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Hindi Section ( 16 March 2022, NewAgeIslam.Com)

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Muslims Have Not Learnt To Live Peacefully As Most Islamic Countries Are Going Through Social And Political Crisis मुसलमानों ने शांति से रहना नहीं सीखा है क्योंकि अधिकांश इस्लामी देश सामाजिक और राजनीतिक संकट से गुजर रहे हैं

आतंकवादी हमलों और सामाजिक और राजनीतिक अशांति ने आर्थिक और सामाजिक विकास को बाधित किया है

प्रमुख बिंदु:

कजाकिस्तान 2 जनवरी से सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा है।

सूडान तानाशाही के खिलाफ राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है।

पाकिस्तान आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा में घिरा हुआ है।

सीरिया पर एक बार फिर आइएसआइएस का हमला है।

यमन में, हूसी सरकार के खिलाफ हथियार उठा रहे हैं।

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न्यू एज इस्लाम स्टाफ राइटर

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

27 जनवरी, 2022

जबकि वैज्ञानिक प्रगति और सामाजिक जागरूकता ने पश्चिमी ईसाइयों और अन्य गैर-मुसलमानों को आर्थिक रूप से उन्नत बना दिया है और इन देशों के लोग राजनीतिक स्थिरता और शैक्षिक और आर्थिक विकास के कारण अपेक्षाकृत बेहतर जीवन जी रहे हैं, वहीँ अधिकांश इस्लामी देश अभी भी सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक विभाजन की चपेट में हैं। कुछ इस्लामी देश दशकों से राजनीतिक और सामाजिक अशांति से ग्रस्त हैं, जैसे सूडान, नाइजीरिया और मध्य पूर्व और पाकिस्तान।

नए साल के पहले महीने के दौरान कुछ अन्य देश सामाजिक और राजनीतिक अशांति के शिकार हुए। बढ़ती मंहगाई और राजनीतिक मुद्दों के खिलाफ विरोध 2 जनवरी को शुरू हुआ और हिंसा में बदल गया जब रूसी सैनिकों द्वारा समर्थित सरकारी बलों ने प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की, सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों को गिरफ्तार कर लिए गए। क़ाज़िक सरकार ने प्रदर्शनकारियों को आतंकवादी घोषित किया है और फ़ोर्स को उनके खिलाफ घातक बल प्रयोग करने का आदेश दिया है।

Sudan Protest/Phot: DW Made for Minds

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सूडान में लोग पिछले साल अक्टूबर में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को उखाड़ फेंकने वाली तानाशाही के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। लोकतंत्र समर्थक विरोध प्रदर्शन जारी है और कम से कम 77 लोग मारे गए हैं।

यमन में स्थिति ठीक नहीं है। इस साल जनवरी से यमन में हूसी विद्रोहियों और सऊदी गठबंधन बलों के बीच संघर्ष बढ़ गया है। पिछले हफ्ते दोनों पक्षों ने अपने-अपने लक्ष्य पर हमला किया। हूसीयों ने अबू धाबी के तेल टैंकर पर हमला किया और यमन जाने वाले अबू धाबी के एक मालवाहक जहाज का अपहरण कर लिया, यह आरोप लगाते हुए कि जहाज में हथियार और गोला-बारूद थे, न कि चिकित्सा आपूर्ति के सामान और दवा। जवाबी कार्रवाई में, सऊदी अरब ने कथित तौर पर हूसियों के कब्जे वाले क्षेत्र में एक जेल पर हमला किया, जिसमें कम से कम 70 कैदी मारे गए, हालांकि सऊदी अरब ने आरोपों से इनकार किया है। 2015 से, ईरान समर्थित हूसी विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना और उत्तरी और पश्चिमी यमन को नियंत्रित किया है।

छह साल बाद भी अंतरराष्ट्रीय मुस्लिम समुदाय इस संकट का समाधान नहीं खोज पाया है। संकट ने यमन को आर्थिक और अकादमिक रूप से नुकसान पहुंचाया है। हजारों बच्चे भूख और गरीबी में जी रहे हैं। बड़ी आबादी के पास रहने की बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। लोगों को और खासकर महिलाओं और बच्चों को पीने के पानी की तलाश में रोजाना मीलों पैदल चलना पड़ता है।

