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Hindi Section ( 21 Jun 2012, NewAgeIslam.Com)

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Repression in Marriage and Separation शादी और एलाहदगी में जब्र

 

शमीम तारिक़

22 जून, 2012

(उर्दू से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

बर्तानिया की हुकूमत एक ऐसा क़ानून बनाने की सिम्त पेशरफ़्त कर चुकी है जिसके नाफ़िज़ होने के बाद शादी के सिलसिले में लड़का या लड़की पर जब्र करने वाले जुर्म के मुर्तक़िब समझे जाऐंगे। जब्र की शादी गै़रक़ानूनी पहले भी थी मगर मशरिक़ की रिवायत को ज़हन में रखते हुए इसको जुर्म नहीं क़रार दिया गया था। मगर अब इसको जुर्म क़रार दिया जा रहा है। इसका नतीजा ये होगा कि बर्तानिया में किसी लड़के या लड़की को उसकी पसंद के बगै़र शादी पर मजबूर करने वाले मुजरिम क़रार पाएंगे। गै़रक़ानूनी होने और जुर्म होने में बुनियादी फ़र्क़ ये है कि गै़रक़ानूनी होने की सूरत में पुलिस ये तो कर सकती है कि उस लड़के या लड़की को तहफ़्फ़ुज़ अता करे जिसकी शादी उसकी मर्ज़ी के बगै़र जबरन कराई जा रही है और जब्र करने वालों को मोतनब्बा करने के साथ ऐसी शादी ना होने दे लेकिन जुर्म क़रार दिए जाने की सूरत में पुलिस को ये इख़्तियार हासिल होगा कि वो शादी के सिलसिले में जब्र करने वालों को गिरफ़्तार कर लें, उन पर मुक़द्दमा चला कर सज़ा दिलवाए और जबरन कराई गई शादी को शादी ना तस्लीम करें।

हिंदुस्तान में मोहब्बत की शादियां होती रहती हैं। अलग अलग बिरादरियों के लड़के लड़कियों में भी शादियां होती हैं लेकिन ज़्यादा तर वालदैन ऐसी शादियों को अपनी नाक कट जाने से ताबीर करते हैं। पंचायतें यहां तक करती हैं कि ऐसी शादी करने वालों को जुदा होने पर मजबूर करती हैं। एक पंचायत ऐसे लड़के लड़की को भाई बहन क़रार दे चुकी है जो 5, 6 साल तक मियां बीवी के तौर पर गुज़ार चुके थे। इस पंचायत में लड़के लड़की के वाल्दैन भी बुलाए गए थे और फ़ैसला ये दिया गया था कि वो अपने बेटे बेटी की नई शादी करवाएं और एक नई ज़िंदगी शुरू करने में इनकी मदद करें। दो अलग अलग मज़ाहिब से ताल्लुक़ रखने वालों की शादी की बुनियाद पर तो अक्सर फ़िरक़ावाराना फ़सादाद हो जाते हैं। सवाल ये है कि क्या हिंदुस्तान में वैसा ही क़ानून बनाया और नाफ़िज़ किया जा सकता है जैसा बर्तानिया में नाफ़िज़ किया जाने वाला है?  और क्या ऐसा क़ानून हिंदुस्तान में नाफ़िज़ किया जाना मुफ़ीद होगा? पहले सवाल का जवाब ये है कि हुकूमत अक्सरीयती फ़िर्क़ा की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई क़ानून बनाने की हिम्मत नहीं कर सकती। कहने को तो हुकूमत कहती है कि वो किसी भी फ़िरक़े या तब्क़े की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ इसके आएली क़ानून में मुदाख़िलत नहीं करेगी मगर हो ये रहा है कि अदालतों के ज़रिए वो मुसलमानों के क़ानून में मुदाख़िलत करती रहती है मगर जब मुसलमानों के अलावा कोई मुआमला आता है तो वो रिवायत- परंपरा के नाम पर बहुत कुछ करने की इजाज़त दे देती है।

