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Hindi Section ( 15 Sept 2012, NewAgeIslam.Com)

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Xenophobia and Religious Intolerance in Islamic Societies इस्लामी समाजों में विदेशियों से डर और धार्मिक असहिष्णुता इस्लामी ग्रंथों की गलत व्याख्या का परिणाम है, सुल्तान शाहीन का संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भाषण

 


सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम के भाषण का पूरा भाग

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, 21वां सत्र, जिनेवा- 10- 28 सितम्बर, 2012

एजेंडा आइटम 3: सभी मानवाधिकारों, विकास के अधिकार सहित नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों का संवर्धन और संरक्षण। वर्ल्ड इन्वायरेंमेंट एण्ड रिसोर्सेज़ काउंसिल (World Environment and Resources Council (WERC) की ओर से

14 सितम्बर, 2012

अध्यक्ष महोदय

सिविल सोसाइटी की ओर से की जाने वाली तमाम कोशिशों के बावजूद, पश्चिम में इस्लामोफ़ोबिया बढ़ रहा है, इसे आंशिक रूप से लगातार हो रहे आतंकवादी हमलों, इक्स्कलूसिविस्ट (exclusivist) रवैय्यों और मुसलमानों के बीच जेनोफ़ोबिया (xenophobia) और मुस्लिम दुनिया में ईशनिंदा जैसे फर्जी आधार पर धार्मिक और सांप्रदायिक अल्पसंख्यकों के साथ बदसुलूकी के कारण बढ़ावा मिल रहा है।

पिछले साल हम लोगों को नॉर्वे में 77 निर्दोष लोगों की हत्या का सामना करना पड़ा था। अब फिनलैंड की खुफिया एजेंसी से ये रिपोर्ट आई है जिसमें उन्होंने हम लोगों को चेतावनी दी है कि नॉर्वे में बड़े पैमाने पर हत्या करने वाले आतंकवादी के ही जैसे एजेंडा और विचारों के साथ इस्लामोफ़ोबिक अतिवादी समूह मौजूद हैं। SUPO (Finnish Security Intelligence Service) को पता चला है कि ये ग्रुप "वैचारिक रूप से हिंसक कार्रवाई के लिए तैयारी हैं" और ये समूह अपने घोषणापत्र के अनुसार इस्लाम को एक संस्कृति विशेष के रूप में निशाना बनाये हुए है।

पश्चिम में सिविल सोसाइटी और सरकारों को जेहादियों को मजबूती पहुंचाने, धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम सरकारों के बजाए सत्ता में इनको शामिल करने और सऊदी अरब में जिहाद के वैचारिक स्रोत की रक्षा करने से बचना होगा, हम मुसलमानों को भी आत्मावलोकन की जरूरत है। आखिर इस्लामी दुनिया में हम एक व्यक्ति के रूप में और हमारी सरकारें इस्लाम के खिलाफ इस बढ़ते खौफ को बढ़ावा देने के लिए क्या कर रही हैं? अगर इस्लामी देशों से आने वाली खबरें लगातार नफरत, हत्या, धर्म बदलने पर मजबूर करने वाली कहानियाँ बयान करती हैं, तो ये क्यों नहीं दुनिया में इस्लामोफ़ोबिया को बढ़ावा देने का कारण नहीं बनेंगी?

आज मिस्र, लीबिया, ईरान और इराक जैसे कई मुस्लिम देश ऐसी बुरी खबरों के स्थायी स्रोत हैं और सबसे बुरे हालात पाकिस्तान में हैं। ईसाई, हिंदू, शिया, अहमदी, सभी धार्मिक और सांप्रदायिक अल्पसंख्यक  उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं। अपहरण और जबरन धर्म बदलने की लहर के बाद बदकिस्मत हिन्दुओं ने देश छोड़ना भी शुरू कर दिया है। पाकिस्तान के नेशनल कमीशन फार जस्टिस एण्ड पीस (NCJP) ने पाया है कि स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में नफरत फैलाने वाली सामग्री में इज़ाफा हुआ है।

इस्लामी ग्रंर्थों के चयनित भाग की जानबूझकर गलत व्याख्या और उनके प्रचार के द्वारा सभी अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत में कई गुना इज़ाफा हो गया है। मुख्य धारा में शामिल मुसलमान इस्लाम को मानवता के लिए एक वरदान के रूप में देखते हैं, उनके पास कोई और रास्ता नहीं है कि वो exclusivist वहाबी आतंकवादी समूहों द्वारा इस्लाम के दुरुपयोग के खिलाफ उठ खड़े हों, हालांकि इन समूहों को पाकिस्तानी सेना की खुफिया एजेंसी, कुख्यात आईएसआई का समर्थन हासिल है।

