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Hindi Section ( 15 Apr 2020, NewAgeIslam.Com)

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Tablighi Jamaat Spread More Than Covid-19 Virus तबलीगी जमाअत ने केवल कोरोना नहीं फैलाया- इसके अमीर मौलाना मोहम्मद साद कांधलवी ने इस्लाम के नाम पर दकियानूसी विचारधारा और सिद्धांतों का भी प्रचार किया

हज़रत निजामुद्दीन में स्थित हेड क्वार्टर में तबलीगी जमात के अमीर मौलाना मोहम्मद साद कांधलावी की कोरोना वायरस और वबाओं पर तकरीर_____(१)

ट्रान्सक्रिप्ट न्यू एज इस्लाम एडिट डेस्क

२० मार्च २०२०

किसी भी तरह की वबा से निपटने के लिए तदाबीर इख्तियार करते हैं और कहते हैं की तदबीर इख्तियार करो और तकदीर पर उम्मीद करो। तदबीर इख्तियार कर के तकदीर पर उम्मीद करने का क्या जवाज़ और क्या ताल्लुक है। तकदीर से उम्मीद तो वह करे गा जो तदबीर पर अल्लाह पाक की इताअत को इबादत और दावत को सारे तदाबीर पर मुक़द्दम करे गा। अगर खुदा ना करे मुसलमान ने तदाबीर को मुकद्दम किया आमाल पर तो मैं कसम खा कर कह सकता हूँ कि यह तुम्हारे तदबीर तुम्हें मस्जिदों से महरूम कर देंगी। तुम अज़ाब को बढाने की तरफ चलोगे अज़ाब को ख़त्म करने की तरफ नहीं चलोगे। तुम्हें तुम्हारे असबाब धकेलेंगे तदाबीर से अल्लाह के निजाम का मुखालिफ बनाने की तरफ हालांकि अल्लाह पाक का दस्तूर है और नबी की सुन्नत है और सहाबा का मामूल है और खुलेफा ए राशिदीन का तरीका है कि जिस तरह का भी अज़ाब आए तुम्हें दौड़ना चाहिए मस्जिदों की तरफ___

