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Hindi Section ( 15 Aug 2014, NewAgeIslam.Com)

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Yazidi, Hindu And Hindustan यजीदी, हिन्दू और हिन्दुस्तान

 

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14 अगस्त, 2014

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

  

छह दिन बाद सिंजर की पहाड़ियों पर अभी भी हजारों यजीदी फंसे हुए हुए हैं जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे हैं

कुर्दिस्तान पर आइसिस आतंकियों के धावे के बाद जान बचाकर भागे डेढ़ लाख (अनुमानित) यजीदियों को बचाने की मुहिम जारी है। करीब एक हफ्ता गुजर जाने के बाद अभी भी सिंजर की पहाड़ियों पर कितने यजीदी फंसे हुए हैं इसका अंदाज अमेरिकी रक्षा अधिकारियों को भी नहीं लग पाया है। एक अनुमान है कि अब भी तीस से पचास हजार यजीदी सिंजर की पहाड़ियों में भटक रहे हैं जिन्हें सुरक्षित निकालने के लिए अमेरिका सैन्य दस्ता भेजने पर भी विचार कर रहा है। इस बीच अमेरिका के बाद अब फ्रांस, ब्रिटेन और आष्ट्रेलिया भी राहत एवं बचाव कार्य का हिस्सा हो रहे हैं। सिर्फ भारत एकमात्र ऐसा देश है जो इस पूरे मामले में या तो जानबूझकर मौन है या भारतीय हुक्मरानों को होश ही नहीं है कि सिंजर की पहाड़ियों पर जो लोग फंसे हुए हैं उनसे भारत का कोई नाता भी है। बात सिर्फ धर्म या मजहब की नहीं है। यजीदी अब खत्म हो रही मनुष्य की विशिष्ट प्रजाति में शामिल हो चुके हैं। शायद यही कारण है कि अमेरिका यजीदियों को बचाने के लिए सीधे मैदान में उतर चुका है लेकिन विश्व राजनीति में हाशिये पर रहने का अभ्यस्त भारत तब भी होश में नहीं आता जबकि एक पूरी मानव प्रजाति पर ही संकट मंडराने लगता है। वह भी ऐसी प्रजाति जो उसी इण्डो इरानियन सभ्यता की गहरी छाप है जो आज भी हमें इराक और ईरान से जोड़कर रखे हुए है।

इराक और ईरान में अगर भारतीय लोगों के प्रति बहुत गहरा मान सम्मान है तो उसका कारण कोई तेल का कारोबार नहीं है। सदियों से भारत और ईरान और इराक के करीब रहा है तो आज भी वहां की किस्सागोई में बसता है। शायद यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र में भारत की सरकार अगर किसी मुद्दे पर ईरान या इराक का साथ नहीं देती तो वहां से विरोध के स्वर नहीं बल्कि मातम के स्वर सुनाई देते हैं। वे शायद यह मानते हैं कि सिन्धु घाटी मेसोपोटामिया और पारस की खाड़ी का स्वाभाविक मित्र है। हाल फिलहाल तक इराक में सद्दाम हुसैन का शासन रहा हो कि ईरान में अयातुल्ला खोमैनी का दौर। भारत या हिन्दू विरोधी स्वर शायद ही कभी सुनाई दिये हों। ईरान से तो भारत का गहरा नाता रहा है और आज भी ईरान में हिन्दोस्तानी होना फक्र की बात समझी जाती है लेकिन इराक भी कभी भारत का दुश्मन नहीं रहा है। हां, यह बात दीगर रही है कि भारत की परतंत्र विदेश नीति के कारण वह खुलकर कभी इन देशों के समर्थन में भी नहीं उतर पाया है। यह तो ठीक है कि भारत ने सद्दाम के सफाये के वक्त मित्र देश होने से मना कर दिया था लेकिन यह ठीक नहीं है कि भारत तभी ईरान और इराक की तरफ देखे जब उसे कच्चे तेल की जरूरत हो।

