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Hindi Section ( 3 Dec 2012, NewAgeIslam.Com)

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To Shave or Not To Shave दाढ़ी मुँडना चाहिए या नहीं

 

 

 ऐमन रियाज़, न्यु एज इस्लाम

3 अप्रैल, 2012

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

दक्षिण पश्चिम लंदन में वोडाफ़ोन के एक स्टोर में नियुक्ति के कुछ घंटों के बाद ही शाहिद सलीम को स्टोर के पीछे के कमरे में ले जाया गया जहाँ स्टोर मैनेजर ने उसे नौकरी से बाहर निकाले जाने के बारे में बताया। उसे नौकरी से सिर्फ इसलिए नहीं निकाला गया कि वो एक मुस्लिम था, अगर ऐसा होता तो उसे नौकरी पर रखा ही नहीं जाता, बल्कि इसलिए कि वो एक दाढ़ी वाला मुसलमान था।

इक्कीस वर्षीय सलीम का 'इस्लामोफोबिया' (इस्लाम का भय) और वास्तव में 'बियर्डोफोबिया (Beardophobia)' (दाढ़ी से भय) से ये पहली बार सामना था, इससे उसे ज़बरदस्त आघात पहुँचा। सलीम ने बाद में एक रिपोर्टर को बताया कि, "हर समय [स्टोर का मैनेजर] मुझसे बात करता था उसने मुझे नीचा दिखाने वाले अंदाज़ में सरे आम वोडाफ़ोन के एक स्टाफ के सामने बात की जिससे मैं हतोत्साहित और परेशान हुआ और मानसिक रूप से मुझे कष्ट पहुँचा'' उसने मेरे कपड़ों बारे में कुछ भी नहीं कहा, उसने सिर्फ ये कहा, अगर मेरे दाढ़ी है तो वो मेरे साथ काम करना नहीं चाहता।

वास्तव में सलीम न तो पहला मुस्लिम है और न ही आख़री, जिसे दाढ़ी के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ा हो। ऐसा सभी पश्चिमी देशों- उत्तरी अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में होता है, और पूर्व के कई गैर मुस्लिम क्षेत्रों का तो ज़िक्र करने की भी ज़रूरत नहीं है। सबसे प्रसिद्ध घटना में, पूर्व क्रिकेटर डीन जोंस ने कुछ साल पहले एक मैच के दौरान कमेंट्री करते हुए हाशिम अमला की तरफ इशारा करते हुए कहा कि एक आतंकवादी ने कैच ले लिया है'

ये खुलेआम और साथ ही साथ ढके छिपे रूप से भी होता है। सलीम को कम से कम ये तो बताया गया कि आखिर उसे क्यों निकाला गया। बहुत से मुसलमान अपनी नौकरी से हाथ धो बैठते हैं या तरक्की के मामले में उन्हें नज़रअंदाज़ किया जाता और इन लोगों को इस बात का एहसास भी नहीं होता कि दाढ़ी उनके रास्ते में आड़े आ रही है।

मुसलमानों की दाढ़ी में ऐसा क्या है जो गैर मुस्लिमों को चुभता है और जो उन्हें बहुत तकलीफ पहुँचाता है? मनोवैज्ञानिक इसे कण्डीशनिंग (conditioning) कहते हैं। लोग अपने अनुभवों से सीखते हैं और उसी के आधार व्यवहार करते हैं। और पिछले कुछ दशकों में 'दाढ़ी वाले मुसलमानों'' ने गैर मुसलमानों को कई बुरे सबक़ सिखाये हैं।

लगभग हर एक आतंकवादी हमला चाहे वो न्युयार्क, बाली, मैड्रिड या लंदन में हों, दाढ़ी वाले मुसलमानों ने अंजाम दिए हैं। इस्लामी चरमपंथ के दो प्रमुख चेहरों ओसामा बिन लादेन से लेकर उमर बकरी मोहम्मद तक सभी लंबी दाढ़ी रखते हैं। इसने गैर मुसलमानों के लिए, अगर सभी मुसलमानों को नहीं तो दाढ़ी वाले मुसलमानों को आतंक के साथ जोड़ने की 'स्थिति'  पैदा कर दी।

