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Hindi Section ( 3 March 2022, NewAgeIslam.Com)

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An Anti-Forced Conversion Law Is Urgently Required in Pakistan to Protect the Minority Rights Given under Islam इस्लाम में दिए गए अल्पसंख्यकों के अधिकार के सुरक्षा के लिए पाकिस्तान में जबरदस्ती मज़हब परिवर्तन कराने के खिलाफ कानून की अत्यधिक आवश्यकता है

पाकिस्तान में कथित तौर पर जबरी धर्म परिवर्तन के मामलों में इजाफा हो रहा है, जबकि यह इस्लाम में हराम है

प्रमुख बिंदु:

1. पाकिस्तान में 12 से 25 साल के उम्र की लगभग 1000 लड़कियों को जबरदस्ती इस्लाम कुबूल करवाया जाता है जिनसे उनके अगवा करने वाले शादी कर लेते हैं

2. इस्लाम के मुताबिक़, अगर किसी गैर मुस्लिम को इस्लामी अकीदे के अलफ़ाज़ कहने पर मजबूर किया जाता है लेकिन वह इस्लाम की बुनियादी बातों पर यकीन नहीं रखता, तो वह मुसलमान नहीं माना जाएगा। तो फिर यह जिहालत की तारीकी क्यों!

3. हज़रत उमर फारुक रज़ीअल्लाहु अन्हु के मुताबिक़, किसी इस्लामी देश में रहने वाले गैर मुस्लिम अल्लाह और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हिफाजत में रहते हैं

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न्यू एज इस्लाम स्टाफ राइटर

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

28 फरवरी 2022

पाकिस्तान में लोगों ने दो रोज़ पहले पंजाब प्रांत के जिला ओकाड़ा में प्रदर्शन किया, जिसमें किशोरियों की जबरी धर्म परिवर्तन के खात्मे और जबरी धर्म परिवर्तन के खिलाफ बिल की मंजूरी का मुतालबा किया गया। प्रदर्शनकारियों की मांग बिलकुल सहीह है। पाकिस्तान में जबरदस्ती धर्म परिवर्तन एक बड़ा मसला बन चुका है। जबरी धर्म परिवर्तन और शादियों को ख़त्म करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की प्रयासों के बावजूद, पाकिस्तान सरकार ने अल्पसंख्यक लड़कियों और महिलाओं के सुरक्षा के लिए धार्मिक पालिसी और मुकालमे के फ्रेमवर्क को वुसअत देने में कोई ख़ास दिलचस्पी ज़ाहिर नहीं की है।

पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों के लिए ऑल पार्टी पार्लिमानी ग्रुप (ऐ पी पी जी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, हर साल, 12 से 25 साल की उम्र के बीच लगभग 1000 लड़कियों को जबरदस्ती इस्लाम कुबूल करवाया जाता है और पाकिस्तान में उनकी अगवाकारों से शादी कर दी जाती है, जिसे मानवाधिकार की तबाहीकरार दिया गया है। रिपोर्ट में जबरी धर्म परिवर्तन और शादियों के तेज़ी से बढ़ते हुए मामूल पर भी रौशनी डाली गई, जिसमें इस घिनावने जुर्म से निमटने के लिए हुकूमत की तरफ से बहुत जरूरी इकदामात में नाकामी की तरफ इशारा किया गया है।

मीडिया जराए के मुताबिक़, पाकिस्तान के अकलियती कौंसलर ने जनवरी में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षा के अभाव के बारे में चिंता का इज़हार किया था क्योंकि देश में जबरी धर्म परिवर्तन की घटनाओं में तेज़ी से इजाफा देखने में आया क्योंकि 2020 में यह संख्या 15 से बढ़ कर 2021 में 60 तक पहुँच गई।

जिन लोगों का ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन किया गया उनमें से 70 प्रतिशत से अधिक नाबालिग बच्चियां थीं। इसकी वजह यह है कि इसे रोकने के लिए कोई कानून ही नहीं है। प्रोहिबेशन ऑफ़ फोर्सड कनवर्ज़न एक्ट 2021 तैयार किया गया और विधानसभा में पेश भी किया गया, तथापि, इसे यह कह कर अस्वीकार कर दिया गया कि यह अल्पसंख्यकों के लिए मज़ीद मसले पैदा करेगा।

जबरी धर्म परिवर्तन और इसके बाद कम उम्र की शादियाँ दोनों ही मानवाधिकार के संगीन अपराध हैं जिनका इज़ाला ऐसे कानूनों के जरिये किया जाना जरूरी है जो दोनों को निषेध करार दे। और इसके अलावा, इस बात का निर्धारण करने के लिए कौंसिलें कायम की जाएं कि क्या कोई शख्स अपनी मर्ज़ी से अलग मज़हब अपना रहा है या उसे ऐसा करने पर मजबूर किया जा रहा है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के हवाले से माहौल पहले से खराब है, और जबरी परिवर्तन जैसे मसलों से सूरते हाल मज़ीद खराब हो रही है।

