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Hindi Section ( 16 Jun 2017, NewAgeIslam.Com)

Who Are Those Who Will Believe And Those Who Will Not? कौन ईमान लाने वाले हैं और कौन नहीं?

 

 

 

नसीर अहमद, न्यु एज इस्लाम

25 अक्टूबर 2016

कुरआन तीन प्रकार के लोगों का ज़िक्र करता है:

1.मोमिन; और मोमिन वह है जो हक़ पर आधारित एक जीवन व्यतीत करता है और हर प्रकार की भलाई को अपनाता है और उसके अंदर सच्चाई की पहचान और उसे स्वीकार करने और गलत की पहचान और उसे तर्क करने की क्षमता होती है। वह अहंकार नहीं करता है और इसलिए वह हर अच्छाई को स्वीकार करता है और उसका समर्थन भी करता है चाहे उसका स्रोत और विधि कुछ भी हो। वो बंदा ए मोमिन ही है जो सच्चाई के रास्ते पर पूरी सख्ती और गतिविधि के साथ चलता है। एक मोमिन की गुणों का उल्लेख कुरान के निम्नलिखित आयतों में इस तरह है:

(2: 2) यह) वह महान किताब है जिसमें किसी शक की गुंजाइश नहीं है, (यह) परहेज़गारों के लिए हिदायत है; (3) जो अनदेखी पर विश्वास करते और नमाज़ को (सभी अधिकारों के साथ) कायम करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से (हमारे रास्ते) में खर्च करते हैं, (4)और वह लोग जो आपके द्वारा भेजा गया और जो आपसे पहले भेजा गया था (सभी) पर विश्वास करते हैं, और वे आखिरत में भी (पूरा) विश्वास करते हैं। (5) वही अपने रब की ओर से हिदायत पर हैं और वही वास्तविक सफलता पाने वाले हैं।

इसमें कोई शक नहीं है कि यह एक महानतम नेकी है क्योंकि इसमें जुनून सहानुभूति के साथ दूसरों के लिए बलिदान करना और उनकी देखभाल करना शामिल है और यह विभिन्न सुनहरे सिद्धांतों में से एक सबसे सर्वोच्च सिद्धांत है। कुरान की इन आयातों में निहित अख़लाक़ी जीवन तंत्र इस बात का सबूत है कि इसका श्रोत ब्रह्मांड के निर्माता और पालनहार के अलावा और कोई नहीं हो सकता है।इसलिए उस अदृश्य परमेश्वर पर विश्वास करना जो इस दिव्य अख़लाक़ी जीवन तंत्र के निर्माता हैं और उस आखिरत में विश्वास करना जहां अल्लाह का न्याय अपने पूर्णता पर होगा ऐसे लोगों के लिए आसान है। उनके दिलों में आखिरत पर विश्वास करना इस्लामी सहीफो में वर्णित एक नैतिक जीवन व्यवस्था के अनुसार जीवन व्यतीत करना आसान बनाता है क्योंकि उनके अंदर यह उम्मीद है कि उनके पुरस्कार का एक बड़ा हिस्सा इस दुनिया में नहीं बल्कि आखिरत में है। और इसी आधार पर उनके लिए हक़, न्याय और पृथ्वी पर सभी प्राणियों के कल्याण के लिए इस जीवन में किसी इनाम की उम्मीद किये बिना अपने निजी हितों का बलिदान करना आसान हो जाता है। यह वही लोग हैं जो तंगी और मुसीबत की स्थिति में धैर्य से काम लेते हैं और संयम का रास्ता अपनाते हैं। ऐसे ही लोग हिदायत के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं।

(16:30) और परहेज़गार लोगों से कहा जाए कि तुम्हारे रब ने क्या उतारा है? वे कहते हैं: (दुनिया और आखिरत की) भलाई (उतारी है), उन लोगों के लिए जो नेकी करते रहे इस दुनिया में (भी) भलाई है, और आखिरत का घर तो अवश्य ही बेहतर है, और परहेज़गारों का घर क्या ही ख़ूब है।

वह अपनी सारी उम्मीदें अल्लाह के साथ संबद्ध कर देते हैं वे अपने जीवन के उतार-चढ़ाव पर बहुत कम ध्यान देते हैं।कुरआन मजीद में मोमिन ईमान का एक निष्पक्ष शब्द है और इसमें वे व्यक्ति शामिल है जो एक अल्लाह और आखिरत पर विश्वास रखता है और नेक काम करता है।

