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Hindi Section ( 30 May 2013, NewAgeIslam.Com)

Is it Islam? क्या यही इस्लाम है?

 

रूमान रिज़वी

8 मई, 2013

(उर्दू से अनुवाद- न्यु एज इस्लाम एडिट डेस्क)

दहशत का माहौल ....! वहशत का काला बादल ...! हर एक पल जान जाने का खतरा ...! हद हो गयी मस्जिद और इबादत में खूनखराबा ....! एक मुसलमान दूसरे मुसलमान के लहू का प्यासा ...! सुकून की बस्ती उजड़ चुकी ...! चिन्ता और बेचैनी का बसेरा है ....! इस्लाम का नाम लेकर अपनी- अपनी मनमानी ...! हत्या, मार काट का बाजार गर्म ......! आत्मघाती हमले ......! क्या यही इस्लाम है?

वो इस्लाम जिसे खुदा ने अपना प्यारा मज़हब कहा और कुरान मजीद में इरशाद फ़रमाया, ''मेरे नजदीक सबसे पसंदीदा दीन इस्लाम है'' वो इस्लाम जो अमन व सलामती का मज़हब है, वो इस्लाम जिसके नाम से ही अमन व अमान की खुश्बू आती है। वो इस्लाम जिसने चरित्र और किरदार के द्वारा दिल पर शासन करने का सबक़ दिया, वो इस्लाम जिसने भूखों  को खाना खिलाने, प्यासों को पानी पिलाने, बेघर को घर देने, बिना कपड़े वाले को कपड़े देने का हुक्म दिया, वो इस्लाम जिसे हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपनी मेहनतों से परवान चढ़ाया। और वो इस्लाम जिसका पैग़ाम है कि अगर किसी से मिलो तो पहले सलाम करो। हमने कभी ग़ौर किया कि आखिर इस्लाम ने हमें ये हुक्म क्यों दिया? जब हम इस हुक्मे इस्लाम पर ग़ौर करेंगे कि हम अगर किसी से मिलें तो पहले सलाम करें, इसका मक़सद ये है कि सलाम करके हम अपने सामने वाले से अहद करते हैं कि आप मेरी तरफ से अमान में हैं चूंकि सलाम करने वाला पहले कहता है कि आप मेरी तरफ से महफूज़ हैं तो इस्लाम यहाँ पर कहता है कि चूँकि सामने वाले ने तुम्हारी सलामती चाही है इसलिए तुम पर अनिवार्य हो गया कि तुम भी उसकी सलामती चाहो। इसलिए सलाम करना मुस्तहब है और सलाम का जवाब अनिवार्य।

जो इस्लाम इतना सलामती चाहता हो कि पहली मुलाकात में सुरक्षा की गारण्टी दिला दे, आज उसी के मानने वालों के बीच इतनी गंभीर अशांति क्यों? आज आलम ये है कि आज उसी इस्लाम के मानने वाले तथाकथित मुस्लिम सारी दुनिया में इस्लाम को बदनाम करवा रहे हैं, वो इस्लाम बेवजह पानी बहाने की इजाज़त कहाँ से दे देगा। कैसे देगा। जिस इस्लाम को हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और उनके अहले बैत अलैहिमुस्सलाम ने अपने किरदार के ज़रिए फैलाया वो क्यों तलवार के ज़रिए कैसे दिलों पर हुक्मरानी करने की कुदरत रखता है। यही वजह है कि आज भी इस्लाम अपनी विशिष्टता के कारण इतने सारे धर्मों की भीड़ में अलग है और लोग उसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं। इस्लाम जबरन किसी को मुसलमान नहीं बनाता बल्कि विशेषताओं और कमालात के ऐसे फूल खिलाता है जिसकी खुशबू की तरफ खुद लोग खींचे चले आते हैं। अल्लाह ने कभी ये पसंद नहीं किया है कि किसी को जबरदस्ती मुसलमान बनाया जाये या इस्लाम के सिद्धांतों पर अमल करने के लिए मजबूर किया जाए। बल्कि अल्लाह ने तो अख्तियार दे रखा है और सूरे हुर में फरमाता है, ''कि हमने तुम्हें रास्ते की हिदायत कर दी अब चाहे नेक रास्ते पर चलकर शाकिर बंदों में हो जाओ या बुरे रास्ते पर चलकर कुफ्र अख्तियार करो।

या फिर दूसरी जगह सूरे माएदा की 99 नम्बर की आयत में फरमाता है, ''हमारे रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम पर पैग़ाम पहुंचा देने के सिवा कुछ (फर्ज़) नहीं और जो कुछ तुम ज़ाहिर बज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम छिपाकर करते हो खुदा सब जानता है।''

मालूम हुआ कि किसी को मजबूर करना इस्लाम का तरीका नहीं है। आज पूरी दुनिया में जो हालात चल रहे हैं वो हम सब के पेशनज़र हैं कि किस तरह तथाकथित मुसलमान इस्लाम को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं और अमेरिका और इस्राइल के इशारे पर कठपुतलियों की तरह नाच रहे हैं। और अपने काले काम से पूरी मुस्लिम उम्मत को शर्मिंदा कर रहे हैं। ऐसे ही तथाकथित कुछ अमेरिका और इस्राइल के ज़रख़रीद कारिन्दों ने पिछले दो दिन पहले ऐसा गुनाह अंजाम दिया जिससे पूरी इस्लामी दुनिया दहल गयी और इंसानियत शर्मिंदा है।

