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Hindi Section ( 22 Oct 2013, NewAgeIslam.Com)

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Fear of Islamic Liberalism इस्लामी उदारवाद का डर

 

नास्तिक दुर्रानी, न्यु एज इस्लाम

18 अक्टूबर, 2013

एक लंबे समय से उदारीकरण से डर का एक वातावरण बना है जो शायद और अधिक लंबे समय तक बना रहेगा। उदारवाद जैसा कि कट्टरपंथी सल्फ़ी कहते हैं एक ऐसी मुसीबत और बुराई है जिसे पश्चिम और पश्चिमीवादी इस्लामी दुनिया पर थोप कर इस्लामी दुनिया में स्थापित नैतिक मूल्यों को खत्म कर उन्हें पश्चिमी सामाजिक और नैतिक मूल्यों से बदलना चाहते हैं।

और जैसा कि सभी को नज़र आता है, सामाजिक सम्बंध और नैतिकता ही मुस्लिम जनता के लिए महत्वपूर्ण हैं। अधिकांश इस्लामी समाज में इस पर बहस भी होती है जिसका अंत पश्चिम में मर्द और औरत के बीच स्थापित सामाजिक सम्बंधों और नैतिकता के इंकार पर होता है, लेकिन जैसा कि हमेशा होता है और जैसा कि सऊदी विचारक इब्राहीम अलबलीही बयान करते हैं कि हम अरब और मुस्लिम राष्ट्र पश्चिम के अन्य नैतिक मूल्यों को हमेशा भूल जाते हैं जैसे वक्त को सोना समझते हुए इसकी पाबंदी। उनके यहाँ वक्त की कीमत सोने के बराबर है और वो केवल बोल कर नहीं बल्कि व्यवहारिक रूप से इसे साबित करते हैं। हम उनके कुछ दूसरे नैतिक और सामाजिक मूल्यों को भी नज़रअंदाज कर देते हैं जैसे व्यवस्था, सफाई, ईमानदारी, गंभीरता और काम में मेहनत।

इसकी तुलना में मुसलमान हमेशा मर्द और औरत के सम्बंध और पश्चिमी समाज में महिलाओं के स्थान पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखते हैं। इस स्थिति की वजह आर्थिक, पर्यावरणीय, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक है। ये कारक हमारे यहां अलग हैं कि पश्चिमी सभ्यता आम तौर पर गंभीर मानव श्रम का फल है।

मुस्लिम लोकतंत्र जो उदारवाद के सामान्य अर्थ से डरे हुए हैं, वास्तव में सच्चाई पर हैं, ये जनता दुनिया की आबादी में आधुनिकता से सबसे ज़्यादा डरने वाले लोग हैं, चाहे बात खाद्य की हो, कपड़े या आधुनिक जीवन के औज़ारों की हो, मनुष्य अपने स्वाभाव में हर नई चीज़ से डरा रहता है लेकिन मुस्लिम जनता का आधुनिकता से इंकार बाकी इंसानों से अधिक तीव्रता वाला है, क्योंकि पूरे इतिहास में सोलहवीं सदी से लेकर इक्कीसवीं सदी तक इन लोगों के जीवन के हर पहलू में आधुनिक चीजों का हमेशा अकाल रहा है।

कट्टरपंथियों का उदारीकरण से इंकार और इससे डर समझा जा सकता है और उन्हें बहाना भी दिया जा सकता है क्योंकि उन्होंने पश्चिमी उदारवाद और इस्लामी उदारवाद का आपस में घाल मेल कर दिया है। वो मानते हैं कि उदारवाद हर समय व स्थान में एक जैसा ही होता है जो वास्तविकता के खिलाफ तर्क है, खासकर इस्लामी उदारवाद के हवाले से। सऊदी उदारवादी विचारक इब्राहीम अलबलीही ने बड़ी बहादुरी से कहा था कि "मैं मुसलमान हूं और समझता हूँ कि आपका उदार होना इस्लाम की सेवा करता है।"

नई चीज़ों को खारिज करना किसी भी राष्ट्र या दौर पर निर्भर नहीं है, धरती की अधिकांश कौमें इस दौर से गुज़री हैं। मुसलमानों के इतिहास में इसकी ज़िंदा मिसाले मौजूद हैं। आधुनिकता से डर कुरैश की घुट्टी में था। मिसाल के तौर पर कुरैश ने इस्लाम से पहले हनीफियत को न सिर्फ खारिज किया, बल्कि इसके खात्मा करने की कोशिश की और इसके एक लीडर को मक्का बदर कर दिया। ये मशहूर हनीफी शाएर ज़ैद बिन नफ़ील था। कुरैश ने ऐसा इसलिए किया ताकि मूर्ति पूजा की परंपरा की रक्षा की जा सके, क्योंकि इससे उस समय उन्हें आर्थिक लाभ होता था। इसी तरह कुरैश ने नए धर्म से भी इंकार किया जब उन्हें इस्लाम की दावत दी गई। उन्हें डर था कि नए धर्म की वजह से उन्हें अपना वतन न खोना पड़े, जैसा कि कुरान में आया हैः

