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Hindi Section ( 3 Apr 2015, NewAgeIslam.Com)

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Muslim Population Explosion: Myth and Reality मुस्लिम आबादी विस्फोट : मिथक और हकीकत

 

क़मर वहीद नक़वी

क्या आज से 20 साल बाद यानी 2035 में मुसलमान भारत में बहुसंख्यक हो जाएंगे और आबादी में हिंदुओं को पीछे छोड़ देंगे? इस तरह के सवालों पर गूगल सर्च के बड़े ही विस्फोटक जवाब मिलते हैं. लेकिन कुछ आंकड़ों का बारीक मुआयना करने पर एक अलग ही तस्वीर उभरती है.

 

 

 

 

 

 

 

   गूगल पर मुस्लिम आबादी विस्फोट के सर्च के नतीजे बाकायदा हिसाब-किताब के साथ कहते हैं कि कैसे 2035 तक भारत में मुसलमानों की आबादी बढ़ कर 92.5 करोड़ हो जाएगी और हिन्दू आबादी सिर्फ 90.2 करोड़ तक ही पहुंच पाएगी. 2040 आते-आते हिन्दू त्योहार मनाए जाने बंद हो जाएंगे, बड़े पैमाने पर धर्मांतरण और गैर मुस्लिमों का नरसंहार होगा और 2050 तक पहुंचते-पहुंचते मुसलमान 189 करोड़ से भी ज्यादा हो जाएंगे और भारत एक मुस्लिम राष्ट्र हो जाएगा.

पिछले कई बरसों से संघ परिवार की तरफ से देश में यह दुष्प्रचार चलाया जा रहा है, कभी लुक-छिपकर, गुमनाम परचों और पैम्फलेटों के जरिए, कभी तरह-तरह के ब्लॉग और सोशल मीडिया की पोस्टों के जरिए, तो कभी खुलकर आधिकारिक रूप से भी. शायद आपको याद होगा कि अक्तूबर 2013 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोच्चि में हुई राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक के दौरान संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने हिंदुओं से खुलकर अपील की थी वह अपनी आबादी बढ़ाने के लिए कम से कम तीन बच्चे तो जरूर पैदा करें. हाल में साक्षी महाराज और साध्वी प्राची तो हिंदुओं से चार-चार बच्चे पैदा करने की अपील कर चुके हैं. विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया भी पीछे नहीं रहे. इसी जनवरी में उन्होंने बरेली में विश्व हिंदू परिषद के 50वें स्थापना दिवस समारोह में कहा कि चार बच्चों की बात करने पर इतना हंगामा क्यों खड़ा हो रहा है? जब मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा करता है तो लोग क्यों चुप रहते हैं. मुसलमान चार बीवियां और 10 बच्चे पैदा करता है. अगर दो बच्चों की बात करते हो तो कानून बनाओ. जो लोग ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए.

अफवाह मशीनरी तो यूरोप के लोगों को भी डराने में लगी है कि जैसे मुसलमानों की आबादी पूरी दुनिया में बढ़ रही है, उसके कारण एक दिन यूरोप खत्म हो जाएगा

बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य वासुदेवानन्द सरस्वती तो हिंदुओं के सामने सीधे 10 बच्चे पैदा करने का आंकड़ा रख दिया है, ताकि हिंदुओं की जनसंख्या बढ़ती रहे और उनका अस्तित्व खतरे में न पड़े. तो क्या सचमुच मुसलमान जान-बूझकर अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं, ताकि एक दिन वे भारत में बहुसंख्यक हो जाएं? क्या सचमुच मुसलमान चार-चार शादियां करते हैं? क्या मुस्लिम औरतें 10-10 बच्चे पैदा करती हैं? क्या मुसलमानों की आबादी बढ़ने का यह एक बड़ा कारण है कि वे बहुविवाह करते हैं? क्या मुसलमान परिवार नियोजन को बिलकुल नहीं अपनाते और उसे इस्लाम विरोधी मानते हैं? क्या एक दिन वाकई मुसलमानों की आबादी इतनी हो जाएगी कि वह जनसंख्या के मामले में हिंदुओं से ज्यादा हो जाएंगे और क्या भारत कभी मुस्लिमराष्ट्र बन सकता है? दिलचस्प यह है कि यह भड़काऊ शिगूफा सिर्फ भारत में ही नहीं छेड़ा जाता, बल्कि अफवाह मशीनरी तो यूरोप के लोगों को भी डराने में लगी है कि जिस तरह मुसलमानों की आबादी पूरी दुनिया में बढ़ रही है, उसके कारण एक दिन यूरोप खत्म हो जायेगा और उसकी जगह यूरेबियाबन जाएगा? तो देखते हैं कि इन दावों में कितना दम है?

पहले भारत. जनगणना 2011 की रिपोर्ट सरकारी तौर पर कुछ दिनों में जारी होनेवाली है. यह रिपोर्ट तो सालभर पहले ही तैयार हो चुकी थी लेकिन लोकसभा चुनाव के कारण यूपीए सरकार ने तब इसे चुनाव तक के लिए रोक दिया था. सरकार को डर था कि रिपोर्ट के आंकड़ों के सामने आने से कहीं  हिंदुत्ववादी संगठनों को नए दुष्प्रचार का मौका न मिल जाए और चुनाव में सरकार के लिए नई मुसीबत खड़ी हो जाए. वैसे लीक हो कर यह रिपोर्ट तब ही कुछ जगहों पर छप गई थी. अभी हाल में ही यह लीकरिपोर्ट फिर छपी है. तो 2011 की जनगणना की लीकरिपोर्ट के मुताबिक़ देश की आबादी में मुसलमान 13.4 प्रतिशत से बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गए हैं और पहली बार हिंदुओं का प्रतिशत 80 से नीचे चले जाने का अनुमान है. 1961 में मुसलमान 10.7 प्रतिशत थे और हिंदू 83.4 प्रतिशत. 2001 में मुसलमान बढ़ कर 13.4 प्रतिशत हो गए और हिंदू घटकर 80.5 प्रतिशत ही रह गये. इसलिए लीकरिपोर्ट के मुताबिक़ अगर मुसलमान बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गये हैं तो हिंदुओं की आबादी जरूर घटकर 80 प्रतिशत से नीचे जा सकती है.

 

 

 

 

 

 

   ऊपर से देखने पर तो ये आंकड़े डरानेवाले लगते हैं. और इन्हीं आंकड़ों को लेकर हिंदुत्व ब्रिगेड के षडयंत्रकारी हिन्दुओं को डराने, भड़काने और मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाने में लगे हैं. लेकिन यह आधा सच है. इस सच का दूसरा पहलू यह है कि मुसलमानों की दशकीय जनसंख्या वृद्धि की दर में पिछले दस साल में उल्लेखनीय कमी आई है. 1991 से 2001 के 10 सालों में मुसलमानों की आबादी 29 प्रतिशत बढ़ी, जबकि 2001 से 2011 के दशक में यह वृद्धि केवल 24 प्रतिशत रही. हालांकि यह 18 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से अभी भी काफी ज्यादा है. मुस्लिम जनसंख्या के आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण करें तो पाएंगे कि मुसलमानों में छोटे परिवार को लेकर रुझान तेजी से बढ़ रहा है और जैसे-जैसे मुसलमानों में शिक्षा का प्रसार बढ़ेगा जैसे-जैसे उनकी आर्थिक हालत में सुधार होता जाएगा, वैसे-वैसे उनकी जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ती जाएगी