सद्दाम हुसैन जिस कुर्दिस्तान रीजन में पैदा हुआ था वह कुर्दिस्तान इराक का तिब्बत है। कुर्द लोगों से भारत की पटती है शायद यही कारण है कि भारतीय तेल कंपनियों के ज्यादातर प्रोजेक्ट इसी इलाके में हैं। लेकिन वही कुर्दिस्तान संकट में फंसा तो भारत आंख मूंदकर बैठ गया। हम रणनीतिक तौर पर युद्ध का हिस्सा नहीं हो सकते। हमें होना भी नहीं चाहिए लेकिन क्या उत्तरी इराक के इस कत्लेआम के बाद अगर यहां आइसिस का कब्जा बरकरार रहता है तो क्या इससे भारत को कोई घाटा नहीं होगा? या फिर वह आइसिस के आतंकियों को पैसे देकर उनसे तेल खरीद लेगा? विदेश नीति के स्तर पर भारत सरकार की तरफ से अब तक तो कोई ऐसी पहल सामने नहीं आयी है जो इराक में उसकी मौजूदगी का अहसास कराती हो सिवाय इसके कि कुछ भारतीयों को हवाई जहाज में बिठाकर भारत पहुंचा दिया गया है।

आज आइसिस के आतंकी जिस यजीद कौम को खत्म करने पर उतारू हैं उसका सीधे तौर पर भारत से कुछ लेना देना हो कि न हो, लेकिन कुर्द इलाके के इस अल्पसंख्यक को बचाने का प्रयास भारत को भी करना चाहिए। ऐसा करने के पीछे कारण है। सबसे पहला और बड़ा कारण यह है कि दुनिया में कुछ ही संस्कृतियां सनातन रूप में मौजूद हैं। भारत जिस सनातन संस्कृति का वाहक है यजीदी भी उसी सनातन सभ्यता के वाहक हैं। वे किसी पैगम्बर में यकीन नहीं करते बिल्कुल भारत की तरह। वे भी प्रकृति के उपासक हैं बिल्कुल भारत की तरह। बहुत सारे कर्मकाण्ड बिल्कुल आदिम काल के पुरातन धर्मों की तरह ही पूरे किये जाते हैं जो आज तक सनातन हैं। उनके शेख साहिबान की मजारें तो होती हैं लेकिन वे इसे मंदिर (टेम्पल) कहते हैं। इन मंदिरोंं में दीपक जलाने और हवनकुण्ड के रूप में अग्नि जलाने जैसे कर्मकाण्ड होते हैं जो कि किसी धर्म विशेष का प्रतिनिनिधित्व नहीं करते हैं। मोर उनका देवदूत है जिसे वे अपना रक्षक मानते हैं। ईस्वी सदी के बाद दुनिया में जो धर्म आये वे ऐसे परंपरागत व्यवस्था को खंडित करते हुए स्थापित हुए और उसमें किसी एक व्यक्ति को सर्वोच्च स्थान दे दिया गया। मनुष्य की इस सेक्टेरियन और शुद्धतावादी सोच का ही शिकार समय समय पर बहुलतावादी दुनिया होती रही है और इन दिनों इराक भी हो रहा है और इराक के यजीदी भी।

हालांकि कुछ लोग इन्हीं समानताओं के आधार पर यजीदियों को हिन्दू धर्म जैसा बता रहे हैं लेकिन यह सोच भी उसी तरह से कट्टर सोच है जैसे आइसिस का इस्लाम। सिर्फ कुछ समानताओं की वजह से हम किसी के अस्तित्व को ही चुनौती नहीं दे सकते। ईसा पूर्व की जितनी भी पूजा पद्धतियां थीं उनमें हवन, सूर्य की उपासना, चांद को देवता मानना और दीपक अर्घ्य और जल तर्पण जैसी समानाएं मिलती हैं। यहां तक कि इस्लाम में चांद का महत्व है जो कि कुरैशियों (मोहम्मद साहब का कबीला) के हुब्बल देवता के प्रतीक थे। पशु और पक्षियों को देव या फिर देवदूत मानकर उनकी उपासना करना सामान्य सी धारणा रही है। हालांकि एक चौंकानेवाली तस्वीर जरूर सामने आयी है जिसमें यजीदियों के सबसे पवित्र स्थल लालिश की भीतरी दीवारों पर एक महिला दीपक जला रही है। यह एक पेन्टिंग है जो दीवार पर बनाई गयी है। इस पेन्टिंग में दीपक से ज्यादा खास है उस महिला का परिधान और भेषभूषा। महिला की भेष भूषा और श्रृंगार किसी दक्षिण भारतीय महिला से मेल खाता है जो परिधान के रूप में साड़ी पहनती है। हालांकि यजीदी महिलाओं का कोई खास परिधान नहीं होता लेकिन इस तस्वीर के सामने आने से इस आशंका को बल मिलता है कि क्या यजीदियों का देवदूत मलक ताउस मुरुगन (कार्तिकेय) की सवारी मोर है?