वास्तव में मुसलमानों को हर जगह पवित्र कुरान के exclusivist  शाब्दिक व्याख्या करने वालों का विरोध करना चाहिए, जो दावा करते हैं कि संदर्भ पर ध्यान दिये बिना कुरान की सभी आयतों को हमेशा और हर जगह लागू किया जा सकता है।

आधुनिक दौर के कुरान के कुछ मुफस्सरीन ने पवित्र कुरान का अध्ययन किया है और पाया है कि इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो मुसलमानों को अन्य गैर मुसलमान वर्गों के साथ या तो खुद एक अल्पसंख्यक के रूप में या एक मुस्लिम बहुल देश में शांतिपूर्ण सहअस्तित्व से रोकता हो। लेकिन वर्तमान समय की अधिकांश समस्याएं वहाबी विचारधारा के exclusivism की देन हैं जिसे पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर सऊदी पेट्रो-डालर्स की माली मदद से बढ़ावा दिया जा रहा है। ये विचारधारा शेख मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब के फतवों पर आधारित है, जो कहते हैं: "किसी भी मुसलमानों का ईमान सही हो ही नहीं सकता चाहे वो एक खुदा में यकीन करने वाला और शिर्क को छोड़ने वाला हो, जब तक कि वो मुशरिकीन के साथ अदावत नहीं रखे और उनके प्रति ईर्ष्या और दुश्मनी को व्यक्त न करे (मजमूआ अलरिसाइल वलमसाइल अलनज्दिया 4/291)

एक कुरानी आयत जिसको शेख अब्दुल वहाब के अनुयायियों द्वारा अक्सर और बिना किसी संदर्भ के हवाला के तौर पर पेश किया जाता है और ये चाहते हैं कि उसे हर समय में लागू होने वाली आयत माना जाये। आयत (सूरे- आल इमरान: 28) कहती है, " मोमिनीन, मोमिनीन को छोड़ के काफ़िरों को अपना सरपरस्त न बनाऐं और जो ऐसा करेगा तो उससे ख़ुदा से कुछ सरोकार नहीं मगर (इस क़िस्म की तदबीरों से) किसी तरह उन (के शर) से बचना चाहो तो (ख़ैर) और ख़ुदा तुमको अपने ही से डराता है और ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है"।

एक दूसरी आयत जिसका उल्लेख भी बार बार किया जाता है, वो आयत निम्नलिखित है: "अहले किताब में से जो लोग न तो (दिल से) ख़ुदा ही पर ईमान रखते हैं और न रोज़े आख़िरत पर और न ख़ुदा और उसके रसूल की हराम की हुई चीज़ों को हराम समझते हैं और न सच्चे दीन ही को एख्तियार करते हैं उन लोगों से लड़े जाओ यहाँ तक कि वह लोग ज़लील होकर (अपने) हाथ से जज़िया दे" (सूरे- अलतौबा, आयत, 29)

अध्यक्ष महोदय,

और इसी तरह की दूसरी जंग से सम्बंधित और exclusivist  आयतों का उद्देश्य इस्लाम के प्रारंभिक दौर में मुसलमानों को निर्देश देना था, जब इस नए धर्म पर चारों ओर से हमले हो रहे थे और इसको सिर्फ बाकी  रखने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत थी। मुसलमानों को कुरानी आयतों के नाज़िल होना शुरु होने के 13वें साल में हथियारों से आत्म रक्षा करने की इजाज़त सिर्फ तब मिली जब उनके पास जब कोई और विकल्प नहीं रह गया था। ऐसे हालात में गैर मुस्लिमों के साथ उनके आपसी सम्बंध भी स्वाभाविक रूप से सीमित कर दिये गये थे, विशेष रूप से इस्लाम के दुश्मन मुसलमानों के बीच अपने जासूस प्रवेश करा रहे थे जिन्हें बाद में कुरान ने खुद मुनाफिक कहा है। उस समय भी उन्हें कुरान में बताया गया कि वो न केवल अपनी धार्मिक स्वतंत्रता बल्कि अन्य सभी धार्मिक समुदायों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करें। खुदा चाहता था कि उसकी इबादत न सिर्फ मस्जिदों में जारी रहे बल्कि चर्चों, कलीसाओं, खानकाहों, मंदिरों और हर जगह जारी रहे। इस संबंध में कुरान मजीद में खुदा के अल्फाज़ (अनुवाद) निम्नलिखित हैं:

 "अगर खुदा लोगों को एक दूसरे से दूर दफा न करता रहता तो गिरजे और यहूदियों के इबादत ख़ाने और मजूस के इबादतख़ाने और मस्जिद जिनमें कसरत से खुदा का नाम लिया जाता है कब के कब ढहा दिए गए होते"(कुरान 22:40)

ये 1400 साल पहले की बात है। अरब के रेगिस्तान में, बहुत प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद, इस्लाम इतनी तेजी से फैला कि यहां तक ​​कि भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के जैसे अनीश्वरवादी (agnostics) ने भी इसे एक चमत्कार कहा। लेकिन कुछ मुसलमान हमेशा उसी ज़माने में रहना चाहते हैं और बार बार उसी ज़माने में हुई जंगे लड़ना चाहते हैं। इस समूह ने अपने वजूद को विभिन्न नामों के तहत हमेशा कायम रखा। जब ये लोग पहली बार चौथे खलीफा हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हा के समय में सामने आए तो मुस्लिम अस्लाफ की पहली और दूसरी पीढ़ी ने उन्हें इस्लाम से संबंध समाप्त करने वाला (ख्वारिज) कहा। लेकिन आज के तथाकथित सल्फ़ी वहाबी मुसलमान (जो अस्लाफ या इस्लाम की पहली पीढ़ी की पैरवी करने का दावा करते हैं) ख्वारिज को अपना आदर्श मानते हैं और उनकी नीतियों का पालन करते हैं। सऊदी अरब की आर्थिक मदद से चलने वाले मदरसों की पाठ्य पुस्तकें पूरी दुनिया के मुसलमानों के बीच ख्वारिज और वहाबियों की इस बचकाने exclusivism को बढ़ावा देती हैं। ये वही वैचारिक प्रशिक्षण है जिसने 9/11 के आतंकवादी तैयार किये, 19 में से 16 आतंकवादी सऊदी अरब के थे और तीन मिस्री थे, जिन्होंने लगभग 3 हजार अमेरिकियों की जान ले ली। ये वही वैचारिक प्रशिक्षण है जिसने कुछ दिनों पहले 9/11 की 11वीं वर्षगांठ के अवसर पर अलकायदा गठबंधन के आतंकवादियों द्वारा लीबिया में अमेरिकी राजदूत और अन्य राजनयिकों की हत्या कर दी। लेकिन अमेरिकी सुरक्षा के दम पर सऊदी अरब ने दुनिया भर के दूरदराज इलाकों में अपने विचारों को भेजना जारी रखा हुआ है और विश्व मुस्लिम समुदाय को कट्टरपंथी बनाने में काफी हद तक सफल है।

अध्यक्ष महोदय,

सौभाग्य से दुनिया भर में कुछ इस्लामी स्कालर्स और बुद्धिजीवी अपने सीमित संसाधनों के भीतर इस बढ़ते खतरे से मुकाबला करने में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं। तेल की दौलत वाली महाशक्ति की पूरी ताकत के साथ ही दुनिया की एकमात्र महाशक्ति की सुरक्षा के तहत फैल रही इस विचारधारा का मुकाबला आसान नहीं है। लेकिन इसके बावजूद वो इस बौद्धिक जिहाद में पूरी तरह लगे हुए हैं।

दुनिया के सभी लोगों के बीच करीबी सम्बंध रखने के औचित्य के रूप में तर्क पेश करने वाले इस्लामी विद्वानों में भारतीय विद्वान वारिस मज़हरी ने अहले किताब के साथ वैवाहिक संबंध के बारे में कुरान की इजाज़त की ओर इशारा किया है। वो स्पष्ट करते हैं कि "हकीकत ये है कि मवालात की ये व्याख्या इंसानी बुद्धि और स्वाभाव दोनों के खिलाफ है। गौर करने की बात ये है कि इस्लाम में अहले किताब की औरतों से निकाह की इजाज़त मुसलमानों को दी गई है। जिस पर सहाबा हज़रात रज़ि. के वक्त से लेकर आज तक अमल होता चला आ रहा है। इंसान स्वाभाविक तौर पर मजबूर है कि वो अपनी माओं से दिली लगाव और अपनी बीवियों से दिली मोहब्बत कायम करे। सवाल ये पैदा होता है कि क्या इस मामले में इस्लाम एक मुसलमान को रोक देगा कि वो अपनी गैर मुस्लिम बीवी या माँ से प्यार न करे? और ये कि '' सिर्फ ज़ाहिरी खुशी से काम चलाए?  क्या ऐसी स्थिति में सुखद वैवाहिक जीवन की कल्पना भी की जा सकती है?  हकीकत ये है कि इस्लाम एक फितरी दीन है। वो फितरते इंसानी के खिलाफ नहीं जा सकता। (4फरवरी, 2012, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

