New Age Islam
Fri Jan 15 2021, 06:25 PM

Loading..

Hindi Section ( 12 Jun 2014, NewAgeIslam.Com)

Beautiful Night of Rewards and Blessings ईनामों की हसीन रात: शबे बरात

 

सादिक़ रज़ा मिस्बाही, मुंबई

12 जून, 2014

आपसी रंजिशों के खात्मे और नाराज़ लोगों को मनाए बिना सिर्फ नफिल नमाज़ और वज़ाएफ में लगे रहने से शबे बरात का सही हक़ अदा नहीं हो सकता है, ये अल्लाह का करम है कि उसने मुसलमानों को साल भर में कई अंतरालों पर ऐसे अवसर दिये हैं कि जो मुसलमानों को आपस में क़रीब आने, उन्हें जोड़ने, मतभेद दूर करने, मिल बैठ कर खाने पीने, बिछड़े हुओं को गले लगाने, नाराज़ लोगों को मनाने और ईर्ष्या व कपट को जड़ से खत्म करने की अपील करते हैं। किसी भी इस्लामी समारोह का जायज़ा लें सभी की शिक्षा भाईचारा व मोहब्बत और हमदर्दी और नरमदिली ही है और सभी के दर्शन में एकता व एकजुटता के तत्व छिपे हुए हैं। शबे बरात भी एक ऐसा ही समारोह है। इस रात को अल्लाह ने मुसलमानों को एक दूसरे के करीब करने के लिए बनाया है। इस रात के फायदे, बरकतें, खुशियाँ और रहमतें अपनी जगह हैं लेकिन सबसे महान फलसफा इस रात का यही है कि टूटे हुए लोगों को जोड़ा जाए और उनसे माफी मांग कर उन्हें राज़ी कर लिया जाए। दरअसल इस मुबारक रात की अहमियत ही इसलिए है कि वो दिलों की कड़वाहट को खत्म करके हमदर्दियाँ और मोहब्बतें बाँटती है।

विडंबना ये है कि हमारे यहां हर त्यौहार को सिर्फ रस्मो किवाज में जकड़ दिया गया है और इसके वास्तविक लक्ष्य को पीछे डाल दिया गया है। इस मुबारक रात में नौजवान, बच्चे, बूढ़े, मर्द व औरतें सभी खूब खूब इबादत करते हैं। रात को जागते हैं, और दरूद व वज़ीफ़े पढ़ते हैं। नफिल नमाज़े पढ़ते हैं और यथासंभव इसकी आवश्यकताओं को पूरा करने की कोशिश करते हैं जैसे अल्लाह के हक़ को अदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। ये निस्संदेह बड़ी खुशी की बात है लेकिन इसके साथ साथ बदनसीबी की बात ये है कि बंदों के हक़ अदा करने में प्रतिस्पर्धा की वो भावना और जोश व ख़रोश देखने को नहीं मिलता जो इस मुबारक रात की बुनियाद है कि ये रात अल्लाह के हक़ से ज़्यादा बंदों के हक़ अदा करने पर को सही करने पर ज़ोर देती है।

याद रखिए कि अल्लाह का हक़ और बंदों का हक़ दो अलग अलग चीजें हैं, और अल्लाह के हक़ को अल्लाह अपने करम से माफ भी फरमा सकता है लेकिन बंदों के हक़ उस वक्त तक माफ नहीं हो सकते जब तक बंदा उन्हें माफ न कर दे, लेकिन ये कैसी समझदारी है कि अल्लाह के हक़ को अदा करने में प्रतिस्पर्धा की भावना तो देखने लायक होती है मगर बंदों के हक़ को अक्सर पूरी तरह भुला दिया जाता है। हम खुले तौर पर कहते हैं कि इसमें वो लोग कुछ ज्यादा ही शामिल हैं जो धर्मपरायणता की श्रेणी में शामिल किए जाते हैं ये (नाम के) बड़े लोग अपने छोटों के आत्मसम्मान का तो ख़याल रखते नहीं उनसे माफी माँगना और उन्हें राज़ी करना बहुत दूर की बात है। और अगर कुछ लोग हिम्मत कर के ऐसा कर भी लें तो वो भी सिर्फ औपचारिकता। उनके दिल में नफरत या यूँ कहें कि हल्की फुल्की रंजिश का लावा पकता ही रहता है।  इल्ला माशाअल्लाह (सिवाय कुछ को छोड़ कर)।

