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Hindi Section ( 7 Apr 2013, NewAgeIslam.Com)

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Security of non-Muslims in Islamic state इस्लामी राज्य में गैर मुसलमानों की सुरक्षा

 

ज़फ़र दराक क़ास्मी

26 मार्च, 2013

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

पश्चिमी देशों का ये नियम रहा है कि हर अच्छी चीज़ को अपने से जोड़ कर पेश करते है और ये साबित करने की कोशिश करते हैं कि ये नेमत हमारे ज़रिए से दुनिया को मिली है वरना दुनिया इन बातों से अंजान और अज्ञानता से ग्रस्त थी। अब ज़रा सा मानवाधिकार के सिलसिले को देखिए। बड़े दावों के साथ कहा जाता है कि उनकी कल्पना लोगों को इंग्लैंड के मैग्ना कार्टा (जो  1215 में लागू हुआ) के ज़रिए से नसीब हुआ है जबकि एक हिजरी में मीसाक़े मदीना की शक्ल में मानवाधिकार पर बेहतरीन संविधान इस्लाम ने दुनिया को दिया। जबकि वो इस्लाम के 600 बरस बाद की बात है। लेकिन वाक़ेआ ये है कि सत्रहवीं सदी के क़ानूनी विशेषज्ञों से पहले किसी के ज़हन में ये कल्पना मौजूद नहीं थी कि मैग्ना कार्टा में ट्रायल बाई ज्युरी (Trial by Jury) हेबिस कारपस (Corpus Habes) और टैक्स लगाने के विशेषाधिकारों पर पार्लियमेंट के कन्ट्रोल के अधिकार भी शामिल हैं। अगर मैग्ना कार्टा लिखने वाले इस ज़माने में मौजूद होते तो उन्हें बहुत हैरत होती कि मैग्ना कार्टा में ये चीजें भी मौजूद थीं। जहां तक ​​मेरी जानकारी का सम्बंध है, सत्रहवीं सदी से पहले पश्चिम में मानवाधिकार और नागरिकता के अधिकार की कोई अवधारणा मौजूद नहीं थी। सत्रहवीं सदी के बाद भी एक अवधि तक दार्शनिकों और कानूनी विचार पेश करने वाले लोगों ने तो ज़रूर इस ख़याल को पेश किया था। लेकिन वास्तविक रूप से इस अवधारणा का सुबूत अठारहवीं सदी के आखीर में अमेरिका और फ्रांस के संविधानों और घोषणाओं में ही मिलता है। इसके बाद विभिन्न देशों के संविधान में मूल अधिकारों का ज़िक्र ज़रूर किया गया है। लेकिन ज़्यादातर हालात में यही स्थिति पाई गई है कि जो अधिकार कागज़ पर दिए गये हैं उन्हें व्यवहारिक रूप से लागू नहीं किया गया है।

इस्लाम में मानव अधिकार का महत्व:

दूसरी बात जो मैं चाहता हूँ कि शुरुआत में ही अच्छी तरह स्पष्ट हो जाय, ये है कि जब हम इस्लाम में मानवाधिकार की बात करते हैं तो उसका अर्थ दरअसल ये होता है कि ये अधिकार ख़ुदा के दिए हुए हैं। ये किसी राजा, क़ानून बनाने वाली किसी मजलिस के दिए हुए नहीं हैं। बादशाह और क़ानून बनाने वाली संस्थाओं के दिये हुए अधिकार जिस तरह दिए जाते हैं उसी तरह जब वो चाहें वापस भी लिए जा सकते हैं। लेकिन इस्लाम में इंसान के जो अधिकार हैं, वो ख़ुदा के दिए हुए हैं। दुनिया की क़ानून बनाने वाली कोई मजलिस और दुनिया की कोई भी हुकूमत उनके अंदर परिवर्तन करने का अधिकार नहीं रखती है। उनको वापस लेने, रद्द कर देने का कोई अधिकार किसी को नहीं है। सबसे पहली चीज़ जो इस मसले में हमें इस्लाम में मिलती है, वो ये है कि इस्लाम बजाय खुद इंसान बहैसियत इंसान के कुछ अधिकार तय करता है। दूसरे शब्दों में इसका मतलब ये है कि हर इंसान चाहे वो हमारे मुल्क और वतन का हो या किसी दूसरे मुल्क और वतन का, हमारी क़ौम का हो या किसी दूसरी क़ौम का, मोमिन हो या गैर मुस्लिम, किसी जंगल का रहने वाला हो या किसी रेगिस्तान में पाया जाता हो। बहरहाल सिर्फ इंसान होने की हैसियत से उसके कुछ अधिकार हैं, जिनको एक मुसलमान अवश्य ही अदा करेगा और उसका (दीनी) फर्ज़ है कि वो उन्हें अदा करे।