भारत सरकार के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़े संघ और उसके परिवार के हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा किए जा रहे दुष्प्रचार की चिंदी-चिंदी उड़ा देते हैं. पहला एनएफएचएस 1991-92 में, दूसरा 1998-99 में और तीसरा 2005-06 में हुआ था. यानी इन पन्द्रह सालों में प्रजनन दर, परिवार नियोजन और गर्भ निरोधक उपायों के इस्तेमाल के चलन को आसानी से देख सकते हैं. 1991-92 में हिंदू महिलाओं की प्रजनन दर यानी टीएफआर 3.3 और मुसलमानों की 4.41 थी. 1998-99 में हिंदू महिलाओं का टीएफआर 2.78 और मुसलमानों का 3.59 दर्ज किया गया. 2005-06 में हिन्दुओं का टीएफआर 2.59 और मुसलमानों का 3.4 रह गया. साफ है कि मुसलमानों की प्रजनन दर में इन 15 सालों में लगातार कमी आई है.

मुस्लिम जनसंख्या के आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण करें तो पाएंगे कि मुसलमानों में छोटे परिवार को लेकर रुझान तेजी से बढ़ रहा है

अब इन आंकड़ों को जरा सरल कर के देखें तो बात आसानी से समझ में आएगी. दो नमूने लेते हैं. एक हजार हिंदू महिलाएं और एक हजार मुस्लिम महिलाएं. इन आंकड़ों के हिसाब से 1991-92 में एक हजार हिंदू महिलाओं के (3.3 प्रति महिला x 1000) यानी 330 बच्चे हुए और एक हजार मुस्लिम महिलाओं के 441 बच्चे. यानी मुस्लिम महिलाओं ने  हिंदू महिलाओं की तुलना में 111 बच्चे ज्यादा पैदा किए. 1998-99 में एक हजार हिंदू महिलाओं के 278 बच्चे हुए और एक हजार मुस्लिम महिलाओं के 359 बच्चे, यानी मुस्लिम महिलाओं ने हिंदू महिलाओं की तुलना में केवल 81 बच्चे ही ज्यादा पैदा किये. कमी साफ है. और 2005-06 में एक हजार हिंदू महिलाओं के 259 बच्चे हुए और एक हजार हिन्दू महिलाओं के 340 बच्चे हुए, यानी वही 81 बच्चे अधिक पैदा हुए. इससे दो बातें स्पष्ट हैं कि 1991 से 2006 के पं्द्रह सालों में मुसलमान महिलाओं की प्रजनन दर में लगातार कमी आई है और दूसरे व तीसरे एनएफएचएस के बीच में तो मुसलमान महिलाओं की प्रजनन दर में आई कमी हिंदू महिलाओं की प्रजनन दर में गिरावट के मुकाबले बहुत पीछे नहीं थी. आप देखें कि 1998-99 के मुक़ाबले एक हजार हिंदू महिलाओं ने 2005-06 में 19 बच्चे कम पैदा किये (278-259) और इसी अवधि में हजार मुसलमान महिलाओं ने भी पिछली बार की तुलना में 19 ही बच्चे कम (359-340) पैदा किए. दूसरी बात यह मुसलमान महिलाएं हिंदू महिलाओं की तुलना में अधिक से अधिक केवल एक ही बच्चा ज्यादा पैदा कर रही हंै, वैसे औसत तो एक से भी कम का यानी 0.81 बच्चे का ही बैठता है.

तो यह मिथक बेबुनियाद है कि मुसलमान महिलाएं दस-दस बच्चे पैदा करती हैं. सच यह कि औसतन वह चार या कहें कि साढ़े तीन से भी कम बच्चे पैदा करती हैं. उनकी प्रजनन दर 2005-06 में 3.4 थी, जो पिछले रुझान को देखते हुए इस समय और भी कम हो गई होगी.

