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Hindi Section ( 20 Jul 2011, NewAgeIslam.Com)

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Religion and Terrorism: Zubair Ahmed धर्म और आतंकवाद: ज़ुबैर अहमद


ज़ुबैर अहमद शुक्रवार, 08 जुलाई 2011, 20:01 IST

पिछले हफ्ते मेरे ब्लॉग पर कई लोगों ने अपनी राय भेजी जिसके लिए मैं सब को धन्यवाद देता हूँ. आप में से कई लोगों ने लिखा कि मुझे घर मिलने को मज़हब से नहीं जोड़ना चाहिए था.

मैं खुद ऐसा नहीं करना चाहता हूँ लेकिन अगर मकान मालिक आपका नाम सुन कर ब्रोकर से कहे मैं मुसलमान को किराए पर घर नहीं दूंगा तो आप किया सोचेंगे?

समस्या ये है की मैं अकेला नहीं हूँ. कई ऐसे लोग हैं जिन्हें इस तरह की दिक्क़तों का सामना करना पड़ रहा है.

ये भी सच है की सब मकान मालिक ऐसे नहीं हैं और ये भी सच है की भेदभाव क्षेत्रीय आधार पर भी है.
और सच ये भी है कि मुसलमान भी हिंदुओ के साथ भेदभाव करते हैं.

लेकिन समाज में भेदभाव है तो इसका खंडन करना ज़रूरी है.

दुख हुआ एक साहब की टिप्पणी से जिन्होंने केवल 'टेस्ट'के नाम से अपनी राय प्रकट की थी.

उनका कहना था,"अगर वहां (मुंबई) आके बम विस्फोट करेंगे तो यही हाल होगा."

एक दुसरे व्यक्ति ने अपना नाम नहीं लिखा लेकिन कुछ इस तरह से टिप्पणी की, " सभी मुस्लिमों को अब आतंकवाद रोकने के लिए कुछ ना कुछ करना होगा और समाज को विश्वास दिलाना होगा कि आप उनके साथ नहीं हैं."

यह मानसिकता ग़लत है और मेरा ब्लॉग इसी मानसिकता के विरोध में था.

क्या आतंकवाद को रोकने की ज़िम्मेदारी सिर्फ मुसलामानों पर है या फिर सभी भारतीय नागरिकों पर? और क्या मुसलामानों को समाज को सही मानों में विश्वास दिलाना होगा की वो आतंकवादियों के साथ नहीं हैं? क्या समाज को शक है की मुसलमान आतंकवादियों के हमदर्द हैं?

ये पढ़ कर मुझे अयोध्या में एक साहब की बात याद गई. उन्होंने मुझ से कहा, "ज़ुबैर जी मुसलमान देशद्रोही होते हैं."

मैंने कहा ये आपकी राय है लेकिन अगर आप गृह मंत्रालय से उन नामों की लिस्ट मंगाएं जिन्होंने 1947 से अब तक पैसे लेकर पाकिस्तान को सरकारी फाइलें बेचीं हैं तो आप अपना बयान वापस ले लेंगे, क्योंकि उनमें 95 प्रतिशत लोग मुसलमान नहीं हैं"

वो ख़ामोश हो गए. मैंने कहा कि हम उस लिस्ट को देख कर ये नहीं सोचेंगे की इसमें कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान. बल्कि हम सभी को देशद्रोही मानेगे.

आतंकवादी तो अकसर बाहर से आते हैं. लेकिन उन देशद्रोहियों का कोई खंडन क्यों नहीं करता जो रोज़ रिश्वत लेकर आपका काम करते हैं और देश को नीलाम करते हैं.

अभी पिछले दिनों एक विदेशी एफ़आरआरओ के दफ्तर गया, उसके कागज़ात अधूरे थे लेकिन रिश्वत देकर उसने अपना काम करवा लिया.

पासपोर्ट बनवाने जाएं तो बिना घूस के आपका काम नहीं होगा.

जबसे हेडली का मामला सामने आया है क़ानून सख्त हो गए हैं लेकिन इसके कारण रिश्वतखोरी भी अधिक बढ़ गई है.