(2:62) बेशक जो लोग ईमान लाए और जो यहूदी हुए और (जो) ईसाईयों और साबी (थे उनमें से) जो (भी) अल्लाह पर और अंतिम दिन पर विश्वास करता है और उसने अच्छे कार्य किए, तो उनके लिये उनके रब के यहां उनका इनाम है, उन पर न कोई भय होगा और न वे दुखी होंगे।

2-मुनाफिक़: कपटी वह है जिसका ईमान कमजोर हो और ईमान और कुफ्र दोनों के बीच फंसा हुआ हो.वह अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करने की कोशिश करता है। वह सदा विजेता दल के साथ रहना चाहता है। वह अभिमानी नहीं है इसलिए वे वास्तविकता पर एक सरसरी नज़र तो डालता है लेकिन जब इस तथ्य से उसका स्वार्थ पूरा नहीं होता इसलिए वे तुरंत इस रौशन हकीकत से नज़र फेर लेता है और मुनाफिकत के अंधेरे में इस तरह पड़ा रहता है जैसे कि वह अंधा हो। मुनाफिक़ की विशेषता निम्नलिखित आयतों में बयान की गई हैं:

(2: 8) और लोगों में से कुछ वे (भी) हैं जो कहते हैं हम अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान लाये हालांकि वे (कभी) मोमिन नहीं हैं। (9) वह अल्लाह और ईमान वालों को धोखा देना चाहते हैं मगर (सचमुच) वह खुद को ही धोखा दे रहे हैं और उन्हें इसकी चेतना नहीं है,(10) उनके दिलों में रोग है,तो अल्लाह ने उनके रोग को और बढ़ा दिया और उनके लिए एक दर्दनाक यातना है। इसलिए कि वे झूठ बोलते थे। (11) और जब उनसे कहा जाता है कि देश में शरारत बपा न करो, तो कहते हैं: हम ही तो सुधार कर रहे हैं। (12) जागरूक हो जाओ! यही लोग (वास्तव में) शरारत करने वाले हैं, लेकिन उन्हें (इसका) एहसास तक नहीं। (13) और जब उनसे कहा जाता है कि (तुम भी)ईमान लाओ जैसे(दोसरे)लोग ईमान ले आए हैं, तो कहते हैं: हम भी (इसी तरह) ईमान ले आएँ जिस तरह (वह) मूर्ख ईमान ले आए हैं,जॉन लो! मूर्ख (वास्तव में) वह खुद हैं लेकिन उन्हें (अपनी मूर्खता और हल्के पन) ज्ञान नहीं।

यह लोग एक पल के लिए वास्तविकता को देखने में सक्षम हैं लेकिन इसके बावजूद हक़ीक़त का पालन नहीं करते और इसलिए खुद को धोखा देते हैं। हर बार वह हक़ीक़त को देखते हैं और हर बार वह इसे नजरअंदाज कर देते हैं। और धीरे-धीरे उनका यह रवैया मजबूत होता जाता है और उनका ज्ञान और बौद्धिक चेतना कमजोर होता जाता है जब तक वह उस स्थान पर पहुँच जाता है कि अब उनहें सच्चाई से कोई परेशानी नहीं होती और वे सच्चाई से बहरे और अंधे हो जाते हैं । निम्नलिखित आयतों में इसी को परिभाषित किया गया है:

(2:14) और जब वे (मुनाफिक़) ईमान वालो से मिलते हैं तो कहते हैं: हम (भी) ईमान लाए हैं, और जब अपने शैतानों से अलगाव में मिलते हैं तो कहते हैं: हम वास्तव में तुम्हारे साथ हैं, हम ( मुसलमानों का तो) महज मजाक उड़ाते हैं। (15) अल्लाह उन्हें शरारत के लिए सजा देता है और उन्हें ढील देता है (ताकि वह अपने अंजाम तक जा पहुंचे)सो वह खुद अपनी सरकशी में भटक रहे हैं। (16)वही लोग हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही खरीदा लेकिन उनकी व्यापार लाभदायक नहीं हुई और वह (लाभदायक सौदे की) राह जानते ही नहीं थे। (17) उनके उदाहरण ऐसे व्यक्ति के समान है जिसने (अंधेरे वातावरण में) आग जलाई और जब उसने परिवेश को हल्का कर दिया तो अल्लाह ने उनका प्रकाश छीन लिया और उन्हें अंधेरे में छोड़ दिया अब वह कुछ नहीं देखते। (18) बहरे गूंगे, (और) अंधे हैं तो वह (सही मार्ग की तरफ) नहीं लौटेंगे।

