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Hindi Section ( 28 Feb 2012, NewAgeIslam.Com)

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Philanthropy in Islam इस्लाम में ख़िदमते ख़ल्क़ (परोपकार)


सैयद एमादुद्दीन असद (अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

24 फरवरी, 2012

ख़िदमते ख़ल्क़ (परोपकार), सरल शब्दों में, लोगों के कल्याण के लिए किए गए कार्य को बताता है। प्रत्येक धर्म में ख़िदमते ख़ल्क़ (परोपकार) के घटक हैं। इस्लाम कोई अपवाद नहीं है, वास्तव में, इस्लामी फरमान खैरात के अमल को अनिवार्य बनाते हैं।

लेकिन, पश्चिम में बहुत से लोगों का मानना ​​है कि ख़िदमते ख़ल्क़ (परोपकार) एक ऐसी अवघारणा है जिसके इस्लाम के साथ जुड़े होने की संभावना नहीं हैं। एहसान, दया, करुणा, सखावत, इंसान दोस्ती के बजाय, आम पश्चिमी लोग इस्लाम को हिंसा, आतंकवाद, असहिष्णुता, अलोकतांत्रिक सामाजिक व्यवहार, महिलाओं के उत्पीड़न आदि जैसी विशेषताओं वाला बताने की कोशिश करते हैं। इस संगीन गलतफहमी के दो कारण हैः उनकी कुरान और रसूलुल्लाह (स.अ.व.) की परंपराओं से लाइल्मी और कुछ मुसलमानों का गैर जिम्मेदाराना रवैय्या है। वास्तव में, इस्लामी मतून में बेशुमार फरमान है जो अच्छे कार्यों को अंजाम देने और इंसानों की खिदमत करने की प्रेरणा देते हैं।

कुरान का कहना है किः नेकी ये कि ईमान लाये अल्लाह और क़यामत और फरिश्तों और किताब और पैगम्बरों पर और अल्लाह की मुहब्बत में अपना अज़ीज़ माल दे रिश्तेदारों और यतीमों और मिस्कीनों और राहगीर और साइलों और गरदनें छुड़ाने में (2:177 ) तो अहले क़राबत और मोहताजों और मुसाफिरों को उनका हक़ देते रहो। जो लोग रज़ाए खुदा के तालिब हैं ये उनके हक़ में बेहतर है। और यही लोग निजात हासिल करने वाले हैं (30:38)

इसी तरह नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के कई फरमान है जो ख़िदमते ख़ल्क़ (परोपकार) की अहमियत को बयान करते हैः "मोमिन तब तक जन्नत में दाखिल नहीं होंगे जब तक आपका ईमान न हो, और आप ईमान तब तक हासिल नहीं कर सकते जब तक कि एक दूसरे से मोहब्बत न करो। जो लोग इस दुनिया में हैं उन पर रहम करो और जो आस्मान में है तुम पर रहम करेगा। ख़ुदा उस पर कोई रहम नहीं दिखाई जो सभी इंसानों के साथ कोई हमदर्दी नहीं करेगा।

"दो लोगों के बीच इंसाफ करना सदक़ा है और बुरे से बुरे आदमी की भी मदद करना सदक़ा है, और पाक साफ अल्फाज़, जिसके लिए ईनाम है और नरमी के साथ एक साएल का जवाब देना सदक़ा है, और हर कदम जो नमाज़ की तरफ ले जाता है वो भी सदक़ा है, और रास्ते की ऐसी मुश्किलों को जो किसी इंसान को तकलीफ पहुंचा सकती हैं जैसे पत्थर, कांटे हटाना भी सदक़ा है"।

इस्लाम में ख़िदमते ख़ल्क़ (परोपकार) दो प्रकार की हैः फर्ज़ और वाजिब। फ़र्ज़ ख़िदमते ख़ल्क़ (परोपकार) में ज़कात और ज़कातुल फित्र या फतराना शामिल है, जबकि, वाजिब ख़िदमते ख़ल्क़ (परोपकार) में सदक़ा और वक़्फ शामिल है।

अगर एक मुसलमान के असासों (परिसम्पत्तियों) की कीमत एक विशेष सीमा से अधिक है तो ज़कात, उसके माल का वो हिस्सा है जिसे मुस्तफीद होने वालों की मुकर्रर किस्म का देना फर्ज़ है। ज़कात के मुस्तफीद होने वालों का ज़िक्र कुरान में है: "सदकात (यानी ज़कात न खैरात) तो मुफलिसों और मोहताजों और कारकुनाने सदकात का हक़ है और उन लोगों का जिनका तालीफ कुलूब मंज़ूर है और गुलामों के आज़ाद कराने और कर्ज़दारों (के कर्ज़ अदा करने में) और खुदा की राह में और मुसाफिरों (की मदद) में भी ये माल खर्च करना चाहिए"(9:60)