अगर कोई पड़ोस का विदेशी आतंकवादी आए तो वो आराम से पुलिस और पासपोर्ट दफ़्तर को घूस दे कर एक भारतीय नागरिक बन सकता है.

देश को ऐसे ही लोग ख़तरे में डाल रहे हैं और सही मानो में ऐसे ही लोग देशद्रोही हैं.पर वो तो देशभक्तों में शामिल होते हैं क्योंकि वो सरकारी दफ़्तरों में मुलाजिम हैं.

टिप्पणियाँ Comments खें

·        3. 22:42 IST, 08 जुलाई 2011 indian: जु़बैर जी अपना देस चाहे जैसा भी हो अपना ही होता है , जहाँ तक भारत में आतंकवाद की बात है तो इसके लिए पाकिस्तान में पल रहे जेहादी मानसिकता के लोग ज़िम्मेदार है, जब तक पाकिस्तान पूरी दुनिया के सामने बेनकाब नही हुआ था, बहुत कम भारतीय मुसलमान थे जो पाकिस्तान की तारीफ़ नही करते थे. मुझे आज भी याद है आज से दस साल पहले मेरे कई मुसलमान दोस्त थे जो बताते थे कि जुम्मा के दिन मस्जिद में नमाज़ के दौरान किस तरह से भारत के बारे भड़काया जाता था और पाकिस्तान की तारीफ़ की जाती थी , कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्हें पाकिस्तान के सारे क्रिकेट खिलाडि़यों के नाम याद थे और उनके पसंदीदा खिलाड़ी भी पाकिस्तानी ही थे और भारतीय खिलाडि़यों के खेल उन्हें बेकार नजर आता था. आज भी मुस्लिम बहुल इलाके में पाकिस्तान के मैच जितने पर पटाखे जलाये जाते है. 
जुबैर जी आपका लेख बदले के भावना से प्रेरित नजर अता है, क्योंकि अप उन गिने चुने लोगो में से नजर आते है जिनको देश सब कुछ देता है और भारतीय से प्यार मिलता है ;इसके बावजूद थोडा सा भी कोई परेशानी होता है तो उसे भेदभाव करार देते है . आपके सामने सिने अभिनेता हाश्मी का उदाहरण है , जिन्हें समूचे भारतीय समुदाय ने क्या कुछ नही दिया परन्तु किसी सोसाइटी में घर नही मिला तो उसने धार्मिक भेदभाव करार दिया . आज अगर वो किसी मुस्लिम देश में होते तो क्या उतनी आजा़दी मिल पाती जीतनी भारत में है. इसी एक प्रकार पूर्व क्रिकेट कप्तान पर जब मैच फिक्सिंग पर आरोप लगा तो उसने भी धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाया. आपका आरोप भी कुछ इसी तरह का है.

·        4. 23:06 IST, 08 जुलाई 2011 naval joshi: मुझे अपना यह मत जाहिर करने में अब कोई संकोच नहीं है कि आप बेशक मुसलमान होने का भ्रम पाले हों लेकिन मुसलमान हो पाना अभी आपके लिए दूर की कौडी जैसा है.जो वास्तव में मुसलमान या हिन्दू हो गया तो उसे कोई भी मुसलमान या हिन्दू नजर ही नहीं सकता है. जो मोटी बुद्धि के लोग हैं वे ही हिन्दू या मुसलमान का रोना रोते है और अपनी पहचान लोगों पर थोपने की कोशिश करते है. यही विवाद का कारण भी हो जाता है. लोगों को इस बात से बहुत अन्तर नहीं पडता कि आपकी इबादत का तरीका क्या है. लेकिन जब हम अपनी पहचान दूसरों पर थोपने लगते हैं तो सामने वाला भी तीखी प्रतिक्रिया करता है .हम और आप जैसे लोग मुसलमान या हिन्दू होते नहीं हैं इसलिए दिखने की कोशिश करते हैं और यह आडम्बर हमें उन्हीं बहस के उसी कीचड़ में घसीट देता है जहॉ साम्प्रदायिक लोग अफवाह उत्तेजना को लेकर बात का बंतगड़ बना देते हैं।

