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Hindi Section ( 26 May 2019, NewAgeIslam.Com)

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Dawat e Walima: Sunnah or Hypocrisy दावत ए वलीमा: सुन्नत की आदायगी या दिखावा


सादिया सलीम शम्सी, न्यू एज इस्लाम

शादी की तकरीबात में वलीमा एक ऐसा अमल है जिसका नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आदेश दिया हैl वलीमा हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बहोत महबूब और मरगूब सुन्नत है और इसका सबसे बड़ा उद्देश्य अल्लाह पाक का शुक्र अदा करना है कि अल्लाह ने इंसान को एक शरीक ए हयात अता की जो उसकी जिंदगी के लिए तस्कीन देने का कारण होगी और ज़िन्दगी के उतार चढ़ाव में उसकी सहयोगी और हमदर्द भीl अल्लाह का शुक्र अदा करने का एक तरिका यह बताया गया कि इस ख़ुशी में दावत का एहतिमाम किया जाए और अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और गरीबों को भी अपनी इस ख़ुशी में शरीक किया जाए इसलिए वलीमा इसी ख़ुशी का इज़हार है मगर याद रखना चाहिए कि वलीमा अपनी इस्तेताअत भर केवल ख़ुशी का इज़हार हो, दौलत, संबंधों, सम्मान और अपनी अहमियत का प्रदर्शन ना होl एक दोसरे पर बढ़त ले जाने की कोशिश हरगिज़ ना हो दोसरी तरफ सच्चाई यह भी है कि इस पाकीज़ा सुन्नत को अदा करने में लोग एक दोसरे पर बढ़त ले जाने के लिए प्रयासरत रहते हैंl मिसकीनों और गरीबों को दावत देने की बजाए अधिकतर अमीरों और मालदारों को बुलाया जाता है जब कि हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है कि: बदतरीन खाना वह वलीमा है जिसमें मालदारों को बुलाया जाए और फकीरों को छोड़ दिया जाएl (बुखारी व मुस्लिम)

वलीमा इतना मुबारक कार्य है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इसमें बरकत की दुआ फरमाईl एक हदीस शरीफ में है कि एक बार लोगों ने अमीरुल मोमिनीन हज़रत उम्र फारुक रज़ीअल्लाहु अन्हु से पूछा कि क्या बात है कि शादी के खाने में हमको जो लज्ज़त और खुशबु मिलती है वह आम खानों में नहीं मिलती? हज़रत उम्र फारुक रज़ीअल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वलीमे के खाने में खैर व बरकत की दुआ फरमाई हैl हजरत इब्राहिम खलीलुल्लाह अलैहिस्सलात वस्सलाम ने दुआ की है कि ऐ अल्लाह! इस खाने को लज़ीज़ और बरकत वाला बनाl वलीमा में जन्नत के खाने का मज़ा होता हैl (कन्जुल आमाल)

देखें कि वलीमे की दावत में अल्लाह पाक ने कितना लुत्फ़ रखा हैl इस वलीमे की दावत की अहमियत व बरकत का अंदाजा इस हदीस से आसानी से लगाया जा सकता है जिसमें फरमाया गया “जो शख्स बिना किसी शरई उज्र दावत (वलीमे) में ना जाएl उसने अल्लाह पाक और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ना फरमानी कीl” (बुखारी व मुस्लिम शरीफ)

