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Hindi Section ( 22 Jan 2013, NewAgeIslam.Com)

Education and the Muslims मुसलमान और इल्म

 

ज़फ़र आग़ा

10 जनवरी, 2013

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

मैं हिंदू हूँ लेकिन इस्लाम का भी तालिबे इल्म (छात्र) हूँ। लोग हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की शिक्षा का असल अर्थ भूल जाते हैं। उन्होंने जो शिक्षा दी है उसका मुकाबला दुनिया में नहीं हो सकता। मत भूलिए कि हज़रत जिबरईल अमीन ने (अल्लाह के) रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को सबसे पहला सबक 'पढ़ो' का दिया। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम खुद कभी स्कूल नहीं गए लेकिन उन्होंने अपने मानने वालों को हमेशा यही सबक़ दिया कि तालीम हासिल करो। ये अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ही थे, जिन्होंने फरमाया, तुम जब शिक्षा के रास्ते पर चलते हो तो जैसे अल्लाह के रास्ते पर चलते हो।'' आपका ये भी क़ौल (कथन) है कि 'एक आलिम (विद्वान) के क़लम की रौशनाई एक शहीद के खून से ज़्यादा क़ीमती है।''

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इस्लाम और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के बारे में ये किस व्यक्ति के विचार हैं? ये शब्द भारतीय जनता पार्टी के मशहूर नेता राम जेठ मलानी के एक लेख का हिस्सा हैं, जो तहलका मैग्ज़ीन के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुआ है। राम जेठ मलानी जैसे हिंदू और भाजपा के नेता रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की तालीम के बुनियादी मकसद को इस कदर जानते हैं लेकिन अफसोस ये है कि खुद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के उम्मती इन शिक्षाओं को भूल रहे हैं। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की शिक्षाओं में दोनों जहान को शामिल किया गया है। एक सही मुसलमान वही है जो आखिरत के साथ साथ इस दुनिया को बखूबी बरत सकता हो, लेकिन आज मुसलमानों की अक्सरियत इस बात से बेखबर है। अगर ऐसा न होता तो फिर सच्चर कमेटी रिपोर्ट हिंदुस्तानी मुसलमानों के बारे में ये नहीं कहती कि भारतीय मुसलमानों में ग्रेजुएशन की डिग्री रखने वालों की संख्या महज़ चार फसीद है, जो दलितों से भी कम है। दूसरे शब्दों में आज हिंदुस्तानी मुसलमान आधुनिक शिक्षा के मैदान में दलितों से भी पिछड़े हैं। ये हाल है उस क़ौम का, जिसके प्यारे रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को सबसे पहला पैग़ामे इलाही 'पढ़ने' का मिला। फिर उस परवरदिगार ने कहा कि ''इल्म क़लम से हासिल होता है।'' यानी परवरदिगारे आलम ने मुसलमानों को ये स्पष्ट कर दिया कि असल मकसद तालीम हासिल करना है और इसी तालीम को हासिल करने के लिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ''तालीम हासिल करने के लिए अगर चीन जाना पड़े तो इससे भी परहेज़ मत करो' हद तो ये है कि ऐसे पढ़े लिखे मुस्लिम कैदी जो जंगो में गिरफ्तार होते थे, अगर वो पांच मुसलमानों को तालीम दे देते थे तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम उन्हें आज़ाद कर देते थे। आज राम जेठ मलानी जैसे कट्टर हिन्दू को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का ये सबक़ याद है लेकिन मुसलमान इस सबक़ को भूल चुके हैं।

सवाल ये है कि आख़िर हम कब तक लापरवाही का शिकार रहेंगे? आख़िर में मुसलमान शिक्षा जैसे फ़र्ज़ को पूरा कब करेंगे? आज शिक्षा से दूर होने के कारण इस इक्कीसवीं सदी में मुसलमान दुनिया के सबसे पिछड़े लोगों में से हैं। सऊदी अरब, पाकिस्तान, हिंदुस्तान और अन्य देशों के मुसलमान शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया के दूसरे लोगों से पीछे हैं। हद तो ये है कि हिंदुस्तान में हम दलितों से भी पीछे रह गए हैं। आश्चर्यजनक बात ये है कि अभी डेढ़ सौ साल पहले अंग्रेज अफसरों ने हिंदुस्तानी मकतबों के बारे में लिखा था कि इन संस्थाओं की शिक्षा का स्तर किसी ऑक्सफोर्ड कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी से कम नहीं लेकिन आज हमारे इस्लामी स्कूलों की ये हालत है कि मामूली सा भी पढ़ा लिखा मुसलमान अपने बच्चों को इन स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए तैयार नहीं है। इसके बावजूद हम गहरी नींद सो रहे हैं। जो क़ौम अपने दौर की शिक्षा से बेखबर हो जाती है, वो क़ौम गुलामी का शिकार हो जाती है। आज सारी दुनिया के मुसलमानों पर पश्चिमी देशों का प्रभुत्व क्यों है? इसका कारण यही है कि मुसलमान आधुनिक दैर की शिक्षा से बहुत दूर हैं। आज की दुनिया विज्ञान, उद्योग और लोकतंत्र वाली है जबकि मुसलमानों में इन बातों की कमी है, जिसकी वजह से हमें ये देखने को मिल रहा है कि हमारे दुश्मन कभी इराक पर कब्जा जमा लेते हैं तो कभी अफगान पर। खुद हिंदुस्तान में कभी बाबरी मस्जिद शहीद की जाती है तो कभी गुजरात जैसे राज्य में मुसलमानों का नरसंहार किया जाता है जबकि हमारे पास रोने के अलावा कोई चारा नहीं।

10 जनवरी, 2013 स्रोत: रोज़नामा वक़्त, पाकिस्तान

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