इस तरह की रिपोर्टें इंटरनेट पर वाफिर मिकदार में उपलब्ध हैं, और इन रिपोर्टों का सच होना हालात को मज़ीद चिंता जनक बना देता है। इस्लाम में जबरी धर्म परिवर्तन का तसव्वुर नाकाबिले कुबूल है। क्या पाकिस्तान में यह जिहालत का नतीजा है? अगर यह जिहालत है तो उलमा ए इस्लाम इस गैर इंसानी और इस्लाम दुश्मन अमल की खुले आम निंदा क्यों नहीं कर रहे? क्या ज़बरदस्ती इस्लाम कुबूल करने के बाद किसी के लिए मुसलमान होना संभव है? यह एक बुनियादी तसव्वुर है कि मुसलमान होने का मतलब एक खुदा का दिल से यकीन और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अल्लाह का हकीकी रसूल तस्लीम करना है।

कोई शख्स केवल कलमा तौहीद पढ़ने और नमाज़ पढ़ने से मुसलमान नहीं होता जब तक कि वह दिल से तौहीद व रिसालत पर ईमान न लाए

यह बात जग ज़ाहिर है कि तौहीद और इस्लामी अकीदे की बातें किसी के मुंह से ज़बरदस्ती निकलवाई जा सकती हैं, लेकिन किसी के दिल में ज़बरदस्ती डाली नहीं जा सकतीं। अगर किसी मुसलमान को कुफ्र के कलिमात कहने पर मजबूर किया जाए जबकि उसका दिल इस्लाम से संतुष्ट है तो वह कुरआन पाक के उसूल के मुताबिक़ काफिर नहीं होता (16:106)। इसी तरह अगर गैर मुस्लिम इस्लामी अकीदे के अलफ़ाज़ कहने पर मजबूर हो लेकिन वह इस्लाम के बुनियादी उसूलों पर यकीन नहीं रखता तो वह मुसलमान नहीं होगा।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने रियासते मदीना के मॉडल पर काम करने की अपनी ख्वाहिश का कसरत से ज़िक्र किया है। यह केवल एक तथाकथित रियासते मदीना का वादा था क्योंकि मदीना में जबरी धर्म परिवर्तन की इजाज़त नहीं थी और न ही ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन करने पर मुसलमान कहलाने का तसव्वुर था। अगर वह वाकई रियासते मदीना में दिलचस्पी रखते हैं, तो उन्हें अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एंटी कनवर्ज़न बिल पास करना चाहिए और साथ ही नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की निम्नलिखित शिक्षाओं को भी ज़ेहन में रखना चाहिए:

अगर किसी मुस्लिम देश में रहने वाले गैर मुस्लिमों पर कोई दुश्मन हमला आवर हो तो मुस्लिम हुकूमत उनकी तरफ से लड़ने की पाबंद है। इस्लामी हुकूमत के तहत रहने वाले गैर मुस्लिमों को मज़हब परिवर्तन करने पर मजबूर किया जाएगा। गैर मुस्लिम नागरिकों की जान, माल, कारवां, व्यवसाय और जमीन की शुरक्षा इस्लामी हुकूमत की शरई जिम्मेदारी है। उनके पास जो कुछ पहले से है वह सब उन्हीं के पास रहेगा। उनके पुजारियों, महंतों, पंडितों और पादरियों को उनके पदों से नहीं हटाया जाएगा।

(हवाला के लिए देखें (1) किताब फुतूहुल बुल्दान जिसे 9 वीं सदी के अब्बासी दौर के बग़दाद में फ़ारसी इतिहासकार अहमद इब्ने यहया अल बलाजरी ने लिखा है या (2) किताबुल खिराज (टेक्सेशन की किताब), फिकह पर एक क्लासिकी किताब जिसे इमाम अबू यूसुफ याकूब इब्राहीम अल अंसारी अल कूफी ने लिखा है।

यह इस्लामी शिक्षा हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दी थी। पाकिस्तान को अल्पसंख्यकों के सुरक्षा के लिए जबरी धर्म परिवर्तन पर पाबंदी लगाने वाले बिल मंज़ूर करने के लिए तेज़ी से काम करना चाहिए। हुकूमत को इस्लाम के दुसरे खलीफा हज़रत उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु से भी सबक हासिल करना चाहिए, जिन्होंने फरमाया था कि हमारे देश में रहने वाले गैर मुस्लिम अल्लाह और रसूल की हिफाज़त में हैं। (किताब फुतूहुल बुल्दान)

इस्लामी देशों के अंदर गैर मुस्लिम अल्लाह और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हिफाज़त में रहते हैं। इसका मतलब यह है कि अल्लाह और उसके प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने गैर मुस्लिमों को दिए गए हुकूक जैसे ज़िन्दगी गुज़ारने का हक़ और मज़हबी आज़ादी का हक़ आदि के सुरक्षा का हुक्म दिया है। इसलिए रियासती हुक्काम को इस्लाम के मुताबिक़ उनके हुकूक के तहफ्फुज़ में हकीकी दिलचस्पी लेना चाहिए।

English Article: An Anti-Forced Conversion Law Is Urgently Required in Pakistan to Protect the Minority Rights Given under Islam

Urdu Article: An Anti-Forced Conversion Law Is Urgently Required in Pakistan to Protect the Minority Rights Given under Islam اسلام میں دیے گئے اقلیتوں کے حقوق کے تحفظ کے لیے پاکستان میں زبردستی مذہب تبدیل کرانے کے خلاف قانون کی اشد ضرورت ہے

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/forced-conversion-law-pakistan-minority-rights/d/126502

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