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Hindi Section ( 12 March 2015, NewAgeIslam.Com)

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Practices that draw believers closer to God वो आचरण जो मनुष्य को अल्लाह के क़रीब ले जाते हैं

 

 

 

 

इमाम सैयद शमशाद अहमद नासिर, न्यू एज इस्लाम

21फ़रवरी, 2015

क़ुरानी नसीहत: सुरा अल-नहल के पहले आयात का अनुवाद इस प्रकार है:

"अल्लाह के नाम के साथ जो बहुत रहम करने वाला बिन माँगे देने वाला और बार बार रहम करने वाला है"

ता सीन जो क़ुरान का एक सुरा है की एक आयात का मतलब है:

मोमिनो के लिए यह हिदायत और खुशख़बरी है, वो जो नमाज़ को क़ायम करते हैं, और ज़कात देते हैं और वही हैं जो आखरत पर यक़ीन रखते हैं

यक़ीनन वो लोग जो आखरत पर ईमान नही लाते, हम उनके अमाल उनके लिए खूबसूरत करके दिखाए हैं, इस लिए वो भटकते रहते हैं। यही वो लोग हैं जिनके लिए बहुत खौफनाक अज़ाब क़िस्मत में है। और वही आखरत मैं सब से ज़्यादा घाटे वाले होंगे।

और यक़ीननन क़ुरान तुझ को अता किया जाता है बहुत हिकमत वाले और बहुत इल्म वाले की तरफ से(27: 7.1)

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नसीहत:

 हज़रत आनस बिन मलिक बयान करते हैं कि मैं ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह कहते सुना कि जो व्यक्ति रिज़्क की फराखा चाहता है या इच्छा रखता है कि उसकी उम्र ज़िक्र (उल्लेख) अधिक हो उसे सिला रहमी का ख़ल्क़ अख्तियार करना चाहिए। यानी अपने रिश्तेदारों से बना कर रखनी चाहिए।( मुस्लिम किताब अलबरुअलसलतह)

हज़रत अबुहुरैरह बयान करते है कि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक दफ़ा फरमाया: अल्लाह तआला फरमाता है जिसने मेरे दोस्त से दुश्मनी की मैं उस से एलान ए जंग करता हूँ, मेरा बंदा जितना मेरी नज़दीकी उस चीज़ से जो मुझे पसंद है और मैंने उस पर फ़र्ज़ कर दी है, हासिल कर सकता है उतना किसी और चीज़ से हासिल नहीं कर सकता और नावाफिल के द्वारा मेरा बंदा मेरे क़रीब हो जाता है। यहाँ तक के मैं उससे मोहब्बत करने लग जाता हूँ। और जब मैं उसे अपना दोस्त बना लेता हूँ तो उसका कान बन जाता हूँ जिन से वह सुनता है, उसकी आँखें बन जाता हूँ जिन से वह देखता हैं।, उसका हाथ बन जाता हूँ जिन से वह पकड़ता है, उसका पाँव बन जाता हूँ जिन से वह चलता है, यानी मैं ही उसका काम करने वाला होता हूँ अगर वो मुझ से माँगता हैं तो मैं उसे देता हूँ और अगर वो मुझ से पनाह चाहता है तो मैं उसे पनाह देता हूँ" (बुखारी किताब अल रिफाक़ बाब उल तवज़ू)

यह हदीस ए क़ुद्सी है जिसमें प्यारे हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अल्लाह से इल्म पाकर उसकी बात हम तक पहुँचाई है कि नफ़िल नमाज़ो से इंसान खुदा के क़रीब हो जाता है और जब इंसान खुदा का दोस्त बन जाए तो फिर खुदा उसकी पनाह बन जाता है। उसकी हिफ़ाज़त फरमाता है बल्कि ऐसे मोमिन जो खुदा का दोस्त बन जाएं तो खुदा उसके दुश्मनो का दुश्मन बन जाता है।

आज आतंकवाद से बचने का यह भी एक कारगर नुस्खा है कि आतंकवादियों को छोड़कर बाकी तो खुदा के बन जायें, खुदा के गोद मैं आ जायें फिर खुदा कि शरण में भी आ जाएँगे। यानी जिस तरह शुरू में सुरा अल-नहल की आयात का अनुवाद दिया गया है उनमें भी खुदा का दोस्त बन जाने के तरीक़े बताए गये हैं के क़ुरान मोमिनो के लिए हिदायत और खुशख़बरी है, ऐसे मोमिन जो नमाज़ को क़ायम करते है और ज़कात देते हैं और क़यामत के दिन पर यक़ीन रखते हैं।

