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Hindi Section ( 7 Jun 2013, NewAgeIslam.Com)

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Great Islamic Civilisation Through The Prism Of Claim And Reality इस्लामी सभ्यता हक़ीकत और दावे के तराज़ू में

 

नास्तिक दुर्रानी, न्यु एज इस्लाम

6 जून, 2013

महान इस्लामी सभ्यता की वापसी की बातों के सिवा शायद ही कोई चीज़ इतना जनता की भावनाओं को गुदगुदा सकती हो और उनकी अक़्ल पर जादू का सा असर कर सकती हो जिसमें मुसलमान इज़्ज़त व दौलत और तरक्की की ऊंचाईयों पर थे।

राजनीतिक इस्लाम के शेख और उनके चमचे सरल स्वाभाव वाले मुसलमानों को मुरीदों के टोले और आतंकवादियों की एक फौज में बदलने के लिए ये मंत्र इस्तेमाल करते हैं। वो उन्हें ये पट्टी पढ़ाते हैं कि उस महान इस्लामी सभ्यता की स्थापना की वजह ये थी कि पुराने मुसलमान अपने धर्म की शिक्षाओं का पालन करते थे और शरीयत के आदेशों को लागू करते थे। इस तरह ये लोग इन शेखों के जाल में आसानी से फंस जाते हैं और उनके हास्यास्पद फतवों पर अमल करते हैं इस उम्मीद के साथ कि शायद ये संस्कृति फिर कभी वापस आ जाए।

हालांकि इस्लामी सभ्यताकी शब्दावली स्वयं बहुत क्रूर है क्योंकि संस्कृतियां धर्म नहीं बनातीं, दुनिया की कोई भी सभ्यता हमारे लिए अपना धर्म नहीं छोड़ गई, क्या आपने कभी ईसाई सभ्यताके बारे में सुना है? कुवैत के प्रगतिशील समीक्षक व साहित्यकार डॉ. अहमद अलबग़्दादी मरहूम कहते थे कि मुसलमान दुनिया की एकमात्र क़ौम है जो सभ्यता को धर्म से जोड़ती है?

इसमें शक नहीं है कि अरब क़ौम ने तरक्की का एक दौर देखा है जिसे आज शेख खींचतान कर इस्लामी सभ्यताबना देते हैं। हिंदुस्तान में चीन की सीमा से लेकर स्पेन तक एक बड़ा क्षेत्र अरब खिलाफत के अधीन था, मगर इस संस्कृति की स्थापना के कारणों का इन बातों से बिल्कुल कोई सम्बंध नहीं है जो राजनीतिक इस्लाम के ये शेख दावा करते फिरते हैं, बल्कि वो जो दावा करते हैं वो उसकी गिरावट के कारणों की मुख्य वजह थी।

संस्कृतियां इंसानों के कारनामे हैं और ये तब तक स्थापित नहीं होतीं जब तक कि उनके गठन के लिए भौतिक और विषयपरक कारण उपलब्ध नहीं हो जाते। और यही पहले अब्बासी दौर के आधे हिस्से में हुआ, जहां राज्य व्यापक हुआ और विपक्ष को कुचल देने के बाद युद्ध और सैन्य मोर्चों की तीव्रता कम हुई। राज्य की सीमा निश्चित हो गईं। शांति स्थापित हुई और इस तरह देश मज़बूत हुआ और हर तरफ से संसाधन की भरमार हो गई। लोग शांति और इत्मिनान से ज़िंदगी गुज़ारने लगे, किसी चीज़ का डर नहीं था। सांस्कृतिक विविधता के कारण विचारों की आज़ादी का माहौल पैदा हुआ। इस सांस्कृतिक विविधता की वजह राज्य की गैर अरब क़ौमों की ज़रूरत थी ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा को उम्मियों, अलवियों और दूसरों से सुरक्षित बनाया जा सके। इस तरह अक़्ल को काम करने का मौका मिला कि वो ज्ञान और कला की विभिन्न  शाखाओं में अछूते कारनामे दिखाए। इस तरह विकास का एक दौर शुरू हुआ और बगदाद सहित अरब के कई अन्य शहर उस वक्त के अजूबे करार दिए जा सकते थे।

ये शर्तें और माहौल इस्लामी राज्य को पूरे 140 साल में अपने राशिदी और उम्वी नुस्खे में कभी उपलब्ध नहीं हो सका हालांकि ये राज्य खैरुल क़ुरूनथा और हजारों सहाबा और ताबेईन मौजूद थे लेकिन इसके बावजूद ये सभ्यता कायम न हो सकी। जब ये शर्तें यूरोप, अमेरिका, जापान और चीन में उपलब्ध हुईं तो वहाँ भी संस्कृतियां उठीं, और आज भी जब तक मुसलमानों में ये शर्तें उपलब्ध नहीं होंगी तो वो कभी कोई सभ्यता स्थापित नहीं कर सकेंगे चाहे मौलवियों और शेखों के आसपास कितना ही जमगठा क्यों न बना लें और चाहे धर्म पर कितना ही अमल क्यों न कर डालें और अपनी औरतों को बुर्के पहना कर घरों में ठूंस दें और जितना चाहे अपनी दाढ़ियां बढ़ा लें।

