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Hindi Section ( 6 March 2014, NewAgeIslam.Com)

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Ulema Are the Heirs of Prophets उलमा नबियों के वारिस हैं

 

 

 

 

 

 

शेख अब्दुल बारी अलसुबेसी

28 फरवरी, 2014

इस्लाम उलमा को आदर व सम्मान देता है क्योंकि उलमा नबियों (अलैहिमुस्सलाम) के वारिसों में से हैं और वो नबियों के बताये रास्ते पर चलते हैं। दरअसल अल्लाह के नज़दीक उनका स्थान इतना महान है कि अल्लाह उलमा का उल्लेख अपने और अपने फरिश्तों के नाम के साथ क़ुरान में करता है: ''अल्लाह ने गवाही दी कि उसके सिवा कोई पूज्य नहीं; और फ़रिश्तों ने और उन लोगों ने भी जो न्याय और संतुलन स्थापित करने वाली एक सत्ता को जानते हैं। उस प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी के सिवा कोई पूज्य नहीं।'' (3: 18)

ये आलिम का ही सम्मान है कि अल्लाह इन पर अपनी रहमत भेजता है, और अल्लाह के फरिश्ते और स्वर्ग और इस धरती पर रहने वाले सभी प्राणी उलमा पर रहमत के लिए अल्लाह से दुआएं करते हैं।

इस सम्बंध में नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: ''बेशक अल्लाह उन पर दया करता है जो लोगों को नेकी सिखाते हैं। और स्वर्ग और धरती पर सभी प्राणी यहां तक ​​कि चींटियाँ अपनी बिलों में और मछलियाँ सागरों में अल्लाह से उलमा पर रहमत के लिए दुआएं करती हैं। (तिर्मज़ी)

उलमा अल्लाह के वली हैं, यही वास्तव में ऐसे लोग हैं जिनके दिल में अल्लाह का डर होता है। ''अल्लाह से डरते तो उसके वही बन्दे हैं, जो बाख़बर है।'' (35: 28) ज्ञान के साथ इनके दिलों में अल्लाह का डर होता है, तब जाकर अल्लाह उन्हें इनाम से सम्मानित करता है। अल्लाह का फरमान है: ''उनका बदला उनके अपने रब के पास सदाबहार बाग़ है, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। उनमें वे सदैव रहेंगे। अल्लाह उनसे राज़ी हुआ और वे उससे राज़ी हुए। यह कुछ उसके लिए है, जो अपने रब से डरा।' (98: 8)

इब्ने अलक़ैय्यम ने फरमाया, ''लोगों के बीच उलमा और वो लोग जिनकी बातें फतवा का रूप धारण करती हैं, वो लोग जिनके अंदर ये क्षमता है कि वो कुरान व हदीस से शरई आदेश निकाल सकते हों और जिनकी गहरी सोच और समझ के नतीजे में जायज़ और नाजायज़ के हुक्म तय होते हैं, वो ज़मीन पर ऐसे ही हैं जैसे आसमान में तारे। इन्ही के द्वारा गुमराह  सीधा रास्ता पाते हैं और लोगों को उनकी ज़रूरत खाने पीने की ज़रूरत से कहीं ज़्यादा है। क़ुरान में एक स्थान पर अल्लाह ने इनके हुक्म मानने को माँ बाप के आज्ञा पालन से अधिक महान करार दिया है: ''ऐ ईमान लाने वालो! अल्लाह की आज्ञा का पालन करो और रसूल का कहना मानो और उनका भी कहना मानो जो तुममें अधिकारी लोग हैं।'' (4: 59) उलमा मुसीबत के समय में लोगों के लिए शरण स्थल हैं। अनगिनत गुमराहों को उन्होंने रास्ता दिखाया, कई सुन्नतों का उन्होंने प्रचार और प्रसार किया और कई नवाचारों को उन्होंने खत्म किया है।

खुदा के प्रति सजग उलमा खुदा की भक्ति के मामले में नेतृत्वकर्त्ता होते हैं, अगर उन्होंने सांसारिक सुखों और उच्च पदों की इच्छा की होती तो वो आसानी से उनके कदमों में होते, लेकिन वो अपने ज्ञान और धर्म के कामों के साथ खुशी खुशी जीवन बिताते हैं और उनका जीवन उन लोगों से बहुत अच्छा है जिनके पास सांसारिक सुख और पद हैं और ऐसा सिर्फ इसलिए है कि उनकी पूरी जिंदगी अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) के आदेशों को मानने के आसपास घूमती है। वो अपने नाम के लिए ज्ञान प्राप्त नहीं करते हैं बल्कि इससे फायदा हासिल करने के लिए करते हैं। उनका प्रभाव इतना ज़बरदस्त है कि अगर वो बंजर भूमि पर अपने कदम रख दें तो वो भी हरी भरी हो जाए, और अगर वो अंधेरे में डूबी हुई किसी बस्ती में कदम रख दें तो वो बस्ती सही रास्ते के प्रकाश से जगमगा उठती है।