इसलिए मैं कहता हूँ कि अगर तुम्हारे तजुर्बे में यह नज़र भी आ जाए कि मस्जिद में आने से आदमी मर जाएगा तो इससे बेहतर मरने की जगह हो ही नहीं सकती। हाए हाए, सहाबा तमन्ना करते थे कि दावत देते हुए मौत आ जाए, नमाज़ में मौत आ जाए। उन्हें नमाज में खतरे नज़र आ रहे हैं। यह नमाज़ छोड़ कर भागेंगे ताकि अज़ाब से बच जावें। अल्लाह अज़ाब लाया नमाज़ छोड़ने की वजह से यह अज़ाब को हटाएंगे नमाज़ छोड़ने के जरिये से। सोचो तो सही, कितनी उलटी सोच है। अल्लाह अज़ाब ला रहा है नमाज़ छोड़ने की वजह से यह अज़ाब हटाएंगे मस्जिदों को छोड़ने के जरिये से। सोचो तो सही कितनी उलटी सोच है। शैतान का वस्वसा है कि जितने अहले बातिल हैं वह ऐसे मौके से फायदा उठा कर कहते हैं कि हम अहले दुनिया हम जानते हैं तुम मौलवी उलेमा तुम क्या जानो बीमारियों से बचाव कैसे होता है। डाक्टर जानते हैं। नहीं केवल उस डॉक्टर की राय काबिले कुबूल हो सकती है जो डॉक्टर खुद मुत्तकी दीनदार अल्लाह से डरने वाला और अमल का शौकीन और पाबन्द हो।वह भी अगर ऐसा मशवरा देता है जिस से अमल खराब हो तो उस पर भी उसकी बात नहीं मानी जाएगी। चाहे कोई आलिम फ़ाज़िल शख्स यह कहे कि मस्जिदों को बंद कर देना चाहिए और मस्जिदों को ताला लगा देना चाहिए। इससे बीमारी भागे गी। यह ख्याल दिल से निकाल दो। हाँ, हाँ एहतियाती तदबीरें अपनी जगह हैं। लेकिन इस ख़याल से मस्जिदों को छोड़ देना देना इससे अज़ाब बढ़ेगा।यह अल्लाह के दस्तूर, खुलेफा के मामूल और सहाबा के तरीके के बिलकुल खिलाफ है। वहा तो हर अज़ाब हर वबा के आने पर मस्जिदों की तरफ बिल इरादा आया जाता था और इस ज़माने में अज़ाब और वबा को हटाने के लिए बिल इरादा मस्जिदों को छोड़ा जाए, कितना गलत जज़्बा है। अल्लाह जज़ा ए खैर दे उलेमा ए हक़ को कि इस बात पर जमे हुए हैं कि मस्जिदों को किसी हाल में बंद करने का कोई सवाल और इसका कोई जवाज़ है ही नहीं। शैतान ने इस मौके से फायदा उठा कर तदबीर और इलाज और एहतियात के नाम से उन्हें अमल से हटाने हमेशा से मामूल है शैतान का कि जब कोई हादसा पेश आता है तो शयातीन ऐसे हादसे के मौके पर हादसे के शिकार लोगों से ऐसे काम करा देते हैं जिससे अज्र ख़त्म हो जाए और मुसीबत बढ़ जाए। यह वक्त मस्जिदों को आबाद करने और उम्मत को तौबा की तरफ लाने का है। जैसा कि मैंने अर्ज़ किया कि अपनी दुआओं में कुबूलियत पैदा करने का वक्त है। यूँ बातिल तदबीरों पर कां धरने का मौक़ा नहीं है। बड़ा वहम दे दिया है, बड़ा खौफ शितान ने दिल में बैठा दिया है कि यह करोगे तो यह होगा, यह करोगे तो यह होगा। हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि कोई शख्स अगर अपनी जुबान से केवल यह कह दे कि अगर यूँ करते तो यूँ हो जाता उसको चाहिए कि आग का एक दहकता हुआ अंगारा अपनी जुबान पर रखे जो जुबान को जला कर खत्म कर दे। यह ज़्यादा बेहतर है यह कहने से कि यूँ करते तो यूँ हो जाता। नहीं हर हाल में गौर करो कि अल्लाह हमसे क्या चाहते हैं और सहाबा का क्या मामूल हैल तुम्हें वहम दे दिया है दिल में बिमारी का, दे दिया नहीं बैठाया गया है। मौतें कहाँ नहीं होतीं? और