3- ईमान का इनकार करने वाले काफिर: काफ़िर वह स्वार्थी और मतलब परस्त व्यक्ति है जो यह मानता है कि सांसारिक जीवन का वास्तविक उद्देश्य अधिकतम लाभ और आनंद के लिए है और इसके लिए जो भी रास्ता अच्छा लगे अपनाया जाए। सत्य,न्याय और दया से वास्तविक रूप में उसे कोई मतलब नहीं होता, बल्कि इन सभी बातों से उसे केवल उसी हद तक मतलब होता है कि जब तक उसका हित पूरा होता रहे।वह घमंडी होता है और दूसरों से ईर्ष्या भी करता है.वह इस सांसारिक जीवन में शक्ति, दौलत और सभी अच्छी चीजें हासिल करना चाहता है। और इसके लिए वह सभी नैतिक बातों के निमंत्रण को अस्वीकार कर देगा।हसद और अहंकार के आधार पर रसूलो का इनकार करता है और उनके संदेशों को इसलिए खारिज करता है क्युकि वह उसकी मंशा के खिलाफ हैं। वे पूरी सक्रियता के साथ अपने कार्य के माध्यम से रसूल और उनके संदेश दोनों का प्रतिरोध करता है और वह उनकी विरोध और प्रतिरोध में इतना जरी हो जाता है कि वे उनके पैगामात से पूरी तरह से बहरा और अंधा हो जाता है। निम्नलिखित आयतो में उनके विवरण पेश की गई है:

(17:94) और (उन) लोगों को ईमान लाने से और कोई चीज़ रुकावट न हुई जबकि उनके पास मार्गदर्शन (भी) आ चुकी थी, सिवाय इसके कि वे कहने लगे: क्या अल्लाह ने (एक) इंसान को रसूल बनाकर भेजा है।

सबसे पहले लोग दूसरों से अहंकार और ईर्ष्या के आधार पर हिदायत का इनकार करते हैं।

(3:14) वह लोग हैं जो सांसारिक जीवन को आख़िरत की अपेक्षा अधिक पसंद करते हैं और (लोगों को) ख़ुदा की राह से रोकते हैं और (दीने हक़) में कमी खोजते हैं। ये लोग दूर की गुमराही में (पड़ चुके) हैं।

(16:22) तुम्हारा परमेश्वर, एक अल्लाह है, इसलिए जो आखिरत में विश्वास नहीं रखते उनके दिल इनकार करने वाले हैं और वे विद्रोही और अहंकारी हैं।

तुरंत एहसान मंदी का इच्छुक व्यक्ति इस दुनिया के जीवन से प्यार करता है और इस तरह के इंसान के लिए आखिरत के वादे बहुत दूर,अनिश्चित और शायद झूठ मालूम होते हैं। यह तथ्य कि उसने अनैतिक साधनों से बहुत कुछ प्राप्त कर लिया है और यह तथ्य कि उसे यह लगता है कि मौजूदा जीवन शैली में कोई भी बदलाव उसकी शक्ति और उसके धन के लिये तत्कालिक रूप से हानिकारक होगी,उसके लिए सत्य के मार्ग में एक रुकावट बन जाती है।

सूरह 102

(1) तुम्हें अक्सर माल की वासना और गर्व ने (आखिरत से) बेपरवाह कर दिया।

(2) यहाँ तक कि कब्र में जा पहुंचे।

(3) हरगिज़ नहीं! (धन तुम्हारे काम नहीं आएंगे) तुम जल्द ही (इस तथ्य को) जान लोगे।

(4) फिर (आगाह किया जाता है :) हरगिज़ नहीं! जल्द ही तुमहें (अपना अंजाम) मालूम हो जाएगा!

(5) हाँ हाँ! काश तुम (माल व ज़र की वासना और अपनी लापरवाही के अंजाम को) निश्चित ज्ञान के साथ जानते (तो दुनिया में खो कर आखिरत को इस तरह न भूलते)

(6) तुम (अपनी लालच के परिणामस्वरूप) नरक को जरूर देखकर रहोगे!

