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Hindi Section ( 14 Feb 2014, NewAgeIslam.Com)

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Maulana Abul Kalam Azad: The Man Who Knew The Future Of Pakistan Before Its Creation मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और पाकिस्तान - पहली क़िस्त

सोरिश कश्मीरी

22 दिसम्बर, 2013

जनाब सोरिश कश्मीरी को 1946 में दिए गए इंटरव्यू का पहला हिस्सा

सवाल- हिन्दू और मुस्लिमों के बीच मतभेद इस हद तक फैल चुके हैं कि विरोधियों में समझौते के दूसरे सभी रास्ते बंद हो गये हैं और पाकिस्तान अपरिहार्य हो गया है?

जवाब- हिंदू और मुस्लिमों के बीच मतभेद का समाधान अगर पाकिस्तान होता तो मैं खुद उसका समर्थन करता। हिन्दुओं का मन भी इसी तरफ पलट रहा है। एक तरफ आधा पंजाब, सीमावर्ती इलाके, सिंध और बलूचिस्तान और दुसरी तरफ आधा बंगाल दे कर उन्हें सारा हिन्दुस्तान मिल जाए तो बड़ी सल्तनत, हर समुदाय के राजनीतिक अधिकार की समस्या से सुरक्षित हो जाती है। इस तरह हिन्दुस्तान एशिया में चीन के बाद लीगी शब्दावली के अनुसार एक बड़ा हिंदू देश होगा। ये किसी हद तक व्यवहारिक भी और काफी हद तक स्वभाविक भी। ये कोई इच्छित चीज़ नहीं होगी बल्कि ये समाज का असर होगा। आप एक समाज को जिसकी आबादी 90 प्रतिशद हिन्दू हो किसी और सांचे में कैसे ढाल सकते हैं जबकि पूर्वऐतिहासिक काल से वो उसी सांचे में ढलें हो और उसकी सबसे बुरी दुश्मनी (सम्बंधी, रिश्तेदार) हो। वो चीज़ जिसने समाज में इस्लाम की शुरुआत की और उसकी आबादियों में से अपना एक ताक़तवर अल्पसंख्यक पैदा किया। बंटवारे की इस राजनीति की ज़बरदस्त नफ़रत ने इस्लाम के प्रचार प्रसार के दरवाज़े इस तरह बंद कर दिए है कि उनके खुलने का सवाल ही नहीं रहा। जैसे इस राजनीति ने मज़हब की दावत खत्म कर दी है। मुसलमान क़ुरान की तरफ लौट रहे हैं, अगर वो कुरान की तरफ लौट रहे हैं, अगर वो कुरान और सीरत के मुसलमान होते और इस्लाम की आड़ में स्वयंभू राजनीतिक दुश्मनी का इस्तेमाल न करते तो इस्लाम हिंदुस्तान में रुकता नहीं, बढ़ता और फैलता। औरंगज़ेब के वक्त में हम मुसलमान हिन्दुस्तान में शायत सवा दो करोड़ थे, कुछ ज़्यादा या इससे कुछ कम। मुग़ल साम्राज्य समाप्त हुआ, अंग्रेज़ हावी हुए तो मुसलमान आज के (1946) 65 फीसद थे। यहाँ तक कि खिलाफ़त आंदोलन की शुरुआत तक मुसलमान बढ़ते ही रहे। लोगों ने इस्लाम क़ुबूल किया, नस्ल बढ़ती रही। अगर हिन्दू मुस्लिम नफरत या राजनीतिक मुसलमानों की बातचीत के अंदाज़ तीखे न होते और सरकारी मुसलमान अंग्रेज़ों की राजनिति को परवान चढ़ाने के लिए हिन्दु मुस्लिम लड़ाई को व्यापक न करते तो ये अजीब न होता कि मुसलमानों की तादाद मौजूदा संख्या की डेढ़ गुना होती। हमने राजनीतिक विवाद पैदा करके इस्लाम के प्रचार प्रसार के दरवाज़े इस तरह बंद किए जैसे इस्लाम प्रचार प्रसार के लिए नहीं बल्कि राजनिति के लिए है। इधर अंग्रेजों के हत्थे चढ़ कर कि वो मुसलमानों की आबादी में इज़ाफा नही चाहते थे। हमने इस्लाम को एक सीमित धर्म बना दिया फिर यहूदी, पारसी और हिन्दुओं की तरह हम एक वंशानुगत मिल्लत बन गए कि यहूदी, पारसी और हिन्दू बन कर नहीं पैदा होते है। हिन्दुस्तानी मुसलमानों ने इस्लाम की दावत को स्थिर कर दिया फिर कई फिरकों (समुदायों) में बंट गए। कुछ समुदाय इस्तेमाल की पैदावार थे उन सब में हरकत व अमल की जगह ठहराव और गतिरोध पैदा हो गया और वो मानसिक तौर पर इस्लाम से महरुमी के जीवन में दाखिल हो गए। उनका अस्तित्व जिहाद से था लेकिन यही चीज़ उनके अस्तित्व से बाहर हो गई। अब वो बिदअत (नवचारों) व राजनीति का शिकार हैं। वो मुसलमान आस्थाओं के चंगुल में फंसे हुए हैं, दूसरे मज़हब के नहीं सियासत के मुसलमान हैं। उन्हें कुरानी दीन नहीं सियासी दीन पंसद है।

