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Mosques Built On Sectarian Lines Are Not Approved By The Quran साम्प्रदायिक तर्ज़ पर बनाई गई मस्जिदें कुरआन को मंज़ूर नहीं

मुनाफिकों द्वारा बनाई गई मस्जिद का जिक्र कुरआन में है।

प्रमुख बिंदु:

1. कुरआन सांप्रदायिक तर्ज पर बनी मस्जिदों को मान्यता नहीं देता

2. सांप्रदायिक मुद्दों पर चर्चा के लिए मस्जिदों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए

3. जुमे की नमाज से पहले उपदेशकों (मुबल्लेगीन) को केवल इस्लामी मुद्दों पर ही चर्चा करनी चाहिए।

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न्यू एज इस्लाम स्टाफ राइटर

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

4 दिसंबर, 2021

Mosque of Virgin Mary in Tartus plays on ‘sectarian nerve’/ Syria Direct

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आज मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक विभाजन इस हद तक बढ़ गया है कि अब सांप्रदायिक आधार पर मस्जिदें बन रही हैं। मुसलमानों के प्रत्येक फिरके की अपनी एक मस्जिद है जिसमें दूसरे फिरके के लोगों को जाने की अनुमति नहीं है, क्योंकि अन्य फिरकों के लोगों को काफिर और मुनाफिक माना जाता है। कई मस्जिदें ऐसी भी हैं जिनके बाहर नोटिस बोर्ड लगा दिए गए हैं और अन्य फिरकों के लोगों को चेतावनी दी गई है कि वे उनमें प्रवेश न करें, भले ही सभी फिरकों के अनुयायियों की नमाज़ की विधि समान हो। उनकी नमाजों में कोई अंतर नहीं है। मतभेद केवल कुछ उप-मुद्दों (फुरुई) मसले में हैं जो इस्लामी अकीदे का आधार नहीं हैं।

फिर भी मस्जिदों को सांप्रदायिकता का केंद्र बना दिया गया है, जिसकी कुरआन निंदा करता है।

कुरआन की कुछ आयतों में सांप्रदायिक मतभेदों की कड़ी निंदा की गई है, इसलिए सांप्रदायिक मान्यताओं पर बनी मस्जिदें कुरआन को स्वीकार्य नहीं हैं। निम्नलिखित में सांप्रदायिक तर्ज पर बनी मस्जिदों के बारे में एक कुरआन की आयत है।

और जिन लोगों ने कुफ़्र के कारण मुसलमानों को नुकसान पहुँचाने और फूट डालने के लिए और उस चीज़ की प्रतीक्षा करने के लिए जो पहले से ही अल्लाह और उसके रसूल के विरोध में है, मस्जिद का निर्माण किया, और वे निश्चित रूप से अल्लाह की कसम खाएंगे कि हम अच्छे की कामना करते हैं और अल्लाह गवाह है कि वे झूठे हैं।

और (वह लोग भी मुनाफिक़ हैं) जिन्होने (मुसलमानों के) नुकसान पहुंचाने और कुफ़्र करने वाले और मोमिनीन के दरमियान तफरक़ा (फूट) डालते और उस शख़्स की घात में बैठने के वास्ते मस्जिद बनाकर खड़ी की है जो ख़ुदा और उसके रसूल से पहले लड़ चुका है (और लुत्फ़ तो ये है कि) ज़रूर क़समें खाएगें कि हमने भलाई के सिवा कुछ और इरादा ही नहीं किया और ख़ुदा ख़ुद गवाही देता है (107) ये लोग यक़ीनन झूठे है (ऐ रसूल) तुम इस (मस्जिद) में कभी खड़े भी न होना वह मस्जिद जिसकी बुनियाद अव्वल रोज़ से परहेज़गारी पर रखी गई है वह ज़रूर उसकी ज्यादा हक़दार है कि तुम उसमें खडे होकर (नमाज़ पढ़ो क्योंकि) उसमें वह लोग हैं जो पाक व पाकीज़ा रहने को पसन्द करते हैं और ख़ुदा भी पाक व पाकीज़ा रहने वालों को दोस्त रखता है (108) क्या जिस शख़्स ने ख़ुदा के ख़ौफ और ख़ुशनूदी पर अपनी इमारत की बुनियाद डाली हो वह ज्यादा अच्छा है या वह शख़्स जिसने अपनी इमारत की बुनियाद इस बोदे किनारे के लब पर रखी हो जिसमें दरार पड़ चुकी हो और अगर वह चाहता हो फिर उसे ले दे के जहन्नुम की आग में फट पडे और ख़ुदा ज़ालिम लोगों को मंज़िलें मक़सूद तक नहीं पहुंचाया करता (109) (ये इमारत की) बुनियाद जो उन लोगों ने क़ायम की उसके सबब से उनके दिलो में हमेशा धरपकड़ रहेगी यहाँ तक कि उनके दिलों के परख़चे उड़ जाएँ और ख़ुदा तो बड़ा वाक़िफकार हकीम हैं (110)”(अल-तौबा: 107-110)

पवित्र पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़ाहिरी जीवन में, मुसलमानों के बीच विभाजन और मतभेद पैदा करने के लिए, मुनाफिकों ने इस्लाम की पहली मस्जिद मस्जिद कुबा के पास एक मस्जिद का निर्माण किया था। इस मस्जिद को मस्जिद जरार कहा जाता है। मुनाफिकों ने पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मस्जिद में नमाज अदा करने के लिए आमंत्रित किया ताकि मस्जिद को उसकी मंजूरी मिल जाए। लेकिन जिब्राइल अलैहिस्सलाम ने मुनाफिकों की योजनाओं के बारे में पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सूचित किया, और पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मस्जिद में नमाज़ अदा करने से इनकार कर दिया। बाद में मस्जिद को गिरा दिया गया।

इसलिए जब भी मुसलमानों को बांटने के लिए ऐसी मस्जिदें बनेंगी तो यह घटना आने वाली पीढ़ियों के लिए सबक होगी। ऐसी मस्जिदें हमेशा मुसलमानों के बीच मतभेद और विभाजन का केंद्र रहेंगी।

मस्जिदें खुदा की इबादत के लिए होती हैं। मस्जिदों में केवल खुदा के नाम का उल्लेख होता है और कोई बात नहीं होती है। मस्जिदों में सांप्रदायिक या वैचारिक मतभेदों पर चर्चा की अनुमति नहीं है। इसलिए, अन्य फिरकों को मस्जिद में प्रवेश करने से रोकना कुरआन की शिक्षाओं के खिलाफ है। ऐसी मस्जिदों के उपदेशक (मुबल्लेगीन) और इमाम सांप्रदायिक मुद्दों पर चर्चा करते हुए और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक विभाजन को भड़काते हुए देखे जाते हैं। यह भी गैर इस्लामी है। मुसलमानों को उन मुनाफिकों की मस्जिद से सीखना चाहिए जो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मुबारक जीवन में बनाई गई थी, जिसकी कुरआन ने निंदा की है। मस्जिदों को सांप्रदायिक मतभेदों का केंद्र न बनाया जाए।

English Article:  Mosques Built On Sectarian Lines Are Not Approved By The Quran

Urdu Article: Mosques Built On Sectarian Lines Are Not Approved By The Quran فرقہ وارانہ خطوط پر بنائی گئی مساجد قرآن کو نامنظور

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/mosque-sectarian-quran/d/125937

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