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Hindi Section ( 25 Oct 2013, NewAgeIslam.Com)

‘The Terrorists Can’t Be Muslims’ 'आतंकवादी मुसलमान नहीं हो सकते'

 

याक़ूब ख़ान बंगश

7 अक्टूबर, 2013

बहुत जिज्ञासू प्रवृत्ति का होने के नाते पाकिस्तानी हमेशा ये सोच कर हैरान रहते हैं की वास्तव  में 'आतंकवादी' कौन लोग हैं। हो सकता है कि कुछ पाकिस्तानियों के लिए इसका जवाब स्पष्ट हो, जबकि अब भी अधिकांश पाकिस्तानी इसके बारे में अनिश्चित हैं। जब मैं अपनी क्लास में एक आतंकवादी हमले पर बात करता हूँ तो अनिवार्य रुप से ये सवाल पैदा होता है और कभी कभी छात्र ही खुद बहुत रचनात्मक विचार पेश करते हैं।

जब मैं उनसे पूछता हूँ तो अक्सर मेरे छात्र ये जवाब देते हैं कि मुसलमान आतंकवादी नहीं हो सकते। जब मैं उनसे इसकी वजह पूछता हूँ तो वो जवाब देते हैं कि मुसलमान, मुसलमान को नहीं मार सकते। कहीं ऐसा न हो कि ये लेख इतिहास का एक लेक्चर बन जाए, इसलिए सिर्फ ये उल्लेख करना काफी होना चाहिए कि ऐसा पहली बार हुआ है जब मुसलमानों ने मुसलमानों को बड़ी संख्या में कत्ल किया है और यहाँ तक कि हमारे अपने इतिहास में गौरियों ने ग़ज़नवियों का कत्ल किया, मुग़लों ने पठानों का कत्ल किया, मुग़लों ने एक दूसरे मुग़लों को मारा, विभिन्न मुस्लिम शहज़ादों का कत्ल किया और एक दूसरे से युध्द किया। सबसे अहम बात ये है कि हैदराबाद के नेज़ाम ने बार बार टीपू सुल्तान के खिलाफ लड़ाई लड़ी। बड़ी संख्या में ऐसी घटनाएं उस समय घटित हुईं जब किसी गैर मुस्लिम के हस्तक्षेप की अवधारणा बिल्कुल भी नहीं थी और ये सिर्फ सत्ता और वासना के लिए जंग थी। यही वजह है कि अतीत में मुसलमानों ने मुसलमानों का कत्ल किया, और इसका कोई कारण नहीं है कि ये रुझान आज क्यों मौजूद नहीं होना चाहीए।

इस बात से इंकार कि आतंकवादी मुसलमान नहीं हो सकते, इसके पीछे ये धारणा है कि निश्तिच रूप से  वो लोग कोई और होने चाहिए। 'टैटू वाले आतंकवादी' आम तौर पर सबसे बड़े सुबूत हैं, क्योंकि एक मुसलमान कभी टैटू नहीं बनवाता है। हालांकि किसी आतंकवादी के जिस्म पर टैटू पाया जाना कितना ही अजीब क्यों न हो, ये मानना कि ये टैटू उस व्यक्ति कि आतंकवाद में विश्वास रखने के प्रशिक्षण से पहले का रहा होगा, या ये हक़ीक़त कि उज़्बेकिस्तान (हो सकता है जहाँ से ये आतंकवादी आएं हो) में इस तरह के टैटू बिल्कुल आम हैं और ये शायद ही शक करने वाले दिमाग स्वीकार कर पाते हैं। ये तथ्य कि सुरक्षा अधिकारियों को आतंकवादियों के पास से अश्लील सामग्री और शक्तिवर्धक दवाओं का मिलना- जो इस्लाम के खिलाफ है- और जो इनके मुसलमान न होने के दावे को बल प्रदान करेगा- जब तक कि कोई इंसान खुद इनको न जाँचे।

निस्संदेह दूसरे देशों के नागरिक और दूसरे धर्मों के लोग पाकिस्तान के खिलाफ हमले कर सकते और करते हैं, लेकिन ये मानना कि पाकिस्तान में होने वाले 'सभी' आतंकवादी हमले गैर मुसलमानों द्वारा ही किए जाते हैं, तो ये कम से कम हास्यास्पद ज़रूर है। इसलिए ज़ाहिर है भारतीय, अमेरिकी और इजरायली सबसे पहले सामने आते हैं और जल्द ही मंगल ग्रह के निवासी भी इन शंका रखने वाले लोगों के मन में एक अपराधी के रूप में प्रकट हो सकते हैं।

