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Hindi Section ( 11 Aug 2021, NewAgeIslam.Com)

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Refutation of ISIS: Mushrikin In Quranic Verse 9:5? - Part 2 आईएसआईएस का रद्द: कुरआन की आयत 9:5 में मुशरेकीन से मुराद कौन हैं?

गुलाम गौस, न्यू एज इस्लाम

भाग-2

12 अक्टूबर 2019

पहले भाग में आयत 9:5 में वारिद होने वाले शब्दमुशरेकीन का शाब्दिक विश्लेषण पेश किया गया जिसे इकीस्वीं शताब्दी में आतंकवाद के औचित्य में आइएसाइएस अक्सर पेश करता है। इसमें यह बात स्पष्ट की गई कि ज़ाहिर और बहुवचन होने के बावजूद शब्द मुशरेकीनमें और विशेषज्ञता या व्याख्या की संभावना है।

दुसरे भाग का उद्देश्य यह अनुसंधान पेश करना है कि कुरआनी आयत 9:5 में क्या हम आज के मुशरेकीनको शामिल कर सकते हैं या नहीं। किसी भी परिणाम पर पहुँचने के लिए इस अनुसंधान में जो तरीका ए कार अपनाया गया है उसमें उन मक्का के मुशरेकीन के तीन महत्वपूर्ण पहलुओं पर गौर व फ़िक्र करना शामिल है जिनका उल्लेख इस आयत में है। पहले दो पहलु मुशरेकीने मक्का के अक़ाइद और आमाल हैं जबकि तीसरा पहलु यह जानने में हमारी रहनुमाई करेगा कि क्या जंग की हालत में उन्हें मारने की अनुमती केवल उनके मुशरेकीनहोने की वजह से दी गई थी या इस वजह से कि वह अमन समझौते का उल्लंघन करने वालेया धार्मिक शोषण करने वाले थे। इन तीनों पहलुओं को गहराई के साथ समझना अत्यंत आवश्यक है ताकि आईएसआईएस के खिलाफ कोई ठोस दलील कायम की जा सके।

कुरआनी आयत 9:5 में उल्लेखित मक्का के मुशरेकीन के अकीदे

उनके अकीदे के बारे में संक्षिप्त यह है कि मक्का के मुशरेकीन ने तशबीह का अकीदा गढ़ लिया था और अपने अकीदे में परिवर्तन का शिकार हो चुके थे। वह कहते थे कि फरिश्ते खुदा की बेटियाँ हैं। उनका अकीदा था कि अल्लाह पाक अपने मुकर्रब बंदों की सिफारिश कुबूल कर लेता है, चाहे वह उसे पसंद न हो, जैसा कि बादशाह कभी कभी अपने वजीरों और मंत्रियों की सिफारिश कुबूल कर लेते हैं। जब वह इल्म और सुनने और देखने की ताकत जैसी अल्लाह की असल सिफात नहीं समझ सके तो उन्होंने उन इलाही सिफात का फैसला अपने इल्म और सुनने और देखने की सलाहियत के संदर्भ में करना शुरू कर दिया। इस तरह वह अल्लाह के लिए जिस्म व मकान का अकीदा रखने की गुमराही में लिप्त हो गए। शाह वलीउल्लाह के शब्दों में तहरीफ़ की रुदाद यह है कि हजरत इस्माइल की संतान लम्बे समय तक इब्राहीमी दीन (मिल्लते इब्राहीमी) पर कायम रही यहाँ तक कि अम्र बिन लुहय नामक एक मलउन शख्स पैदा हुआ उसने बुत तराशी की और उनकी इबादत को लाज़िम करार दिया। उसने उन बुतों के लिए बहीरा व साईबा और हाम जानवरों के आज़ाद छोड़ने और तीरों के जरिये किस्मत आजमाई जैसे कामों का सिलसिला शुरू किया। यह घटना पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बेअसत [आने] से तीन सौ साल पहले घटित हुआ। अपनी बुत परस्ती व बद मज़हबी के सिलसिले में मुशरेकीन अपने बाप दादा की रविश और रिवायत से इस्तदलाल करते हुए इसे अपने लिए एक कतई दलील समझने लगे थे। हालांकि पिछले नबियों ने भी कयामत और हश्र व नश्र का अकीदा लोगों को दिया था लेकिन उन्होंने इसे इतनी वजाहत और तफसील से ब्यान नहीं किया था जिस तरह कुरआन ने ब्यान किया है। चूँकि अरब के मुशरेकीन को मौत के बाद की ज़िन्दगी के मुफ़स्सल अहवाल नहीं दिए गए थे इसीलिए वह कयामत के वाकियात को असंभव और हकीकत से दूर मानते थे। हालांकि अरब के मुशरेकीन इब्राहीम, इस्माइल और हजरत मूसा अलैहिमुस्सलाम की नबूवत को मानते थे लेकिन वह उन नबियों में इंसानी सिफात [जो कि उनकी नबूवत के जमाल का एक हिजाब और पर्दा होता था] के वजूद के बारे में मुगालते में पड़ गए, और इस तरह उनके बारे में शक का शिकार हो गए.....इंसानी शक्ल में अम्बिया के वजूद को उन्होंने असंभव और अविश्वसनीय काम समझा (शाह वलीउल्लाह, अल फौजुल कबीर)।