कितनी मौतें मर्ज़ से? हमेशा यह याद रखना कि मोमिन का ईमान है कि कभी भी मौत सबब की वजह से नहीं आती हाँ अल्लाह पाक जब मौत लाते हैं तो कभी कभी सबब भी ले आते हैं। मेरी बात तवज्जोह चाहती है। सबब से मौत नहीं आती बल्कि मौत के कभी असबाब आ जाते हैं। क्यों आते हैं? अल्लाह मौत के असबाब इसलिए नहीं लाते कि अल्लाह उसको इस सबब से मारना चाहते हैं। नहीं, ना अल्लाह को सबब की जरूरत है मौत के लिए और ना मलकुल मौत को सबब की जरूरत है रूह निकालने के लिए। अल्लाह मौत के मुकद्दर हो जाने और इस मौत के आजाने क्व वक्त सबब केवल इसलिए लाते हैं ताकि वह यह देखें कि मरने वाला या उसके संबंधी मौत को सबब की तरफ मंसूब करते हैं या मेरे अमल की तरफ मंसूब करते हैं। इतनी सी बात है। आप देखेंगे साड़ी दुनिया में कि मरने वालों को अल्लाह का हुक्म और वक्त आ जाता है मगर वह यह नहीं कहते कि वक्त आ गया। लोग पूछते हैं, क्या हुआ था, क्या हुआ था, बीमार थे? हज़रत आयशा रज़ीअल्लाहु अन्हा के भाई का इन्तिकाल हो गया। हाय ऐसे कोई मरता होगा। मुझे तो इस बात का शक है कि मेरे भाई अब्दुर्रहमान को यूँ ही दफन कर दिया गया। उसकी वफात नहीं हुई। ना बीमार हुआ ना कोई तकलीफ हुई। यानी कि हमेशा मेरे दिल में वसवसा रहा।एक दिन मैंने देखा अपने हुजरे से एक आदमी आया, अच्छा खासा ठीक ठाक। वह सवारी से उतरा। बाहर से आया और उसने अपनी चादर अपने सर के निचे रखी और लेटा। थोड़ी देर में नमाज़ का वक्त हो गया। फिर उसे हिलाया, उठाया नमाज़ के लिए तो वह मरा हुआ था। कहने लगीं कि उसके बाद मेरे दिल से हमेशा के लिए खल्जान ख़त्म हो गया। मैं सोचती थी ऐसे भी कोई मरता होगा? मैंने अर्ज़ किया कि मौत सबब से नहीं आतील अगर वाकई मौत असबाब से आती तो दुनिया में मौत के असबाब हयात के असबाब से कहीं ज़्यादा हैं।और जितनी दुनिया तरक्की कर रही है उसमें बजाहिर मौत के असबाब अधिक नज़र आते हैं। इसलिए हमने अर्ज़ किया कि वहम में खौफ में शैतान ने डाल दिया है और बस। यह सोच कर बिचारे कि कानून यह है, और एहतियात यह है अमल और अमल की जगह को छोड़ने की कोई गुंजाइश नहीं है। हाँ, एहतियाती तदाबीर इख्तियार करना एक सुन्नत है और सुन्नत से इनकार करना इसको तवक्कुल के खिलाफ समझना इसकी कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन यह कहना कि ऐसा करेंगे तो ऐसा होगा यह अकीदे की भी खराबी है और यकीन की भी खराबी है। यह वक्त है उम्मत को तौबा की तरफ अल्लाह की तरफ अल्लाह के घर की तरफ लाने का। बजाए इसके कि इस बात की कोशिश करें जो एहतियाती तदाबीर हैं वह इख्तियार की जाएं। और अल्लाह पर भरोसा करना? हाए कुरआन तो पढ़ते नहीं जो अल्लाह पर भरोसा करें। अखबार पढ़ते हैं बेचारे। एक खबर सुनते हैं मायूस हो जाते हैं, एक खबर सुनते हैं खबर से भागने लगते हैं कहीं यह खबर सुनते हैं तो पूरी तरह अल्लाह की रहमत से मायूस हो जाते हैं। अल्लाह रब्बुल इज्ज़त कोई भी वबा या कोई भी मर्ज़ या कोई भी मुसीबत सिर्फ इसलिए लाते हैं कि मैं देखना चाहता हूँ कि मेरा बंदा इस हाल में क्या करता है। अगर महज़ तदबीरों में लग गए तो फिर कुदरत से