नास्तिक दुर्रानी, न्यु एज इस्लाम
20 मई, 2013
”अलजमल की घटना में हज़रत आयशा का महरम कौन था? क्या सऊदी अरब की तथाकथित इस्लामी पुलिस के पास इसका जवाब है?
सऊदी अरब के अखबार “अल-यौम“ में एक खबर छपी कि हैयतल अमर बिलमारूफ़ (सऊदी अरब की मौलवी पुलिस) औरतों को महरम की उपस्थिति की शर्त पर साइकिल और मोटरसाइकिल चलाने की इजाज़त देगी, लेकिन कुछ सऊदी लोगों ने इसे “अप्रैल फ़ूल“ समझा। खबर पर टिप्पणी करते हुए एक सऊदी ने लिखा: “क्या आप लोग मज़ाक़ कर रहे हैं!“ हास्य भावना रखने वालों में ये खबर बहुत लोकप्रिय हुई, लोगों ने इस पर हास्यास्पद अवधारणाएं बनानी शुरू कर दी कि साइकिल पर महरम कहाँ और कैसे बैठे होगा। हालांकि बाद में हैयतल अमर बिलमारूफ़ ने खबर का खंडन कर दिया। इससे इस बात की इंकार बहरहाल नहीं होता कि सऊदी समाज में औरत की हर हरकत के लिए महरम की उपस्थिति आवश्यक है चाहे उसे साइकिल पर सवार होना हो या जहाज पर, या फिर अपने बच्चों के साथ रहने के लिए कोई घर ही किराए पर लेना हो, उसे अवश्य ही महरम आवश्यक होगा, जो उसकी जगह मकान किराए पर लेकर उसे दे दे या फिर कोई बेटा जिसकी उम्र अठारह साल से ज़्यादा हो, चाहे किराया उसे ही क्यों न देना हो, सऊदी समाज में महरम का बेहूदा कानून औरत के लिए तो समस्या है ही, अब मर्दों के लिए भी समस्या बनता जा रहा है।
वली (अभिभावक) अमर होने के नाते एक सऊदी को एक ही समय में तीन विभिन्न स्थानों पर तीन अलग औरतों के साथ मौजूद होना आवश्यक था। उसे अपनी बीवी के ऑपरेशन के कागज़ात पर दस्तख़त के लिए अस्पताल जाना था, इसी वक्त उसे अपनी तलाकशुदा बेटी के साथ अदालत में उपस्थित होना था क्योंकि काज़ी महरम के बग़ैर उसके केस को स्वीकार करने से इन्कार कर रहा था, जबकि उसी वक्त उसे अपनी दूसरी बेटी की उच्च शिक्षा के लिए उसके साथ अमेरिका जाना था!
उसे खुद ये फैसला लेने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था कि किसके साथ उसकी मौजूदगी ज्यादा जरूरी थी, मरीज़ के साथ, छात्रा के साथ या तलाकशुदा के साथ!? बेटी हो या बीवी, वो “वलियतः“ के सभी मामलों का कर्ता धर्ता था, चाहे तो उसका मसला हल करे और न चाहे तो लटका दे। इस सारी पुरानी व्यवस्था का संरक्षण सरकार करती है जिसकी जड़ें धर्म में है जो औरत को मर्द का ग़ुलाम बनाती है और नागरिक होने के बावजूद उसे न्यूनतम सेवाओं से वंचित करती है चाहे वो साइकिल पर सवारी जैसा फिज़ूल मामला ही क्यों न हो। हालांकि निजी क्षेत्र में इस कानून पर इतना पालन नहीं किया लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि ये मौजूद नहीं। अदालतें औरतों का कोई मामला तब तक स्वीकार नहीं करतीं जब तक उनका कोई महरम उनके साथ न हो, चाहे वो शिकायत महरम की ही दर्ज कराने आई हो। उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए भी औरतें महरम के बिना विदेश नहीं जा सकतीं। सरकार समझती है कि घर की औरतों के मामलों में वली (अभिभावक) की सहमति उसके मौलिक अधिकारों में शामिल है। जहां तक बात औरत के अधिकार की है तो उसकी आप बात न करें, क्योंकि शरीयत में इसके लिए कोई जगह नहीं। आखिर औरत की गवाही आधी है और ऊपर से वो नाक़िसुल अक़्ल है। पागल और अक़्ल वाले इंसान में अक़्ल का ही तो फर्क़ होता है, और शरीयत औरत को नाक़िसुल अक़्ल (मंद बुद्धि) करार देकर उसे पागलों की पंक्ति में ला खड़ा करती है।
अच्छी परिस्थितियों में वली (अभिभावक) औरत के मामलों की अच्छी तरह देखभाल करता है, उसके लिए आसानियां पैदा करता है और उसके साथ चलता है। हालांकि उसमें भी उसके लिए भी काफी मशक्कत और परेशानी होती है। लेकिन ज्यादातर स्थितियों में वली (अभिभावक) ऐसा नहीं करता, बल्कि इस कानून का गलत फायदा उठाता है और औरत को ब्लैकमेल करता है। कितनी ही पत्नियां अपना सारा वेतन सिर्फ इसलिए पति के हाथ में रख देती हैं ताकि वो उन्हें दफ्तर छोड़ने जाया करे। कितने ही बाप अपनी तलाकशुदा बीवी से बदला लेने के लिए अपनी बेटियों की शिक्षा रुकवा देते हैं। कितनी ही बहनें छोटी छोटी बातों के लिए अपने भाइयों को रिश्वत देती नज़र आती हैं। इस बेहूदा कानून का बदतरीन नमूना मुझे एक सऊदी प्रोफेसर ने सुनाया कि एयरपोर्ट के इमिग्रेशन ने उसे अपनी 80 साल की माँ के साथ सिर्फ इसलिए सफ़र नहीं करने दिया क्योंकि शरअन उसका बड़ा भाई उसकी माँ का वली (अभिभावक) था और सफ़र के लिए उसकी सहमति आवश्यक थी न कि प्रोफेसर साहब की!
डॉ. सामिया अल-अमूदी ने टि्वटर पर अपनी एक ट्वीट में लिखा किः “डॉक्टर हूँ और पचास से अधिक की हो गई हूँ, तुम जैसे हज़ारों मेरे हाथों पढ़कर निकले हैं, और एक कांफ्रेंस में भाग लेने के लिए वो मुझसे मेरे वली की सहमति मांग रहे हैं। मेरा वली (अभिभावक) मेरा बेटा है जो मेरे खर्च पर पलता है!“
ये सब बातें पढ़ने के बाद मन में कई सवाल उठते हैं जैसे “अलजमल की घटना में हज़रत आयशा का महरम कौन था? क्या सावदया की तथाकथित इस्लामी पुलिस के पास इसका जवाब है?
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