मक्का के मुशरेकीन और इस दौर के मुशरेकीन के बीच एक दुसरा अंतर यह भी है कि अरब के मुशरेकीन खुद को अह्नाफ (हक़ के मुतलाशी) करार देते थे और यह दावा करते थे कि वह इब्राहीमी मिल्लत की पैरवी करते हैं। असल में हनीफ वह है जो हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की मिल्लत पर कायम रहे और आप के ही बयान किये हुए मामुलात बजा लाता हो। इब्राहीमी मिल्लत के शआएर व शराए में कुछ यह हैं: हज्जे बैतुल्लाह करना, नमाज़ के दौरान किबले की तरफ रुख करना, जनाबत से गुस्ल करना और तमाम प्राकृतिक आदतों जैसे खतना करना, बगल के बाल कटवाना, ज़बह व नहर दोनों तरह की कुर्बानी करना, नाफ के नीचे के बाल काटना आदि भी शामिल हैं..... अरब के मुशरेकीन ने मिल्लते इब्राहीमी को तर्क कर दिया था और वह अनुचित हत्या, चोरी, जिना, सूद खोरी और ज़ुल्म व जब्र हिंसा जैसे बुरे कामों में लिप्त हो चुके थे। हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की मिल्लत के एतेकादी मसाइल में उन मुशरेकीन ने आम तौर पर संदेह पैदा कर दिए थे और उन्हें कयास से दूर मानते थे और उन्हें समझने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते थे। शिर्क, तशबीह का अकीदा, इब्राहीमी सहिफा में तरमीम, आखिरत से इनकार और हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रिसालती मिशन को अविश्वसनीय करार देना आदि ऐसे मसाइल हैं जिनको अपना कर जम्हूरे मुशरेकीन ने मिल्लते इब्राहीमी से मुन्हरिफ होने का सुबूत दिया। इसके अलावा वह अत्याचार व अन्याय और फितना व फसाद जैसे शर्मनाक कामों में लिप्त हो चुके थे और उन्होंने अल्लाह की इबादत की हर निशानी को मिटा कर रख दिया था। [शाह वलीउल्लाह, अल फौजुल कबीर- पेज 3-4]

कुरआन मजीद की कई आयतों के अनुसार शिर्क एक न क्षमा किये जाने के लायक गुनाह है और इस गुनाह के करने वाले को कयामत के दिन अज़ाबे इलाही का सामना करना पड़ेगा। तथापि, कुरआनी आयतें मोमिनीन को इस इकीस्वीं शताब्दी में अमन व सद्भाव के साथ जीवन यापन करने से नहीं रोकतीं जहां इंसानों ने अमन और सद्भाव के कानून के तहत जीवन यापन करने का वादा लिया है। जहां तक आयत 9:5 की बात है, हालांकि इसमें शब्द मुशरेकीनका उल्लेख है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनसे शिर्क या अकीदे की बुनियाद पर जंगें की गई थीं। बल्कि उनसे जंगें इस लिए की गई थीं क्योंकि वह धर्म की बुनियाद पर अत्याचार किया करते थे। दुसरे शब्दों में उनकी हिंसक कार्रवाइयों के कारण से उनसे जंगें की गईं।