फायदा नहीं उठा सकते। और अगर अमल में लगे रहे तो अल्लाह पाक तुम्हें ऐसी तदबीरें इल्हाम करेंगे कि बल्कि आप ने तो यह सोचा भी नहीं होगा कि अल्लाह इस ज़माने में भी किसी भी आने वाली वबा या किसी आने वाले दुश्मन के खिलाफ मुसलामानों की इस तरह मदद करेंगे जिस तरह अल्लाह ने सहाबा की मदद ज़ाहिर के खिलाफ की। तलवार टूट गई। अब क्या करें? दुश्मन सामने मुकाबले पर। ताज़ा दरखत की टहनी हाथ में आते ही तलवार बन गई। अल्लाह पाक यही चाहते हैं। जो मैं कह रहा हूँ वह तुम करो जो हाल तुम पर आवेगा उस हाल से मैं निपटू गा। मैं क्या बताऊँ इस ज़माने के मुसलामानों की। अल्लाह के अज़ाब से खुद निपटना चाह्रते हैं और उसके अज़ाब का मुकाबला अपने असबाब से करना चाहते हैं। जब अल्लाह के गैबी खजानों से, मलाइका और अल्लाह पाक के लश्करों का यकीन दिल से निकल जाता है तब उनको फ़ौज और हथियार और माद्दी शक्लें नज़र आती हैं। अपने बचाव के लिए। तू मेरी बात याद रखना इन शक्लों के जाब्ते तरीके ऐसे हैं कि उनके लिए मुसलमानों को अमल छोड़ना ही पड़ेगा। गैरों के ज़ाब्ते और उनकी माद्दी शक्लों के तरीके ऐसे हैं कि इसके लिए मुसलमान को अमल छोड़ना ही पड़ेगा। वह यह कहेंगे कि आप हमारे इस्कीम पर चलें हमारी इस्कीम यह है कि इल्म के हलके ख़त्म करो मस्जिदों में नमाज़ ख़त्म करो। आप निजाम हमारे हाथ देते हैं तो आप के मर्ज़ का हम इलाज करेंगे। हरगिज़ ऐसा नहीं। हरगिज़ ऐसा नहीं। मुसलमान असल कायनात है, कुफ्फार असल कायनात नहीं हैं। जितना भी निज़ाम कायनात का चलेगा मुसलमान के अमल पर चलेगा। इससे सारे अश्या, सारे इनाम और साड़ी मखलूक फायदा उठाएगी और साड़ी मखलूक को मुसलमान के अमल से राहत मिलेगी और साड़ी मखलूक को मुसलमानों के गुनाह से तकलीफ पहुंचेगी। असल कायनात खुद मुसलमान ही हैं। मुसलमान के लिए तो यह सोचने की गुंजाइश भी नहीं है कि भाई इन हालात में हमें क्या करना चाहिए। यह तो बेचारे जो अल्लाह को नहीं जानते वह सोचते हैं कि भाई इस बला का इस मुसीबत बिमारी का बचाव किस तरह करें। महज़ मद्दी असबाब तो कुफ्फार सोचते हैं। और आमाल को और इबादात को मुसलमान सोचता है। इस वक्त का क्या अमल है। अगर मुसलमान भी गैरों की तरह इस तरह बैठ जावेगा तो फिर वह भी कहेगा कि हाँ इस वक्त का तकाज़ा यह है कि इस अमल को फिलहाल छोड़ दिया जाए। इस हाल के लिए अमल को छोड़ दो तो ज़्यादा बुरा हो जाएगा। हुजुर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हर उम्मती को मसलों के हल के लिए ऐसा मस्जिद से जोड़ा था कि उन्हें मस्जिद से बाहर किसी मसले का हल नज़र आता नहीं था। अल्लाह की तरफ आना मस्जिद की तरफ आने को ही कहते हैं। वकील की तरफ जाना उसके दफ्तर की तरफ और वजीर की तरफ जाना उसकी वजारत की तरफ जाने को कहते हैं। इसी तरह अल्लाह की तरफ आना, अल्लाह के घर में अल्लाह के घर की तरफ आने को कहते हैं। अगर कोई गैर मुस्लिम कहता है कि मस्जिदें छोड़ दो उन्हें क्या पता कि मस्जिद क्या है। तो जहां फरिश्तों के नुज़ूल से सेहत और इत्मीनान आता है वहाँ उनको बीमारी नज़र आ रही है। यह हमारा अंधापन है। यह हमारा अंधापन है।

