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Hindi Section ( 29 March 2022, NewAgeIslam.Com)

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Islamophobia Should Be Fought Along With Muslim Intolerance न केवल इस्लामोफोबिया बल्कि मुस्लिम चरमपंथ और असहिष्णुता से भी लड़ा जाना चाहिए

धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की हालिया घटनाएं मुसलमानों में बढ़ती असहिष्णुता को दर्शाती हैं।

प्रमुख बिंदु:

1. संयुक्त राष्ट्र इस्लामोफोबिया को मान्यता देता है, लेकिन मुसलमानों को भी आपस में धार्मिक असहिष्णुता को स्वीकारना चाहिए।

2. बांग्लादेश में एक मंदिर में तोड़फोड़ की गई।

3. पाकिस्तान में शिया मस्जिद पर हमला किया गया।

4. पाकिस्तान में एक ईसाई चर्च के फादर की हत्या कर दी गई।

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न्यू एज इस्लाम स्टाफ राइटर

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

22 मार्च 2022

File Photo

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15 मार्च, 2022 को, संयुक्त राष्ट्र ने 15 मार्च को इस्लामोफोबिया के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में घोषित किया। हालांकि कुछ पश्चिमी और एशियाई देशों ने कुछ आपत्तियां व्यक्त की हैं, वे इस बात से सहमत हैं कि इस्लामोफोबिया एक वास्तविकता है और इसका मुकाबला किया जाना चाहिए। मुस्लिम मीडिया इस खबर पर झुंझलाहट का शिकार हो गया क्योंकि संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस दिन को अपनाने से उनकी बेगुनाही पर मुहर लग गई थी। उन्हें यह जानकर राहत मिली कि अब उन्हें धर्म के आधार पर उत्पीड़न या भेदभाव का शिकार नहीं होना पड़ेगा और उन्हें अब रूढ़िबद्ध नहीं माना जाएगा।

लेकिन विश्व इस्लामोफोबिया दिवस पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव से दस दिन पहले, पेशावर में जुमे की नमाज के दौरान एक शिया मस्जिद पर हुए आतंकवादी हमले में 62 लोग मारे गए और लगभग 100 घायल हो गए। एक महीने पहले, फरवरी में, पाकिस्तान में इस्लाम पसंदों द्वारा एक ईसाई चर्च के फादर की हत्या कर दी गई थी।

इस्लामोफोबिया पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के तीन दिन बाद 18 मार्च को बांग्लादेश के एक इस्कॉन मंदिर पर हाजी सफीउल्लाह और एक अशरफ सूफी के नेतृत्व में 200 से अधिक लोगों ने हमला किया था।

मुस्लिम बहुल पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू, शिया और ईसाई अल्पसंख्यकों पर हमले की तीनों घटनाएं मुसलमानों में बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता को दर्शाती हैं। विडंबना यह है कि बांग्लादेश में दंगाई भीड़ का नेता एक 'हाजी' और 'सूफी' था। वे इस बात से अवगत नहीं हैं कि इस्कॉन का धार्मिक आंदोलन धार्मिक सहिष्णुता के धार्मिक दर्शन पर आधारित है जिसकी तबलीग श्री राम कृष्ण प्रमहंस ने की थी जो इस्लाम और ईसाई धर्म का सम्मान करते थे और तीन दिनों तक इस्लाम पर अमल भी किया था और वह भी गोमांस खाना चाहते थे लेकिन उनके एक छात्र ने उन्हें ऐसा करने से रोकने में सफलता प्राप्त की।

(File Photo)

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पेशावर में एक शिया मस्जिद पर आतंकवादी हमला कोई छोटी घटना नहीं थी। इसे एक मस्जिद में अंजाम दिया गया और 60 से अधिक निर्दोष मुसलमान मारे गए। फिर भी पाकिस्तान की सरकार ने अपनी बेरुखी दिखाते हुए इसे एक छोटी सी घटना के रूप में लिया। ऐसी घटनाओं पर जीरो टॉलरेंस की बात हुई और फिर मुसलमान हमेशा की तरह भूल गए। अल-अजहर या किसी अन्य प्रमुख धार्मिक संगठन या मुफ्ती ने घटना की निंदा करते हुए एक भी शब्द नहीं कहा, न ही मुस्लिम उलमा, मुस्लिम संगठनों और मुस्लिम सरकारों द्वारा इस तरह के जघन्य हमलों को रोकने के लिए कोई सामूहिक कार्रवाई की गई।

