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Hindi Section ( 5 Oct 2012, NewAgeIslam.Com)

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The Shroud of a Holy Language एक पवित्र भाषा का पर्दा

 

राशिद समनाके, न्यु एज इस्लाम

2 अक्तूबर, 2012

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

(30: 22) “और उस (की कुदरत) की निशानियों में आसमानो और ज़मीन का पैदा करना और तुम्हारी ज़बानो और रंगतो का एख़तेलाफ भी है यकीनन इसमें वाक़िफकारों के लिए बहुत सी निशानियाँ हैं।"

धार्मिक उद्योगों की तरफ से भोले भाले मुसलमानों पर अरबी भाषा का भ्रामक जाल फेंका गया है ताकि वो यकीन करें कि कोई भी भाषा पवित्र हो सकती है। मुसलमानों के बहुमत का मानना ​​है कि अरबी भाषा निम्नलिखित आधार पर पवित्र है:

(1) ये 'खुदा' की अपनी भाषा है, क्योंकि कुरान अरबी भाषा में है,

(2) क्योंकि कुरान अरबी भाषा में अरब में नाज़िल किया (उतारा) गया था,

(3) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम जन्म से 'अरब' थे और आपने इसे अपनी मातृभाषा, 'अरबी में संकलित किया है।

उपरोक्त दिए गए विचार के खिलाफ कुछ उचित तर्क निम्नलिखित कारणों से सामने आते हैं।

खुदा अपनी खुदाई और अपने असीमित नेमतों के साथ (34:14)  इल्मुल ग़ैय्यूब है यानी सब कुछका इल्म रखने वाला है और इसलिए खुदा एक भाषी नहीं हो सकता। इसलिए, ये यकीन करना कि खुदा एक भाषी है, ये कुफ्र करने के बराबर हो जाएगा और अल्लाह के गुणों से इन्कार करना होगा। इसका मतलब केवल मानवों का पोषण करना भी होगा, खुदा की अपनी रचना, रचनाकार से ऊपर होगी, जैसा कि मनुष्यों के बीच कई लोग दो भाषाओं के जानने वाले कुछ कई भाषाओं के भी जानने वाले हैं।

मोहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ही केवल खुदा के पवित्र पैगम्बर नहीं थे, जिन्हें इंसानों की तरफ खुदा की हिदायत के साथ भेजा गया, क्योंकि आपसे पहले भी कई रसूल कई देशों में भेजे गए थे (2:4) मुस्नद के अनुसार एक लाख पच्चीस हजार नबी इस दुनिया में आये और बाइबल के अनुसार संख्या एक लाख चौवालिस हजार थी, इसलिए, कि इसकी वजह ये थी कि पैगम्बर अपने लोगों के साथ प्रभावी रूप से बातचीत कर सकें, और नबियों ने अपनी मातृभाषा में लोगों को संदेश दिया होगा, न कि कुरान की क्लासिक अरबी भाषा में दिया होगा।

संदेश वैश्विक है, लेकिन कोई वैश्विक अद्वितीय मानव भाषा नहीं है। इसलिए गैर अरबी लोगों के लिए कुरान के संदेश को उनकी अपनी भाषा में समझने के लिए और विभिन्न भाषा में इसके संदेश को उपलब्ध कराने के लिए अनुवादकों पर निर्भरता जरूरी है।

एक किताब जो किसी अन्य भाषा में है उसकी पूरी समझने के लिए, केवल उस विशिष्ट भाषा के बोलचाल और दैनिक उपयोग को जानना ही काफी नहीं है बल्कि इसके नाजुक पहलुओं और उसके संदेश की वास्तविक आत्मा को समझना भी जरूरी है।

अरबी भाषा में कई शब्द हैं जो आज दूसरी भाषाओं के समानार्थी हैं, जैसा कि फारसी और उर्दू में हैं, लेकिन ये कुरान में दिए गए अर्थ से बिल्कुल अलग हैं। हालांकि किताब इनका प्रयोग करती है लेकिन उन्हें मतलब की महत्वपूर्ण और व्यापक गुंजाइश दी है और जिसे अरबी पाठकों का वर्ग रट कर इसके अर्थ को समझने में नाकाम है।

उदाहरण के लिए अरब में शब्द अल्लाह का उपयोग आमतौर पर सभी बुतों के प्रमुख के लिए किया जाता था, लेकिन उसके बाद से अब तक पूरी दुनिया में इसे "उसके सिवा कोई माबूद (इबादत के लायक) नही" को बताने के लिए किया जाता है, जिसके लिए अरबी संज्ञा अल्लाह है। लेकिन अल्लाह शब्द को मुसलमानों ने खास तौर पर एक वैश्विक अथारिटी (प्राधिकरण) के जन्म, शादी और मौत के रजिस्टर में दर्ज एक व्यक्तिगत नाम की तरह लिया है।