असल बात ये है कि कुरान में मवालात की आयतों का संबंध न तो सभी मुसलमानों से है और न सभी गैर मुसलमानों से। इसमें असल रूप से सम्बोधित उन मुसलमानों को किया गया हैं जिनके और गैर मुस्लिमों की किसी दल के बीच तनाव और युद्ध की स्थिति कायम हो। इस पर इस आदेश के लागू होने की सही शर्त ये है कि ये जंग सिर्फ इस्लामी आधार पर लड़ी जा रही हो। यानी वो वास्तव में इस्लाम के कलमे की हिफाज़त और उसे बुलंद करने के लिए लड़ी जा रही हो न कि सिर्फ राष्ट्रीय उद्देश्यों के लिए।

आदरणीय माने जाने वाले इस्लामी स्कालर मौलाना अमीन अहसन इस्लाही ने ये भी कहा है (जैसा कि वारिस मज़हरी ने उनका उल्लेख किया है): "कुफ़्फ़ार को दोस्त और साथी बनाने के लिए उसी स्थिति में मनाही है जब वो मुसलमानों से मुकाबला कर रहे हों। अगर ये स्थिति न हो तो इसमें कोई बुराई नहीं है'' (तदब्बुरे कुरान 412/2) उन्होंने सूरे आल इमरान की आयत 28 की व्याख्या में इस बात पर जोर दिया है, "मुसलमानों के लिए जायज़ नहीं है कि वो काफिरों को अपना वली बनाएँ लेकिन इसके साथ 'मिन दूनिल मोमिनीन'' की शर्त है। यानी काफिरों के साथ केवल इस तरह की मवालात अवैध है जो मुसलमानों से मुकाबला कर रहे हों और उनके हित के खिलाफ हो (पृष्ठ 67) वो ये भी स्पष्ट करते हैं किः मवालात से संबंधित इन आयतों में हालांकि मुसलमानों को संबोधित किया गया है लेकिन इसमें मुख्य रूप से सम्बोधित मुनाफिकीन को किया गया है जो मदीना के यहूद के मुसलमानों के साथ षड्यंत्रों में उनके मददगार बने हुए थे। जब अपने अस्तित्व और ईमान की रक्षा के लिए मुसलमानों के दुश्मनों से लड़ाई छिड़ गई तो मुसलमानों को मक्का के मुशरिकीन और मदीना के यहूदियों के साथ दोस्ती करने से मना कर दिया गया।

सूरे अलमुम्तहन्ना इसके लिए सबसे अच्छी मिसाल है। आयत 8 और 9 में बहस और ज्यादा विस्तार पाती है जो निम्नलिखित है (4 फरवरी, 2012, न्यु एज इस्लाम डाट काम):

ो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से ख़ुदा तुम्हें मना नहीं करता बेशक ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है (सूरे अलमुम्तहन्ना, आयत 8)

ुदा तो बस उन लोगों के साथ दोस्ती करने से मना करता है जिन्होने तुमसे दीन के बारे में लड़ाई की और तुमको तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया, और तुम्हारे निकालने में (औरों की) मदद की और जो लोग ऐसों से दोस्ती करेंगे वह लोग ज़ालिम हैं"(सूरे अलमुम्तहन्ना, आयत 9)

वारिस मज़हर इस पर टिप्पणी करते हैं कि "यही कारण है कि मौलाना अमीन अहसन इस्लाही ने संबंधित आयतों के बारे में अपनी राय व्यक्त की, " मवालात के लिए ये मनाही सभी कुफ़्फ़ार के पक्ष में नहीं है बल्कि केवल उनके पक्ष में है जिन्होंने धर्म के मामले में तुम (मुसलमानों) से जंग की। और तुम (मुसलमानों) को जिलावतन (निर्वासित) किया।" (तदब्बुरे कुरान: 8/334)