ज़िंदगी के अस्तित्व का अधिकार

इनमें पहली चीज़ ज़िंदा रहने का हक़ और इंसानी जान के एहतेराम का फर्ज़ है। क़ुरान मजीद में फरमाया गया है:

मन क़त्ला नफ्सन बेग़ैरे नफ्सिन अव फसादिन फिल अर्दे फकाअन्नमा क़त्लन्नासे जमीआ वमन अहयाआ फकाअन्नमा अहया अन्नासा जमीआ (अलमाएदा: 32)

''जिस शख्स ने किसी एक इंसान को क़त्ल किया बग़ैर इसके कि इससे किसी जान का बदला लेना हो, या वो ज़मीन में फसाद बरपा करने का मुजरिम हो, उसने जैसे तमाम इंसानों का क़त्ल कर दिया।'' जहां तक ​​खून का बदला लेने या फसाद फिल अर्द पर सज़ा देने का सवाल है, उसका फैसला एक अदालत ही कर सकती है या किसी क़ौम से जंग हो तो एक नियमित शासन व्यवस्था ही इसका फैसला कर सकती है। बहरहाल किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से ये अधिकार नहीं है कि वो बदला ले या फसाद फिल अर्द की सज़ा दे, इसलिए हर इंसान पर ये अनिवार्य है कि किसी इंसान के क़त्ल का गुनाह हरगिज़ न करे। अगर किसी ने एक इंसान को क़त्ल किया तो ये ऐसा है जैसे उसने तमाम इंसानों को क़त्ल कर दिया। इसी बात को दूसरे जगहों पर क़ुरान मजीद में इस तरह दोहराया गया है कि

वला तक़तोलुन्नफ्सल्लती हर्रमल्लाहो इल्ला बिलहक़्क़ (अल अनाम: 151)

''किसी जान को हक़ (यानी क़सास (बदला) या फसाद की सज़ा) के बग़ैर क़त्ल न करो जिसे अल्लाह ने हराम किया है।''

यहां भी क़त्ल की प्रतिष्ठा को ऐसे क़त्ल से मुक्त किया है जो हक़ के साथ हो, और हक़ का फैसला बहरहाल कोई सक्षम अदालत ही करेगी। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने क़त्ल नफ्स (किसी के क़त्ल) को शिर्क के बाद सबसे बड़ा गुनाह करार दिया है, जैसा कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: अकबरुल कबायर इशराक बिल्लाह व क़त्लन नफ्से। इन सभी आयतों और हदीसों में नफ्स का इस्तेमाल किया गया है जो किसी खास नफ्स को बाँटता नहीं कि इसका मतलब ये लिया जा सकता है कि अपनी क़ौम या अपने मुल्क के शहरी या किसी खास नस्ल, रंग या देश या धर्म के आदमी को क़त्ल न किया जाए। ये हुक्म सभी इंसानों के बारे में है और बजाय खुद हर इंसानी जान को ख़त्म करना हराम किया गया है। अब आप देखिए कि जो लोग मानवाधिकारों का नाम लेते हैं, उन्होंने अगर अपने संविधानों या घोषणाओं में कहीं मानवाधिकार का उल्लेख है तो वस्तुत: इसमें ये बात शामिल होती है कि ये अधिकार या उनके नागरिकों के हैं, या फिर वो उनको सफेद नस्ल वालों के लिए आरक्षित समझते हैं। जिस तरह ऑस्ट्रेलिया में इंसानों का शिकार करके सफेद नस्ल वालों के लिए प्राचीन निवासियों से ज़मीन खाली कराई गई और अमेरिका में वहाँ के पुराने निवासियों का नरसंहार किया गया और शेष बचे लोगों को विशिष्ट क्षेत्रों (Reservations ) में कैद कर दिया गया, और अफ्रीका के विभिन्न क्षेत्रों में घुसकर इंसानों को जानवरों की तरह क़त्ल किया गया, ये सारी चीजें इस बात को साबित करती हैं कि इंसानी जान बहैसियत 'इंसान कोई सम्मान उनके दिल में नहीं है। अगर कोई सम्मान है तो अपनी क़ौम या अपने रंग या नस्ल के आधार पर है। लेकिन इस्लाम सभी इंसानों के लिए इस अधिकार को स्वीकार करता है। अगर कोई व्यक्ति वहशी क़बीले से सम्बन्ध रखता है तो उसे इस्लाम इंसान ही समझता है।