एक इस्लामी राज्य में ज़कात जमा करना और उसका नज़्म करना सरकार की ज़िम्मेदारी है। ज़कातुल फित्र या फितराना वो सदक़ा है जो कि दौलत के एख खास मात्रा का मालिक हर मुसलमान, रमज़ान के महीने के अंत में अदा करता है। ज़कातुल फित्र प्रत्येक मुसलमान पर वाजिब है, न केवल ये कि अपनी ओर से, बल्कि उन सभी लोगों की ओर से भी जिनका वो जिम्मेदार है।

सदक़ा का मतलब सिर्फ पैसा या खाने के रूप में दान नहीं है बल्कि मानव हित के लिए किया जाने वाला हर एक अमल सदक़ा है। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है किः "खैर व भलाई के लिए किया गया हर एक अमल सदक़ा है", और "हर मुसलमान पर एक सदक़ा फ़र्ज़ है। अगर वो दे नहीं सकता क्योंकि उसके पास पैसा नहीं है तो उसे काम करना चाहिए ताकि वो अपनी मदद कर सके और दान कर सके; अगर वह काम करने के काबिल नहीं है तो उसे ऐसे व्यक्ति की मदद करनी चाहिए जिसे उसकी मदद की जरूरत हो, अगर वो ऐसा नहीं कर सकता है तो उसके नेक काम में जुड़ जाए; अगर वो ऐसा नहीं कर सकता है तो वह किसी का बुरा या नुक्सान न करे: ये उसके लिए बतौर सदक़ा दर्ज किया जाएगा"।

वक़्फ इस्लामी कानून के मुताबिक तस्लीम शुदह मक्सद मज़हबी, नेक या खैराती काम के लिए मुस्तकिल तौर पर अपनी जायेदाद को देना है। जो भी चीज वक़्फ़ की जाती है उसकी मिल्कियत खुदा को मुंतक़िल हो जाती है। लेकिन जैसा कि खुदा किसी मिल्कियत के इस्तेमाल या लुत्फ लेने से बालातर है। इसके फायदे वापस इंसानों की मदद के काम में इस्तेमाल किये जाते हैं।

कोई भी जायेदाद वक़्फ़ की जा सकती है। एक वक़्फ़ के दुरुस्त होने का अंदाज़ा उसके ज़रिए होने वाले लाज़वाल फायदे से उसे किसी दूसरी शक्ल में तब्दील करने की सलाहियत से लगाया जा सकता है। ये सिर्फ उस सूरत में जब उसे किसी मुनाफे बख्श चीज़ में तब्दील कर दिया जाता है, तब उसका इस्तेमाल अपना मकसद खो देता है।

अंग्रेजी कानून में ट्रस्ट के मुक़ाबले वक़्फ़ के इस्लामी इदारे में व्यापक गुंजाइश और मकसद है। इस्लामी देशों में ये इदारे इतने लोकप्रिय और महत्वपूर्ण बन गए हैं कि उनमें से अक्सर में, एक विशेष मंत्रालय वक़्फ़ संपत्ति की प्रशासनिक ज़िम्मेदारी के लिए क़ायम की गयी है।

इस्लाम बे-सहारा लोगों की मदद पर बहुत ज़ोर देता है। कुरान और सुन्नत ने स्पष्ट शब्दों में ऐलान किया है कि अमीर की जिम्मेदारी है कि वो समाज के वंचित तब्के की देखभाल करे। मुसलमानों को सिर्फ इंसानों के साथ ही हुस्ने सुलूक के लिए नहीं कहा गया है बल्कि जानवरों के साथ दया का व्यवहार और पर्यावरण की सुरक्षा का भी निर्देश दिया गया है।

हालांकि अन्य धर्म भी ख़िदमते ख़ल्क़ (परोपकार) का प्रचार और प्रोत्साहित करते हैं। लेकिन इस्लाम ज़कात की शक्लस में इसे फ़र्ज़ कर औरों से एक कदम आगे जाता है। इस्लाम ने लोगों की इस जिम्मेदारी पर अमल को यक़ीनी बनाने की जिम्मेदारी इस्लामी राज्यों पर डाली है। इस तरह, ज़कात अदा न करने वाला न सिर्फ खुदा की नाराजगी के लिए जिम्मेदार होता है बल्कि राज्य की ओर से उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। दूसरे शब्दों में, ख़िदमते ख़ल्क़ (परोपकार) को एक कानूनी जिम्मेदारी भी बना दिया गया है।

लेखक हार्वर्ड लॉ स्कूल ग्रेजुएट हैं और स्कूल ऑफ लॉ एंड पालिसी, यू.एम.टी लाहौर के डायरेक्टर हैं।

स्रोत: डॉन, कराची

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