5. 00:37 IST, 09 जुलाई 2011 anand: सब लोग उतने समझदार नहीं होते लेकिन वो उतने बुरे भी नहीं होते ये बात सही है कि ज़िम्मेदारी सबकी है लेकिन स्वाभाविक तौर पर उनकी ज़्यादा है , जो आतंकवाद के शिकार भी है और उसके इल्ज़ाम से बदनाम भी. हाँ नफ़रत का कारोबार दोनों तरफ से है. जी हाँ दोनों तरफ से.अगर मैं आपको वो बाते बताऊं जो मुझे कुछ मुस्लिम दोस्तों ने कही हैं तो अआप हैरान रह जायेंगे, लेकिन मैं मनाता हूँ वे समझदार नहीं हैं,दिशाभ्रमित हैं.आप भी यही मानें. पूरे मुल्क या कौम के बारे में इतनी जल्दी राय कायम करें.

6. 00:48 IST, 09 जुलाई 2011 vivek kumar pandey:

जुबैर जी देश को और दुनिया को सबसे बड़ा ख़तरा इस्लामिक चरमपंथ से है क्योंकि उनको व्यापक समर्थन और सहानुभूति मिलती है जबकि हिन्दू चरमपंथ फल-फूल नहीं सकता और वह बस कुछ लोगों तक ही सीमित है .इसका मुख्य कारण आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक सोच की कमी है .आज भी मुसलमानों को मदरसे की तर्ज़ पर सिर्फ़ धर्म की शिक्षा दी जाती है, जो उनमें धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देती है और उनको आधुनिक सोच से दूर रखती है . मुझे पोलियो टीकाकरण अभियान में शामिल होने का मौका मिला और मैंने देखा की कुछ मुस्लिम लोग अपने बच्चों को पोलियो की ड्रॉप्स पिलाने से साफ़ मना कर देते है .पूछने पर बताते है कि ये सरकार की साजिश है हमारी आबादी को रोकने की .मैंने भी ठान लिया था कि मैं लोगो को समझाउगा और उनकी ग़लतफ़हमी दूर करूँगा, लेकिन मुझे कामयाबी नहीं मिली .मैंने पूछा कि आप टीवी./रेडियो पर शाहरुख खा़न और अमिताभ बच्चन को पोलियो ड्रॉप्स की अपील करते हुए देखते हैं ,जबाब मिला हाँ वो तो पैसे के लिए कुछ भी कर सकते है .आप इसको किस रूप में देखते है?

7. 02:16 IST, 09 जुलाई 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

भेदभाव के बहुत से आधार हैं लेकिन सबसे ज़्यादा भेदभाव धर्मं के नाम पर मुसलमानों के साथ हो रहा है. क्या मुसलमान इस देश के किरायेदार हैं जो सबको विश्वास दिलाते फिरें कि हम आतंकवादी नहीं हैं. जिसको जो समझना है समझता रहे, लेकिन सलाह दें कि मुसलमानों को क्या करना चाहिए. बम कोई और फोडे और नाम मुसलमानों का आता हैं. अब तो असली आतंकवादी बेनकाब हो चुके हैं. रिश्वत लेकर देश को बेचने वाले इस देश के असली गद्दार हैं और हमें फख्र है की देश में घोटाले करने वाले मुसलमान नहीं हैं.

8. 09:19 IST, 09 जुलाई 2011 Amit Bhatt:

आपको किराये में मिलने में परेशानी हुई इससे आप विचलित है,या वास्तव में हिन्दू ,मुसलमान का भेदभाव आपको परेशान कर रहा है. छोडिये जु़बैर सहाब इन बातों में कुछ नहीं रखा है ये तो केवल बातें हैं बातों का क्या? भेदभाव केवल हिन्दू- मुसलमान में ही नहीं होता है जिसके लिए आप फिक्रमंद दिखने की कोशिश कर रहे है. बात कुछ और ही है,जिसे आप छुपाना चाहते हैं. एक भाई अमीर हो जाता है तो अपने ग़रीब भाई के प्रति वह कैसा व्यवहार करता है,इसी मुम्बई में दूसरे राज्य के लोगों को किस तरह मारा गया क्या यह व्यवहार कम पीडा़दायी था. आपको कोई उदाहरण देना सूर्य को दिया दिखाने जैसा होगा आप सब जानते हैं लेकिन हम आपकी यह राजनीति नहीं समझ पा रहे हैं जो आप कर रहे हैं.