(7) फिर तुम उसे जरूर यकीन की आंख से देख लोगे!

(8) फिर उस दिन तुम से (अल्लाह के) खुशी के बारे में जरूर पूछा जाएगा।

(2: 6) बेशक जिनहोंने कुफ्र अपना लिया है उनके लिए बराबर है चाहे आप उन्हें डराऐं या ना डराऐं, वह ईमान नहीं लाएंगे (7) अल्लाह नें उनके दिल और कानों पर मुहर लगा दी है और उनकी आँखों पर पर्दा (पड़ गया) है और उनके लिए सख़्त अज़ाब है।

जब अल्लाह यह कहता है कि अल्लाह गुनाहगारों के दिलों पर मुहर लगा देता है तो इसका अर्थ अल्लाह का प्रकृतिक कानून है जिसके अनुसार वह अहंकारी मनुष्य जो अहंकार और अभिमान के कारण दूसरों की अनदेखी करता है और केवल तुरंत एहसान मंदी में रुचि रखता है,जो स्वार्थी है,और जो सच्चाई और बुद्धिमत्ता की आवाज को दबाता है इसके अलावा प्रत्येक बात को समझने की क्षमता खो देता है जो तुरंत उसकी प्रशंसा हो जैसे कि उसके दिल पर एक मुहर लग गई हो। "और अल्लाह नें उन पर कोई अत्याचार नहीं किया बल्कि वे खुद पर ज़ुल्म करते हैं" (3: 117, 9:70)।

6:12 जिन्होंने अपने प्राण को (जीर्ण) घाटे में डाल दिया है इसलिये वे ईमान नहीं लाएंगे।

(6: 108) और (मुसलमानों) तुम उन्हें गाली मत दो जिनहे वे अल्लाह के सिवा पूजते हैं फिर वे लोग अज्ञानता के कारण अत्याचार करते हुए अल्लाह की शान में दशनाम तराज़ी करने लगेंगे। इसी तरह हम हर समुदाय के लिए उनका कर्म वांछनीय कर रखा है, फिर सब को अपने रब की ओर लौटना है और वह उन्हें इन कार्यों के परिणाम के बारे में बता देगा जो वे करते थे।

उन्होंने जानबूझकर खुद अपनी मर्जी से बुराई की ओर झुककर और अच्छाई को खारिज कर के अपने अंदर मौजूद अच्छाई की सभी क्षमताओं को खो दिया है। ऐसे लोग कभी ईमान नहीं लाएंगे और अपने खु़शी महसूस करेंगे और ईमान लाने वालो को मूर्ख समझेंगे और खुद को बुद्धिमान।

शब्द काफिर कुरान में ईमान की एक निष्पक्ष शब्द है। काफ़िर कोई मुसलमान, ईसाई,यहूदी, मुशरिक या किसी अन्य धर्म का मानने वाला व्यक्ति भी हो सकता है। मोहम्मद पीकथाल का कहना है:"मैं कुरान में (शब्द काफिर के) दो अर्थ पाए लेकिन जैसे ही हम दिव्य दृष्टि को समझने की कोशिश करते हैं वे एक हो जाते हैं.सबसे पहले काफिर वह है जो किसी भी धर्म का अनुयायी न हो.वह अल्लाह की खैर अंदेश इच्छा और प्रतिवादी के खिलाफ होता है तो वह सभी धर्मों की प्रामाणिकता से इनकार करने वाला है,अल्लाह के वहि के रूप में सभी आसमानी सहीफो का इनकार करने वाला है और उसका कुफ्र इस सीमा तक पहुँच जाता है कि वे उन सभी नबियों (अलैहिस्सलाम)का विरोध पूरी सक्रियता के साथ करता है कि बिना किसी भेदभाव जिनका सम्मान करने का आदेश मुसलमानों को दिया गया है।

मानव स्वभाव और चरित्र के बारे में परमेश्वर के नियमों की समझ

ज्ञान और बौद्धिक असामंजस्य की भूमिका

दार्शनिक अल्फ्रेड नार्थ व्हाइट हेड इन ने 1925 में अपनी किताब "विज्ञान और आधुनिक दुनिया" में कहा है:"एक [विशेष रूप से आधारित]सिद्धांत लगाना काफी आसान है।परंतु अपने आधे सबूतों को नजरअंदाज करने पर मजबूर हो जाएं। सच्चाई की मांग के लिए आवश्यक नैतिक स्वभाव में सभी साक्ष्य को अपने हिसाब में रखने का एक अडिग प्रतिबद्धता शामिल है। "

बहुत से ऐसे लोग हैं जो संबंधित साक्ष्य के आधे को उपेक्षा करने में एक अडिग प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं!