पाकिस्तान एक राजनीतिक दृष्टिकोण है, इस पर ध्यान दिये बिना कि पाकिस्तान हिन्दुस्तानी मुसलमानों की समस्या का समाधान है कि नहीं? इसकी मांग इस्लाम के नाम पर की जा रही है। सवाल ये है कि इस्लाम ने कहाँ और कब दीन के नाम पर भौगोलिक बँटवारे की मांग की और कुफ्र और इस्लाम की बस्तियां बसायी हैं। क्या ये बँटवारा कुरान में है कि हदीस में? सहाबा ने किस चरण में इसकी बुनियाद रखी? इस्लाम के फ़ुक़्हा (धर्मशास्त्री) में से किसने खुदा की ज़मीन को कुफ्र और इस्लाम में बांटा? अगर इस्लाम ने कुफ्र और इस्लाम के सिद्धांत पर बाँटा होता तो इस्लाम वैश्विक होता? मुसलमानों का इतना विस्तार होता? खुद हिन्दुस्तान में इस्लाम दाखिल होता और ये मुसलमान जो आज मुसलमान होने के आधार पर पाकिस्तान की मांग करते हैं, उनके पूर्वज मुसलमान होते?

भौगोलिक बँटवारा सिर्फ लीग की नई कोशिश है। वो इसे राजनीतिक दृष्टिकोण करार दें तो इस तरह बहस व दृष्टिकोण का औचित्य हो सकता है लेकिन कुरान या इस्लाम में भौगोलिक बँटवारे का औचित्य कहीं नहीं और कोई नहीं। मुसलमान इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए हैं या राजनिति के आधार पर कुफ्र और इस्लाम के भौगोलिक बँटवारे के लिए? पाकिस्तान की मांग ने मुसलमानों को इस्लामी दृष्टिकोण से क्या फायदा पहुँचाया, अब तक कुछ नहीं? पाकिस्तान बन गया तो इस्लाम को क्या फायदा पहुँचेगा, इसकी निर्भरता इस क्षेत्र की राजनिति पर है कि उसे किस तरह की लीडरशिप मिलती है। हम जिस मानसिक संकट से गुज़र रहे हैं, इस्लामी दुनिया की जो हालत है और पश्चिमी विद्वानों ने जिस तरह विश्व भर के दिमागों पर क़ब्ज़ा कर रखा है उसके मद्देनज़र मुस्लिम लीग की लीडरशिप का अदाज़ा होता है कि हिन्दुस्तान का इस तरह विभाजन हुआ तो पाकिस्तान में इस्लाम नहीं रहेगा। और हिन्दुस्तान में मुसलमान नहीं होगा। ये एक राजनीतिक अनुमान है जो होगा वो अल्लाह के इल्म में है लेकिन पाकिस्तान में सबसे पहले धार्मिक टकराव पैदा किए जाएंगे। दूसरे वहाँ इस तरह के लोग सत्ता पर आसीन होगें जिनसे दीन को सख्त धक्का लगेगा। ये अजीब नहीं होगा कि नई पीढ़ी पर इसका असर हो और वो आधुनिक आंदोलनों के बिना मज़हब वाले दर्शन के हो जाएं। हिन्दुस्तान के हिन्दू राज्यों में धर्म से जो लगाव या मज़हब से जो लगाव मुसलमानों को है वो पाकिस्तान के मुसलमान राज्यों में नहीं। पाकिस्तान में उलमा के प्रतिरोध के बावजूद धर्म की ताक़त कमज़ोर रहेगी यहां तक ​​कि पाकिस्तान की शक्ल बदल जाएगी।