कुछ लोग ये दलील देते हैं कि चूंकि कुरान में खुदा के 'व्यक्तिगत नाम' के रूप में दिया गया है, इसलिए किसी को भी किसी अन्य भाषा में किसी अन्य नाम से खुदा को पुकारना नहीं चाहिए, क्योंकि ये तौहीन खुदा (परमेश्वर का अपमान) होगी! हालांकि ख़ुदा की विशिष्टता, ईसाई, यहूदी और अन्य मज़हबों में स्वीकार की जाती है, जिन्हें कुरान को मानने वाले "अहले किताब" के रूप में स्वीकार करते हैं और ये बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी असली पुस्तकों को संपादित किया गया है। लेकिन व्यवहारिक रूप से मुसलमान इस बयान को खारिज करते हैं जैसे कि उनके पवित्र रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का अल्लाह और मूसा या हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम आदि के अल्लाह से बहुत अलग है।

ये तथ्य कि कुरान अरबी भाषा में है और ये खुदा के भाषाई ज्ञान की सीमा नहीं है। अरबी भाषा को आम और तार्किक रूप से इसलिए चुना गया क्योंकि अल्लाह के रसूल जन्म से अरब थे और अरब के लोगों की मातृभाषा के रूप में अरबी बोलते थे यही वो एकमात्र भाषा थी जो वो लोग समझते थेَ इसलिए, संदेश अरबी  के अलावा किसी अन्य भाषा में नहीं दिया जा सकता था! ठीक इसी तरह अल्लाह के दूसरे रसूल अपने श्रोताओं की मातृ भाषा के अलावा अरबी में अल्लाह के संदेश को नहीं पहुँचा सकते थे।

इसलिए ये निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि अरबी मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के अल्लाह के रसूल होने के कारण पवित्र भाषा है, तो इसलिए पिछले सभी पैगम्बरों की विभिन्न भाषाओं को भी पवित्र माना जाना चाहिए। जिहालत की सदियों की जमी धूल और एक धार्मिक पवित्र भाषा के रूप में अरबी को बढ़ावा देने के कारण ये आज भी मुसलमानों की समझ से बाहर है। ये बात पूरी तरह से उनके के ईमान के विपरीत है कि हालांकि पिछले सारे रसूल पवित्र थे लेकिन उनकी भाषा पवित्र नहीं थी!

अरबी के पवित्र होने की मार्केटिंग एक सदी से भी अधिक समय से संतोषजनक रूप से सफल रही है और साथ ही न सिर्फ इस क्षेत्र की भाषा बल्कि अन्य सभी चीजें जैसे ज़मज़म का पानी, कपड़े पहनने का अंदाज़, इत्र और खुशबू, खजूरें, जानमाज़, यहां तक कि यादगारी तोहफा (सोवेनियर्स) भी पवित्र मानी जाती हैं - हालांकि इनमें से अधिकांश भारत, जापान और चीन में ही बने होते हैं!

ये एक जाल है कि जो कुछ भी अरब से आ रहा है, वो पवित्र है और जो मुस्लिम समुदाय को मजहबी तक़वा के ट्रिलियन डॉलर उद्योग से बांधे रखने में प्रभावी है और ये एक विशेष समुदाय और देश और उसकी जनता को एकमात्र रूप से लाभ पहुँचाने के लिए है। इस तरह, किताब के वैश्विक संदेश की दुनिया में डाका डाल रहे हैं, जिसकी मूल भावना का उद्देश्य मानवता को फायदा पहुंचाना है।

एक आठ साल का बच्चा जो रविवार को धार्मिक 'क्लास में भाग लेता है उसने अरबी भाषा के कुछ आम शब्द जैसे जज़ाकल्लाह, सीख लिए, जिसे नेक मुसलमान' अपनी रोज़ाने की ज़िंदगी में इस्तेमाल करते हैं और इस बच्चे के माता पिता बहुत खुश और इस पर गर्व महसूस करते हैं। लेकिन जब बच्चे से एक बार पूछा गया कि इसका क्या मतलब है, तो उसने अपने कंधे उचकाए और कहा कि "मुझे नहीं मालूम" और दौड़ता हुआ चला गया और सवाल करने वाले को चकित छोड़ गया।

उपरोक्त में दी गई मिसाल एक धार्मिक भाषा की प्रतिष्ठा में विचारों  के बदलने की दुविधा को स्पष्ट करता है। 'ज्ञान' प्राप्त करने के लिए किसी भी भाषा को सीखने के बजाय, ये अनुष्ठानों और धार्मिक संस्कारों को निभाने के लिए सीखी जाती है।

अरबी की इस संकीर्णता ने आम तौर पर एक राष्ट्र के आर्थिक लाभ और कुलीन वर्ग जिन्हें आलिमुद्दीन कहा जाता है, उनके पेशे को बनाए रखने के लिए मानवता के लिए इसके संदेश के वास्तविक अर्थ को मुश्किल बना दिया है! मुल्ला की अज़ान और، मुजाहिद की अज़ान और।

राशिद समनाके भारतीय मूल के इंजीनियर (रिटायर्ड) हैं और चालीस सालों से आस्ट्रेलिया में रह रहे हैं और न्यु एज इस्लाम के लिए नियमित रूप से लिखते हैं।

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