इस्लामिक स्टेट ने समस्या का समाधान खोजने के बजाय यमन में एक युद्ध छेड़ दिया है जिसमें अमेरिका सहित अधिक से अधिक देश शामिल हो रहे हैं। यह संकट को बढ़ा देगा और अरब दुनिया को एक और राजनीतिक संकट में डुबो देगा।

U.S. and Syrian-Kurdish forces in the city of Hasaka on Monday.Credit...Ahmed Mardnli/EPA, via Shutterstock

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सीरिया भी 2014 से संकट से गुजर रहा है जब आइएसआइएस ने सीरिया और इराक के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया और अपनी खिलाफत की स्थापना और सीरियाई और अमेरिकी सेना के साथ पांच साल के युद्ध की घोषणा की। आइएसआइएस के पीछे हटने के बाद, उसने इस क्षेत्र पर नियंत्रण खो दिया। संयुक्त राज्य अमेरिका मार्च 2020 में इस क्षेत्र से हट गया। एक आतंकवादी संगठन के रूप में, उन्होंने कई मुस्लिम बहुल देशों में पैर पसारना शुरू कर दिया और आतंकवादी संगठनों की रणनीति अपनाई। उन्होंने श्रीलंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और फिलीपींस में आतंकवादी हमले किए हैं।

बाद में उन्होंने सीरिया में अपने ठिकाने को फिर से मजबूत कर लिया है। 22 जनवरी, 2022 को आइएसआइएस ने सीरिया की एक जेल पर हमला किया, जहाँ हजारों संदिग्ध आइएसआइएस लड़ाके थे। लड़ाके फ्रांस, ट्यूनीशिया और अन्य देशों के हैं। आइएसआइएस  ने उन्हें मुक्त करने की कोशिश की ताकि वे सीरिया और इराक में अपने ठिकानों को फिर से मजबूत कर सकें। उसने पहले इराकी बलों पर हमला किया था और एक पुलिस अधिकारी का सिर कलम किए जाने का वीडियो जारी किया था। तथ्य यह है कि आईएसआईएस परिष्कृत हमलों को अंजाम देने में सफल रहा है, यह दर्शाता है कि आतंकवादी संगठन सीरिया और इराक में फिर से उभर रहा है और पहले से ही तबाह हुए क्षेत्र के लिए एक और खतरा पैदा कर रहा है।

पिछले साल अगस्त में उनके सत्ता संभालने के बाद से अफगानिस्तान में राजनीतिक स्थिति स्थिर नहीं रही है। एक तरफ तालिबान ने अपनी जनविरोधी और महिला विरोधी नीति से देश की जनता में भय और दहशत फैला दी है और दूसरी तरफ उनका प्रतिद्वंद्वी आईएसआईएस तालिबान और आम लोगों दोनों पर आतंकी हमले कर रहा है।

तालिबान ने महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित किया है। सामाजिक और राजनीतिक प्रतिबंधों के कारण, कई शिक्षित पेशेवर अफगानिस्तान छोड़ गए हैं। कई लोग बेहतर जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तलाश में जर्मनी चले गए हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के एक समूह द्वारा जारी नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान अफगानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ लिंग आधारित हिंसा और भेदभाव का आयोजन करता रहा है। वे महिलाओं और लड़कियों को देश के सामाजिक, शैक्षिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं।

देश के राष्ट्रपति द्वारा भ्रष्टाचार के आरोपों में प्रधान मंत्री मुहम्मद हुसैन को निलंबित करने के बाद हाल ही में राजनीतिक अस्थिरता फैल गई। प्रधान मंत्री ने आरोपों का खंडन करते हुए राष्ट्रपति पर संसदीय चुनाव के बाद तख्तापलट के प्रयास का आरोप लगाया। यह संकट अल-कायदा से जुड़े आतंकवादी संगठन अल-शबाब के खिलाफ देश की लड़ाई में बाधा बन रहा है। साफ है कि अल-कायदा देश में एक मजबूत गढ़ है, लेकिन इससे सामूहिक रूप से लड़ने के बजाय, देश के राजनेता मामूली राजनीतिक लाभ के लिए एक-दूसरे से लड़ते रहे हैं।