हज़रत निजामुद्दीन में स्थित हेड क्वार्टर में तबलीगी जमात के अमीर मौलाना साद कांधलवी की कोरोना वायरस और वबाओं पर तकरीर____(२)

ट्रांसक्रिप्ट न्यू एज इस्लाम एडिट डेस्क

२० मार्च २०२०

मेरे दोस्तों और अजीजों रोजों का एहतिमाम करो, रोज़े रखो और इवराद की कसरत करो। बस यही एक रास्ता है इससे निजात का रहां एहतियात और डॉक्टरों की हिदायतों पर अमल करना यकीन तवक्कुल और शरीयत के खिलाफ नहीं। बल्कि एहतियात ना करना और फिर अगर कोई नुक्सान हो तो अपने आप को ही मलामत करना चाहिए। इसलिए चाहिए कि हम कवानीन का और डॉक्टरों की हिदायतों का सिर्फ उस दर्जे तक एहतिमाम करें जहां तक कोई अमल बर्बाद ना हो। जहां अमल बर्बाद हो जाएगा तो अल्लाह तुम्हें डॉक्टरों के हवाले कर देंगे और अल्लाह मदद का हाथ खींच लेंगे। मैं फिर से कह रहा हूँ कानूनों का, डॉक्टरों की हिदायत का हम सब एहतिमाम करें यह हम सब की जिम्मेदारी है और सारे आलम को करना चाहिए। कानून की रिआयत करना और डॉक्टरों की हिदायत की रिआयत करना हमारा बुनियादी उसूल है। यह दावत और तबलीग बुनियादी उसूल है। दुनिया के किसी कानून का या पुलिस की किसी हिदायत के खिलाफ करना दावत व तबलीग के मिजाज़ और उसूल के बिलकुल खिलाफ। इसलिए मैंने अर्ज़ किया है कि इस पर अमल करना एहतियात करना तवक्कुल यकीन और शरीअत के खिलाफ नहीं, बिलकुल ऐन मुताबिक़ है। अगर आप एहतियात को तवक्कुल के खिलाफ कहेंगे तो अम्बिया और सहाबा के तवक्कुल को इख्तियार करना पड़ेगा। साफ़ बात। यह ज़रा खतरनाक बात है। अगर हम इसको इस तरह हलके में लें। मैंने अर्ज़ किया कि अम्बिया ने भी सहाबा ने भी अपने तहफ्फुज़ के लिए हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का बावजूद अल्लाह की तरफ से मदद का वादा होने के आपका जंगों में खूद पहनना, ज़िरह पहनना सहाबा का ज़िरह पहनना यह सब के सब एहतियात के और हिफाजत के असबाब और उसकी तदबीरें हैं। इसका इनकार करना बे एहतियाती बरतना खुद कोई अक्ल मंदी की बात नहीं। इसलिए मैंने अर्ज़ किया है कि इस वक्त जो एहतियात बताई जाए उस पर अमल करना मगर फिर अर्ज़ करता हूँ दोबारा कि उस हद तक एहतियात करें कि कोई अमल बर्बाद ना हो। वरना अगर खुदा ना करे कोई अमल बर्बाद कर दिया एहतियात के चक्कर में तो अल्लाह पाक हाथ खींच लेंगे। फिर तो उसका वादा किसी सबब पर नहीं है। तदबीरें एहतियात के तौर पर हैं आमाल यकीन के तौर पर हैं। तदबीरें यकीनी नहीं है आमाल यकीनी हैं। तदबीरें एहतियात के तौर पर हैं और आमाल यकीन के तौर पर हैं। बस इसका सब ख्याल रखें और रातों को तहज्जुद में उठ कर अल्लाह पाक से दुआएं मांगो और बजाए बिमारी के तज़किरे करने के अल्लाह का ज़िक्र बढ़ाओ। और इतना अर्ज़ करूँगा कि जमातें वापस इलाकों की तरफ जा रही हैं और जाना चाहिए और हर जगह रह कर नफ्ल रोजों का और नफ्ल नमाज़ों का और तहज्जुद और रात को कयाम और दुआओं का एहतिमाम करें और किसी अमल को बर्बाद ना होने दें। यह वक्त बर्बाद करने का नहीं है। और यह भी याद रखो कई बार शैतान जुबान से ऐसे जुमले बा जाब्ता निकलवा देता है जिससे अल्लाह पाक की तरफ से आने वाले अज़ाब का तमस्खुर और इसका मज़ाक हो जाता है। इस पर अल्लाह पाक अज़ाब को बढ़ा देते हैं गुस्से में आकर। अगर अज़ाब का मज़ाक उड़ाया जाए तो अल्लाह पाक अज़ाब को बढ़ा देते हैं। यह पिछली कौम के साथ हो चुका है। जब भी किसी कौम में अल्लाह के अज़ाब के आने पर तज़र्रो और तौबा इस्तिग्फार और अपने गुनाहों का एतिराफ नहीं किया और अल्लाह के अज़ाब का मजाक उड़ाया अल्लाह पाक ने उनको हलाक कर दिया। इसलिए मैं कहता रहा हूँ कि यह मौक़ा इस किस्म का नहीं कि हम मुख्तलिफ किस्म की बीमारियों पर तबसिरे करें हँसे या उसका मज़ाक बनाएं। नहीं बेशक अल्लाह इससे  आज़ाद है और अज़ाब ही की शक्ल में है। यह वक्त तौबा इस्तिग्फार दावत और दुआओं की मिकदार बढ़ाने का वक्त है।

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हज़रत निजामुद्दीन में स्थित हेड क्वार्टर में तबलीगी जमात के अमीर मौना साद कांधलवी की कोरोना वायरस और वबाओं पर तकरीर_____(३)