11. 13:15 IST, 09 जुलाई 2011 BHEEMAL Dildar Nagar: जनाब जु़बैर भाई आपने उदहारण देकर अपने विष-वमन की प्रक्रिया चालू कर रखी है . इसे मैं आल्ला मियाँ की या राम जी की मर्ज़ी कहूं. फिलहाल मेरा शक एकदम विश्वास में बदल गया है कि बीबीसी स्टाफ को भारत मैं ज़हर फैलाने का ठेका मिल गया है, येनकेन प्रकारेंण विष-विष. यह अभी स्पष्ट होना चाहिए कि ये ठेका धृतराष्ट्र , गांधारी , शकुनि , दुर्योधन या दुशाशन किसने दिया है . मेरा शक पक्का हो गया कि ज़हर फैलाने का काम कितना आसान और लाभकारी काम है . अगर ये काम पाकिस्तान में करो तो... मैं आपका धन्यवाद करना नहीं चाहता.

14. 13:59 IST, 09 जुलाई 2011 jane alam: ज़ुबैर साहब, आपके ब्लॉग को पढ़कर मुझे ऐसा लग रहा है कि हमारे देश में जबतक भ्रष्टाचार व्याप्त रहेगा तब तक आतंकवाद को शह मिलती रहेगी. आज ज़रूरत है हमें एक जुट होने की, हमारे दिलों में देश प्रेम की भावना जागृत करने की. जब तक भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ कोई सख्त़ का़नून नहीं बनेगा तब तक आतंकवाद फलता फूलता रहेगा .

19. 16:28 IST, 09 जुलाई 2011 tahir ahmed:

जो लोग अपने कर्त्तव्य का पालन ठीक ढंग से करे वो सभी देशद्रोही हैं. देशवासियों को मौलिक अधिकारों का तो ज्ञान है लेकिन उनसे कोई 11 मूल कर्तव्यों के बारे में पूछे तो शायद 5 का भी जवाब नहीं दे पाएंगे और ऐसे कितने लोग है जो ये दावा कर सकते हों कि उन्होंने देश के लिए यह सही काम किया है . बोलने में तो सभी देशभक्त हैं लेकिन देश के लिए किया क्या ,उनका योगदान क्या रहा . ऐसे 90 फ़ीसदी लोग हैं जिन्होंनें रोटी खाई , अपने शौक पूरे किये और कुछ नहीं किया . इसलिए देशभक्ति का भ्रम दिमाग से निकाल देना चाहिए.

22. 17:27 IST, 09 जुलाई 2011 BINDESHWAR PANDEY[BHU]: माना कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं किन्तु आज ज़्यादातर आतंकवादी मुसलमान हैं इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता? साहब गेंहूँ के साथ घुन को भी पिसना पड़ता है. लोगों को अफज़ल गुरु तथा जु़बैर अहमद में फ़र्क करने में वक्त तो लगेगा ही.