पाकिस्तान भी लगातार सांप्रदायिकता और आतंकवाद की चपेट में है। कुछ दिन पहले लाहौर के एक व्यस्त बाजार अनारकली बाजार में बम धमाका हुआ था। विस्फोट की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली है। मीडिया भी किसी संगठन का नाम लेने से डरता है। टीटीपी जैसे धार्मिक संगठन और अन्य सांप्रदायिक संगठन भी सांप्रदायिक और धार्मिक मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते रहे हैं। इस अस्थिरता के कारण देश आर्थिक और वैज्ञानिक मोर्चों पर कोई प्रगति नहीं कर पाया है। इसकी सारी ऊर्जा और संसाधन सांप्रदायिक और आतंकवादी संगठनों से निपटने के लिए समर्पित है। एक ऐसे देश में भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या है जो गर्व से खुद को इस्लामिक देश कहता है।

इस्लामी देशों में इन सभी घटनाओं से संकेत मिलता है कि मुसलमान शांति से ज़िन्दगी गुज़ारने और मुसलमानों की साझा भलाई के लिए सामूहिक रूप से काम करने और वैज्ञानिक और आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ने के काबिल नहीं हो सके हैं। भ्रष्टाचार पर इस्लाम के प्रतिबंध के बावजूद, इस्लामी देशों में भ्रष्टाचार चरम पर है। इससे भ्रष्टाचार, मंहगाई और सामाजिक अन्याय को बढ़ावा मिलता है। इस्लामी देशों में अशांति का एक अन्य कारण सरकार की प्रकृति पर उनकी अस्पष्टता है। मुसलमान शासन के स्तर से परे सरकार की प्रकृति के प्रति आसक्त हैं। यह कई इस्लामी समाजों में वैचारिक और राजनीतिक रूप से अशांति का कारण बनता है।

मध्य युग से लेकर आधुनिक काल तक के कई इस्लामी उलमा का मानना है कि अगर चार सही हिदायतयाफ्ता खलीफाओं के खिलाफत की शैली में खिलाफत स्थापित की जाती है, तो मुसलमानों की सभी समस्याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा। और इसी विश्वास के कारण उलमाओं ने खुलेआम और परोक्ष रूप से आतंकवादी संगठनों का समर्थन किया है क्योंकि वे दावा करते हैं कि वे खिलाफत की स्थापना के लिए लड़ रहे हैं। मुसलमानों की यह वैचारिक और राजनीतिक उलझनें इसके नेताओं में भ्रष्टाचार, इस्लामी देशों में हिंसा और संकट का कारण है।

English Article: Muslims Have Not Learnt To Live Peacefully As Most Islamic Countries Are Going Through Social And Political Crisis

Urdu Article: Muslims Have Not Learnt To Live Peacefully As Most Islamic Countries Are Going Through Social And Political Crisis مسلمانوں نے امن سے رہنا نہیں سیکھا کیونکہ بیشتر اسلامی ممالک سماجی اور سیاسی بحران سے گزر رہے ہیں

Malayalam Article: Muslims Have Not Learnt To Live Peacefully As Most Islamic Countries Are Going Through Crisis മിക്ക ഇസ്ലാമിക രാജ്യങ്ങളും സാമൂഹികവും രാഷ്ട്രീയവുമായ പ്രതിസന്ധികളിലൂടെ കടന്നുപോകുന്നതിനാൽ മുസ്ലീങ്ങൾ സമാധാനപരമായി ജീവിക്കാൻ പഠിച്ചിട്ടില്ല

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/muslims-islamic-countries-social-political-crisis/d/126587

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