ऐसा नहीं है कि निर्दोष अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक के बाद एक किए गए ये तीन गंभीर पाप दुर्लभ और असामान्य थे। बांग्लादेश और पाकिस्तान में नियमित रूप से धार्मिक और सांप्रदायिक अल्पसंख्यकों पर हमले की खबरें आती हैं और पिछले दस वर्षों में ऐसी हजारों घटनाएं सामने आई हैं। 2013 में, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे हुए थे। 1950 के दशक में पाकिस्तान में अहमदिया संप्रदाय के खिलाफ बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे हुए। पाकिस्तान के शिया-बहुल इलाकों में जुलूसों, स्कूली वाहनों और शिया मस्जिदों और आवासीय और व्यावसायिक परिसरों पर सैकड़ों हमले टीटीपी और अन्य आतंकवादी इस्लामी संगठनों द्वारा किए गए हैं जो आज खुलेआम घूमते हैं। इन सबके बावजूद, पाकिस्तान या भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम बुद्धिजीवियों और धर्मगुरुओं के बीच इस संकट से लड़ने के लिए सामूहिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर कोई सहमति स्थापित नहीं हो सकी।

भारत-पाक उपमहाद्वीप का धार्मिक नेतृत्व कभी-कभी औपचारिक बयान देता है जैसे 'इस्लाम शांति का धर्म है', या 'इस्लाम हिंसा का प्रचार नहीं करता' या 'इस्लाम आतंकवाद का समर्थन नहीं करता' लेकिन कभी भी वे उन लोगों का नाम नहीं लेते जिन्हें वे आतंकवादी मानते हैं। इसके विपरीत, इस्लामी संगठनों के मौलवी खुले तौर पर या गुप्त रूप से उग्रवादी संगठनों की प्रशंसा या समर्थन करते दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए, जब ये उलमा तालिबान का समर्थन करते हैं, तो उनके लाखों छात्र और प्रशंसक और अनुयायी स्वाभाविक रूप से अपने दिलों में उनके लिए एक नरम जगह बना लेते हैं। इसी तरह, पाकिस्तान में, जब सरकार के मंत्री और धार्मिक नेता और मुफ्ती टीटीपी या सिपाह-ए-सहाबा द्वारा आयोजित बैठकों या रैलियों में भाग लेते हैं, जो कि अल्पसंख्यकों विशेष रूप से शियाओं के लिए शत्रुतापूर्ण आतंकवादी संगठन हैं, तो लाखों मुसलमान उनके सांप्रदायिक विचार से प्रभावित होते हैं। और परिणामस्वरूप, इन अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा होती है।

यह एक तथ्य है कि कुरआन और सुन्नत की इस्लामी व्याख्याओं के आधार पर गैर-मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और रक्तपात की हर घटना इस्लामोफोबिया को बढ़ावा देती है। जब हाजी और सूफी के रूप में जाने जाने वाले लोग गैर-मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में भाग लेते हैं, तो यह दाढ़ी, टोपी या यहां तक कि सूफी पोशाक के खिलाफ रूढ़िवादिता पैदा करता है।

इसलिए, यदि मुसलमान इस्लामोफोबिया से लड़ना चाहते हैं, तो उन्हें पहले आपस में धार्मिक असहिष्णुता का मुकाबला करने के लिए एक सामूहिक दृष्टिकोण विकसित करना होगा। इस तरह की पहल के लिए संयुक्त राष्ट्र एक बहुत प्रभावी मंच है। पाकिस्तान को धार्मिक असहिष्णुता के खिलाफ लड़ाई में नेतृत्व करना चाहिए, जैसा कि उसने इस्लामोफोबिया के खिलाफ लड़ाई में किया था। इसे मुस्लिम देशों में धार्मिक असहिष्णुता से लड़ने के लिए एक प्रस्ताव पेश करना चाहिए और मुस्लिम देशों को अतिवादी धार्मिक उलमा के माध्यमिक धार्मिक साहित्य से नफरत और हिंसा की विचारधारा को मिटाने के लिए सामूहिक उपायों पर विचार करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो इस्लामोफोबिया के खिलाफ लड़ाई कागज पर एक प्रस्ताव तक सीमित रह जाएगी।

English Article: Islamophobia Should Be Fought Along With Muslim Intolerance

Urdu Article: Islamophobia Should Be Fought Along With Muslim Intolerance نہ صرف اسلاموفوبیا بلکہ مسلم انتہاپسندی اور عدم برداشت کا مقابلہ بھی لازمی

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/islamophobia-muslim-intolerance/d/126682

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