हालांकि यह बात सही है कि मुस्लिम महिलाओं की प्रजनन दर हिंदुओं के मुकाबले अब भी ज्यादा है. क्यों? इसका जवाब भी एनएफएचएस के आंकड़ों से मिलता है. ये आंकड़े इस तथ्य को स्पष्ट रूप से सिद्ध करते हैं कि गरीब और अशिक्षित तबके में प्रजनन दर काफी अधिक रहती है और जैसे-जैसे आर्थिक संपन्नता व शिक्षा का स्तर बढ़ता जाता है, प्रजनन दर कम होती जाती है.

*एनएफएचएस में हाईस्कूल और उससे ऊपर की शिक्षा के दो अलग स्लैब कर दिए गए थे. पहला: 10-11 साल तक शिक्षा प्राप्त करनेवाले और 12 साल या उससे अधिक की शिक्षा प्राप्त करनेवाले. यहां हमने दूसरे स्लैब यानी 12 साल या उससे अधिक की शिक्षा के आंकड़े लिए हैं.

 

 

 

 

 

 

 

  आप देखेंगे कि शिक्षा का स्तर बढ़ते ही प्रजनन दर काफी गिर गई और यह रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से भी नीचे चली गई. रिप्लेसमेंट लेवल क्या है? एक महिला और एक पुरुष मिला कर दो हुए. इसलिए यदि वे दो बच्चे पैदा करते हैं तो उनकी मृत्यु के बाद बच्चे उनको आबादी में रिप्लेस कर देंगे. यानी अगर हर दंपती दो बच्चे ही पैदा करता है तो आबादी स्थिर रहेगी. लेकिन चूंकि प्राकृतिक रूप से जन्म दर में लड़कियों की संख्या लड़कों से कुछ कम होती है, इसलिए रिप्लेसमेंट लेवल के लिए प्रजनन दर 2.1 लिया जाता है. तो जब तक जनन दर 2.1 है, तब तक आबादी स्थिर रहेगी. इससे कम जनन दर होने पर आबादी घटने लगती है. तो बहरहाल, ऊपर की तालिका से स्पष्ट है कि शिक्षा के बढ़ने के साथ जनन दर घटती जाती है.

आप देखेंगे कि जैसे-जैसे  सम्पन्नता का स्तर बढ़ता गया, वैसे-वैसे प्रजनन दर घटती गई. मुसलमानों में अशिक्षा और गरीबी की क्या स्थिति है, यह सच्चर कमिटी की रिपोर्ट से साफ हो जाता है. ऐसे में अगर मुसलमानों के पिछड़ेपन के कारणों को दूर करने की तरफ ध्यान दिया जाए तो यकीनन उनकी प्रजनन दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है.

एनएफएचएस के आंकड़े इस दुष्प्रचार की भी पूरी तरह से कलई खोल देते हैं कि मुसलमान परिवार नियोजन को नहीं अपनाते और इसे गैरइस्लामी मानते हैं

साफ जाहिर है कि समय बीतने के साथ-साथ दूसरे वर्गों की महिलाओं की तरह मुसलमान महिलाओं में भी परिवार नियोजन को अपनाने की चेतना बढ़ी है. यह सही है कि मुसलिम महिलाएं अभी परिवार नियोजन के मामले में हिन्दू महिलाओं के मुकाबले काफी पीछे हैं. अगर आप इन आंकड़ों को ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि अगर हिन्दू महिलाओं में गर्भ निरोध के आधुनिक साधनों का प्रयोग पहले एनएफएचएस में 37.7प्रतिशत से बढ़कर दूसरे एनएफएचएस में 44.3 प्रतिशत हुआ और उसमें 6.6 फीसद की बढ़ोत्तरी हुई तो मुसलमान महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा 22 प्रतिशत से बढ़ कर 30.2 प्रतिशत हो गया और उसमें 8.2 फीसद की बढ़ोत्तरी हुई. इसी तरह दूसरे एनएफएचएस से तीसरे एनएफएचएस के बीच गर्भ निरोध के आधुनिक तरीके इस्तेमाल करनेवाली हिंदू महिलाओं की संख्या में 5.9 फीसद की वृद्धि दर्ज हुई तो मुस्लिम महिलाओं के मामले में यह वृद्धि 6.2 फीसद की रही. यानी हिंदू महिलाओं के मुकाबले 0.3 फीसदी ज्यादा.