शबे बरात एक महत्वपूर्ण इस्लामी त्योहार के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है। मुसलमान इस मौक़े पर खुशियों का इज़हार करते हैं और ज़रूरत के मुताबिक़ रौशनी करते हैं और इस मुबारक रात की मुबारकबाद पेश करते हैं। इस रात में मुसलमान कुछ ज़्यादा ही बढ़ चढ़ कर इबादत करते हैं, अपने रब की बारगाह में हाज़िर होते हैं, माफी मांगते हैं और अपने सुनहरे भविष्य के लिए दुआएं करते हैं। इस मौक़े पर मुस्लिम इलाक़ों के दृश्य देखने लायक होते हैं और ये दिलकश नज़ारे लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करता है। शबे बरात निस्संदेह अल्लाह की एक बड़ी नेमत है। कुरान व हदीस में इसके बहुत अधिक फायदे और बरकतें दर्ज हैं। ये रात उम्मते मोहम्मदिया के लिए बहुत बड़ा ईनाम है। इस ईनाम से पहले की उम्मतें वंचित रहीं हैं। वास्तव में ये हमारे प्यारे आक़ा सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का सदक़ा है जो हम सबको मिला है। बड़ा कमनसीब हैं वो मुसलमान जो इस मुबारक रात को पाए और इसके फायदे और बरकतों का लाभ न उठा सके।

शबे बरात में अदा की गई नफिल नमाज़े तब तक क़ुबूल होने के दर्जे को नहीं पहुंच सकती, जब तक इसकी वास्तविक आवश्यकता की आवाज़ में लब्बैक न कहा जाए और ये वास्तविक आवश्यकताएं बंदों के हक़ को अदा करना ही है। वो लोग कितने खुशनसीब हैं जो शबे बरात की रहमतों से जी भर कर लाभांवित होते हैं, खुदा को राज़ी करते हैं और शबे बरात का सही इस्तेमाल करते हैं। शबे बरात दरअसल गुनाहों से मुक्ति की रात है। ये उम्मते मोहम्मदिया पर एक महान दया है कि शबे बरात पहले के नबियों के मानने वालों को नसीब नहीं हुई। इससे जहां हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की महिमा का पता चलता है वहीं उम्मते मोहम्मदिया की विशेषता भी उजागर होती है। इस मुबारक रात की पृष्ठभूमि ये है कि पिछली पीढ़ियों में कई लोगों की आयु बहुत लंबी हुआ करती थी और कोई कोई तो कई कई सदियों तक जीवित रहता था और अल्लाह की इबादत करता था। अपने लंबे जीवन से वो लोग खुदा की बारगाह में कमाल के दर्जे हासिल करते थे मगर चूंकि उम्मते मोहम्मदिया की उम्र इतनी लंबी नहीं होती कि वो भी एक लंबे समय तक इबादत कर के अपने पालनहार की रज़ामंदी हासिल कर सकें, इसलिए हम उम्मते मोहम्मदिया को अल्लाह ने हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की बरकत से ये भव्य पुरस्कार अता किया है, यानि हमें शबे बरात अता फरमा कर हमें ये मौका दिया है कि हम भी इस रात में इबादत कर के खुदा के चाहने वाले बंदे बन सकें। सूफी लोगों के अनुसार इस से एक कदम और आगे बढ़ कर ये कहा जा सकता है कि शबे बरात में दिल से अदा की गयी नफिल नमाज़ें पिछले लोगों की सदियों की इबादत के बराबर या उन से बेहतर हो जाती हैं। हमारी उम्र यद्यपि कम होती हैं लेकिन शबे बरात ने हमें ये बरकत वाला और हसीन मौक़ा इनायत किया है कि हमारी कम नमाज़ें भी लंबी उम्र वाले लोगों की इबादत के बराबर गिनी जाएं। वलहमदोलिल्लाहे अला ज़ालिक। इससे कोई ये न समझ ले कि सिर्फ इसी रात की इबादत से वो अल्लाह के हुज़ूर में पंसद किया जाने वाला बंदा हो सकता है और पिछली उम्मतों की पंक्ति में खड़ाहो सकता है बल्कि शबे बरात तो बंदों के दर्जे में बुलंदी, कमालात में इज़ाफा और बंदे को खुदा के क़रीब करने के लिए अल्लाह की तरफ से एक स्पेशल गिफ्ट है।