ट्रांसक्रिप्ट न्यू एज इस्लाम एडिट डेस्क

२२ मार्च २०२०

बात यह है कि इन हालात में हर शख्स यह समझे कि अल्लाह पाक मुझ पर हालात बराह ए रास्त लाए हैं। और यह भी सबके ज़ेहन में रहे कि ऐसा नहीं हो सकता कि अज़ाब तो आए कुफ्फार पर और मुसलमान उसमें फंस जाएं। यह लोगों का ख्याल गलत है। ‘भाई वबा तो आई थी गैरों पर मुसलमान इसमें फंस गए हैं। ‘मामला अल्लाह का हर मोमिन के साथ सीधा है। यह तो हम कभी भी नहीं मान सकते ईमान और अकीदे की रौशनी में कि भाई अल्लाह की तरफ से अज़ाब तो ज़माने वालों पर आया था बेचारे मुसलमान भी इसमें फंस गए। कुरआन कहता है कि हम जानते हैं कि कौन हैं जिन पर अज़ाब आए गा और किन पर अज़ाब नहीं आए गा। हम जानते हैं। अज़ाब आए गा तो हम जानते हैं कि अज़ाब किन को पहुंचे गा।किस को नहीं पहुंचेगा। यह तो नहीं कि अज़ाब के लपेटे में सब आ जावेंगे। हाँ इतनी बात ज़रूर है कि हम किसी पर इसके अलावा अगर अज़ाब लाते हैं तो वह दोसरों को डराने के लिए और उनको अमल की तरफ मुतवज्जोह करने के लिए। इसलिए यह हालात इबरत लेने के हैं। यह नहीं कि थोड़े दिन नमाज़ छोड़ दो, थोड़े दिन यह अमल छोड़ दो, तब यह अज़ाब हट जावेगा। अरे? (कुरआन की आयत पढ़ते हैं) अजीब! कुरआन की आयत है। अल्लाह पाक फरमाते हैं कि ऐसे लोगों को वबाएं और अज़ाब क्या नसीहत करेंगे और क्या उनकी आँखें खोलेंगे। यह नहीं सोचते कि वक्ती चीज है। अपनी जगह पे चली जाएगी। चलो तो सही। उनको नसीहत कोई फायदा नहीं देती। आज भी मुसलामानों का ख्याल है कि यह जो बीमारी सी फ़ैल गई है थोड़े दिन की बात है। ताल जाए गी। अल्लाह पाक फरमाते हैं कि हम हल्का अज़ाब थोड़े दिन के लिए हटा कर देखेंगे। और हम जानते हैं कि तुम गुनाहों की तरफ वापस जाओगे पलट कर। तुम कहो गे हो गया गुज़र गया। पानी का बहाव था गुजर गया। इसलिए मेरे दोस्तों अज़ीज़ों यह वक्त तौबा और तिलावत का और अल्लाह की तरफ मुतवज्जोह होने का है। यह मौक़ा तो उम्मत को मस्जिद से जोड़ने का है। मस्जिदों को छोड़ने का नहीं। यह जिहालत और इंतिहाई बाद अकीदगी अल्लाह से दुरी की अलामत है। मैं शुरू में अर्ज़ कर चुका हूँ कि जानवर हैं वह जो डंडे देख कर अपने मालिक से डर कर भागे। आप तो जानते हैं ना कि भैंस का मालिक भैंस को डर दिखाता है अपनी तरफ लाने के लिए। भाई ऐसा ही है क्या। कौन होगा जो अपनी दूध देने वाली भैंस को भगाएगा। बाज़ मर्तबा तो आप ने देखा होगा कि वह डंडे को छुपा कर भैंस से आगे निकल जाना चाहता है।ताकि घर की तरफ उसको हांका जाए। डंडे को छुपा कर चाहता है कि वह भैंस से आगे निकल जाए। ताकि वह हंकाए उसको घर की तरफ। और इस जमाने की यह जिहालत मुसलमानों की। हम समझते थे कि तुम्हें आमाल से काफिर नहीं रोकेंगे। अगर आमाल से कुफ्फार रोकने लगें तो अल्लाह उन्हें तबाह कर देंगे। हम समझते थे कि किसी ज़माने में इस्लाम को नुक्सान मुसलमान से होगा कुफ्फार से नहीं होगा। यह ख्याल बातिल ख्याल है लोगों का कि गैरों से इस्लाम को नुक्सान नुक्सान पहुँच रहा है। हरगिज़ नहीं। जितना इस्लाम को नुक्सान होगा मुसलमान से होगा। गैर इस्लाम का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। अगर सारा बातिल एक वक्त में जमा हो कर एक इस्तिन्जे की सुन्नत के मुकाबले में आ जाएं तो बातिल की तबाही के लिए काफी है। सीधी बात है। भाई अंदाजा करो कि फ़राइज़ से रोकने पर कैसी तबाही आएगी। लेकिन मुसलमान ही फ़राइज़ से रोकेंगे बजाए इसके कि मस्जिदों को आबाद करते। अल्लाह के घर में आकर पढ़ते, अल्लाह से कहते। यह नहीं कि मस्जिद छोड़ दो, मस्जिद छोड़ दो, कि तुम्हारे जमा होने से बीमारी आएगी। हाए तो जिन गुनाहों की निस्बत से जमा हो रहे थे जिससे यह अज़ाब आया था उसके मुकाबले में अगर अल्लाह की रज़ा वाले कामों पर जमा होते तो अज़ाब क्यों ना हटे गा।अजीब अहमक किस्म के लोग। जिन गुनाहों के अड्डों पर जमा होने की वजह से अज़ाब आया। मस्जिदों को खाली करके अज़ाब का इलाज कर रहे हैं। इससे अज़ाब बढ़ेगा या ख़त्म होगा। कितनी उलटी सोच है कि नमाज़ ना पढ़ो। घरों पर पढ़ लो। हालांकि जो अज़ाब अल्लाह के यहाँ से आना मुकद्दर हो चुका होता है अल्लाह पाक उस अज़ाब को सिर्फ उन लोगों की वजह से हटा देते हैं जो मस्जिदों को आमाल से आबाद रखते हैं।

