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Hindi Section ( 22 Oct 2013, NewAgeIslam.Com)

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After All Who does Mahmood Madani Support आखिर महमूद मदनी किसके समर्थक हैं?

 

ज़फ़र आग़ा

21 अक्टूबर, 2013

भारतीय इतिहास की जानकारी रखने वाले लोग मीर जाफ़र और मीर सादिक़ के नाम से परिचित होंगे। जाफ़र और सादिक़ इसलिए याद नहीं किए जाते कि उन्होंने कोई बड़ा ऐतिहासिक कारनामा अंजाम दिया था। इन दोनों का नाम इतिहास में इसलिए प्रसिद्ध है कि उन्होंने अंग्रेज़ों से मिलकर अपने आकाओं की पीठ में छुरा घोंपा था। मीर जाफ़र ने बंगाल के शासक नवाब सिराजुद्दौला के खिलाफ अंग्रेजों से मिलकर अपने नवाब की तबाही का सामान किया था, जिसके बाद बंगाल में अंग्रेजों के शासन की स्थापना हो गई थी।

इसी तरह दक्कन में मीर सादिक़ ने टीपू सुल्तान को धोखा देकर अपने हाकिम को युद्ध के मैदान में अंग्रेजों के हाथों क़त्ल होने के लिए छोड़ दिया था। इसलिए मीर जाफ़र और मीर सादिक़ भारतीय इतिहास में इतने बदनाम हुए कि आज दोनों धोखे के प्रतीक के रूप याद किए जाते हैं। क्योंकि इन दोनों के धोखे से न सिर्फ भारत पर अंग्रेजों का क़ब्ज़ा हो गया था बल्कि भारत से मुस्लिम शासन का अंत हो गया था। यही कारण है कि इन दोनों के बारे में अल्लामा इक़बाल का ये शेर बहुत प्रसिद्ध हुआ:

जाफ़र अज़ बंगाल सादिक़ अज़ दक्कन

तंगे मिल्लत, तंगे दीं, तंगे वतन

लेकिन अफसोस की भारतीय मुसलमानों का इतिहास मीर जाफ़र और मीर सादिक़ के दौर से अब तक सिर्फ इन्हीं के जैसे किरदारों से भरा हुआ है। भारतीय इतिहास में बहादुर शाह ज़फ़र जैसे व्यक्तित्व कम मिलते हैं , जबकि मीर जाफ़र और मीर सादिक़ जैसे लोग भरे पड़े हैं। इस हक़ीक़त से सभी परिचित हैं कि मौलाना आज़ाद के बाद आज़ाद हिंदुस्तान से मुस्लिम नेतृत्व का खात्मा हो गया, लेकिन न जाने क्या बात है कि जब कभी चुनाव का मौका आता है तो अचानक मुस्लिम लीडर गली गली में पैदा हो जाते हैं और मुसलमानों की सूझबूझ का ठेका अपने सिर ले लेते हैं। इस सूचि में अक्सर उलमा पहली पंक्ति में होते हैं। ऐसे ही नेताओं में से एक नेता ने एक बड़े सम्मेलन में मुसलमानों को ये सलाह दी कि कांग्रेस पार्टी, भाजपा (या मोदी) का डर बताकर मुसलमानों का वोट हासिल न करें। उन्होंने मुसलमानों को ये सलाह दी कि वो किसी को नाकाम करने के बजाय अपने तरक़्क़ी के लिए अपने वोट का इस्तेमाल करें। मौलाना ने ये नहीं कहा कि मुसलमान अगर इस देश में तरक़्क़ी करना चाहते हैं तो नरेंद्र मोदी के पक्ष में अपने वोट का इस्तेमाल करें। भला कोई आलिमे दीन ये खुलकर कैसे कह सकता है कि मोदी के पक्ष में अपने वोट का इस्तेमाल करें, लेकिन जो बात महोदय ने नहीं कही, वो भारतीय मीडिया खुल कर कह रहा है। प्रसिद्ध अंग्रेज़ी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने महोदय के बयान पर एक विशेष संपादकीय लिखा, जिसमें कहा, "मदनी (साहब) ने मुसलमानों को अच्छा सुझाव दिया है।" इस संपादकीय में अख़बार ने आगे लिखा कि मदनी साहब ने ये बयान देकर, "कबूतर को बिल्ली के आगे छोड़ दिया है" और इसका फायदा उठाकर बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने उनकी अनकही बात के बारे में अपनी राय दी।