हुकूमत और सियासी पार्टियां पंचायत के चौधरियों को अपनी ताक़त का मंबा समझती हैं इसलिए रिवायत और परंपरा के अलावा इन चौधरियों की अना और मफ़ाद का भी लिहाज़ रखती हैं इसलिए ना सिर्फ शादी ब्याह के मुआमले में बल्कि कई दूसरे उमूर में भी चौधरियों की चौधराहट ही को रिवायत और परम्परा का नाम दे दिया जाता है। नतीजतन ना सिर्फ आशिकों के ख़ुशनुमा ख़्वाबों का बल्कि इंसानी आज़ादी और बुनियादी इंसानी हुक़ूक़ का भी ख़ून होता है। अब रहा ये सवाल कि क्या वैसा ही क़ानून हिंदुस्तान में भी नाफ़िज़ किया जाना चाहिए जैसा बर्तानिया में नाफ़िज़ किया जा रहा है तो जवाब है कि अभी नहीं। इसकी पहली वजह तो ये है कि इस मुल्क में अव्वल तो इसका नेफ़ाज़ मुश्किल है और फिर उस क़ानून के दायरे में जब्र की शादी ही नहीं मियां बीवी की जबरी अलैहिदगी भी लाई जानी चाहिए। दूसरी वजह ये है कि हिंदुस्तान में अगर एक तरफ़ गांव या बिरादरी की पंचायत सच्चे आशिकों का जीना दूभर किए हुए है तो दूसरी तरफ़ इस मुल्क में ऐसे मकरूह लोगों की भी कमी नहीं है जो मासूम लड़की को इश्क़ में मुब्तेला करके शादी का फ़रेब देते हैं और फिर उस लड़की को जहन्नुम में धकेल देते हैं। अख़बारात में एक शख़्स के कई कई शादियां करने और किसी भी बीवी के साथ वफ़ा और इंसाफ़ ना करने बल्कि उस पर ज़ुल्म करने वालों के चेहरे बेनकाब होते रहते हैं। हम हिंदुस्तानी चाहे कितने रौशन ख़याल हों लेकिन इस हक़ीक़त को नज़रअंदाज नहीं कर सकते कि यहां बच्चियां बहुत जल्द फ़रेब में आ जाती हैं इसलिए शादी ब्याह के मुआमले में बड़ी बूढ़ियों,  ख़ानदान और मुआशरे की निगरानी बहुत ज़रूरी है। इस पसे मंज़र में पंचायतों का एक दूसरा रूप भी सामने आता है लिहाज़ा पंचायतों और खानदानों के मश्विरों की हुदूद तो मुतैय्यन की जा सकती हैं मगर अपनी बच्चियों के फ़ैसले पर आँख बंद करके हाँ करने के लिए ख़ानदान और माशरे के उठाए हुए सवालों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

बर्तानिया और हिंदुस्तान के लोगों की सोच और तर्ज़े ज़िदंगी में भी बुनियादी फ़र्क़ है। हिंदुस्तान में लड़की और लड़के के बालिग़ कहलाने के लिए 18 और 21 साल का होना और रज़ामंदी से जिन्सी ताल्लुक़ क़ायम करने के लिए 18 साल का होना ज़रूरी है। जब कि WHO यानी आलमी सेहत तंज़ीम के मुताबिक़ 13 से 19 साल की उम्र को ग़फ़वाने शबाब तस्लीम किया गया है और बशमूल बर्तानिया मग़रिब में 13, 14 साल की उम्र में बच्चियां जिन्सी ताल्लुक़ का तजुर्बा हासिल कर लेती हैं। इनका मुआशरा उसको बर्दाश्त करता है। हिंदुस्तान में ऐसा नहीं है लेकिन हमारे यहां बिरादरीवाद की गिरफ़्त इतनी मज़बूत है और आज भी पैदाइश के सर्टीफ़िकेट से स्कूलों के फ़ार्म पर नाम लिखवाने तक बिरादरी और सरनेम पर इतना इसरार किया जाता है कि एक ख़ास किस्म की ज़हनियत से पूरी उम्र निजात नहीं मिलती। इस्लाम तवाना अक़ीदए तौहीद और मसावात के अमली नमूनों के साथ हिंदुस्तान आया लेकिन यहां आने के बाद बिरादरीवाद के चक्कर में इस तरह फंस गया कि बुताँ रंग व ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जा, का नारा एक तमाशा बन कर रह गया और एक ब्रह्मनज़ादा ये नारा बुलंद करने वालों को, हर ख़रकए सालोस के अंदर है महाजन, या, मानिंद बुताँ पुजते हैं काबे के ब्रह्मन का ताना देने पर मजबूर हुआ। आज हालत ये है कि हिंदुस्तान के तमाम लोगों को चाहे वो किसी भी मज़हब व मसलक से ताल्लुक़ रखते हों इकरामे इंसानियत,  इंसानी मसावात और बुनियादी इंसानी हुक़ूक़ से ज़्यादा हड्डी ख़ानदानी रवायत और बिरदरी अज़ीज़ है। ऐसी सूरत में शादी ब्याह के मुआमले में जब्र का होना लाज़िमी है। हुकूमत अगर जब्र ख़त्म करना चाहती है तो बेहतर है कि वो बर्थ सर्टीफ़िकेट और स्कूल के नाम से ऐसे ख़ानों को ख़त्म कर दे जिनको पुर करने से इंसानी वहदत के तसव्वुर पर ज़र्ब और शादी ब्याह के मुआमलात में जब्र की बुनियाद फ़राहम होती है। इसके बाद उन लोगों पर गिरफ़्त करने में मज़ीद मुस्तैदी का मज़ाहिरा करे जो शादी में जहेज़ पर इसरार करते हैं या जहेज़ हासिल करने के लिए कई कई शादियां करते हैं या इसलिए शादी का ढोंग रचाते हैं कि घर आने वाली लड़की को रुपये कमाने का घिनौना ज़रीया बना लें।

बर्तानिया में उर्यानी है, जिन्सी बेराह रवी है मगर रियाकारी नहीं है। हिंदुस्तान में रियारी और धोकादही बहुत ज़्यादा है जिससे सबसे ज़्यादा नुक़्सान नौ उम्र लड़के लड़कियों को पहुंचता है। इस नुक़्सान को बड़े बूढ़ों के मश्विरों से ही कम किया जा सकता है इसलिए दोनों मुल्कों में शादी का एक जैसा क़ानून बनाए जाने का मश्विरा क़ुबूल नहीं किया जा सकता।

22 जून, 2012 बशुक्रियाः इन्क़लाब, नई दिल्ली

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