इतनी अहमियत व अजमत वाली दावत जो हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की महबूब तरीन सुन्नतों में से एक है, को हमने दुनयावी खुराफात का मजमुआ बना कर रख दिया हैl अस्तगफिरुल्लाहl थोड़ी सी समझ बुझ रखने वाले इंसान को भी यह बात आसानी से समझ आ जाएगी कि वलीमा जब सुन्नत है, दुनयावी रस्म नहीं तो उसे करना भी इस्लामी तरीके से ही चाहिए, ना कि दुनयावी तरीके सेl मगर अफ़सोस! आज कल वलीमे की तकरीब में भी बरात से ज़्यादा हुजूम दिखाई देता है, अपनी शान व शौकत का इज़हार किया जाता है, गरीबों की शिरकत को नापसंद और अपने मकाम व मर्तबे के खिलाफ समझा जाता हैl औरतों की बेपर्दगी का यह आलम देखा जाता है कि दिसम्बर और जनवरी के कड़कते जाड़े में भी उनके जिस्म पर बहोत ही बारीक और कम से कम लिबास देखने को मिलता है और इस पर मुसतज़ाद यह कि साड़ी महफ़िल में वीडियो फिल्म, सेल्फी आदि बना बना कर पुरे सोशल मीडिया पर वायरल किया जाता है और पूरी महफ़िल में बेपर्दगी का एक तूफ़ान आया हुआ होता है यहाँ तक कि दुल्हन की तस्वीरें बार बार प्रोजेक्टर पर लाइव शो हो रही होती हैं और हर आम और ख़ास राह चलता इसे मज़े से देखता और इसका आनन्द लेता हैl शादी में शिरकत करने वाले मेहमान यह कहते हुए नज़र आते हैं कि वाह क्या शानदार शादी हैl उस समय उनके यह शब्द सुन कर मैं दंग रह जाती हूँ कि या अल्लाह हमारी कौम को क्या हो गया है? और किस और हम जा रहे हैं, लेकिन अल्लाह का शुक्र अदा करती हूँ कि ईमान की दोसरी सतह पर अमल करते हुए कम से कम यहाँ इसको गलत कहने की हिम्मत तो रखती हूँl इसलिए शायद लोग मुझे पसंद नहीं करते और मुझे तरह तरह से आलोचना का निशाना बनाया जाता हैl अल्लामा इकबाल का यह शेर मेरी इस बात की बेहतरीन तर्जुमानी करता है...........

अपने भी खफा मुझसे हैं बेगाने भी नाखुश

मैं ज़हरे हलाहल को कभी कह ना सका कंद

मर्द और औरतें सब एक साथ इस महफ़िल का मज़ा लेते हैं और किसी को यह एहसास तक नहीं होता कि यह हम क्या कर रहे हैं? इसका अंजाम क्या होगा? दो तीन घंटे की इस झूटी शान व शौकत के लिए हम कितने बड़े गुनाह और रियाकारी की लानत को अपने सिर बाँध लेटे हैंl क्या यही सुन्नत है? क्या इसी तरह वलीमे की दावत की तकरीब होनी चाहिए? हैरत की बात यह है कि इस रियाकारी के तूफ़ान में कुछ उलेमा इ दीन भी या यूँ कह लें कि उलेमा नुमा हज़रात भी बढ़ चढ़ कर शामिल होते हैं लेकिन इज़हार इ अफ़सोस की हलकी से शिकन भी उनके माथे पर देखने को नहीं मिलतीl क्या उलेमा अपनी जिम्मेदारियां भूल गए? या उन्हें इस तरह की वलीमे की कबाहत नज़र नहीं आती? क्या ऐसे ही वलीमे का हुक्म दिया गया था?

इस तरह के वलीमे में दोसरी खराबी यह भी देखिये, खाने का बेजा इसराफ (बर्बादी) और ना जाने कितने प्रकार के खानों और उनकी बर्बादी के मनाज़िर आप आसानी से देख सकते हैंl खानों से भरी पूरी पूरी प्लेटें कूड़े के डब्बे में नज़र आती हैंl नहीं यह अल्लाह के नबी की सुन्नत नहीं है, यह आप सुन्नत अदा नहीं कर रहे, एक दिखावा कर रहे हैं जिससे आप अपने आप को गुनाहों के अंबार में ले कर जा रहे हैंl खुदारा अब भी संभल जाएं, तौबा के दरवाज़े खुले हैंl वलीमे की तकरीब जिसको आप सुन्नत का नाम देते हैं, उसे सुन्नत की तरह करने की कोशिश कीजिये और अपने रवय्यों में बदलाव लाइएl इस्लामी शिक्षाओं पर अमल कीजिये, इसराफ, फुजूल खर्ची से बचिएl और इस बात को यकीनी बनाइए कि वलीमे की तकरीब सादा और छोटी होl इस तकरीब में सारे खानदान और अहबाब को इकट्ठा करना जरूरी नहीं हैl नबवी जमाने में सहाबा अपने बेटों और बेटियों की शादी करते थे लेकिन दावत ए वलीमा आदि में किसी बहोत बड़ी महफ़िल का कोई सबूत नहीं मिलताl आइए रसूल ए कायनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के एक वलीमे की दावत का मंजर देखें:

हदीस शरीफ की मशहूर व मारुफ़ किताब सुनन बेहकी में है कि आका ए कायनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खैबर से वापसी पर खैबर और मदीना के बीच तीन रोज़ कयाम फरमाया और उसी जगह पर उम्मुल मोमिनीन हज़रत सफिया रज़ीअल्लाहु अन्हा से निकाह कर के वलीमे की दावत कीl आपने दस्तरख्वान पर खुजूर, पनीर और घी रख दियाl दोसरे सहाबा रज़ीअल्लाहु अन्हुम ने भी इसी प्रकार का सामान लाए और सब को मिला कर लोगों ने तनाउल कियाl एक रिवायत में है कि निकाह की सुबह को आका सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एलान फरमाया कि: जिस शख्स के पास खाने पीने का सामान आवश्यकता से अधिक हो उसे ला कर रख दे, इसलिए लोगों ने खजूर, सत्तू और घी के ढेर लगा दिए और इसी से वलीमे की दावत हुईl (सुनन बेहकी)

उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमा रज़ीअल्लाहु अन्हा से निकाह के समय रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खजूर और सत्तू का वलीमा खिलायाl हज़रत अनस रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कुछ अज़वाज मुतहरात से निकाह के मौके पर अधिक मात्रा में वलीमा का खाना खिलाया हैl साबित बिनानी ताबई रज़ीअल्लाहु अन्हु ने हज़रत अनस रज़ीअल्लाहु अन्हु से पूछा कि हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वलीमे की मात्रा क्या थी? हज़रत अनस रज़ीअल्लाहु अन्हु ने बताया कि गोश्त और रोटी की मात्रा इतनी अधिक थी कि लोगों ने शिकम सेर हो कर खाया फिर भी खाना बच गयाl (सुनन बेहकी)

यह दोनों हदीसें मैंने केवल नमूने के तौर पर पेश की हैं वरना इस मफहूम की अनगिनत हदीसें हैं उनसे यह मालुम होता है कि इस्तेताअत के अनुसार वलीमे की दावत का एहतिमाम करना सुन्नत है, लेकिन कर्ज़ ले कर लम्बी चौड़ी दावत करना जाएज नहींl छोटे दावत से भी वलीमे की सुन्नत अदा हो जाती हैl इन हदीसों से उन लोगों को सबक लेना चाहिए कि वलीमे की दावत के लिए अपनी हैसियत से अधिक एहतिमाम करते हैं कि कहीं समाज के लोग बाद में ताना ना देंl ला हौला वला कुवतl लोगों का इतना डर मगर अल्लाह और उसके रसूल का कोई डर नहीं?

यहाँ गौर करने वाली एक बात यह भी है कि आज मियाँ बीवी में तलाक की कसरत क्यों अधिक हो रही है, और दोनों में निबाह क्यों नहीं हो पा रही है? आपने कभी इस पर गौर किया है? मैं देखती हूँ कि शादियों में करोड़ों रूपए खर्च कर दिए जाते हैं मगर कुछ दिन के बाद पता चलता है कि मियाँ बीवी में अन बन चल रही है या दोनों अलग हो गए हैंl आदि आदिl जानते हो, आज कल इस तरह की घटनाएं अधिक देखने को मिल रहे हैं? क्यों कि ऐसी शादियाँ और ऐसी दावतें जिनमें सुन्नत ए रसूल का लिहाज़ नहीं किया जाता, बरकतों से खाली होती है और जहां बरकत ही नहीं हो तो वहाँ ऐसे हादसे तो होने ही हैंl

जिस लिहाज़ से भी देखा जाए, वलीमे में दिखावा और अपनी समाजी अहमियत का “एलान” अत्यधिक बुरी चीज हैl इसके परिणाम अगर अभी नहीं मिलेंगे तो भविष्य में अवश्य आपको मिल जाएंगेl अगर अल्लाह ने दुनयावी संसाधनों से नवाज़ा है तो उसे आवश्यकताओं पर खर्च किया जाए जिनकी समाज में आवश्यकता हैl अल्लाह के दीन और दीन के रक्षकों पर खर्च किया जाए, इस प्रकार की नुमाइश पर नहींl अल्लाह पाक हम सब को इस दिखावे से बचाए आमीनl

(रीसर्च स्कॉलर उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद)

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