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Content: Identity of the Believers क़नाअतः मोमिन की पहचान


सुहेल अरशद, न्यु एज इस्लाम

25 जून, 2012

(उर्दू से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

क़ुरान के मुताबिक़, क़नाअत मोमिन की पहचान है। सब्र, शुक्र और परहेज़गारी क़नाअत के अज्ज़ा हैं। एक मोमिन हर हाल में ख़ुदा का शुक्र अदा करता है। अल्लाह ने अपनी नेमतें उसे जितनी मिक़दार में अता की हैं उस पर वो क़ाने रहता है और ज़्यादा की हिर्स नहीं रखता। अल्लाह जिसे चाहता है बेहिसाब रिज़्क देता है और जिसे चाहता है माप कर बक़दिया ज़रूरत देता है और बहुतों को तंगदस्ती, डरा, भूख और कारोबार में ख़सारे के ज़रिए आज़माता है लिहाज़ा, एक मोमिन हर आज़माईश पर पूरा उतरता है। अल्लाह फ़रमाता है।

सो खाओ रोज़ी जो दी तुमको अल्लाह ने हलाल और पाक और शुक्र करो अल्लाह के एहसान का अगर तुम को पूजते हो। (अल-नहलः 115)

हर इंसान के दिल में हिर्स व तमा मौजूद होता है और वो दूसरों की ख़ुशहाली, दौलत और माद्दी वसाइल की इफ़रात को देख कर ख़ुद भी इन वसाइल के हुसूल के लिए कोशां रहता है। ये ख़्वाहिश कभी कभी ग़लत सूरत इख़्तियार कर लेती है और वो दुनियावी आसाइशों के हुसूल के लिए हर तरह के हरबे इस्तेमाल करने लगता है। उसे जायज़, नाजायज़, हलाल, हराम और सही व ग़लत का होश नहीं रह जाता । क़ुरान इंसान के इस जज़्बे पर तंबीह करते हुए कहता है

और हवस मत करो जिस चीज़ में बड़ाई दी अल्लाह ने एक को एक पर। (अल-निसाः 32)

क़ुरान कहता है कि अल्लाह कुछ लोगों को दुनिया में ज़्यादा रिज़्क, माल व दौलत, जायदाद और माद्दी वसाइल अता करता है तो इसमें उसकी मस्लहतें हैं वो लोगों को माल व दौलत से आज़माता है जिस तरह से कुछ लोगों को भूख और इफ़लास के ज़रीए से आज़माता है। लिहाज़ा,  दूसरों को देख कर रौनक दुनिया और आसाइशों के हुसूल के लिए परेशान रहना हेमाक़त है। क़ुरान कहता है

और मत पसार अपनी आँखें उस चीज़ पर जो फ़ायदा उठाने को दी हमने इन तरह तरह के लोगों को रौनके दुनिया की ज़िंदगानी की इनके जांचने को और तेरे रब की दी हुई रोज़ी बेहतर है और बहुत बाक़ी रहने वाली। (ताहाः 131)

अल्लाह ने हर इंसान की रोज़ी उसके मोक़द्दर में लिख दी है। लिहाज़ा, अपने मुक़द्दर से शाकी रहना और अपने हाल से नालां रहना गोया ख़ुदा की नेमतों की नाशुक्री करना है। और नाशुक्री बहुत बड़ा वबाल है। अल्लाह ने नाशुक्री की बिना पर कई क़ौमों को तबाह कर दिया। क़ुरान कहता है,

और हमने तुम को जगह दी ज़मीन में और मोक़र्रर कर दीं इसमें तुम्हारे लिए रोज़ियाँ तुम बहुत कम शुक्र करते हो।( अल-आराफ़ः 10)

लिहाज़ा, क़नाअत इंसान को सब्र और शुक्र के साथ रहना सिखाती है। तंगदस्ती और दुनिया की वक़्ती महरूमियों पर सब्र और हिर्स व तमा से दूरी इंसान को परहेज़गार बनाती है और ख़ुदा की नेमतों के एतराफ़ से दिल को रुहानी सुकून मिलता है ख़ुदा का शुक्र अदा करने वाला इंसान ना तंगदस्ती पर ख़ुदा से मायूस होता है और ना ख़ुशहाली में शेखी बघारने और इतराने लगता है।

क़ुरान में आया हैः

कोई आफ़त नहीं पड़ती मुल्क में और ना तुम्हारी जानों में जो लिखी ना हो एक किताब में पहले इससे कि पैदा करें हम इसको दुनिया में- बेशक ये अल्लाह पर आसान है ताकि गम ना खाया करो उस पर जो हाथ ना आया और ना शेखी किया करो उस पर जो तुमको उसने दिया और अल्लाह को ख़ुश नहीं आता कोई इतराने वाला बड़ाई मारने वाला। (अल-हदीदः 22-23)

इस तरह अल्लाह क़ुरान में चार मक़ामात पर इंसान को क़नाअत की तलक़ीन करता है। वो उसे दूसरों की ख़ुशहाली से हसद करने से मना करता और ज़्यादा की हवस से बचने की हिदायत करता है। अल्लाह फ़रमाता है:

और अगर तुम सब्र करो और परहेज़गारी तो ये हिम्मत के काम हैं। (आल-इमरानः 186)

एक दूसरे मुक़ाम पर क़ुरान क़नाअत के जे़ल में कहता हैः

मत डाल अपनी आँखें इन चीज़ों पर जो हर तने को दीं हम ने हमने उनमें से कई तरह के लोगों को और ग़म ना खाओ उन पर और झुका अपने बाज़ू ईमान वालों के वास्ते ( अल-हिज्र: 88)

लिहाज़ा, क़ुरान वाज़ेह तौर पर मुसलमानों को क़नाअत की तालीम देता है क्योंकि क़नाअत ना सिर्फ इंसान को अल्लाह का शुक्र गुज़ार बनाती है बल्कि उसे हिर्स व तमा से बाज़ रहने में मदद देती है क्योंकि हिर्स व तमा ही इंसान को माल व दौलत और माद्दी आसाइशों के हुसूल के लिए हर जायज़ नाजायज़ तरीक़े आज़माने पर मजबूर करती है बल्कि क़नाअत इंसान को परहेज़गार बनाती है।

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