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Hindi Section ( 11 Oct 2013, NewAgeIslam.Com)

Human Rights in Islam मानवाधिकार और इस्लाम

 

रोज़नामा क़ौमी सलामती

21 जून, 2013

(उर्दु से अनुवादः न्यु एज इस्लाम)

इस्लाम ने अपने मानने वालों को मानवाधिकार की रिआयत की सिर्फ प्रेरणा ही नहीं दी, बल्कि उन पर मानवाधिकार निर्धारित भी कर दिए। मानवाधिकार से सम्बंधित इस्लामी शिक्षाएं बताती हैं कि माँ बाप का बच्चों पर, बच्चों का माँ बाप पर, पति का पत्नी पर, पत्नी का पति पर, पड़ोसियों का पड़ोसियों पर अधिकार निर्धारित हैं। यही नहीं बल्कि मुसलमानों पर गैर-मुसलमानों के कई अधिकार निर्धारित किए गए हैं। अब जो व्यक्ति इन अधिकारों को पूरा करेगा वो अल्लाह के यहां सवाब का हक़दार होगा और जो अधिकारों को पूरा करने में कोताही बरतेगा तो उसकी क़यामत के दिन पकड़ की जायेगी।

इस्लाम ने हर स्तर पर अधिकारों की रक्षा के लिए मामूली मामूली बातों पर ध्यान दिया है ताकि आगे चलकर वो बातें खतरनाक रुख अख्तियार न कर लें और किसी के साथ अत्याचार और नाइंसाफी का कारण न बन जाएं। जैसे इंसान के अंदर जो गुण रखें हैं, उनमें एक गुण 'एहसास' है। यानी इंसान के अंदर एहसास का माद्दा पूरे तौर पर रखा गया है। जिसके आधार पर अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे को गाली देता है तो दूसरे व्यक्ति को इससे बड़ी तकलीफ़ पहुंचती है या कोई ऐसी बात कभी कभी इंसान को बहुत दुख में डाल देती है, जो उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली होती हैं। कहावत मशहूर है कि, ''तलवार का घाव भर जाता है, लेकिन बात का घाव नहीं भरता'' बल्कि बुरा भला कहने, छोटा और नीच समझने, किसी पर दोषारोपण करने, आरोप प्रत्यारोप करने, संदेह, बलात्कार और बुराई व चुगलखोरी करने से परहेज़ करना ज़रूरी है। क्योंकि ये सब बातें मानवाधिकार के खिलाफ हैं।

इस्लाम ने इल्ज़ाम लगाने को नापंसदीदा काम करार दिया है। इससे इंसान का व्यक्तित्व आहत होता है और समाज में उसके लिए जीना मुश्किल हो जाता है। अगर एक बार किसी औरत की बदनामी हो जाती है, तो जीवन भर उसे परेशानियों और मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। इसलिए अल्लाह इरशाद फ़रमाता है, ''जो लोग पाक दामन, भोली भाली, बेखबर औरतों पर तोहमत (आरोप) लगाते हैं, उन पर दुनिया और आखिरत (परलोक) में लानत है और उनके लिए बहुत बड़ी सज़ा है। जिस दिन उनकी अपनी ज़बानें और उनके अपने हाथ पांव उनकी करतूतों की गवाही देंगे'' (अल-नूर 23- 24) इस्लाम ने औरतों को जो स्थान दिया है, उस पर झूठे आरोप लगाना, उसके मक़ाम (स्थान) के खिलाफ काम करना है। औरत को अपमानित करने के लिए आरोप लगाने पर क़यामत के दिन सख़्त पकड़ होगी।

बदग़ुमानी (किसी के बारे में बुरा ख़याल रखना) से भी इस्लाम ने रोका है। क्योंकि कई बार ये बदग़ुमानी अपने नतीजे के ऐतबार से बड़ी खतरनाक साबित होती है। इसका अवलोकन हम आए दिन समाज में करते रहते हैं। अगर मियाँ बीवी के बीच संदेह या बदग़ुमानियाँ होती हैं, तो उनकी शादी शुदा ज़िंदगी कड़वी हो जाती है और नौबत काफी आगे तक पहुंच जाती है। इसी तरह की बदग़ुमानियाँ कभी पति की तरफ से होती हैं और कभी बीवी की तऱफ से। बिना जांच और सुबूत के दूसरे के बारे में बदग़ुमानी करना, उसके अधिकारों का हनन करना है।