मनोविज्ञान शब्दावली में इसे जानबूझ कर जेहालत करना कहा जाता है जिसमें हम केवल उनहीं तथ्यों पर ध्यान देते हैं जिनसे हमारा हित प्राप्त होता है। और जो सबूत हमारे सिद्धांत के खिलाफ होते हैं और इसमें किसी व्यवधान का कारण बनते हैं उन्हें ज्ञान और बौद्धिक असामंजस्य कहा जाता है। संज्ञानात्मक और बौद्धिक असामंजस्य के साथ निपटने का एक सबसे विश्वास योग्य तरीका पूर्ण तथ्यों को नजर में रखते हुए अपनी राय और अपने सिद्धांत को संशोधित करना। और इसका गैर ईमानदार तरीका सबूत को नज़रअंदाज़ करना और उन्हें गलत साबित करना या उन्हें पूरी तरह से सबूत को नज़रअंदाज़ करना है जिनसे हमारा हित पूरा नहीं होता।

हर इंसान एक ही स्तर पर संज्ञानात्मक और बौद्धिक असामंजस्य महसूस नहीं करता है। जिन लोगों को अपने जीवन में स्थिरता और विश्वास की जरूरत ज्यादा होती है उन्हें आम तौर पर उन लोगों की तुलना में इस संज्ञानात्मक और बौद्धिक असामंजस्य के प्रभाव अधिक महसूस होते हैं इस तरह की स्थिरता की जरूरत कम होती है। जिन लोगों के पास ज्ञान और बौद्धिक असामंजस्य से ईमानदारी के साथ निपटने का प्रशिक्षण नहीं होता है वह झूठ के आदी हो जाते हैं और उन्हें कुछ भी महसूस नहीं होता। उनहीं लोगों के बारे में कुरआन कहता है कि:

(2:16) यही वह लोग हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही खरीदा लेकिन उनके व्यापार लाभदायक नहीं हुए और वह (लाभदायक सौदों की) राह जानते ही नहीं थे,(17) उनकी समानता एक ऐसे व्यक्ति की समान है जिसने (अंधेरे वातावरण में)आग जलाई और जब उसने परिवेश को रौशन कर दिया तो अल्लाह ने उनका प्रकाश छीन लिया और उन्हें अंधेरे में छोड़ दिया अब वह कुछ नहीं देखते। (18)ये बहरे,गूंगे (और) अंधे हैं तो वह (सीधे मार्ग की तरफ) नहीं लौटेंगे।

जिन्हें ज्ञान और बौद्धिक असामंजस्य को दबाने का हुनर मालूम है वह किसी भी मुद्दे पर अपने रुख बदल लेंगे इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आगे चलकर वे गलत साबित हो जाऐं और ऐसा इसलिए है कि इनका रुख किसी निष्पक्ष विश्लेषण पर आधारित नहीं है और किसी भी मामले में उन लोगों के लिए वास्तविकता महत्वपूर्ण नहीं है। वे सिर्फ अपने स्वार्थ के मुर्ति की पूजा करते हैं। उनका गर्व और घमंड उन्हें अपने रुख बदलने से रोकता है चाहे वह गलत ही क्यों न साबित हो जाएँ।एसे लोगों के बारे में कुरआन का फरमान है कि:

(6: 109) बड़े सत्यनिष्ठा शपथ के साथ अल्लाह की कसम खाते हैं कि अगर उनके पास कोई (खुली) निशानी आ जाए तो वह उस पर जरूर विश्वास कर लेंगे। (उनसे)कह दो कि संकेत तो केवल अल्लाह ही के पास है, और (मुसलमानों) तुम्हें क्या खबर कि जब वह निशानी आ जाएगी (तो) वह (फिर भी) ईमान नहीं लाएंगे।

(110) और हम उनके दिलों और उनकी आँखों को (उनकी स्वयं के दुर्भावनापूर्ण के कारण  सत्य स्वीकारने) से (इसी तरह) फेर देंगे जिस तरह वह (नबी) पर पहली बार ईमान नहीं लाए (सो वह निशानी देख कर भी ईमान नहीं लाएंगे) और हम उन्हें उनकी सरकशी में (ही) छोड़ देंगे कि वे भटकते फिरें।