हालांकि अखबार ने ये भी लिखा है कि हज़रत मदनी (यानी मौलाना महमूद मदनी) ने अपने बयान में मोदी का कोई ज़िक्र नहीं किया, लेकिन उन्होंने ये ज़रूर कहा कि, "सेकुलर सरकारें राजस्थान और उत्तर प्रदेश में दंगे नहीं रोक सकीं।" आख़िर में टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपने संपादकीय में मौलाना के बयान का स्वागत करते हुए ये लिखा कि मौलाना ने मुसलमानों को सलाह दी है कि वो अपने तरक़्क़ी और बेहतर शासन के लिए वोट दें। आज हिंदुस्तान का हर व्यक्ति इस बात से परिचित है कि इस समय मीडिया में "तरक़्क़ी और बेहतर शासन" का प्रतीक नरेंद्र मोदी समझे जा रहे हैं। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, यहां हर किसी का संवैधानिक अधिकार है कि वो हर मामले में न केवल अपनी राय दे सकता है बल्कि राजनीतिक मामलों में दूसरों को राय दे सकता है। लेकिन ये राय कि मुसलमान 2014 में अपनी तरक़्क़ी के लिए वोट दें और दूसरे शब्दों में मोदी को वोट दें, ये सलाह कोई मुस्लिम नेता ही दे सकता है, क्योंकि मोदी पर 2002 के मुस्लिम नरसंहार का आरोप है। सिर्फ इल्ज़ाम ही नहीं बल्कि भारतीय धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग ये मानता है कि गुजरात में मुस्लिम नरसंहार मोदी ने ही कराया था। गौरतलब है कि इस नरसंहार के दौरान माँओं के गर्भ से बच्चों को निकाल कर हत्या की गई थी और दिन दहाड़े मुस्लिम महिलाओं का बलात्कार किया गया था। आज तक तीस्ता सीतलवाड और उनके जैसे विचार रखने वाले दर्जनों हिंदू गुजरात में मुसलमानों के साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ अदालतों में संघर्ष जारी रखे हुए हैं। जबकि दूसरी ओर मुस्लिम नेता ये सलाह दे रहे हैं कि गुजरात की घटनाओं को भूलकर अपनी तरक़्क़ी के लिए मोदी को वोट दीजिए। ऐसे में मीर जाफ़र और मीर सादिक़ की याद ज़रूर ताज़ा हो जाती है।

दरअसल मुसलमानों के पतन का कारण यही है कि हमारे लोगों में मीर जाफ़र और मीर सादिक़ जैसे लोगों की कोई कमी नहीं है। गौरतलब है कि 2014 के आम चुनाव ऐतिहासिकता के लिहाज़ से भारतीय मुसलमानों के लिए 1857 ई. के स्वतंत्रता संग्राम से कम महत्वपूर्ण नहीं होंगे। 1857 में मुसलमानों के हाथों से सत्ता गयी थी, इसी तरह अगर 2014 में हिन्दुत्व ताक़तें सफल हो गईं, तो ये देश बाक़ायदा हिंदू राष्ट्र में तब्दील हो जाएगा और फिर गुजरात की तरह सारे हिंदुस्तान में मुस्लिम सिर उठाकर नहीं जी सकेंगे। क्या ये तरक़्क़ी कही जाएगी? इसमें कोई शक नहीं कि जब बंगाल और दक्कन में मीर जाफ़र और मीर सादिक़ ने मुस्लिम शासकों की पीठ में खंजर घोंपा था तो मुस्लिम क़ौम गुलाम हो गई थी, लेकिन मीर जाफ़र और मीर सादिक़ ने व्यक्तिगत तौर पर काफी तरक़्क़ी की थी। इस तरह अगर मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए तो इसमें कोई शक नहीं कि मुस्लिम क़ौम तो दोयम दर्जे का नागरिक बन जाएगा, लेकिन मुट्ठी भर मुस्लिम लीडरों की व्यक्तिगत रूप से बहुत तरक़्क़ी होगी।

2004 में गुजरात दंगों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी को जब ये खतरा महसूस हुआ कि चुनाव हार सकते हैं तो उस वक्त भी एक "हिमायत कमेटी" बनी थी, जिसने मुसलमानों को ये सलाह दी थी कि "श्री वाजपेयी के पक्ष में वोट इस्तेमाल किया जाए।" लेकिन वाजपेयी जी का इस चुनाव में जो हाल हुआ, उससे आप बख़ूबी वाक़िफ़ हैं। मीर जाफ़र और मीर सादिक़ जैसे लोग हर देश में, हर दौर में होते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि मुसलमानों में ऐसे चरित्र की कमी नहीं है, लेकिन समकालीन मुस्लिम, मीर जाफ़र और मीर सादिक़ के दौर के मुसलमान नहीं रहे। इस लोकतांत्रिक देश में उन्हें अपने वोट का मूल्य अच्छी तरह मालूम है। वो इस बात को जानते हैं कि अगर हम दूसरे दर्जे के नागरिक बन गए तो फिर तरक़्क़ी हमारे लिए क्या मायने रखती है?

बात सिर्फ इतनी है कि भाजपा मुस्लिम वोट से डरी हुई है, क्योंकि उसको इस बात का अंदाज़ा है कि मोदी को प्रधानमंत्री बनने से कोई अगर रोक सकता है तो वो मुसलमान हैं। इसलिए संघ परिवार को इस समय मीर जाफ़र और मीर सादिक़ की तलाश है, इसलिए 2014 तक हमारे लोगों में कई मीर जाफ़र और मीर सादिक़ नज़र आएंगे। उनसे सावधान रहना और अपने अस्तित्व और दूसरे दर्जे का नागरिक बनने से बचने के लिए वोट डालने में हमारी भलाई और तरक़्क़ी है।

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