अगर ऐसा है तो उस धारणा का क्या करेंगे जो कहती है कि यजीदियों से कर्बला के युद्ध में जब हजरत हुसैन परास्त हुए और यजीदी उनका सिर काटकर ले गये तो यह एक हिन्दू ब्राह्मण शासक सिद्धदत्त थे जिन्होंने अपने छह बेटों की कुर्बानी तो दे दी लेकिन हजरत हुसैन का सिर नहीं दिया। कुछ मुस्लिम विद्वान मानते हैं कि महाभारत काल में अस्वस्थामा मारा नहीं गया था बल्कि जीवित अवस्था में मेसोपोटामिया चला गया था। वहां उसने दत्त ब्राह्मण वंश की स्थापना की जो बाद में अरब, मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक फैला। सिद्धदस्त उसी शाखा के ब्राह्मण शासक थे। अगर हम मान भी लें कि यजीदियों का वर्तमान हिन्दू धर्म से कोई मेल जोल है तो फिर कर्बला के युद्ध के बाद उन्होंंने यजीदियोंं को नेस्तनाबूत करने का फैसला क्यों किया? मुस्लिम विद्वान कहते हैं कि इमाम हुसैन के सिद्ध दत्त पर बहुत अहसान थे और वे छह पुत्र इमाम हुसैन की ही देन थे। दत्त ब्राह्मणों पर इमाम हुसैन का इतना असर हुआ कि बाद में यही हुसैनी ब्राह्मण कहलाए। आज भी इस्लाम में हुसैन अपने आपको इस्लाम का ब्राह्मण समझते हैं। लेकिन फिर भी सवाल शेष रहता है कि अगर यजीदी धर्म भी इण्डो आर्यन सभ्यता की देन था तो दत्त ब्राह्मण (हुसैनी ब्राह्मण) क्या यजीदियों के खिलाफ इसलिए खड़े हो गये क्योंकि सिद्धदत्त इमाम हुसैन को मानते थे? अगर यह सच है तो सवाल और बड़ा दायरा बनाता है कि क्या इराक में भी कबीलों और संप्रदायोंं के बीच आर्य और द्रविण जैसा ही कोई न मिट सकने वाला बंटवारा था जिसका फायदा उठाकर इस्लाम खुद अरब में तेजी से विकसित हुआ?

यह लंबी बहस का विषय है और इतनी आसानी से किसी नतीजे तक पहुंच पाना मुश्किल है। लेकिन इन छिटपुट संकतों से जो बात साफ होती है वह यह कि इराक हो या ईरान उसका भारत से गहरा ऐतिहासिक नाता है। उस नाते को जिन्दा रखने की जो आखिरी कड़ी है वे वही यजीदी, कुर्द और शिया हैं जो इस वक्त इराक में संकट में हैं। इस्लाम के भीतर जिस शुद्धतावाद की जो हवा बहाई जा रही है उसकी रणनीति और कूटनीति क्या है यह अलग मामला है लेकिन ऐसी ही शुद्धतावादी हवाओं के कारण दुनियाभर में इस्लाम न केवल अलग थलग पड़ता रहा है बल्कि बदनाम भी हुआ है। अब ताजा मामलात में आइसिस शुद्धतावाद की जो ताजी हवा लेकर आया है उसमें काबा के लिए भी कोई जगह नहीं है तो फिर क्या शिया और क्या यजीदी। शुद्धतावाद की इस मुनाफाखोरी में संगीनों के साये में ऐतिहासिक धरोहरों को ही नहीं बल्कि इंसानी ऐतिहासिकता के साथ भी जबर्दस्त खिलवाड़ किया जा रहा है। यह तो भला हो अमेरिका को जो वक्त रहते सिंजर की पहाड़ी पर पहुंच गया अन्यथा जो यजीदी जिन्दा सीरिया के कैम्प में पहुंचाये गये हैं वे भी अब तक काल के गाल में समा चुके होते। सामरिक रूप से न सही, सांस्कृतिक रूप से ही भारत को इराक की उस कौम को बचाने के प्रयास का हिस्सेदार होना चाहिए जो उतना ही सनातन हैं जितना सनातन भारत।

Source: http://visfot.com/index.php/comentry/11322-yazidi-hindu-aur-hindustan.html

URL:  http://newageislam.com/hindi-section/visfot-news-network/yazidi,-hindu-and-hindustan--यजीदी,-हिन्दू-और-हिन्दुस्तान/d/98580

 

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