एनएफएचएस-3 के आंकड़ों के अनुसार 21.3 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं ने महिला नसबंदी कराई, जबकि हिंदू महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा 39.9 प्रतिशत का है. परिवार नियोजन के मामले में भी वही बात लागू होती है कि गरीब और अशिक्षित वर्ग में परिवार नियोजन के साधनों का इस्तेमाल कम है और जैसे-जैसे शिक्षा व संपन्नता बढ़ती जाती है, परिवार नियोजन की स्वीकार्यता भी उतनी ही बढ़ती जाती है. एनएफएचएस-3 के मुताबिक सबसे गरीब वर्ग में केवल 34.6 प्रतिशत महिलाएं ही गर्भ निरोध के आधुनिक तरीके अपना रही थीं, जबकि मध्यम रूप से संपन्न महिलाओं के मामले में यह प्रतिशत 49.8 था और अति संपन्न महिलाओं के मामले में यह बढ़कर 58 हो गया.

यानी यह मिथक पूरी तरह निराधार है कि मुसलमान परिवार नियोजन को नहीं अपनाते. कुछ बरसों पहले तक यह बात बिलकुल सही थी, लेकिन पिछले 30 सालों में दुनिया-भर के मुसलमानों में परिवार नियोजन को लेकर विचार बिलकुल बदल चुके हैं और सचाई यह है कि बहुत-से मुस्लिम देशों में प्रजनन दर में भारी गिरावट आई है. इस मामले में पड़ोसी बांग्लादेश और ईरान ने तो कमाल ही कर दिया है. ईरान में प्रजनन दर 8 से गिरकर 2 तक पहुंच गई है और कहा जा रहा है कि अगर प्रजनन दर में गिरावट जारी रही तो वहां आबादी घटने लगेगी. 2011 में पीईडब्लू रिसर्च के एक अध्य्यन द फ्यूचर ऑफ ग्लोबल मुस्लिम पॉपुलेशन के मुताबिक मुस्लिम बहुल आबादीवाले 49 देशों और भूभागों में प्रजनन दर 1990-95 में 4.3 थी, जो 2010-15 में घटकर 2.9 ही रह जाने का अनुमान है. और 2020-25 में इसके घटकर 2.6 और 2030-35 में 2.3 हो जाने का अनुमान है. यानी रिप्लेसमेंट लेवेल 2.1 के कुछ ऊपर. इसका अर्थ है कि अगर प्रजनन दर में इसी तरह गिरावट जारी रही , तो 2040 के बाद दुनिया में मुस्लिम आबादी न केवल स्थिर हो जाएगी, बल्कि कम भी होने लगेगी. प्रसिद्ध जनसांख्यिकीविद् निकोलस इबरस्ताद और अपूर्वा शाह के मुताबिक पिछले तीन दशकों में इन 49 मुस्लिम बहुल देशों में प्रजनन दर में 41 प्रतिशत की गिरावट आयी है, जबकि इस अवधि में पूरी दुनिया में प्रजनन दर में औसत 33 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. करीब 22 मुस्लिम बहुल देशों में पिछले तीन दशकों में प्रजनन दर में 50 प्रतिशत या उससे ज्यादा की गिरावट आई. इनमें से 10 देशों में यह गिरावट 60 प्रतिशत या उससे अधिक रही और ईरान व मालदीव में तो यह 70 प्रतिशत से भी ज्यादा गिरी.

