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Hindi Section ( 4 Apr 2013, NewAgeIslam.Com)

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Each Muslim Should Be An Ambassador Of Islam मुसलमानों के हाथों मुसलमानों की हत्या

 

अली खान

23 मार्च, 2013

(उर्दू से अनुवाद- मुहम्मद अनजुम, न्यु एज इस्लाम)

डेरा इस्माइल खान से दमिश्क तक और कराची से करबला तक कुछ लोग मुसलमानों की हत्या करने पर तैयार हैं। लगभग रोज पाकिस्तान से खबर मिलती है कि किसी शिया डॉक्टर, वकील, मजदूर बल्कि राहगीर तक को शिकार की तरह खोज खोज के मारा जा रहा है। हाल में प्रोफेसर सिब्ते जाफर साहब की हत्या कर दी गई। इससे पहले लाहौर के प्रसिद्ध आंखों के डाक्टर अली हैदर और उनके ग्यारह साल के बेटे मुर्तजा हैदर की हत्या कर दी गई। क्वेटा में आए दिन हजारों गरीबों को बेदर्दी से बसों और कारों से निकाल कर या उनके घरों में घुस कर उनकी हत्या कि जाती है, इराक में हर दूसरे दिन बम धमाके की ख़बर मिलती है। मन में विचार आता है कि न जाने कितनी औरतें विधवा होगी, कितने बच्चे अनाथ हुए होंगे कितने लोगों का परिवार उजड़ जाएगा। मध्य पूर्व के अन्य देशों और मध्य एशिया के कई देशों में भी यही स्थिति है। अब दमिश्क से ताजा खबर मिली है कि शेख मोहम्मद सईद रमज़ान अलबोती और 42 अन्य लोग मस्जिद में आत्मघाती हमले के शिकार हो गए। इन लोगों में शेख अलबोती का पोता भी मारा गया । शेख अलबोती हनफी थे और प्रसिद्ध अग्रणी धर्मगुरु, लेखक और विचारक थे। सवाल यह उठता है कि इस्लाम के नाम पर मुसलमानों को क्यों मारा जा रहा है?

पहली महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर इन संगठनों और संस्थाओं की समीक्षा की जाए जो क़त्ल व ग़ारत को हवा देते हैं तो तुरंत यह स्पष्ट होगा कि उन लोगों का इन ताग़ूती शक्तियों से संबंध है जो मुसलमानों को बर्बाद करना चाहते हैं। यानी लोग कहते हैं के इस्लाम को नष्ट करना चाहते हैं लेकिन यह कैसे हो सकता है जब इस्लाम का खुदा खुद हाफिज है। बहरहाल पिछली सदी के इतिहास का संक्षिप्त अध्ययन किया जाए तो बहुत जल्द स्पष्ट होगा कि आज जो लोग आतंक फैला रहे हैं वह कल उन्हीं ताग़ूती शक्तियों की आगोश में पले बढ़े थे जिन्हें आज वह बुरा भला कहते हैं। रूस के खिलाफ मुजाहिदीन को किसने तैयार किया? दूसरी उतनी ही महत्वपूर्ण बात यह है कि इन लोगों का समर्थन उन मुसलमानों ने भी किया है जो एक तरफ अपने को गर्व से धर्म सेवक कहलवाते हैं और दूसरी तरफ लाभ के लालच में लोगों के हाथ बिक चुके हैं जो मुसलमानों का  सम्मान और आब्रु लुटने पर आमादा हैं। ये लोग वही हैं जो एक तरफ तकफिर के फतवे जारी करते हैं और दूसरी तरफ आपने देशों की इज्जत उन शक्तियों के सुपुर्द करते हैं जो इसी खोज में हैं कि मुसलमान आपस में लड़कर एक दूसरे को नष्ट कर बैठें। ऐसा नहीं है कि ये लोग केवल इस ज़मीन के खास हिस्से में पाए जाते हैं बल्कि तथ्य यह है कि यह सारी दुनिया में छाए हुए हैं यहां तक ​​कि भारतीय भी हैं। आवश्यक है कि वे अपने गरेबानों में झांक कर देखें और इस बात पर गौर करें कि उनकी हरकतों से किसके हाथ मजबूत होते जा रहे हैं।