सवाल- लेकिन कुछ उलमा भी तो क़ायदे आज़म के साथ हैं।''

जवाब- उलमा अकबर महान के साथ भी थे। उसकी खातिर उन्होंने ''दीने अकबरी' ईजाद किया था, इस व्यक्तिगत बहस को छोड़ो, इस्लाम का पूरा इतिहास उलमा से भरा पड़ा है जिनकी बदौलत इस्लाम हर दौर में सिसकियां लेता रहा। सीधी बातें करने वाली कुछ ही ज़बानें होती हैं। पिछले तेरह सौ साल के इतिहास में कितने उलमा है जिन्हें इतिहास ने अपने में जगह दी है, अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैहि तो एक ही थे और इब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैहि भी एक ही थे, हिन्दुस्तान में शाह वलीउल्लाह रहमतुल्लाह अलैहि और उनका खानदान ही ज़िंदा रहा बाकी सब प्रभावित हो गए, सिवाए कुछ को छोड़कर (इल्ला माशाअल्लाह)। मोजद्दिद अलिफ सानी रहमतुल्लाह अलैहि की सच्चाई आज भी बाक़ी है, लेकिन जिन लोगों ने शिकायतों के अम्बार लगा कर उन्हें ग्वालियर के किले में डलवाया था वो भी उलमा थे। अब कहाँ हैं? उनके लिए किसी ज़बान पर सम्मान की बातें हैं?

सवाल- मौलाना! पाकिस्तान अगर राजनीतिक रूप से स्थापित हो जाए तो इसमें गलत क्या है? इस्लाम का नाम तो मुसलमानों की एकता को सुरक्षित रखने के लिए लिया जा रहा है।''

जवाब- आप इस्लाम का नाम एक ऐसी चीज़ के लिए बोल रहे है जो इस्लाम ही के मुताबिक सही नहीं। जंगे जमल में कुरान नेज़े पर लटकाए गए, वो सही थे? करबला में अहले बैत शहीद किय गए उनके हत्यारे मुसलमान थे। क्या वो हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के करीबी होने के दावेदार न थे। हुज्जाज मुसलमान था उसने बैतुल्लाह पर पथराव कराया था। क्या उसका काम सही था? किसी भी झुठे मकसद के लिए कोई भी वाक्य सही नहीं होता। पाकिस्तान मुसलमानों के लिए राजनीतिक रूप से सही होता तो मैं इसका समर्थन करता लेकिन बाहरी और आंतरिक किसी भी दृष्टि से इसके निहितार्थ मुसलमानों के लिए सुखद नहीं, मैं अपनी राय पर ज़ोर नहीं देता।

लेकिन मैं जो देख रहा हूँ उससे फिरना मेरे लिए मुम्किन नहीं, लोग ताक़त की मानते है या तजुर्बे की। जब तक मुसलमान पाकिस्तान के तजुर्बे से नहीं गुज़रेगें उनके लिए पाकिस्तान के बारे में कोई दूसरी बात जो उससे इंकार करता हो, स्वीकार्य नहीं होगी। वो आज दिन को रात कह सकते है लेकिन पाकिस्तान को छोड़ने के लिए तैयार नहीं। एक बात हो सकती है कि सरकारी ताक़त पाकिस्तान बनाने से इंकार कर दे और वो इसके प्लान पर तैय्यार हो जाएं या खुद मिस्टर जिन्ना उनके मन को बदल दें और समझौते की जो स्थिति सामने आए उस पर हुक्म जारी कर दें।