क़ुरान मजीद की उपरोक्त आयत के बाद ये फरमाया गया है कि:

वमन अहयाआ फकाअन्नमा अहया अन्नासा जमीआ (अलमाएदा: 32)

'और जिसने किसी नफ्स को बचाया, उसने जैसे तमाम इंसानों को ज़िंदगी बख्शी।''

आदमी को मौत से बचाने की अनगिनत रूप हैं। एक आदमी बीमार या ज़ख़्मी है। इस पर ध्यान दिये बना कि वो किस नस्ल, किस क़ौम या किस रंग का है, अगर वो आपको बीमारी की हालत में या ज़ख़्मी होने की हालत में मिला है तो आपका काम ये है कि उसकी बीमारी या ज़ख़्म के इलाज की फिक्र करें। अगर वो भूख से मर रहा है तो आपका काम ये है कि उसे खिलाएं ताकि उसकी जान बच जाए। अगर वो डूब रहा है या और किसी तरह से उसकी जान खतरे में है तो आपका फर्ज़ है कि उसको बचाएँ। ये जानकर हैरत होगी कि यहूदियों की धार्मिक पुस्तक 'तलमूद मैं इस आयत का लेख दर्ज है मगर उसके भावार्थ ये हैं कि, ''जिसने इसराइल की एक जान को मारा, अलकिताब (Scripture) की निगाह में उसने जैसे सारी दुनिया को क़त्ल कर दिया और जिसने इसराइल की एक जान को सुरक्षित रखा, उसने मानो सारी दुनिया की सुरक्षा की। तलमूद में ये भी साफ लिखा है कि अगर कोई गैर इसराइल डूब रहा हो और तुमने उसे बचाने की कोशिश की तो गुनहगार होगे। नस्लवाद का करिश्मा देखिए, हम हर इंसान की जान को बचाने को अपना कर्तव्य समझते हैं क्योंकि क़ुरान मजीद ने ऐसा ही हुक्म दिया है। लेकिन वो अगर बचाना ज़रूरी समझते हैं तो सिर्फ बनी इसराइल की जान बाक़ी रहे दूसरे इंसान तो दीने यहूद में इंसान समझे ही नहीं जाते। उनके यहाँ कोईम की कल्पना है जिसके लिए अंग्रेजी में Gentile (गैर यहूदी सम्बंधी) अरबी में उम्मी का इस्तेमाल किया जाता है, ये है कि उनके कोई मानवाधिकार नहीं हैं। ये केवल बनी इसराइल के लिए आरक्षित हैं। क़ुरान मजीद में भी इसका उल्लेख आया है कि यहूदी कहते हैं, लैसा अलैना फिल अमीनिस्स सबील। यानी हमारे ऊपर उम्मियों के बारे में (यानी उनका माल खाने में) कोई पकड़ नहीं है। अल्लाह ने जो असल शरीयत बनी इसराइल को इनायत की थी, उसमें ये सभी मानवाधिकार सभी इंसानों के ही लिये थे। तौरात में अब भी ये आयत मौजूद है कि, ''कोई परदेशी (गैर क़ौम का व्यक्ति) तुम्हारे साथ तुम्हारे देश में रहता हो तो उसके साथ बदसलूकी न करना। जो परदेशी तुम्हारे साथ रहता हो उससे देशी (इजरायल) जैसा व्यवहार करना बल्कि तुम उससे अपने ही समान प्रेम करना क्योंकि तुम भी मिस्र में परदेशी थे। (जारी )

26 मार्च, 2013 स्रोत: रोज़नामा हिन्दुस्तान एक्सप्रेस, नई दिल्ली

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