क्या आप इस हदीस का इनकार करेंगे। कहेंगे कि यह तो वक्ती तौर पर कर रहे हैं। वक्ती तौर पर? अल्लाह पाक का जो अज़ाब आता है वह किसी आमाल की तरफ से मुतवज्जोह करने के लिए आता है। वह अज़ाब यूँ ही नहीं आ गया कि हम दो चार दिन के लिए लाए हैं, हटा देंगे। वह हट जाएगा तो तुम फिर आ जाना आमाल की तरफ। नहीं ऐसा नहीं है। अज़ाब को हटाने के लिए आमाल है यह नहीं कि तुम आमाल को छोड़ दो अज़ाब के हटने तक। इसलिए मेरे दोस्तों अजीजों, यह मौक़ा है मस्जिदों का आमाल से आबाद करने का। यह मौक़ा है मस्जिदों का आमाल से आबाद करने का।

हज़रत निजामुद्दीन में स्थित हेड क्वार्टर में तबलीगी जमात के अमीर मौलाना मोहम्मद साद कांधलवी की कोरोना वायरस और वबाओं पर तकरीर______(४)

ट्रान्सक्रिप्ट न्यू एज इस्लाम एडिट डेस्क

२५ मार्च २०१२०

(४) अब ज़रा अंदाजा करें जहां मस्जिदें बिलकुल आबाद नहीं आमाल से वहाँ बाहर के माहौल में कितनी ज़ुलमतें होंगी। उन जुलमतों में कितने गुनाह होंगे। उन गुनाहों से कितने अज़ाब आएँगे। इसलिए मेरे दोस्तों यह मौक़ा म्हणत करने का है। और उम्मत को मस्जिदों से जोड़ने का है नाकि मस्जिदों से रोकने का। इसलिए अल्लाह पाक कोई भी अज़ाब कोई भी आज़माइश इसलिए नहीं लाते कि मुसलमान तदाबीर करने और इलाज मुआलजे में मशगुल हो जाएं। बल्कि इए मौकों पर अज़ाब के आने के असबाब देखे जाते हैं। अज़ाब टालने के असबाब नहीं देखे जाते। अज़ाब को टालने के माद्दी असबाब नहीं देखे जाते। और उनके साथ साथ यह देखा जाता है कि वह कौन कौन से आमाल हैं जिन आमाल पर अल्लाह रब्बुल इज्ज़त राज़ी होकर अज़ाब हटा दें। किसी भी इलाके वाले जमात की नकल व हरकत में किसी भी हालात की वजह से खुरुज में देरी की उन्होंने इससे ज़्यादा बुरे हालात को दावत दी है। हज़रत फरमाते थे कि जमातों के खुरुज में ज़रा भी कमी कर दी तो गोया तुम ने इससे बड़े अज़ाब को दावत दे दी। इसलिए कि किसी भी तरह के फितने में पड़ने वाले वह नहीं हैं जो खुदा की राह में निकल जावें। फितने में पड़ने वाले वह लोग हैं जो फितने की वजह से खुरुज में देरी करें। कुरआन ने इसी तरह बयान किया है। ऐसे ही लोग हैं जो कहेंगे कि इजाज़त दीजिये अभी हालात निकलने के नहीं हैं। आप जिस जगह जा रहे हैं वहाँ फितना है। फितना किसी भी शक्ल में हो सकता है। मुआशरे की खराबी की शक्ल में अमराज़ की शक्ल में किसी भी शक्ल में हो सकता है। फिर उन्होंने कहा कि हमें इजाज़त दीजिये कि अहम् मदीने में रहें कि यह मौक़ा निकलने का नहीं। अल्लाह पाक ने कुरआन में फरमाया कि जो आप से मदीने में रहने की इजाज़त मांग रहे हैं और निकलने से इनकार कर रहे हैं उनका निकलना फितना नहीं बल्कि उनका रह जाना फितना है। मौलाना साहब का मामूल था कि जहां भी किसी फसाद की या किसी वबा की खबर आती बस वह फ़ौरन वहाँ जमात रवाना कर देते अगर