कुरआनी आयत 9:5 में उल्लेखित मुशरेकीन के आमाल

जहां तक कुरआन में उल्लेखित मुशरेकीन के आमाल की बात है तो मुशरेकीन ने मक्का में 14 या 15 वर्षों तक नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और आपके अनुयाइयों को अत्याचार का निशाना बनाया था। उन्होंने अल्लाह के पसंदीदा दीन इस्लाम कुबूल करने वालों पर हर किस्म की ज़िल्लत व रुसवाई मुसल्लत की थी। उन्होंने अल्लाह की नाजिल की हुई आयतों पर निराधार एतेराज़ लगाए, शरीअत के अहकामात का मज़ाक उड़ाया और तेरह सालों तक अपने अत्याचार का सिलसिला जारी रखा यहाँ तक कि मुसलमानों को दू बदू बदले की कार्रवाई करने की अनुमति मिल गई।

नबूवत के तेरहवें साल हिजरत की इजाज़त मिली। हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा ए किराम मक्का से ढाई तीन सौ मील दूर यसरब [अब मदीना नाम है] नामक एक बस्ती में जमा हो गए। लेकिन मक्का के काफिरों की गुस्से की आतिश अब भी ठंडी नहीं हुई। यहाँ भी मुसलमानों को चैन का सांस न लेने दिया। दस दस बीस बीस काफिरों के जत्थे आते। मक्का की चरागाहों में अगर किसी मुसलमान के मवेशी चर रहे होते तो उन्हें ले उड़ते। इक्का दुक्का मुसलमान मिल जाता तो उसे भी कत्ल करने से बाज़ न आते।

चौदा पन्द्रह साल तक सब्र व ज़ब्त से अत्याचार बर्दाश्त करने वालों को आज इजाज़त दी जा रही है कि तुम अपनी सुरक्षा के लिए हथियार उठा सकते हो। कुफ्र के अँधेरे की अति हो गई। बातिल की जफा कशियाँ हद से बढ़ गई हैं। अब उठो उन सरकशों और शराब से मदहोश काफिरों को बता दो कि इस्लाम का चराग इसलिए रौशन नहीं हुआ कि तुम फूंक मार कर उसे बुझा दो। हक़ का परचम इस लिए बुलंद हुआ कि तुम बढ़ कर उसे गिरा दो। यह चराग उस समय रौशन रहेगा जब तक नीले आसमान पर चाँद सितारे चमक रहे हैं। (ज़ियाउल कुरआन, जिल्द3 पेज 218)

शुरू में मुसलमानों को बचाव में भी लड़ने की इजाज़त नहीं थी। बाद में बचाव में लड़ने की इजाज़त दी गई और एक ऐसी स्थिति पैदा हो गई कि आयत मुशरेकीन को जहां कहीं भी [जंग की हालत में] पाओ क़त्ल करोनाजिल हुई।

मुशरेकीनसे अमन समझौते का उल्लंघन करने पर जंग हुई इसलिए नहीं कि उन्होंने शिर्क का प्रतिबद्ध किया था।

शाने नुज़ूल से यह बात साबित होती है कि उन्हें उन मुशरेकीने मक्का के खिलाफ लड़ने की इजाज़त दी गई थी जो धार्मिक आधार पर अत्याचार करते थे और अमन मुआहेदे पर दस्तखत करने के बाद उन्होंने इसका उल्लंघन किया था। आयत 9:5 से यह कयास करना सहीह नहीं होगा कि शिर्क का प्रतिबद्ध करने की वजह से उनसे जंग की गई। क्लासिकी उलेमा की निम्नलिखित व्याख्या से भी इसकी ताईद होती है।

इमाम बैज़ावी (मृतक 685 हिजरी) अपनी किताब अनवारुल तंजील व असरारुल तावील की जिल्द 3, पेज 71, 9:5- अरबी)जो कि क्लासिकी तफसीर की किताब है और उपमहाद्वीप भारत के मदरसों के पाठ्यक्रम में शामिल भी है, इस आयत की तफसीर करते हुए लिखते हैं फकतुलुल मुशरेकीन अय  अल नाकेसीनजिसका अर्थ यह है कि आयत 9:5 में ब्यान किये हुए मुशरेकीन से मुराद नाकेसीन हैं। नाकेसीन उन लोगों को कहा जाता है जो मुसलमानों पर हमला कर के अमन मुआहेदे का उल्लंघन करते हैं।

अल्लामा आलूसी (मृतक 1270 हिजरी) अपनी किताब रुहुल मुआनी (जिल्द10, पेज 50, 9:5, अरबी) में उल्लेखित आयत की तफसीर में लिखते हैं:

على هذا فالمراد بالمشركين في قوله سبحانه: (فاقتلوا المشركين) الناكثون

अनुवाद: इसलिए, अल्लाह पाक के कौल मुशरिकों को मारोमें मुशरेकीन से मुराद नाकेसीन अर्थात वह लोग हैं जिन्होंने मुसलमानों के खिलाफ जंग का एलान करके अमन मुआहेदों का उल्लंघन किया।

दीनीयात के माहिर अल्लामा अबुबकर अल जससास (मृतक 370 हिजरी) लिखते हैं,

"صار قوله تعالى: {فَاقْتُلُوا المُشْرِكِينَ حَيْثُ وَجَدْتُمُوهُمْ} خاصّاً في مشركي العرب دون غيرهم"

अनुवाद: आयत (मुशरिकों को क़त्ल करो जहां कहीं उन्हें पाओ) में ख़ास तौर पर अरब के मुशरेकीन मुराद हैं और इसका इतलाक किसी और पर नहीं होता (अह्कामुल कुरआन लिल जसास, जिल्द5, पेज 270)

इमाम जलालुद्दीन सुयूती लिखते हैं:

कुरआन की उपर्युक्त आयत 9:5 पर अपनी तफसीर में इमाम इब्ने हातिम ने हजरत इब्ने अब्बास (रज़ीअल्लाहु अन्हु जो कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चचा ज़ाद भाई थे) से यह रिवायत किया है कि वह फरमाते हैं: इस आयत में ज़िक्र किये गए मुशरेकीन से मुराद कुरैश के वह मुशरेकीन हैं जिनके साथ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने [सुलह] का मुआहेदा किया था [और जिन्होंने बाद में सुलह के मुआहेदे को तोड़ दिया था] (दुर्रे मंसूर, जिल्द-3, पेज 666)

वह यह भी बयान करते हैं कि इमाम इब्ने मुन्ज़ीर, इब्ने अबी हातिम और अबू शैख़ (रज़ी अल्लाहु अन्हुम) ने हजरत मोहम्मद बिन इबाद बिन जाफर से नकल किया है कि उन्होंने फरमाया यह मुशरेकीन बनू खुजैमा बिन आमिर के हैं जो बनी बकर बिन कनआना से संबंध रखते हैं,” (दुर्रे मंसूर, जिल्द3- पेज 666)

दुसरे उलमा के अनुसार ऐसी तफसीरों की पुष्टि कुरआन के उस फरमान से होती है जो उसी सुरह की आयत 13 में मौजूद है,

क्या उस कौम से न लड़ोगे जिन्होंने अपनी कसमें तोड़ीं और रसूल के निकालने का इरादा किया हालांकि उन्हीं की तरफ से पहल होती है, क्या उनसे डरते हो तो अल्लाह इसका ज़्यादा हकदार है कि उससे डरो अगर ईमान रखते हो (9:13)

और सुरह तौबा की आयत नंबर 36 भी इसकी ताईद करती है

और मुशरिकों से हर वक्त लड़ो जैसा वह तुमसे हर वक्त लड़ते हैं, और जान लो कि अल्लाह परहेज़गारों के साथ है। (9:36)

इन दो आयतों (9:13) और (9:36) और उपर्युक्त क्लासिकी फुकहा के टिप्पणियों का हासिल यह है कि आयत 9:5 में बयान किये हुए मुशरेकीन से तमाम मुशरेकीन मुराद नहीं हैं बल्कि वह मुशरेकीन मुराद हैं जिन्होंने शुरू के मुसलमानों के खिलाफ जंग का एलान कर के अमन मुआहेदों का उल्लंघन किया था। इसलिए, यह बात सहीह नहीं है कि मक्का के मुशरेकीन से जंग उनके शिर्क की वजह से की गई थी।

हमें यहाँ दो बातों पर गौर करने की आवश्यकता है। पहला: अगर शिर्क का अमल ही जंग का कारण होता तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और मुशरेकीने मक्का के बीच अमन मुआहेदा न हुआ होता। दुसरे: अगर यह मुशरेकीन मज़हब के आधार पर अत्याचार न करते या अमन मुआहेदे का उल्लंघन न करते तो जंगें भी न हुई होतीं। यह बात उन हदीसों से भी समझी जा सकती है (जो अगले भागों में पेश किये जाएंगे) जिनमें मुशरेकीन में से औरतों, बच्चों, विकलांगों या बूढों को मारने से मना किया गया है।

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