अध्यक्ष महोदय,

इस संदर्भ में, इस्लामी विद्वान और कुरान के मुफ़स्सिर मोहम्मद यूनुस (सह लेखक (अशफाक अल्लाह सैयद के साथ), इस्लाम का असल पैग़ाम, आमना पब्लिकेशन, यूएसए 2009) ने इस्लामी वेबसाइट न्यु एज इस्लाम डॉट काम के लिए इस्लाम और बहुलतावाद के अपने अध्ययन में निम्नलिखित कुरान की सम्बंधित आयतों के साथ ही वही नाज़िल होने के अंतिम चरण की आयतों (5:48, 49:13) का भी हवाला दिया है। उनका कहना है कि ये आयतें अपनी बात खुद ही साबित करती हैः

"और हर फरीक़ के वास्ते एक सिम्त है उसी की तरफ वह नमाज़ में अपना मुँह कर लेता है पस तुम ऐ मुसलमानों झगड़े को छोड़ दो और नेकियों मे उन से लपक के आगे बढ़ जाओ तुम जहाँ कहीं होगे ख़ुदा तुम सबको अपनी तरफ ले आऐगा बेशक ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है"(2:148)

 " और (ऐ रसूल) हमने तुम पर भी बरहक़ किताब नाज़िल की जो किताब (उसके पहले से) उसके वक्त में मौजूद है उसकी तसदीक़ करती है और उसकी निगेहबान (भी) है जो कुछ तुम पर ख़ुदा ने नाज़िल किया है उसी के मुताबिक़ तुम भी हुक्म दो और जो हक़ बात ख़ुदा की तरफ़ से आ चुकी है उससे कतरा के उन लोगों की ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो और हमने तुम में हर एक के वास्ते (हस्बे मसलेहते वक्त) एक एक शरीयत और ख़ास तरीक़े पर मुक़र्रर कर दिया और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम सब के सब को एक ही (शरीयत की) उम्मत बना देता मगर (मुख़तलिफ़ शरीयतों से) ख़ुदा का मतलब यह था कि जो कुछ तुम्हें दिया है उसमें तुम्हारा इमतेहान करे बस तुम नेकी में लपक कर आगे बढ़ जाओ और (यक़ीन जानो कि) तुम सब को ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है"(5:48)

"लोगों हमने तो तुम सबको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और हम ही ने तुम्हारे कबीले और बिरादरियाँ बनायीं ताकि एक दूसरे की शिनाख्त करे इसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा के नज़दीक तुम सबमें बड़ा इज्ज़तदार वही है जो बड़ा परहेज़गार हो बेशक ख़ुदा बड़ा वाक़िफ़कार ख़बरदार है"(49:13)

अध्यक्ष महोदय,

अंत में,  मैं इस प्रतिष्ठित मंच से लोगों को याद दिलाना चाहूंगा कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने अंतिम भाषण में क्या फरमाया थाः

"पूरी मानवता आदम और हव्वा की संतान हैं, किसी अरबी को किसी गैर अरबी पर और किसी गैर अरबी को किसी अरबी पर कोई फज़ीलत (प्रतिष्ठा) नहीं है, और न किसी गोरे को किसी काले पर और किसी काले को किसी गोरे पर कोई फज़ीलत है, सिवाय तक़वा और नेक काम के, इसलिए अन्याय मत करो। याद रखो, एक दिन तुम अल्लाह से मिलोगे, और अपने किये गये कामों के लिए जवाब दोगे। इसलिए खबर दार रहो, मेरे जाने के बाद नेकी की राह से भटक मत जाना।"

कोई भी समझ सकता है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ये नहीं कहा है कि एक मुसलमान को किसी गैर मुसलमान पर कोई फज़ीलत है। नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के अनुसार बरतरी की निर्भरता पूरी तरह से "तक़वा और अच्छा काम" पर था। यही सब कुछ है। आइये इसे हम याद करें और इस्लाम श्रेष्ठतावाद की नुकसानदेह विचारधारा की बढ़ती ताकत के खिलाफ संघर्ष करें। क्योंकि ये विचारधारा हमें आज की ग्लोब्लाईज़्ड बहुसंस्कृति वाली दुनिया में एक हिस्सा के रूप में रहने के अयोग्य बना देता है। हम मुख्य धारा में शामिल मुसलमान हमेशा से ही एक शांतिपूर्ण समुदाय रहे हैं लेकिन आज बहुत कम लोग दूसरों के साथ शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की हमारी क्षमता पर भरोसा करते हैं। और अब हम पर अविश्वास करने के इन लोगों के पास वैध कारण हैं।