लेकिन सबसे ज्यादा अहम इन लोगों का ये दावा कि वो मुसलमान नहीं हैं, ये क्या इशारा करता है। जब पाकिस्तानी ये कहते हैं कि आतंकवादी मुसलमान नहीं हैं तो वो भी वही कर रहे होते हैं जो आतंकवादी कर रहे हैं- यानि ये तय करना कि एक धर्म में क्या सही और क्या गलत हैं और मतभेद रखने वालों को हाशिए पर डाल रहे हैं। इसलिए एक उदारवादी पाकिस्तानी के लिए तालिबान मुसलमान नहीं हैं और तालिबान के लिए एक उदार पाकिस्तानी मुसलमान नहीं है, इस स्थिति में दोनों दृष्टिकोणों में क्या अंतर रह जाता है? निश्चित रूप से वो लोग जो तालिबान की आलोचना करते हैं धर्म के व्यापक दृष्टिकोण वाले हैं और इसके शांतिपूर्ण तत्वों को स्पष्ट करते हैं और इस दृष्टिकोण से सहमति नहीं रखते उनके मुसलमान होने को पूरी तरह खारिज करना हानिकारक है। तालिबान और इस तरह के दूसरे समूह धर्म के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण रखते हैं। हो सकता है कि ये सबसे अच्छा दृष्टिकोण न हो लेकिन ये फिर भी एक मुस्लिम दृष्टिकोण है और इसे सार्वजनिक रूप से कुछ समर्थन प्राप्त है। जब तक हम ये स्वीकार नहीं करते कि वो भी मुसलमान हैं, हम ईमानदारी के साथ उनसे इन बिंदुओं पर चर्चा नहीं कर सकते और न ही उन्हें, उनका रास्ता बदलने के लिए उन्हें तैयार कर सकते हैं। मेरा मानना ​​है कि इस तरह के विचार को पूरे तौर पर खारिज करना कि इनका धर्म के साथ कोई सरोकार ही नहीं है, इससे मतभेद और उनके उन्मूलन को कठिन बनाना है। व्याख्या की इस समस्या को 'मानना' इस विचारधारा से संघर्ष की तरफ पहला कदम है।

तो फिर ये आतंकवादी हैं कौन? यहाँ मैं ये नहीं मंज़ूर कर सकता कि सभी मुसलमान आतंकवादी हैं बल्कि इस बात की पुष्टि करना चाहता हूं कि हमें ये ज़रूर स्वीकार करना चाहिए कि कुछ मुसलमान आतंकवादी हैं बिल्कुल उसी तरह जैसे कुछ ईसाई, कुछ हिंदू और कुछ यहूदी आदि आतंकवादी हैं। काल्पनिक बहाने खोजना और इस मामले की अनदेखी करना इस समस्या का समाधान नहीं है बल्कि इस विचारधारा की स्वीकृति और इसके साथ लगने से ये समस्या हल होगी।

अंत में जब हम इस सवाल के बारे में सोचें तो शायद हमें अपने पर ध्यान देने कि ज़रुरत पड़े। क्या हमारी सोच, हमारा तौर तरीका और हमारा व्यवहार हमें कट्टरपंथी ज़ाहिर करते हैं? हमारे परिवेश में एक दिन गुज़ारने से हमें शायद कुछ जवाब मिल सकता है।

स्रोतः http://tribune.com.pk/story/614761/the-terrorists-cant-be-muslims

URL for English article:

http://www.newageislam.com/islam,terrorism-and-jihad/yaqoob-khan-bangash/‘the-terrorists-can’t-be-muslims’/d/13891

URL for Urdu article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/yaqoob-khan-bangash,-tr-new-age-islam/‘the-terrorists-can’t-be-muslims’--دہشت-گرد-مسلمان-نہیں-ہو-سکتے-/d/13938

URL for this article:

http://www.newageislam.com/hindi-section/yaqoob-khan-bangash,-tr-new-age-islam/‘the-terrorists-can’t-be-muslims’--आतंकवादी-मुसलमान-नहीं-हो-सकते-/d/14148

 

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