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Hindi Section ( 18 Jan 2015, NewAgeIslam.Com)

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Terrorism is One,Why Calling with Different Names एक ही आतंकवाद पर अलग-अलग राग क्यों?

 

ज़ुबैर अहमद

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

16 जनवरी 2015

 

 

 

 

 

 

 ग्यारह सितंबर और शार्ली एब्दो, इन दोनों हमलों के बाद ऐसे सुर सुनाई दिए कि आप या तो हमारे साथ हैं या फिर चरमपंथियों के साथ.

ग्यारह सितंबर के हमले के समय कहा जा रहा था कि ये इस्लाम और पश्चिमी सभ्यताओं के बीच हिंसक टकराव है. फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी ने कहा कि ये हमारी सभ्यता पर घोषित एक जंग है.

इसका मतलब ये कि अमरीका के राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुएल हंटिंगटन की बातों में दम है. उन्होंने 1996 में अपनी किताब 'क्लैश ऑफ़ सिविलाइज़ेशंस' में पश्चिम और इस्लाम के टकराव की भविष्वाणी की थी.

पश्चिमी देशों की ख़ामोशी

 

 

 

 

 

 

 शायद हंटिंगटन के मत पर पश्चिमी देशों में उतना ही यक़ीन है जितना अमरीका के 'ग्लोबल वॉर ऑन टेररिज़्म' पर, जिसकी शुरुआत अफ़ग़ानिस्तान पर अमरीकी हमले से हुई थी.

भारत ख़ुद इस्लामी चरमपंथियों के हमलों का शिकार रहा है लेकिन पश्चिमी देशों में इस पर ख़ामोशी है.

नाइजीरिया में बोको हराम के हमलों पर उतनी तीखी प्रतिक्रियाएं क्यों नहीं आतीं? यमन एक अरब और मुस्लिम देश है जो चरमपंथियों से सालों से जूझ रहा है. वहां आए दिन पेरिस जैसे हमले होते रहते हैं. पेरिस में हमले से कुछ घंटे पहले यमन में जानलेवा चरमपंथी हमले हुए थे जिसे सुर्ख़ियों में भी जगह नहीं मिली.

'सभ्यता पर हमला'

 

 

 

 

 

 

 आख़िर 26 नवंबर 2008 की रात मुंबई पर हुए हमलों को पश्चिमी देशों ने सभ्यता पर हमला क्यों नहीं कहा? न केवल ये हमले मुंबई के पाँच अलग-अलग जगहों पर एक सोची समझी योजना के तहत किए गए थे बल्कि हमला करने वाले बाहर से आए थे जबकि पेरिस के बंदूक़धारी फ्रांस में पैदा हुए थे और पश्चिमी सभ्यता में ही उनकी परवरिश हुई थी. इसे शायद फ्रांस की सभ्यता की नाकामी की तरह भी देखा जाना चाहिए.

मुंबई हमलों की रात भारत की सरकार, जनता और नेताओं ने जिस संयम तरीक़े से काम लिया वो सराहनीय था. भारतीय भी तो कह सकते थे कि मुंबई हमला हिन्दू धर्म और सभ्यता के ख़िलाफ़ जंग है. इसे यहाँ सभ्यता की कसौटी में नहीं देखा गया.

सभ्यताओं के बीच संवाद

 

 

 

 

 

 

भारत के लोग पाकिस्तानी जनता के विरोधी नहीं हैं पाकिस्तान सरकार की उन नीतियों के ख़िलाफ़ हैं जिनसे चरमपंथियों को शह मिलती है.

दुनिया भर में सब अमरीका के नेतृत्व वाले 'ग्लोबल वॉर ऑन टेरररिज़्म' को जानते हैं, लेकिन उसी साल संयुक्त राष्ट्र ने 2001 को 'डायलाग अमंग सविलाइज़ेशंस' का साल घोषित किया था ताकि पश्चिमी देशों और बाक़ी दुनिया, ख़ास तौर पर मुसलमान देशों के बीच संवाद का सिलसिला शुरू हो सके लेकिन इसे दुनिया में कितने लोग याद रखते हैं?

Source: http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/01/150116_charlie_hebdo_debate_india_rns

URL: http://newageislam.com/hindi-section/zubair-ahmad/terrorism-is-one,why-calling-with-different-names--एक-ही-आतंकवाद-पर-अलग-अलग-राग-क्यों?/d/101093

 

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