आइए, हम इस्लामी समाज में गैर मुस्लिमों के साथ किये जाने वाले अन्याय के खिलाफ संघर्ष के लिए कमर कस लें। ऐसा करके हम सिर्फ अपने धार्मिक दायित्व को ही पूरा करेंगे। और इससे ग़ैर मुस्लिम बहुल देशों में अल्पसंख्यकों के रूप में रहने वाले मुसलमानों के लिए न्याय की हमारी आवाज को बल मिलेगा। हाल ही में हमने बर्मा के रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में आवाज उठाई, जिन्हें बड़े पैमाने पर अत्याचार का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इस आवाज़ ने दुनिया को प्रभावित नहीं किया, क्योंकि जिस तरह से हम अपने देश के अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार करते हैं वो नैतिक रूप से सही नहीं है और विशेष रूप से उन देशों में जो इस्लामी होने का दावा करते हैं।

इस तरह कम से कम बौद्धिक स्तर पर इस जिहाद में हमें शामिल होना चाहिए और जो जिहाद का एक महान रूप है और वो ये है कि इस्लामी होने का दावा करने वाले पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए हम संघर्ष करें। उदाहरण के लिए, एक तब्के के रूप में हमें सऊदी अरब से ये मांग करनी चाहिए कि वो अपने देश में काम करने वाले गैर मुस्लिमों को अपने पूजा घरों के निर्माण की इजाज़त दे। पाकिस्तान में बदनाम ईशनिंदा कानून को रद्द करने को कहने के लिए एकजुट होना ज़रूरी है। हालांकि पाकिस्तान की मौजूदा सरकार में शामिल कुछ लोग इसे रद्द करना चाहते हैं, लेकिन इस मसले पर दो बड़े लीडरों की हत्या के बाद वो इसे कहने की हिम्मत नहीं जुटा सकते हैं।

पश्चिमी देशों में बढ़ते इस्लामोफ़ोबिया को बुरा भला कहने और षड़यंत्र के सिद्धांतों को तैयार करने के बजाय, हमें शर्मिंदगी का एहसास करना शुरू करना चाहिए औऱ ये सोचना चाहिए कि हर किसी के पास इस्लाम से डरने के कोई न कोई कारण हैं और खुदा बेहतर जानता है कि आज इस्लाम से डरने के लोगों के पास कारण हैं। दरअसल इस्लाम के इस रूप से गैर मुसलमानों के बजाए उदारवादी और मुख्य धारा के मुसलमानों के डरने के अधिक कारण हैं। अंतर केवल ये है कि गैर मुसलमान इस्लाम और सभी मुसलमानों को एक मानते हैं; वो मुसलमानों और चरमपंथियों या जेहादियों के बीच अंतर नहीं कर सकते हैं। उनके लिए हम सब  एक जैसे हैं। इसलिए वो धर्म की एक विशेष व्याख्या से नहीं बल्कि सभी मुसलमानों और धर्म के रूप में इस्लाम से भय खाने के कारण तलाश लेते हैं। हम लोग इसे अच्छे से जानते हैं लेकिन ये उनकी कोई मदद नहीं करता है।

खुदा ने इस्लाम को दुनिया में एक वरदान के रूप में भेजा था; ये हम मुसलमान हैं जिन्होंने इसे भय पैदा करने वाली वस्तु में बदल दिया। 9/11 के बाद आम तौर पर अमेरिका और पश्चिमी देशों के जेहादी विचारधारा को मजबूत करने के अपने सामरिक कारण हैं, लेकिन मुख्य रूप से ये इस्लाम के अंदर ही एक जंग है और हमें अपने सीमित संसाधनों के साथ अपनी इस जंग को लड़ना होगा। अपने पूरे इतिहास में हमने खारिजियों और जिहादियों को हराया है, और भारी संकट के बावजूद इस आशा के सभी कारण हैं कि हम ऐसा दोबारा करेंगे।

URL for English article:

Xenophobia and Religious Intolerance in Islamic Societies Is a Result of Misinterpretation of Islamic Scriptures, Sultan Shahin Tells UNHRC

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https://www.newageislam.com/hindi-section/xenophobia-religious-intolerance-islamic-societies/d/8676

URL for Urdu article: Xenophobia and Religious Intolerance in Islamic Societies اسلامی معاشروں میں غیر ملکیوں سے نفرت اور مذہبی عدم رواداری اسلامی صحیفوں کی قصداً غلط تشریح کا نتیجہ ہے، سلطان شاہین کا اقوام متحدہ کی انسانی حقوق کونسل سے خطاب

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