पहले उदाहरण में जिस बात ने उन्हें ईमान लाने से रोका है उसकी सोच पर इसका लगातार हावी रहेगा और वह ईमान नहीं लाएंगे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके पास क्या संकेत भेजी जा रही हैं। ऐसा इसलिए है कि पहले सभी अवसर पर जानबूझकर सच्चाई से इनकार ने उनकी सोच और चिंता धीरे धीरे और पूरी तरह से गम गुशतह कर दिया है।

(111) और अगर हम उनकी तरफ फ़रिश्ते उतार देते और उनसे मुर्दे बातें करने लगते हैं और हम उन पर सब कुछ (आँखों के सामने)समूह दर समूह जमा कर देते वह तब भी ईमान नहीं लाते सिवाय इसके कि जो अल्लाह चाहता और उनके अधिकांश लोग अज्ञानता से काम लेते हैं।

(112) और इस प्रकार हम हर नबी के लिए मनुष्य और जिनो में से शैतानों को दुश्मन बना दिया है जो एक दूसरे के दिल में पॉलिश की हुई (चिकनी चुपड़ी) बातें (वसवसा के रूप में) धोखा देने के लिए डालते रहते हैं, और अगर आपका अल्लाह (उन्हें जबरन रोकना) चाहता (तो) वे ऐसा नहीं कर पाते, तो आप उन्हें (भी) छोड़ दें और जो कुछ वह बोह्तान बांध रहे हैं।

(113) और (यह) क्योंकि उन के दिल (धोखा) की ओर आकर्षित हो जाएं जो आखिरत में विश्वास नहीं रखते और (यह) कि वह उसे पसंद करने लगें और (यह भी) कि वह (इन्हीं बुरे कार्यों का) अपराध करनें लगें जिसका वह खुद (दोषी) हो रहे हैं।

(114) फर्मा दीजिये :) क्या मैं अल्लाह के सिवा किसी और को हाकिम (और फैसल) तलाश करूं हालांकि वह (अल्लाह) ही है जिसने तुम्हारे विस्तृत (यानी स्पष्ट रणनीति पर आधारित) किताब उतारी है, और वे लोग जिन्हें हमनें (पूर्व)किताब दी थी (दिल से)जानते हैं कि यह (कुरआन)आपके रब की ओर से (आधारित) सत्य पर उतारा हुआ है तो आप (उन अहले किताब की तुलना) शक करने वालों में न हों।

(115) और अपने रब की बात सच्चाई और न्याय की दॄष्टि से पूरी हो चुकी है, उसकी बातों को कोई बदलने वाला नहीं, और वह खूब सुनने वाला खूब जानने वाला है।

यहाँ इन शब्दों से मतलब अल्लाह के नियम हैं जिन्हें कोई नहीं बदल सकता और जिसके द्वारा अल्लाह न्याय सुनिश्चित करता है।

(116) और अगर जमीन में (उपस्थित) लोगों के बहुमत का कहना मान ले तो वह तुझे अल्लाह के मार्ग से भटका देंगे। वे (सत्य और विश्वास के बजाय) केवल भ्रम और कल्पना का पालन करते हैं और केवल गलत अटकलें (और झूठ बोलते) रहते हैं।

(117) निस्संदेह तुम्हारा रब ही उसे भली-भाँति जानता है जो उसके रास्ते से भटका है और वही हिदायत पाने वाले लोगों से (भी) खूब परिचित है।

इन आयत में राहे हक़ से भटके हुवे और हिदायत के मार्ग पर चलने वाले लोगों की लक्षण का वर्णन है।

अहंकार और ईमान का इंकार

(7: 146) मैं अपनी आयतों (के समझने और स्वीकार करने) से उन लोगों को बाज रखूंगा, जो पृथ्वी में बिला वजह घमण्ड करते हैं और अगर वे सभी लक्षण देख लें (तब भी)उस पर ईमान नहीं लाएंगे और अगर वह हिदायत की राह देख लें (फिर भी) उसे (अपना) रास्ता नहीं बनाएंगे और अगर वह गुमराही का रास्ता देख लें (तो)उसे अपनी राह के रूप में अपना लेंगे,यह इसलिए कि उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे अनजान बने रहे।

किसी व्यक्ति को इस हद तक अहंकार के लिए कि उसे हक़ की परवाह ही न रहे अल्लाह की खुले तौर पर अवज्ञा है। ऐसे लोग न तो अल्लाह पर विश्वास करेंगे और न ही कभी सच का रास्ता अख्तियार करेंगे।

खुदा की हिदायत किसके लिए है?