एक तकलीफदेह स्थिति ये है कि शबे बरात को हमारे मुस्लिम नौजवानों ने सैर करने, मनोरंजन, मटरगशती, पटाखे बाज़ी और हुल्लड़बाज़ी का ज़रिया समझ लिया है जो बहुत बुरी बात है, इस्लाम में इसकी कोई गुंजाइश नहीं। हमारी मस्जिदों के इमाम और ज़िम्मेदारों को इसके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। उनके इस अमल से गैर मुसलमानों में गलतफहमियां फैलती हैं और इस्लाम की छवि प्रभावित होती है। हमारे मुस्लिम युवाओं ने माफी वाली रात शबे बरात के हवाले से अपने अमल व किरदार से अचेतन रूप से जो गलतफहमी फैलाई वो ये है कि कई गैर मुस्लिम ये समझने लगे हैं कि जिस रात मुस्लिम नौजवान सड़कों पर तेज़ी से बाइक दौड़ाएँ, एक दूसरे पर बाज़ी मारने के लिए गाड़ी तेज़ी से दौड़ाते हुए माहौल पर असर डाले, गली कूचों में हुल्लड़ बाज़ी करते फिरें, पटाखेबाज़ी करके लोगों की इबादत और नींद में खलल डालें और चौराहों पर गपशप करते नज़र आएं तो समझ लो कि मुसलमानों की बड़ी रात (यानी शबे बरात) आ गई। ये कोई धारणा नहीं बल्कि एक ज़िम्मेदार गैर मुस्लिम की ज़बानी सुनी हुई बात है। ख़ुदा के लिए ऐसी हरकतें मत कीजिए जिससे इस रात की पवित्रता को नुकसान हो और इस्लाम के चेहरे पर दाग़ आए।

शबे बरात माफी वाली रात है और माफी उन लोगों की ही होती है जो इसकी आवश्यकताओं को अमलीजामा पहनाते हैं, यानि एक दूसरे के दुख मिटा कर एकजुटता का सूबुत देते हैं। उस इंसान की बख्शिश नहीं होती है जो सिर्फ नफिल नमाज़  में तो लगा रहता है लेकिन खुद से नाराज़ लोगों की नाराज़गी दूर करके उन्हें राज़ी नहीं करता बल्कि शबे बरात की रहमत का साया दरअसल उन्हीं लोगों पर पड़ता है जो सही मायने में शबे बरात का हक़ अदा करते हैं। अल्लाह हम सब को सबे बरात की सभी फज़ीलतों और बरकतों से माला माल फरमाए। आमीन

URL for Urdu article:

http://newageislam.com/urdu-section/sadiq-raza-misbahi/beautiful-night-of-rewards-and-blessings--انعامات-کی-حسین-رات--شب-برآت/d/87486

URL for this article:

http://www.newageislam.com/hindi-section/sadiq-raza-misbahi,-tr-new-age-islam/beautiful-night-of-rewards-and-blessings-ईनामों-की-हसीन-रात--शबे-बरात/d/87508

 

Loading..

Loading..