आज आप इंटरनेट के माध्यम से गूगल पर 'तकफ़ेर इस्लाम और हिन्दुस्तान देखें तो कई वेबसाइट मिलेंगी जो औरों के विश्वासों पर ऐसे टिप्पणी किए जाते हैं जैसे लोग खुद फतवा देने के लिए तैयार हैं। इंटरनेट एक बहुत ही उम्दा और कमाल की चीज़ है लेकिन एक त्रुटि है कि हर व्यक्ति अपने को धर्मगुरु बल्कि हरफन मौला समझने लगा है। ऐसा भी नहीं है कि ऐसी बातें केवल लोगों की निजी वेबसाइट पर मिलती हैं बल्कि कई संस्थान भी हैं जो बिना सोचे समझे औरों के विश्वासों के बारे में यूं फतवे जारी करते हैं जैसे समाचार जारी की जाती हैं।

आज मुसलमान हजारों और लाखों की संख्या में सड़कों पर निकल आते हैं अगर पश्चिमी देशों के खिलाफ विरोध करना हो लेकिन जब वह लोग जो अपने को मुसलमान कहते हैं इस्लाम के नाम पर अत्याचार और विनाश फैलाते हैं तो ऐसी चुप्पी छा ​​जाती है जैसे सब ज़ुबानों पर मुहर लगा दी गई हो। मुसलमान कब बेदार होंगे?

अक्सर लोग मुझ से यह सवाल करते हैं कि इस्लाम मे गिरावट क्यों आई  है? पहले तो यह गलतफहमी दूर करता हूं कि इस्लाम मे गिरावट हुई है क्योंकि इस्लाम की सुरक्षा का दावा तो हमारे ईश्वर ने कुरान में किया है। हाँ इतना है कि इस्लामी मजतमों और मुसलमानों में अजीबोग़रीब जमुद नज़र आता है और पिछड़ेपन और अराजकता हर तरफ से हम को घेरे हुए है। जाहिर है कि यह कारणों पर एक नहीं दर्जनों किताबें लिखी जा सकती हैं, लेकिन एक बात तो कहना जरुरी है और वह यह है कि हम एक सीमा तक अपनी उस हालत के लिए जिम्मेदार हैं। यह आपस की लड़ाई संघर्ष हमको नष्ट कर देगी।

शेख रमजान अलबेاती दमिश्क की मस्जिद उमवी में हर शुक्रवार को खुतबा पढ़ते थे। विभिन्न मुद्दों पर वे बात करते थे लेकिन एक बात हमेशा ताकिद के साथ कहते थे और यह था कि मुसलमानों को दुनिया के सामने ऐसे पेश आना चाहिए जैसे वह इस्लाम के राजदूत हो। यानी मुसलमानों को इस बात का एहसास होना चाहिए कि उनके जीवन शैली औरों के लिए एक प्रकार का खामोश दावा है। अब कोई न्याय से बताए कि खून खराबे को देखकर लोग क्या सोचेंगे? के इस्लाम में भेदभाव और हिंसा है? के इस्लाम मुआज़ अल्लाह नफरत सिखाता है? कितनी अजीब बात है कि शेख अलबोती को मस्जिद में हत्या कर दी गई जबकि कुछ ही दिन पहले उन्होंने गर्व से कहा था कि वह अपने को मस्जिद का निगाहदार मानते थे?

कुरान केवल मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि सारे विश्व के लिए गाईड का चिराग है. हमारे रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम केवल मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि तमाम आलमीन के लिए रहमत बनाकर भेजे गए। तो फिर मज़लुम ईनसानों की जान लेने की अनुमति कैसे शरीयत ने दी है? अहद जाहिलियत के अरबी भी इतने क्रूर और दमनकारी नहीं थे जितने वह लोग हैं, जो पाकिस्तान और अन्य देशों में मुसलमानों को ढूंढ ढूंढ कर हत्या कर रहे हैं।

23 मार्च, 2013 स्रोत: इंकलाब, नई दिल्ली

URL for Urdu article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/ali-khan--علی-خان/each-muslim-should-be-an-ambassador-of-islam--مسلمانوں-کے-ہاتھوں-مسلمانوں-کا-قتل/d/11003

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