ये 'बियर्डोफोबिया (Beardophobia)' भी उसी तरह अतार्किक है जिस तरह आपने आप में इस्लामोफोबिया (Islamophobia) है। शाहिद सलीम या हाशिम अमला या दूसरे वो बहुत सारे लोग जो दाढ़ी बढ़ाते हैं, आतंकवादी नहीं हैं। ये एक छोटी सी तादाद है जो आतंकवाद में लिप्त है  और ये सोचना निरर्थक है कि सभी दाढ़ी वाले मुस्लिम आतंकवादी हैं।

दुर्भाग्यवश हमारे दिमाग इतने तार्किक नहीं हैं जितना कि हम उन्हें होना पसंद करते हैं। मुस्लिम होने के नाते, हमें ये अच्छी तरह पता होना चाहिए। इसी तरह हास्यास्पद कारणों से हम खुद गैर मुसलमानों और कई मुस्लिम समूहों के खिलाफ भेदभाव नहीं करते हैं? न तो हर एक पश्चिमवासी या मिसाल के लिए हर गैर मुस्लिम इस्लामोफ़ोब है जैसा कि अभी भी कई मुस्लिम सभी गैर मुस्लिम देशों पर 'मुस्लिम विरोधी'' होने का कलंक लगाते हैं।

उम्मत के अंदर सुन्नी, शियों के साथ भेदभाव करते हैं, और इसी तरह शिया भी सुन्नी के खिलाफ करते हैं, देवबंदी, बरेलवियों के खिलाफ और बरेलवी, देवबंदियों के खिलाफ, अरब, फारस और कुर्दों के खिलाफ और इसके विपरीत, और ये फेहरिस्त काफी लम्बी है। और ये भेदभावा इस पर निर्भर करती है कि कौन बहुमत में है या सत्ता में है। और अधिकांश भेदभाव रहस्यमय कारणों से है जैसा कि दाढ़ी पर भेदभाव है। वास्तव में बहुत सारे दाढ़ी वाले मुसलमान खुद बिना दाढ़ी वाले मुस्लिमों के खिलाफ ऐसे ही कारणों के आधार पर भेदभाव करते हैं।

इस्लामोफोबिया (Islamophobia) और बियर्डोफोबिया (Beardophobia) का शिकार होने के नाते हमें ये याद रखना ज़रूरी है कि जिस तरह इस्लाम और मुसलमानों के बारे में ''स्वाभाविक आतंकवादी''  जैसा कुछ नहीं है उसी तरह सभी गैर मुसलमानों के बारे में ''सव्भाविक मुस्लिम विरोधी'' जैसा कुछ नहीं है (या वो मुस्लिम जो हमसे कुछ अलग सोचते हैं या व्यवहार करते हैं)। निस्संदेह न तो इस्लामोफ़ोबिया और न ही बियर्डोफोबिया )Beardophobia(  को कहीं भी किसी तरह का संस्थागत समर्थन हासिल है।

शाहिद सलीम की घटना सितम्बर में हुई, तब वोडाफ़ोन ने इस मामले की जांच की और सलीम से खेद भी प्रकट किया। जबकि लोगों को ये बयान भी दिया कि सलीम को निकाला नहीं गया था बल्कि खुद सलीम ने 'उस पद को स्वीकार नहीं किया जिसकी उसे पेशकश की गई थी। हालांकि ये सच है या नहीं, वोडाफ़ोन में किसी के द्वारा दाढ़ी की वजह से किसी को नौकरी से निकालने के मामले की जांच करना और इस पर माफी मांगना, कट्टरता की बात को स्वीकार करने को प्रकट करता है। ठीक इसी तरह डीन जोंस पर आईसीसी की तरफ से अधिकारिक रूप से पाबंदी लगा दी गयी, जबकि हाशिम अमला को उसके बाद दक्षिण अफ्रीकी टीम का कप्तान बनाया गया।

जो भी हो, दाढ़ी मुंडवाई जाए या नहीं,  बहुत बड़ी तादाद में मुसलमानों के मन में एक दुविधा बनी हुई है। और हजारों तरह के भेदभाव सिर्फ इसलिए है कि मुट्ठी भर लोग बहक गए हैं। जो भी हो इसका समाधान ये है कि हम दुनिया को बताएँ कि इस्लाम अमन और शांति का धर्म है, बंदूक और बमों का धर्म नहीं हैं। लेकिन इससे पहले कि इस तरह की कण्डीशनिंग  गैर मुस्लिमों के बीच पैदा हो, ये सबक हम मुसलमानों को खुद ही समझना चाहिए।

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