाई नहीं कर रहे हैं, और जिन्होंने तुम्हें तुम्हारे घर से नहीं निकाला है, बेशक अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है”।
दहशतगर्दी में बुनियादी तौर पर इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि कि असल अत्याचारी कौन है? बल्कि उससे सम्बंधित लोगों में से जो भी हाथ आ जाये, उसे हिंसा का शिकार बनाया जाता है। इस्लाम ने इसे बिल्कुल गैर-सैध्दान्तिक और गैरइंसानी हरकत करार दिया है। क़ुरान ने नियम तय कर दिया है कि एक व्यक्ति की गलती का का बोझ और उसकी ज़िम्मेदारी दूसरे पर नहीं डाली जा सकती। ‘क़ुरान ने एक व्यक्ति की हत्या को पूरी मानवता की हत्या के बराबर करार दिया है’। (अलमायेदाः31)
क़ुरान ने उन कारणों को भी रोकने की कोशिश की है जो दहशतगर्दी का कारण बनते हैं, ज़्यादा दहशतगर्दी का कारण ये बात होती है कि लोग दूसरों को जबरन अपने विश्वास को मानने वाला बनाना चाहते हैं। ईसाईयों का धार्मिक इतिहास इस की खुली हुई मिसाल है। क़ुरान ने साफ ऐलान कर दिया कि धर्म के मामले में कोई ज़बर्दस्ती की गुंजाइश नहीं है। (अलबक़राः256) इसलिए इस बात से भी मना किया गया है कि कोई गिरोह दूसरों के धार्मिक विश्वास और उनके पेशवाओं को बुरा भला कहे, कि इससे भावनाएं भड़कती हैं। (अनआमः107)
किसी भी समाज में दहशतगर्दी फैलने का कारण अत्याचार और नाइंसाफी है, जो समूह अत्याचार का शिकार होता है अगर वो अत्याचारी का मुक़ाबला नहीं कर पाता और इंसाफ की प्राप्ति से वंचित रहता है, तो उसमें बदला लेने की भावनाएं पनपती हैं, और जब वो देखता है कि क़ानूनी रास्ते बंद हैं, तो गैरक़ानूनी रास्ता पकड़ लेता है, इसलिए दहशतगर्दी रोकने का सबसे असरदार तरीका ये है कि समाज में अत्याचार का दरवाज़ा बंद किया जाये, और न्याय को बिना किसी पक्षपात के लागू किया जाये, ताकि दहशतगर्दी की ओर ले जाने वाले कारण बाकी न रहें। इसलिए क़ुरान ने जगह जगह न्याय का आदेश दिया है और उसकी बड़ी ताक़ीद की है। इरशाद है कि अल्लाह न्याय करने का हुक्म देता है। (अननहेलः90) क़ुरान ने ताक़ीद की है कि किसी भी क़ौम से दुश्मनी भी तुमको उसके साथ अत्याचार व अन्याय न करने दे और न्याय के मार्ग से हटा न पाये। (अलमायेदाः8)
इस वक्त हालात ये हैं कि इस्लामी दुनिया और मुसलमानों के खिलाफ आतंकवादी होने का दुश्प्रचार किया जा रहा है, हालांकि खुद मुसलमान भी देश के और वैश्विक आतंकवाद का निशाना बने हुए हैं। जिन देशों में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं वहां मुसलमानों की हालत बयान के लायक नहीं है। मुसलमान अपने मुल्क में भी खुद अपनी इच्छा से इस्लामी जीवन पध्दति लागू करना चाहते हैं तो उसमें सांस्कृतिक लड़ाई और कट्टरपंथ का नाम देकर अवरोध उत्पन्न किया जाता है, और उनसे वही कुछ कहा जाता है जो पैग़म्बरों की क़ौम उनसे कहा करती थी, जैसा कि हज़रत शीश (अलै.) और उनकी क़ौम का ज़िक्र करते हुए क़ुरान की सूरे ऐराफ़ में इसका वर्णन किया गया है।
(उर्दू से हिंदी अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)
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