जाहिर सी बात है कि मुस्लिम देशों में परिवार नियोजन और आबादी को नियंत्रण में रखने की आवश्यकता न केवल महसूस की गई, बल्कि इस दिशा में व्यापक अभियान भी चलाया जा रहा है. हालांकि यह भी सच है कि कुछ मुस्लिम देशों में और कुछ मुसलमान अब भी कूढ़मगजी के शिकार हैं और वे ऐसी बातें करते मिल भी जाएंगे कि बच्चे तो अल्लाह की देन हैं और अल्लाह अगर बच्चे देता है तो वही उन्हें पालने का इंतजाम भी करता है. लेकिन केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया-भर में जनसंख्या संबंधी अध्ययनों का एक ही निष्कर्ष है कि संपन्न देशों और समाज के संपन्न वर्गों में प्रजनन दर काफी कम रहती है और जो देश या परिवार जितना अधिक गरीब रहता है, वहां प्रजनन दर उतनी ही ज्यादा रहती है. संभवत: इसके पीछे एक आर्थिक कारण भी है कि परिवार में जितने अधिक लोग होंगे, उतने अधिक कमानेवाले होंगे. तो आबादी पर लगाम लगाना है तो निर्धन लोगों को इस लायक बनाना होगा कि वे आसानी से अपना गुजारा कर सकें.

 

 

 

 

 

 

 

    प्रजनन दर में अगर इसी तरह गिरावट जारी रही, तो 2040 के बाद दुनिया में मुस्लिम आबादी न केवल स्थिर हो जाएगी, बल्कि कम भी होने लगेगी

दूसरी बात यह कि महिलाओं की संख्या यदि 936 है और प्रजनन दर 3.4, यानी प्रति महिला 3.4 संतान, तो कुल बच्चे तो 936×3.4 ही पैदा होंगे. यानी बहुविवाह से किसी परिवार में तो बच्चों की संख्या बढ़ सकती है लेकिन जनसंख्या पर इसका कोई असर नहीं होगा क्योंकि महिलाओं की संख्या और प्रजनन दर स्थिर है. एक और बात है, जिसकी तरफ कम ही ध्यान जाता है. हिंदुओं के मुकाबले मुसलमानों की जीवन प्रत्याशा लगभग तीन साल ज्यादा है. यानी हिन्दुओं के लिए जीवित रहने की उम्मीद 2005-06 में 65 साल थी, जबकि मुसलमानों के लिए 68 साल. सामान्य भाषा में समझें तो एक मुसलमान एक हिन्दू के मुकाबले औसतन तीन साल ज्यादा जिंदा रहता है. इसके अलावा हिंदुओं में पांच साल से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 76 है, जबकि मुसलमानों में यह केवल 70 है (एनएफएचएस-3). आंकड़ों से स्पष्ट है कि मुसलमानों में पांच साल से कम के बच्चों की मृत्यु दर हिन्दुओं के मुकाबले लगातार कम रही है. यह दोनों बातें भी मुसलमानों की आबादी बढ़ाने में योगदान करती हैं.

आबादी का बढ़ना चिंता की बात है. इस पर लगाम लगनी चाहिए. लेकिन इसका हल वह नहीं, जो आरएसएस, प्रवीण तोगड़िया और संघ परिवार के लोग सुझाते हैं. हल यह है कि सरकार विकास की रोशनी को पिछड़े गलियारों तक जल्दी से जल्दी ले जाए, शिक्षा की सुविधा को बढ़ाए, परिवार नियोजन कार्यक्रमों के लिए जोरदार मुहिम छेड़े, घर-घर पहुंचे, लोगों को समझे और समझाए तो तस्वीर क्यों नहीं बदलेगी? आखिर पोलियो के खिलाफ अभियान सफल हुआ या नहीं!

Source: http://tehelkahindi.com/muslim-population-in-india-by-qamar-waheed-naqvi/

URL: http://newageislam.com/hindi-section/qamar-waheed-naqvi/muslim-population-explosion--myth-and-reality--मुस्लिम-आबादी-विस्फोट---मिथक-और-हकीकत/d/102280

 

 

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