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Hindi Section ( 27 March 2013, NewAgeIslam.Com)

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Spiritual aspect of Holi होली का आध्यात्मिक पहलू

 

संत राजेंद्र सिंह जी महाराज

27 मार्च, 2013

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

फागुन महीने में हर तरफ फूल खिल आते हैं और बड़ी रंग बिरंगी बहार होती है। होली का त्यौहार इसी फागुन महीने में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। जिसमें लोग एक दूसरे से गले मिलकर होली की मुबारकबाद देते हैं। इस तरह होली के त्यौहार का बाहरी पहलू जिसके तहत एक दिन 'होलिका' जलाई जाती है और इसके अगले दिन एक दूसरे पर रंग और गुलाल डाल कर त्यौहार को पारंपरिक रूप से मनाया जाता है, लेकिन इसका एक आध्यात्मिक महत्व भी है।

दुनिया में हमेशा ही एक दौर चलता रहता है, हक़ व बातिल (सत्य और असत्य) की हमेशा लड़ाई होती रहती है। हक़ को दबाने के लिए बातिल हमेशा बड़ी कोशिश करता है कि किसी न किसी तरह दब या छिप जाए लेकिन वास्तव में हक़ (सत्य) एक ऐसी चीज़ है जो कभी छिप नहीं सकता है क्योंकि ब्रह्मांड रचियता दुनिया की शुरुआत में हक़ थे, आज भी हक़ हैं और रहती दुनिया तक हक़ ही रहेंगे।

होली के सिलिसले में एक पुरानी परंपरा है। भक्त प्रह्लाद के पिता 'हिरण्यकश्यप' जो अपने आपको कहते थे, कि मैं खुदा  (परमात्मा) हूँ, सब लोग मेरी पूजा करो। जो लोग स्वार्थी थे, जो सिद्धांतों से गिर गए थे उन्होंने 'हिरण्यकश्यप' की बात स्वीकार कर ली और उन्हें खुदा और परमात्मा की हैसियत से क़ुबूल कर लिया, लेकिन भक्त प्रह्लाद जो ब्रह्मांड के वास्तविक निर्माता को मानने वाले थे और उन्हीं की पूजा और इबादत करने वाले थे, उन्होंने अपने पिता की बात को स्वीकार नहीं किया और उन्हें एक आम आदमी ही मानते थे और ब्रह्मांड के वास्तविक निर्माता की पूजा करते रहे, चाहे उनके पिता ने उन पर कितना ही अत्याचार क्यों न किया और उन पर कितनी ही सख्तियाँ क्यों न कीं, लेकिन उन्होंने इन सब का कुछ भी ख़याल नहीं किया।

जब भक्त प्रह्लाद ने अपने पिता को किसी भी तरह परमात्मा 'स्वीकार नहीं किया तो उन्हें जान से मार देने की तरक़ीब सोची। हिरण्यकश्यप की एक बहन थी,'होलिका, जिसे ये 'वरदान' मिला था कि वो आग में बैठे तो भी वो जल नहीं सकती, उसने सोचा कि वो प्रह्लाद को लेकर आग में बैठ जाएगी, प्रह्लाद जल जाएगा और वो सुरक्षित रहेगी। इसी बात पर अमल किया गया। लकड़ियों का अंबार लगा गया। इसमें आग लगा दी गई और होलिका' प्रह्लाद को गोद में लेकर आग के बीच में बैठ गयी। आख़िरकार अगले दिन देखा गया कि प्रह्लाद सुरक्षित था लेकिन 'होलिका' जल गई थी। इसी घटना की याद में होली का त्योहार मनाया जाता है, जो इस बात का संकेत है कि सत्य की हमेशा जीत होती है और असत्य को हमेशा हार का सामना करना पड़ता है।

संतों के अनुसार होली जलाने का आध्यात्मिक महत्व ये है कि हम अपने अंदर की बुराइयों को जलाकर नेक और ईमानदाराना ज़िंदगी जियें और जिस तरह हम बाहर एक दूसरे पर रंग गुलाल डाल कर त्यौहार को मनाते हैं उसी तरह हम पूर्ण 'गुरु' की मदद से ध्यान 'मेडीटेशन के द्वारा अपने अंदर' प्रभु के विभिन्न रंगों को देख कर वास्तविक होली खेलें।

इस त्योहार का दूसरा पहलू एक दूसरे को रंग लगाना है। इस त्यौहार के दिन लोग सफेद कपड़े पहनते हैं। इसमें भी एक आध्यात्मिक पहलू है। सफेद रंग में अन्य सभी रंग शामिल हैं, इसी तरह से प्रभु 'हम सब के अंदर हैं। जिस तरह सफेद रंग सभी रंगों का स्रोत है उसी तरह से प्रभु 'या परमेश्वर सारी दुनिया के साधन हैं।

इस सम्बंध में नवविवाहित जोड़े की कहानी है। ये जोड़ा अपने जीवन में एक दूसरे के साथ बहुत प्यार और मोहब्बत से रहता था लेकिन कुछ दिन बीतने के बाद एक दूसरे की गलतियों और कमियों को देखकर आपस में बहस करने लगे। धीरे धीरे उनके जीवन में आपसी प्रेम और प्यार में गिरावट आने लगी और उनके जीवन बेमज़ा हो गई। उनके परिवार की बुज़ुर्ग महिला ने उनके जीवन में बदलाव को देखते हुए उनमें फिर से प्यार व मोहब्बत पैदा करने के लिए उन्हें एक पार्क में खाने पर आमंत्रित किया। इस जोड़े ने विभिन्न प्रकार के व्यंजनों और सुंदर वातावरण का आनंद उठाया। इसके बाद जोड़े से बुज़ुर्ग महिला ने ढलते हुए सूरज को देखने को कहा जो धीरे धीरे विभिन्न प्रकार के रंगों, नीले, नारंगी, पीले और गुलाबी में तब्दील होकर माहौल को सुंदर बना रहा था बुज़ुर्ग महिला ने इस दृश्य को देख कर कहा, कितना खूबसूरत नज़ारा है जो इस जोड़े ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद बुज़ुर्ग महिला ने कहा कि मैंने आप में से किसी से भी नहीं सुना कि ब्रह्मांड निर्माता से प्रार्थना करे कि रंग की दिशा को बदलकर ढलते सूरज की लाली को कम या ज़्यादा कर दे। यदि ब्रह्मांड निर्माता के बनाए हुए ढलते सूरज के इस नज़ारे को हम बिना परिवर्तन के स्वीकार करते हैं। ठीक इसी तरह ब्रह्मांड निर्माता ने हम सबको बनाया है, तो हमें किसी में कमी नहीं देखते हुए उसे खुशी खुशी स्वीकार करना चाहिए।

जिस तरह होली में विभिन्न रंग हमारे कपड़ों पर कई रंगों की विभिन्न शक्लें बनाते हैं और हम उन शक्लों को बदलने की कोशिश नहीं करते उसी तरह हमें अपने जीवन में एक दूसरे को प्यार के साथ स्वीकार करना चाहिए। अगर हम एक देश या समुदाय के सदस्य हैं तो हमें दूसरे को उसी तरह स्वीकार करना चाहिए जिस तरह ब्रह्मांड निर्माता सबको स्वीकार करते हैं

आइए सतरंगी होली के इस पवित्र त्योहार पर हम सब अपने अंदर की बुराइयों को जलाकर और दूसरे पर प्यार और भाईचारगी का रंग डालते हुए मानव जीवन के सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य को प्राप्त करें।

27 मार्च, 2013 स्रोत: रोज़नामा सहाफत, नई दिल्ली

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