23. 17:33 IST, 09 जुलाई 2011 raza husain: यह बात पूरी दुनिया जानती है कि मुसलमान का ईमान पैसा नहीं बल्कि देश के लिए क़ुर्बानी देना होता है.हिन्दू धर्म में पैसे की पूजा होती है . इतिहास गवाह है कि अंग्रेज़ों ने इंडिया में 200 साल राज किया. कौन से लोग अंग्रेज़ों को यहाँ लाए. सिर्फ पैसे के चक्कर में हिन्दू रजा अंग्रेज़ों को इंडिया मे लाए . मुसलमानों ने तो अपनी जान देकर अंग्रेज़ो को इंडिया से बाहार किया. आखिर क्यों इंडिया में मुसलमानों को आतंकी नज़र से देखा जाता है ? इंडिया में सरकारें हिन्दू होती है. नेपाल, बांग्लादेश , कश्मीर, चीन सीमा पर चंद पैसों की लालच में सेना के लोग उन लोगों को सीमा के अंदर घुसने देते हैं. यही नहीं इनके राशन कार्ड भी बन जाते है. इंडिया में 6-7 करोड़ विदेशी लोग आराम से रह रहे है .यह क्या आतंकवादी नहीं है ? इस देश में पासपोर्ट , राशन कार्ड , सरकारी लोन सब कुछ पैसा देकर हो जाता है. क्या यह देशद्रोही नहीं है ? बांग्लादेश सीमा रोज़ पार कराई जाती है , नेपाल सीमा से स्मग्लिंग पुलिस और सेना की मिलीभगत से होती है , कश्मीर सीमा से आतंकवादियों को पैसा और हथियार आता है यह सबको पता है ? यही हाल चीन का है बिना देश की सेना , पुलिस , डिपार्टमेंट के अफसरों के चीन की सेना इंडिया की सीमा के अंदर कब्ज़ा नहीं कर सकती? आज हिंदुस्तान भ्रष्टाचार , आबादी , कन्याभ्रूणहत्या जैसे कारनामों में दुनिया में नाम रोशन कर रहा है . क्या इन सबका दोषी मुसलमान है? 1974 में देश का बटवांरा हुआ, जितना दोष जिन्ना का था उससे ज़्यादा नेहरु , पटेल का था , कश्मीर समस्या के दोषी भी नेहरु हैं.हर बात पर मुसलमानों को दोषी ठहराना बंद होना चाहिये . अब तो हिन्दू आंतकवादी भी दुनिया के सामने गये हैं ? मेरे कहने का मतलब यह है कि बुरे लोग हर मज़हब में होते है इसका यह मतलब नहीं को वो मज़हब ख़राब है? हमे मिल-जुलकर देश में आतंकवाद , भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं को दूर करना होगा तभी देश तरक्की करेगा.

24. 17:41 IST, 09 जुलाई 2011 PRAVEEN SINGH: क्या बीबीसी और पत्रकार टीम भारत राष्ट्र की शत्रु हैं , इतनी बात अमरीका में करो तो सीआईए तुमको सी -ऑफ कर देगा .

25. 17:51 IST, 09 जुलाई 2011 jubairamir: आप ये कह सकते हैं कि अफ़ज़ल गुरु नकली नाम है वो एक पंडित है .आप ये भी कह सकते हैं कि कसाब नाम का कभी पैदा ही नहीं हुआ , सब सरकारी गद्दारों की धोखाधड़ी है . साथ में इतने दर्द जो मानवजाति के लिए है आपके , कह सकते हो कि पंडितों और सिख लोगों की कश्मीर मैं पूजा होती है , 2 लाख पंडितों को स्वर्गवासी बना दिया , ये परम देश भक्त लोगो ने किया. अगले ब्लॉग में ज़रूर लिखो कि यासीन मालिक , गिलानी , अफ़ज़ल गुरु को शांति के लिए भारत रत्न भी देना चाहिए .

26. 18:13 IST, 09 जुलाई 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat: जनाब बिंदेश्वर पाण्डेय जी, आपका ये सोचना बिलकुल गलत है कि ज़्यादातर आतंकवादी मुसलमान हैं, आप बताइए क्या लिट्टे, माओवादी, उल्फा, संघ ये सब इस्लामिक संगठन हैं और दुनिया में जाने कितने ऐसे संगठन होंगे. ज़रूरी बात ये है कि मुसलमानों के नाम का शोर ज्यादा मचाया जाता है. अगर मुसलमान अपने हक़ के लिए या इंसाफ़ कायम करने के लिए लड़तें हैं तब भी उन्हें आतंकवादी कहा जाता है लेकिन अमरीका बेवजह ईराक पर हमला करता है फिर भी उसे आतंकवादी नहीं कहा जाता. आखि़र क्यों ?
मुसलमानों के पकडे जाते ही ख़बरिया चैनल उसे आतंकवादी घोषित कर देते हैं लेकिन प्रज्ञा सिंह, पुरोहित, कुलकर्णी और असीमानंद को आतंकवादी नहीं कहते. आखिर क्यों? (जबकि असीमानंद जुर्म क़ुबूल कर चुके हैं)

29. 20:07 IST, 09 जुलाई 2011 MD. KHURSHID ALAM: प्रिय