जमात बावजूद कोशिश के वहाँ दाखिल नहीं हो सकती थी तो वह पूछते कि हज़रत हम क्या करें। हज़रत फरमाते कि जिस इलाके में फसाद है तुम वहाँ के आस पास की मस्जिद में जा कर वहाँ के लोगों से तौबा कराओ और वहाँ के लोगों को इन आमाल की तरफ इस यकीन के साथ जोड़ो कि अल्लाह के अज़ाब के हटने का यही एक सबब है। इसलिए कि सहीह हदीस में है कि जो अज़ाब अल्लाह के यहाँ से आना मुकद्दर हो चुका होता है वह सिर्फ मस्जिद के आबाद करने की वजह से हटा दिया जाता है। इन हालात में मस्जिदों को छोड़ देना इस हदीस की खिलाफ वर्जी है। इस रिवायत का इनकार और हदीस का इनकार कर देना यह कह कर कि यह वक्त जमा होने का नहीं है क्योंकि जमा होने से बिमारी आवेगी। इसका मतलब यह है कि तुम ने अल्लाह की अतार्फ़ से अज़ाब के हटने और मदद के आने के असबाब को खुद बदल दिया। हमने अपनी आँखों से देखा मेवात में कि इधर से जमात दाखिल होती थी उधर से वबा निकल जाती थी। इधर जमात दाखिल होती थी उधर से अज़ाब और फितना ख़त्म हो जाता था। इसलिए मैं अर्ज़ कर रहा था आप सब से कि यह मौक़ा काम के बढ़ाने का है यह मौक़ा काम में कमी करने का नहीं। यह वक्त है इसका कि गश्त करके लोगों को मस्जिदों कीतरफ ले कर आएं। यह इसका वक्त है। इसलिए कि जो अज़ाब गुनाहों की वजह से आ रहे हैं वह अज़ाब इबादतों को छोड़ने से ख़त्म नहीं होंगे। बल्कि इबादतों की मिकदार बढ़ाने से ख़त्म होंगे।

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तबलीगी जमात के आमिर मौलाना मोहम्मद साद कांधलवी का जमात के साथियों के नाम ऑडियो पैगाम

ट्रांसक्रिप्ट न्यू एज इस्लाम एडिट डेस्क

१ अप्रैल २०२०

इसमें कोई शक नहीं कि इस वक्त पूरी दुनिया में यह वबा हम इंसानों के गुनाहों का नतीजा है। इस वक्त यकीनी असबाब में दुआएं, इस्तिग्फार की कसरत, अल्लाह की तरफ मुतवज्जोह होने और इनफिरादी इबादतों और अपने घरों में रहते हुए दावत व तालीम का एहतिमाम करना है। यह अल्लाह पाक के अज़ाब के हटाने और उसके गुस्से को ठंढा करने का असल जरिया है। अलबत्ता ज़ाहिरी असबाब में एहतियात और तदाबीर इख्तियार करना इसमें ख़ास तौर पर उलेमा ए हक़ की तरफ से जारी करदा हिदायात का एहतिमाम करना है। डॉक्टरों की हिदायात व इलाज का एहतिमाम, हुकूमत इंतेजामिया का पूरा साथ देना जैसे मजमा जमा ना करना और इन हालात में हुकूमत इंतेजामिया की पूरी मदद करना जरुरी है। बंदा अज खुद भी देहली में डॉक्टरों की हिदायात के मुताबिक़ अपने आप को कोरनटाईन किये हुए हैकोरनताईन यह एहतियाती तदाबीर यकीन, तवक्कुल, ईमान बिल्लाह के हरगिज़ खिलाफ नहीं। तदाबीर का इख्तियार करना जरूरी है। जहां जहां भी हमारी जमातें हैं वह वहाँ रहते हुए हुकूमत के कवानीन की पाबंदी जरुर करें। फ़कत व अस्सलाम मोहम्मद साद।

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