हिन्दुस्तान का विभाजन हुआ, जैसा कि मुझे कार्यसमिति के कुछ साथियों के मानसिक रोष से महसूस हो रहा है, तो हिंदुस्तान ही का बँटवारा नहीं होगा, पाकिस्तान भी बँटेगा। विभाजन आबादी के आधार पर होगा, इनमें प्राकृतिक परिसीमन क्या होगा? कोई नदी, कोई पहाड़, कोई रेगिस्तान? कुछ नहीं। एक लकीर खींची जाएगी। कब तक? कुछ कहना मुश्किल है लेकिन जो चीज़ नफ़रत पर होगी वो नफ़रत पर कायम रहेगी और नफरत उनके बीच एक स्थायी खतरा होगा। इस स्थिति में किसी बड़े बदलाव या काट के बगैर पाकिस्तान और हिन्दुस्तान कभी दोस्त न होंगे। दोनों के दिल में बंटवारे की दीवार होगी। तो सारे हिन्दुस्तान के मुसलमानों को संभालना पाकिस्तान के लिए मुशकिल है, कि उसकी ज़मीन इसे बर्दाश्त नहीं कर सकती लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान में हिन्दुओं का ठहरना मुमकिन न होगा, वो निकाले जाएगें या खुद चले जाएगें, इन दोनों स्थितियों में हिन्दुस्तानी मुसलमानों की निगाह पाकिस्तान पर होगी फिर उस हालत में हिन्दुस्तानी मुसलमानों के लिए तीन रास्ते होगें।

1- वो लुटा या पिट पिटा कर पाकिस्तान जाएं, लेकिन पाकिस्तान कितने मुसलमानों को जगह देगा।

2- वो हिन्दुस्तान में बहुमत के दंगाईयों के हाथों से क़त्ल होते रहेगें। मुसलमानों की एक बड़ी तादाद एक लम्बे समय तक क्रोध व उत्पीड़न की क़त्लगाह से गुज़रेगी।

3- मुसलमानों की एक संख्या राजनीतिक पिछड़ेपन, क्षेत्रिय तबाही का शिकार हो, वो इस्लाम छोड़ कर मुर्तद (स्वधर्म त्याग) हो जाए।

वो मुसलमान जो लीग के प्रभाव वाले क्षेत्रों में प्रमुख हैं, पाकिस्तान के उद्योग और व्यापार को हाथ में लेकर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के एकाधिकार हो जाएंगे लेकिन हिंदुस्तान में तीन करोड़ के लगभग मुसलमान रह जाएंगे, लीग के पास इनके भविष्य की गारंटी क्या है? क्या सिर्फ कागजी समझौता उनके लिए काफी होगा? उनके लिए वो हालत तो और खतरनाक होगी जो हिंदुओं और सिखों के पश्चिमी पाकिस्तान से निकल आने के बाद हिंदुस्तान में पैदा होगी। पाकिस्तान कई मुसीबतों का शिकार होगा। सबसे बड़ा खतरा जो महसूस होता है वो आंतरिक रूप से वैश्विक शक्तियों का इस पर कंट्रोल होगा और हर प्रकार के परिवर्तन के साथ कंट्रोल में वृद्धि होती रहेगी। हिन्दुस्तान की भी इससे सहमति होगी क्योंकि वो पाकिस्तान को अपने लिए खतरा बता कर कर वैश्विक शक्तियों से राजनीतिक जोड़ तोड़ करेगा लेकिन पाकिस्तान का खतरा गंभीर और बहुत बड़ा नुकसान होगा। (जारी)

22 दिसम्बर, 2013, स्रोतः रोज़नामा जदीद खबर, नई दिल्ली

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