इसी तरह किसी व्यक्ति को छोटा और नीच समझना भी मानवाधिकारों का हनन करने के बराबर है। क्योंकि अल्लाह के नज़दीक तो सभी इंसान इज़्ज़त के लायक़ हैं। जन्म के लिहाज़ से कोई किसी से छोटा या बड़ा नहीं। रंग और नस्ल और जाति के आधार पर किसी पर कोई श्रेष्ठता नहीं रखता है। जहां तक श्रेष्ठता की बात है तो अल्लाह के नज़दीक, इंसानों में बेहतर वो है, जो परहेज़गार है। अल्लाह का इरशाद है, ''बिला शुब्हा (निस्संदेह) तुम में अल्लाह के नज़दीक ज़्यादा मोकर्रम वो हैं, जो ज़्यादा परहेज़गार है।'' मगर हैरानी की बात है कि आज आम तौर पर छोटे बड़े होने का पैमाना इस्लाम के तय किये गये पैमाने से अलग माना जाता है। धन, दौलत, बिरादरी, जाति को श्रेष्ठता का पैमाना माना जाता है। जो कि गलत है, धार्मिक लिहाज़ से भी और इंसानी लिहाज़ से भी। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की हदीसों से भी मालूम होता कि वंश, जाति, समुदाय, माल व दौलत, रंग आदि पर कोई श्रेष्ठता नहीं। ग़ौर करने वाली बात ये है कि अगर कोई व्यक्ति जाति एवं समुदाय के आधार पर किसी को अपमानित व उपेक्षित समझ रहा है, जबकि वो अपने कार्यों और चरित्र के आधार पर उससे बेहतर हो सकता है। दूसरे ये कि जिसे छोटा व अपमानित समझा जा रहा है, उसे ये बात तकलीफ पहुंचाने वाली हो सकती है। अल्लाह ने किसी भी बंदे को हरगिज़ इस बात का अधिकार नहीं दिया है कि वो दूसरे को छोटा समझे और अपने ऊपर घमंड करे। अल्लाह का इरशाद है कि, ''(घमंड) में लोगों से गाल न फुलाओ'' (लुक़मान- 18)

किसी पर ऐब लगाना और तरह तरह के नाम रखना भी तकलीफ़ देने वाला काम है और मानवाधिकारों के खिलाफ है। और इसलिए इस्लाम ने ऐसा करने से भी मना किया है। अगर वो ऐब (दोष) उसके अंदर मौजूद हो तब भी, उसको इस ऐब के साथ पुकारना उचित नहीं है। क्योंकि चाहे वो बात भले ही सही हो, लेकिन इससे उस व्यक्ति को तकलीफ पहुँचती है। जैसे कोई आंखों से देख नहीं पाता है, उसे अंधा कहना, उसे और अधिक तकलीफ में डालना है। ऐसे ही अगर किसी के पैर नहीं हैं, उसे लंगड़ा कह कर पुकारना भी गलत है। क्योंकि ये बात भी तकलीफ़ पहुँचाती है और अगर किसी में ऐब न हो, फिर उस पर ऐब लगाना आरोप लगाना है, जो बिल्कुल नाजायज़ है। इसलिए इस तरह की बातों से इस्लाम ने अपने मानने वालों को सख्ती से रोका है। अल्लाह का इरशाद है, ''मोमिनों! कुछ लोग दूसरे लोगों का मज़ाक़ न उड़ाएं, हो सकता है कि वो उनसे बेहतर हों'' (अल-हुजरात- 11)

मानवाधिकार का जिस तरह भी उल्लंघन हो, इस्लाम के खिलाफ है। क़यामत के दिन उससे कड़ी पूछताछ होगी। कुछ बातें ऐसी होती हैं जो सामने नज़र नहीं आती हैं, लेकिन वो भी अधिकारों के हनन और दिल दुखाने का कारण बनती हैं। जैसे किसी के टोह में लग जाना। अल्लाह का इरशाद है, ''और किसी के टोह में न लगे रहो'' (अल-हुजरात- 12) एक और जगह और स्पष्टता के साथ कहा गया है, ''और किसी ऐसी बात के पीछे न लग जाओ जिसका तुम्हें पूरा इल्म (जानकारी) न हो, हक़ीक़त ये है कि कान, आंख और दिल सभी की पूछताछ होनी है'' (बनी-इसराइल- 36) किसी की पीठ पीछे बुराई करना शरीयत की निगाह में बहुत बुरा काम है और इस पर सख्त अज़ाब बयान किया गया है। अल्लाह का इरशाद है, ''और एक दुसरे को पीठ पीछे बुरा न कहो, क्या तुम में से कोई इस बात को पसंद करेगा कि वो अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाये, इससे तुम ज़रूर नफरत करोगे'' (अल-हुजरात- 12)

इस्लाम ने 'आदमियत' के आदर की जो कल्पना पेश की है वो वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा करने वाली है। क्योंकि आदमियत में सभी इंसान आ जाते हैं, चाहे वो किसी भी धर्म से सम्बंध रखते हों। अल्लाह इरशाद फ़रमाता है, ''और तहक़ीक़ हमने औलादे आदम को मोकर्रम बनाया'' (क़ुरान)। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस्लाम पूरी इंसानियत के लिए कितनी हमदर्दी रखता है और वो नहीं चाहता कि किसी पर ज़ुल्म हो और कोई किसी के अधिकारों का हनन करे।

21 जून, 2013, स्रोतः रोज़नामा क़ौमी सलामती, नई दिल्ली

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