(8:23) और अगर अल्लाह उनमें कुछ भी अच्छाई (की ओर आकर्षण) जानता तो उन्हें (जरूर) सुना देता है, और (उनकी हालत यह है कि) अगर वह उन्हें (हक़) सुना दे तो वह (फिर भी) मुख मोड़ लें और वह (हक़ से) बचने ही करने वाले हैं।

यह खुदा का एक प्राकृतिक नियम है कि वह सभी लोगों जिनके अंदर कुछ भी अच्छाई है वह इस संदेश के इच्छुक होंगे और जिनके अंदर कुछ भी अच्छाई नहीं है अगर खुदा उन तक अपना संदेश पहूंचाए, तब भी वे अपने कुफ्र में ही लौट आएंगे।

(10:32) तो यही (अज़मत और क़ुद्रत वाला) अल्लाह ही तो तुम्हारा रब है, तो (इस) हक़ के बाद गुमराही छोड़कर और क्या हो सकता है,तो तुम कहाँ फिरे जा रहे हो,(33)इसी तरह आपके रब का आदेश नाफरमानों पर साबित होकर रहा कि वह ईमान नहीं लाएंगे।

सच और झूठ के बीच अंतर स्पष्ट हो चुका है और अब जो कोई भी सच्चाई से मुंह फेरेगा वह स्पष्ट रूप से अपराधियों गिना जाएगा। अल्लाह का कानून (अल्लाह का कलाम) यह है कि जो व्यक्ति विद्रोह में सच्चाई से मुंह फेर लेगा वह ईमान नहीं लाएगा।

क्या गुमराही में पड़ा और बातिल पर जीवन बिताने वाला व्यक्ति स्वतः जीवन बदल सकता है?

ऐसे व्यक्ति को पहले यह स्वीकार करना होगा कि जिस रास्ते पर हूँ वह गलत है और फिर उसके बाद उसे अपने अंदर परिवर्तन पैदा करने और इसके लिए खुदा की मदद तलब करने का नैतिक निर्णय भी करना चाहिएIइसे यह एहसास होना चाहिए कि वास्तव में बुनियादी रूप में ईमानदारी के साथ ज्ञान और बौद्धिक असामंजस्य से निमटने का तरीका जानने से इनकार एक झूठ और खुद फ़रेबी हैIमेट्ज़ और सहयोगियों को (2008) में यह महसूस हुआ कि बेरों बेन व्यक्तियों पर ज्ञान और बौद्धिक असामंजस्य के नकारात्मक प्रभाव होने की संभावना कम है और उनके लिए अपने मन और चिंता और बदलने की संभावना भी कम हैं। जबकि दूसरी ओर दरों बीन लोग संज्ञानात्मक और बौद्धिक असामंजस्य के साथ अधिक दयानत दारी से पेश आते हैं।यह कोई कठिन बात नहीं है क्योंकि दरों बीन लोग खुद अपने व्यक्तित्व पर ध्यान केंद्रित रखते हैं और खुद से झूठ बोलना मुश्किल है बैरु बीन लोगों का ध्यान अधिक इस बात पर होता है कि दूसरे लोग उनके बारे में क्या कहते हैं। बेरों बेन जो कुछ वे कहते हैं या करते हैं उनके हम मजलिस, साथी उनके चापलूस इस पर उनकी प्रशंसा के पुल बांध देते हैं। और अगर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो उनके झूठ को उनके सामने रखते हैं और उनके लिए परेशानी का कारण बनते हैं तो उन्हें आसानी से दुश्मन मान लिया जाता है और उन पर झूठ और बदनामी की बारिश कर दी जाती है। अगर उनके झूठ में उन्हें समर्थन करने वाले लोग मौजूद हैं तो ये लोग कभी नहीं बदलेंगे।