इसलिए नमाज़ को कायम रखना यह खुदा की नज़दीकी हासिल करने का बहुत कामयाब ज़रिया है। शर्त यह है की नमाज़ सर पटकने का नाम नही है बल्कि बहुत विनम्रता और ध्यान के साथ क़याम, रुकु और सजदा करने और ''हम तेरी बन्दगी करते हैं और तुझी से मदद माँगते हैं'' (1:4) का बार बार इस यक़ीन के साथ दोहराना की, अल्लाह को ही अपना मालिक और अपनी ज़रूरतों को पूरा करने वाला समझें। ऐसी ही नमाज़ इंसान को खुदा के क़रीब ले जाती है।

फिर आर्थिक (माली) क़ुर्बानी है जो इंसान को खुदा की क़ुरबत (नज़दीकी) प्रदान करता है। जो कोई खुदा के लिए हर क़िस्म की क़ुर्बानी कर रहा होगा खुदा उसकी हर तरह से हिफ़ाज़त फरमाता है. लेकिन अपने वतन में इसका उल्टा हो रहा है। कहने को तो सभी मुसलमान है लेकिन जब ज़कात देने का वक़्त आएगा ज़कात नहीं देंगे। रमज़ान में भी ऐसे घिनौने काम करेंगे की इंसानियत भी शरमाने लगेगी। सरकारी टैक्स नहीं देना तो ग़लत समझा ही नहीं जाता है। नमाज़ नहीं अदा करने के भी तरीक़े सभी लोगों को आते हैं. अधिकतर लोगों की नमाज़ तो ऐसी होगी कि उन्हें नमाज़ का मतलब ही नहीं मालूम की वह क्या कर रहे हैं।

सार्वजनिक स्थानों पर राजनीतिज्ञ हज़रात तसबीह ले कर गिनते रहते हैं। दीन से दूरी है खुदा से दूरी है लेकिन नामूसे रेसालत पर इस क़दर ईमान है की लोगों को ज़िंदा जला देने से भी नहीं घबराते। अल अयाज़ बिल्ल्लाह।

इसलिए आतंकवादियों को तो छोड़िए दूसरे लोग अगर खुदा की नज़दीकी हासिल करें तो फिर खुदा ऐसे दुश्मनों से उन्हें खुद रक्षा करेगा।

जैसा की मैं पहले भी लिख चुका हूँ की आख़िर यह आतंकवादी एक रात की तो पैदावार नहीं हैं। देश की इतिहास को देखें की यह कब और कैसे पैदा हुए हैं। इनके पीछे किस का हाथ था। और फिर ऐसे ही लोगों ने उन को न केवल यह की इनको जन्म दिया बल्कि इनकी देख भाल की और आज कहते हैं की हम इनसे निपट कर रहेंगे। क्या यह संभव है, खुदा करे की ऐसा ही हो, आमीन।

पैग़म्बरे इस्लाम स.अ.व की दुआएं:

हज़रत अबू अमामा बाहली कहते हैं कि एक बार हम ने रसूल करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अर्ज़ किया कि आप ने ढेर सारी दुआएं की हैं जो हमें याद ऩही रहीं। आप स.अ.व ने फरमाया की मैं तुम्हें एक व्यापक (जामे) दुआ सिखाता हूँ इसे याद कर लो। (अनुवाद)

ऐ अल्लाह हम तुझ से वो तमाम खैर व भलाई माँगते हैं जो तेरे नबी स.अ.व ने तुझ से माँगी और हम तुझ से उन बातो से पनाह चाहते हैं जिन से तेरे नबी मोहम्मद स.अ.व ने पनाह चाही। तू ही है जिस से पनाह चाही जाती है अतः तेरे तक दुआ का पहुँचना आवश्यक है.(तिर्मिज़ी ख़ज़ीनह दुआ पृष्ठ 82)

पैग़म्बरे इस्लाम स.अ.व की दुआ:

अनुवाद: ऐ अल्लाह सब हम्द और तारीफ तुझे हासिल है। जिसे तू उदार प्रदान करे उसे कोई तंगी नहीं दे सकता और जिसे तू तंगी दे उसे कोई उदार प्रदान नही कर सकता। जिसे तो गुमराह करार दे दे उसे कोई हिदायत देने वाला नहीं और जिसे तू हिदायत दे उसे कोई गुमराह नहीं कर सकता। जिसे तू न दे उसे कोई दे नहीं सकता और जिसे तू दे उसे कोई रोक नहीं सकता। जिसे तू दूर करे उसे कोई क़रीब नहीं कर सकता और जिसे तू क़रीब करे उसे कोई दूर करने वाला नहीं। ऐ अल्लाह हम पर अपने बर्कत और रहमत के दरवाज़े खोल दे ऐ अल्लाह मैं तुझ से ऐसी हमेशा रहने वाली प्रसन्नता माँगता हूँ जो कभी ज़ाइल न हों। न खत्म हो। ऐ अल्लाह मैं तुझ से ग़रीबी के लिए नेमत माँगता हू और ख़ौफ़ के समय अमन चाहता हूँ।