किसी भी मसलक (पंथ) का मुसलमान हो वो कभी पसन्द नहीं करता कि किसी कब्र से लाश निकाली जाए इसलिए कि शरीयते इस्लामिया में नबश कब्र (यानी कब्र खोद कर मैय्यत बाहर निकालना हराम है) और ये बड़ा पाप है। मगर सीरिया में अमेरिका के डालरों पर बिके हुए ज़रख़रीद बेदीन बाग़ी जो अपने को मुसलमान कहते हैं। पिछले दिनों इन दरिंदों ने ऐसा बेहूदा काम अंजाम दिया जो वास्तव में ख़ुदा को क्रोध दिलाने के लिए काफी है। सीरिया के कब्रिस्तान में दफ्न जनाब हजर बिन अदी अलकुंदी अलकोफ़ी के पवित्र पार्थिव शरीर को कब्र से निकालकर अज्ञात स्थान पर फरार हो  गए।

कौन हजर बिन अदी अलकुंदी अलकोफ़ी? पाठकों की जानकारी के लिए आपके बारे में कुछ लाइनें लिखना अपना फर्ज़  समझता हूं ताकि हर आदमी खुद फैसला कर सके कि क्या यही इस्लाम है?

जनाब हजर बिन अदी अलकुंदी अलकोफ़ी बुजुर्ग, फाज़िल, प्रामाणिक और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के सहाबियों में से थे। किताब कामिल बहाई में है कि उनका इबादत में लगे रहना अरब में मशहूर था। कहते हैं रात दिन एक हजार रिकअत नमाज़ पढ़ा करते थे। किताबे मजालिस में है कि इस्तेआब ने कहा है कि हजर फज़ला सहाबा में से थे। और मुस्तजाबुद दावा थे। जंगे सफीन में अमीरूल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब (अलैहिस्सलाम) की तरफ से लश्कर की कमान और उसके प्रमुख थे और नहरवान के दिन अमीरुल मोमिनीन के लश्कर के सेनापति थे। अल्लामा हिल्ली फरमाते हैं कि हजर सहाबा जनाब अमीर और अब्दाल में से थे और हसन बिन दाऊद ने उल्लेख किया है कि हजर सहाबए रसूल और अमीरुल मोमिनीन के साथियों में से थे। सीरिया के शासक के एक अफसर ने उन्हें आदेश दिया था कि हज़रत अमीरूल मोमेनीन अली अलैहिस्सलाम पर लानत करो तो उनकी जबान पर ये शब्द आये कि, ''प्रतिनिधिमंडल का अमीर मुझे हुक्म देता है कि अली पर लानत करूँ। खुदा उस पर लानत करे। हजर ने अपने कुछ साथियों के साथ ज़ेयाद बिन अलबिया की चुगलखोरी और सीरिया के शासक के हुक्म से 51 हिजरी में शहादत को गले लगा लिया।

बीबी आयशा ने कहा कि मैंने रसूले खुदा से से सुना है कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया, मेरे बाद उम्मत के कुछ लोग अज़रा नाम के स्थान पर क़त्ल किए जाएंगे कि जिनकी वजह से खुदा और अहले आसमान क्रोधित होंगे। ये थे जनाब हजर बिन अदी .....

अफसोस की बात है कि इस पवित्र सहाबी को मरने के बाद भी चैन से न रहने दिया गया। आखिर क्या नुकसान था उनकी कब्र से, और किस इस्लाम ने ये हुक्म दिया कि कब्र खोदकर लाश निकाली जाए वो भी ऐसे पवित्र सहाबिए रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की। लेकिन चमत्कार ये है कि चौदह सौ साल पहले दफनायी गयी सहाबिए रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और अमीरूल मोमेनीन अलैहिस्सलाम जनाब हजर बिन अदी रहमतुल्लाह अलैहि की लाश जब निकाली गई तो देखने वालों ने कहा कि लाश ऐसी मालूम हो रही है जैसे आज ही दफन की गई हो।

सोचने की बात ये है कि मुसलमानों के लिए कि आख़िर चौदह सौ साल के बाद भी जनाब हजर बिन अदी रहमतुल्लाह अलैहि की लाश सही और सुरक्षित क्यों? आखिर उन्होंने ऐसा क्या कारनामा अंजाम दिया, वो किसी की राह के मुसाफ़िर थे, किसी के प्यार और आज्ञाकारिता में जीवन बिताया।

वाये हो उन मुसलमानों पर जो कण बराबर भी इंसानियत से करीब नहीं और इस्लाम के सिद्धांतों और पवित्रता को खत्म कर रहे हैं, इन तथाकथित मुसलमानों से अब अल्लाह ही समझे।

8 मई, 2013 स्रोत: रोज़नामा सहाफत, मुंबई

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http://www.newageislam.com/urdu-section/is-it-islam?-کیا-یہی-اسلام-ہے؟/d/11719

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