आत्मा चेतना और परिवर्तन की इच्छा ख़ुद को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका है। जब आप किसी मामले में अपने रुख के खिलाफ किसी जानकारी को नजरअंदाज कर रहे होते हैं तो आप इसका ज्ञान होता है। सुकरात ने कहा था कि "एक बे पारखी हुई ज़िंदगी जीने के लायक नहीं होती।"अपने अंदर आत्म चेतना पैदा करें क्योंकि यही परिवर्तन पहला कदम है।

जब आप की इच्छा और आप जिसे सही मानते हैं उनके बीच कोई विरोधाभास पैदा होता है तब आप पूरे चेतना और जागरूकता के साथ सही रास्ता चुनते हैं। अतीत की गलतियों को स्वीकार करते हैं,उनके लिए खेद होते हैं और फिर आगे बढ़ना सीखते हैं। जन्म से झूठे लोगों का सामना जब ऐसे सबूत के साथ होता है जो इन्हें गलत साबित करते हैं तो वह उन्हें "भ्रामक"बताते हैं। उनके लिए कड़वी सच्चाई एक धोखा है और आरामदायक झूठ ही उनके लिए सत्य है।

जो लोग नैतिकता के बारे में बात करते हैं और 'अंतरात्मा' या दिल की आवाज की बात करते हैं कि ज्ञान और बौद्धिक असामंजस्य के अलावा कुछ भी नहीं है और जो अनुभव हमें तब होता है जब हमारे कार्य सच्चाई के साथ संगत नहीं होते हैं। हम उन मूल्यों के साथ पैदा नहीं हुए हैं बल्कि वह मूल्य हैं जिन्हें हम स्वीकार करते हैं। इस तरह की चेतना पैदा करने के लिए कुरआन का अध्ययन किया जाए ताकि गलत और सही के बीच इम्तियाज़ी रेखा खींचा जाए।

क्या प्रार्थना सहायक हो सकता है?

प्रार्थना खुद के व्यक्तित्व को बदलने में सबसे प्रभावी है। अल्लाह पर विश्वास करना इसमें सहायक तो है लेकिन अगर प्रार्थना दैनिक संकल्प या वादा में बदल दिया जाए तो यह इस प्रकार के विश्वास के बिना भी सहायक हो सकती है।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की यह प्रार्थना मेरी हर सुबह की दिनचर्या है:

ऐ अल्लाह! मेरे दिल को पाखंड मुक्त कर दे,

मेरे व्यवहार से कपट को दूर कर दे,

झूठ से मेरी ज़ुबान को शुद्ध कर दे,

और मेरी आंखों को विश्वासघात मुक्त कर दे,

बेशक तेरी नज़रों में धोखेबाज की पहचान है

और जो कुछ मन में रहस्य छिपा है इस पर भी तेरी नज़र है।

कुरान मानव व्यवहार के नियमों का वर्णन करता है लेकिन अल्लाह ख़ुदा साथ ही साथ वह अपनी सुन्नत भी बयान करता है। ऐसा इसलिए है कि ख़ुदा के ये नियम अटल और अपरिवर्तनीय हैं जो सख्ती से लगातार और ना बदलने वाली शैली में रवां दवां हैं। लोग उसे शाब्दिक शैली में समझते हैं और यह कहते हैं कि अगर ख़ुदा लोगों को गुमराह करने की अनुमति देता है या उनके दिलों पर मुहर लगाता है जिससे वह "बहरे, गूंगे और अंधे" हो जाते हैं तो फिर उसे कैसे इसका जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? यह भी आत्म का धोखा है और नैतिक जीवन प्रणाली की जिम्मेदारी लेने की नाकाबिलियत का प्रतीक है जिसको उन्होंनें स्वयं चुना है जबकि ख़ुदा लगातार उन्हें इस बात की याद दिलाती है कि:

(4: 120) शैतान उन्हें (गलत) वादे देता है और उन्हें (झूठी) उम्मीदें दिलाता है और शैतान छल के अलावा उनसे कोई वादा नहीं करता।

(35: 5) ऐ लोगो! बेशक अल्लाह का वादा सच्चा है इसलिये सांसारिक जीवन तुम्हें कभी धोखा न दे दे, और न वह विश्वासघाती शैतान तुम्हें अल्लाह के (नाम) से धोखा दे। (6) बेशक शैतान तुम्हारा दुश्मन है तो तुम भी (इसका विरोध के रूप में) उसे दुश्मन ही बनाए रखो, वह तो अपने समूह को केवल इसलिए बुलाता है कि वह दोज़खियों में शामिल हों।

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