सही अर्थों में आलिम वो नहीं हैं जिसके पास बड़े बड़े सर्टिफिकेट या शैक्षणिक खिताब हैं। बल्कि आलिम वो है जिसके पास ज्ञान हो, खुदा पर गहरा विश्वास हो, अल्लाह का हुक्म मानता हो और इबादत में लगा रहने वाला हो। यही वो लोग हैं जिनके बारे में अल्लाह फरमाता है कि वो दूसरों के मुक़ाबले में अतुलनीय हैं, ''क्या वो लोग जो जानते है और वो लोग जो नहीं जानते दोनों समान होंगे? (39: 9) इब्ने मुबारक से पूछा गया कि ''सही आलिम की पहचान कैसे हो सकती है? इस पर उन्होंने जवाब दिया कि, ''एक सच्चा आलिम वो है जो सांसारिक मामलों से खुद को अलग रखता है और हमेशा आखिरत (परलोक) की तैयारी में लगा रहता है।''

इसके बावजूद उलमा को पूरी तरह से सही, सभी पापों, त्रुटियों, गलतियों से सुरक्षित नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा होना असम्भव है। हालांकि लोगों को उलमा की ग़लतियों की तलाश में नहीं रहना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि उनके पास इस गलती का कोई बहाना हो जिससे लोग अनजान हों या हो सकता है कि इस गलती का कोई उचित कारण हो जो हमारी चेतना में न हो।

अगर नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को सम्मानित और प्रतिष्ठित होने का अधिकार है तो उनके उत्तराधिकारियों का भी इसमें हिस्सा होना चाहिए। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि, ''वास्तव में उलमा नबियों के वारिस हैं।'' (अबु दाऊद और अन्य) इसलिए हमारा ये कर्त्तव्य होगा कि हम उनसे प्यार करें, धर्म की बातों में उनकी आज्ञा का पालन करें, उनका बचाव करें और जो लोग मर चुके हैं उनके लिए अल्लाह की दया और माफी के लिए दुआ करने को कहें। इब्न अब्बास ने कहा है कि, जो व्यक्ति किसी आलिम को नाराज़ करता है वो अल्लाह के नबी को नाराज़ करता है, और जो कोई अल्लाह के पैगम्बर को नाराज़ करता है वो अल्लाह को नाराज़ करता है।''

उलमा की मौत उम्मत के लिए अपूर्णनीय क्षति है। हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि जो उलमा मर चुके हैं अल्लाह उनको माफ करे और जो जीवित हैं उनके ज्ञान से हमे फायदा पहुँचाए।

हाँ ! ऐसा होता है कि आंखें नम हो जाती हैं और दिल उदास हो जाते हैं, लेकिन अगर हम सभी अपने आँसू बहायें तो इससे हालात नहीं बदलने वाले हैं या नुकसान को राका नहीं जा सकता है। दरअसल जब कोई ज्ञान वाला इस दुनिया से विदा होता है तों कमज़ोर दिमाग़ वाले लोगों की प्रतिक्रिया ये होती है कि वो उनकी मौत पर मातम करते हैं, लेकिन जो प्रबुद्ध लोग होते हैं और जिनके उद्देश्य महान होते हैं, उनकी प्रतिक्रिया इसके अलावा भी होती है, इसलिए कि उन्हें इस बात का ज्ञान होता है कि उलमा के साथ निःस्वार्थ प्रेम ये है कि हम उनके नक्शे क़दम पर जीवन गुज़ारें, उनके रास्ते पर चलते हुए हम अपनी मौत से जा मिलें; ताकि हम ज्ञान और नेक कामों की एक अच्छी मिसाल बन सकें, विनम्रता और धर्मपरायणता में सबसे आगे जा सकें, धैर्य और संतोष का स्रोत बन सकें और उदारता और बलिदान में दूसरों के लिए मार्गदर्शक बन सकें। एक सच्चे आलिम की विशेषताएं यही हैं और जो उलमा से प्यार करते हैं उनके भी यही लक्षण होने चाहिए।

उलमा ऐसे व्यक्तित्व नहीं हैं जिनके गुणों को सिर्फ गाया या सुनाया जाए और उनसे फायदा हासिल किए बिना ही उन्हें लिख दिया जाए। इब्राहीम इब्न हबीब ने कहा, ''मेरे पिता ने एक बार मुझसे कहा: 'मेरे बच्चे उलमा के पास जाया करो, उनसे इल्म हासिल करो, उनकी आदतों और तरीकों और नैतिकता से फायदा हासिल करो, ये तुम्हारे द्वारा (बिना शिष्टाचार) के कई हदीसें सीखने से भी ज़्यादा बेहतर है।''

शेख अब्दुल बारी अलसुबेसी मस्जिदे नबवी, मदीना के इमाम व खतीब (उपदेशक) हैं।

स्रोत: http://www.arabnews.com/news/532426

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http://www.newageislam.com/islamic-society/sheikh-abdul-bari-ath-thubaythi/ulema-are-the-heirs-of-prophets/d/45974

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