ऐ अल्लाह जो कुछ तू ने हमें दिया उस के बुराई से तेरी पनाह चाहता हूँ और जो तू ने नहीं दिया उसके बुराई से भी। ऐ अल्लाह हमें ईमान वाला बना दे और कुफ्र अज्ञानता और अवज्ञा के लिए हमारे दिलों में डर पैदा कर दे। और हमें सही रास्ते पर चलने वाला बना। ऐ अल्लाह हमें मुसलमान होने की हालत में मौत दे, मुसलमान होने की हालत में ज़िंदा रख और हमें सीधे रास्ते पर चलने वाला बना। हमें रुसवा न करना। न ही किसी फ़ितना में डालना। ऐअल्लाह उन काफिरों को स्वंय बर्बाद कर जो तेरे रासूलों को झुट्लाते हैं और तेरे रास्ते से रोकते हैं उन पर अपनी सख्ती और अज़ाब नाज़िल कर। ऐ अल्लाह! इन काफिरों को भी मार जिन्हें किताब दी गई मगर मानते नहीं के रसूल हक़ है (मसनद अहमद) स्रोतः (ख़ज़ीनह उद दुआ पृष्ठ 81)

एक खास दुआः

‘‘ऐ अल्लाह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत को सुधार दे। ऐ अल्लाह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत पर रहम फरमा। ऐ अल्लाह हम पर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बर्कत नाज़िल फरमा और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर रहमतें और बर्कतें और सलाम भेज '' (मकतोबात अहमद जल्द प्रथम पृष्ठ 50)

चर्चा से एक प्रार्थना:

'' रब असलह मुहम्मद'' तज़किरह (स्रोत ख़ज़ीनतह अलदुआ पृष्ठ 53)

अनुवाद: ए मरे रब उम्मत मुहम्मदियह को नेक बना।

एक और दुआः

'' ऐ मेरे रब मेरी दुआ को सुन और अपने और मेरे दुश्मन को टुकड़े टुकड़े कर दे और अपना वादा पुरा कर और अपने बंदे की मदद फरमा और हमें अपने वादों के दिन दिखा और अपनी तलवार हमारे लिए निकाल ले और शरीर काफिरों में से किसी को बाक़ी न छोड़'' (ख़ज़ीनतह अलदुआ पृष्ठ 52)

तज़केरत औलिया से हज़रत अब्दुल्ला बिन मुबारक की एक घटना:

कहते हैः

'' एक बार आप बहुत वजाहत के साथ चल रहे थे कि एक नादार सैयद ने कहा कि सैयद होने के बावजूद भी आपसे मर्तबा में कम क्यों हूँ। कहा कि मैं तो तेरे जद अमजद का पालन गुज़ार हूँ लेकिन तुम उनके कार्यों का भी पालन नहीं करते, कुछ लोगों का कहना है कि आपने यह जवाब दिया कि यह तो एक हकीकत है कि तेरे जद आला खातमुल अंबिया थे और मेरा पिता गुमराह मगर तेरे जद आला ने जो तर्का छोड़ा उसको मैंने हासिल कर लिया जिसकी वजह से मुझे यह मर्तबा दिया गया और मेरे पिता की गुमराही तुम ने हासिल की इसलिए तो रुसवा हो गया लेकिन उसी रात आप सपने में पैगम्बर मोहम्मद (स.अ.व.) को गुस्सा की हालत में देखा और जब कारण पूछा तो पैगम्बर ने कहा कि तूने मेरी ऑल के ऐब की  पर्दा दरी क्यों की तो आप जागने के बाद इसी सैयद की तलाश में निकल खड़े हुए और उधर इस सैयद ने सपने में देखा कि हूजूर स.अ.व. यह फरमा रहे हैं कि अगर तेरे अमाल और कार्यों बेहतर होते तो अब्दुल्ला तेरी अहानत क्यों करता? इसलिए वे भी जागने के बाद आप की तलाश में चला गया और जब रास्ते में दोनों की मुलाकात हुई तो दोनों अपना सपना सुनाने के बाद बहुत पचताए '' (पृष्ठ 139)

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