ताज्जुब वाली बात ये है कि जिन लोगों ने इस्लामी सभ्यताकी स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई वो आज के वहाबी इस्लाम के मानकों के अनुसार - जो आज मुस्लिमों के धर्म की नैया डूबो रहे हैं- सिरे से मुसलमान थे ही नहीं, बल्कि वो काफ़िर, फ़ासिक व ज़ंदीक थे। वो अधिकारी जिन्होंने इस्लामी विकास के इस चरण का नेतृत्व किया जैसे अलअमीन, अलमामून, अलमोतसिम तथा दूसरे मोतज़्ला थे और अक़्ल को नक़ल पर तरजीह देते थे और कुरान के निर्माण के कायल थे। अनुवाद का आंदोलन जो इस संस्कृतिकी पहली ईंट की सी स्थिति रखता है वो ईसाइयों ने अंजाम दिया, जो यूनानी और सरियानी ज़बानों के माहिर थे। रही बात इस संस्कृतिके विभिन्न क्षेत्रों के महत्वपूर्ण किरदारों जैसे फाराबी, इब्ने सिना, राज़ी, जाबज़, इब्ने रशद, अबुल नवास, इब्ने रूमी, अलमोरी तथा अन्य तो उनके काफिर होने पर ही इसी उम्मत के वड्डे वड्डे शेखों ने सहमति जताई है जैसे गज़ाली, इब्ने अलसलाह, इब्ने तैमिया, इब्ने अलक़ैय्यम और उनकी राह पर चलने वाले सुल्तानों और हनाबिला के सभी अतिवादी धर्मशास्त्री जो आज भी उसी आदर व शान के साथ कुफ्र के ख़ंजर अपने हाथों में लिए फिरते हैं।

इससे भी अधिक आश्चर्यजनक बात ये है कि ये इस्लामी सभ्यताकोई दो सौ साल तक बने रहने के बाद दूसरे अब्बासी दौर के आधे हिस्से में हम्बली शेखों के हाथों गिरावट का शिकार होना शुरू हो गई। खलीफा अलमोतावक्कल ने इन हम्बली शेखों की मदद लेना शुरू दी क्योंकि राज्य कमजोर होता जा रहा था और सिर्फ वही सेनाओं के तुर्क अमीरों के प्रभुत्व का सामना करने के लिए जनता को इकट्ठा कर सकते थे, और इस तरह जैसे धर्म को पूरी छूट मिल गई, और हनाबिला ने सभ्यता की सभी निशानियों को मिटाना शुरू कर दिया जैसा कि आज इस्लामी देशों में उनके मुरीद करते फिरते हैं। ये लोग बाजारों में फैल जाते थे और गलियों में लोगों पर हमला करते थे। लोगों पर उनके रहन सहन और कपड़ों पर पाबंदियाँ लगाते थे, और आरोपियों पर सरे आम शरई हदें लागू करवाते थे। साहित्यकारों, कवियों और वैज्ञानिकों पर विशेष हमले करते थे और उनकी किताबें जलाते थे। संगीत, गीत, दर्शन, तर्क, गणित, आयुर्विज्ञान सहित सभी कलाओं और ज्ञान की शिक्षा हराम क़रार देते थे। विरोधी पंथ के धार्मिक नेताओं, इमामों और काज़ियों के घरों की घेराबंदी करते थे और उन्हें देश से निकाला करते थे। इन लोगों ने धार्मिक शिक्षाओं के अलावा अन्य सभी ज्ञान और लोगों के सम्मेलनों पर ज़बरदस्ती प्रतिबंध लगवाए, इस तरह आतंकवाद को बढ़ावा मिला, आज़ादी का खून बहा और अक़्ल की मौत हो गई, और सभ्यता का सूरज इस्लामी दुनियासे हमेशा के लिए अस्त हो गया।

धर्म संस्कृतियां नहीं बनाते, इंसान मज़हब के जन्म से हजारों साल पहले से सभ्यता से परिचित था। सभ्यता अपनी सबसे सरल परिभाषा में कला एवं ज्ञान व साहित्य में विकास के माध्यम से मानव जीवन को आसान बनाना है। न ही ये कोई ईश्वरीय कारनामा है कि जो कुन फयाकुन की ताक़त से अंजाम पाती हो, बल्कि ये विशुद्ध रूप से एक भौतिक व मानवीय उपलब्धि है, जो जब जहां माहौल पैदा होता है, पनप उठती है और इस वातावरण के खत्म होने पर समाप्त हो जाती है। खुदा दुनिया में उसे ही तौफ़ीक़ देगा जो सही कारकों का सहारा लेगा चाहे मोमिन हो या काफिर।

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