वकालू इन्नतबेइलहुदा मअका नुतखत्तफ मिन अर्देना

(अनुवादः और कहते हैं कि अगर हम तुम्हारे साथ हिदायत की पैरवी करें तो अपने मुल्क से उचक लिए जाएँ। अलक़सस- 57)

आधुनिकता से इंकार हमारी कई स्वाभाविक विशेषताओं में से एक विशेषता है। प्राचीनता को छोड़ने से इंकार करना हमारी  चेतना में पिरोया है, हर नई चीज़ पर शक हमारी सहज प्रवृत्ति है। लेकिन ये निश्चित है कि ये इंकार पंद्रह सदियाँ पहले एक स्वाभाविक व्यवहार था। मगर आज ये हास्यास्पद व्यवहार है। यही स्थिति उदारीकरण और आधुनिकता की है कि जिस चीज़ से आज हम डरते हैं और अल्लाह से पनाह मांगते हैं, कल हास्यास्पद व्यवहार में शामिल हो जाएगा, जिसका मज़ाक़ भी उड़ाया जाएगा। इसलिए हमें आगे बढ़ने के लिए इस दौर से अवश्य गुज़रना होगा और क्या ही बेहतर हो कि हम ये दौर जवाँ मर्दी से पार करें।

मैं हमेशा ये बात तोते की तरह दोहराता रहता हूँ और आज फिर दोहरा रहा हूँ कि इस्लामी उदारवाद, पश्चिमी उदारवाद नहीं है। न ही ये उस तरह का उदारवाद है जैसा कि पश्चिमी देश समझते हैं या जैसा कि पश्चिम ने इसे अपनी आस्था, ऐतिहासिक तथ्यों, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मूल्यों से सींचा है। ये इससे बिल्कुल अलग है कि वहाँ ईसाईयत और यहाँ इस्लाम है।

वहाँ औद्योगिक क्रांति है और यहां कृषि और खस्ता हाल उपभोक्ता समाज है।

वहाँ नियंत्रण ही प्रजनन है और यहां आबादी का एक उमड़ता सैलाब है।

वहाँ वर्तमान समय के ब्रिटिश, फ्रेंच और अमेरिकी क्रांतियाँ हैं और यहां उस्मानी, फ्रांसीसी, ब्रिटिश और इतालवी उपनिवेशवाद है।  

वहां लोकतंत्र की खुश्बू है और यहां बादशाहों, खलीफों और सुल्तानों की हुकूमत है।

वहाँ विचारक, शोधकर्ता, दार्शनिक और आविष्कारक हैं और यहां प्राचीन ग्रंथों के हाफिज़, शेख, सूफी, दरवेश, धर्म के व्यापारी, रहमानी, शैतानी और काले इल्म के विशेषज्ञ और दिखावा करने वाले हैं।

वहाँ तार्किक, धार्मिक और शारीरिक रूप से स्वतंत्र महिला है और यहाँ सलफ और खलफ़ का पालन करने वाली, काले चादर में लिपटी लाचार औरत है।

वहाँ अच्छी या बुरी पर आधुनिकता है और यहां सिर्फ रूढ़िवादिता, पूर्वाग्रह, संकीर्णता है।

वास्तविक इस्लामी उदारवाद में सहिष्णुता की कमी है जिसको प्राप्त करने के लिए पश्चिमी देशों ने कई पापड़ बेले हैं।  मुस्लिम संस्कृति में सम्बंध, समझ बूझ और समझाने पर स्थापित नहीं हैं, बल्कि शक्ति और दूसरे पर प्रभुत्व स्थापित करने पर स्थापित है। यही कारण है कि हम इस महान सिद्धांत के तहत दुनिया को अपनी समस्याएं समझाने की कोशिश नहीं की, जो अल्लाह ने हमें दिया है। ये महान सिद्धांत कुरान में बहुत ही स्पष्ट है, लेकिन हमने इस सिद्धांत से दुश्मनी कर रखी है और हर विरोधी राय को कुचलने का तरीका अपना रखा है। इस तरह मुस्लिम दुनिया ने लगातार नुकसान उठाए हैं और उन पर मुसीबतों के पहाड़ टूटे हैं और अगर हम अब भी नहीं समझे तो शाएर के मुताबिक़ हमारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में।

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