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The Law on Adultery in the Quran कुरआन में वर्णित जिना का कानून

नसीर अहमद, न्यू एज इस्लाम

उर्दू से अनुवाद, न्यू एज इस्लाम

24 फरवरी, 2021

कुरआन में वर्णित जिना का कानून एक ऐसा कानून है जिसमें दोषी पाए जाने पर सजा के रूप में सौ कोड़ों की आवश्यकता होती है। इसे कम या ज्यादा माफ नहीं किया जा सकता है। ऐसे अन्य कानून हैं जिनका बहुत विस्तार से उल्लेख किया गया हैलेकिन इस प्रकार के प्रत्येक कानून में सजा कम करने या क्षमा करने की अनुमति मौजूद है। जिना के कानून को भी बहुत विस्तार से बताया गया हैघटना के चार विश्वसनीय चश्मदीद गवाहों को इसे साबित करने की आवश्यकता हैजो लगभग असंभव हैसिवाय इसके कि अपराधी इतने बेशर्म और जिद्दी हैं कि खुले में प्रत्यक्षदर्शियों के सामने इस अपराध को सार्वजनिक रूप से करें।

२४ फरवरी २०२१

الزّانِيَةُ وَالزّاني فَاجلِدوا كُلَّ واحِدٍ مِنهُما مِائَةَ جَلدَةٍ ، وَلا تَأخُذكُم بِهِما رَأفَةٌ في دينِ اللَّهِ إِن كُنتُم تُؤمِنونَ بِاللَّهِ وَاليَومِ الآخِرِ، وَليَشهَد عَذابَهُما طائِفَةٌ مِنَ المُؤمِنينَ۔ (سورہ النور آیت نمبر ۲)

अनुवाद: ज़िना करने वाली औरत और ज़िना करने वाले मर्द इन दोनों में से हर एक को सौ (सौ) कोडे मारो और अगर तुम ख़ुदा और रोजे आख़िरत पर ईमान रखते हो तो हुक्मे खुदा के नाफिज़ करने में तुमको उनके बारे में किसी तरह की तरस का लिहाज़ न होने पाए और उन दोनों की सज़ा के वक्त मोमिन की एक जमाअत को मौजूद रहना चाहिए।

अपराध और पाप में अंतर यह है कि पाप अल्लाह के विरुद्ध है जबकि अपराध मनुष्य या समाज के विरुद्ध है। हर अपराध पाप हैलेकिन हर पाप अपराध नहीं है। गुनाह की सजा आख़िरत में हैजबकि अपराध की सज़ा इस दुनिया में हैअगर तौबा न करे तो अपराध की सज़ा आख़िरत में भी मिलती है। अल्लाह के साथ शिर्क करना सबसे बड़ा पाप हैलेकिन यह कोई अपराध नहीं है। यदि हम जिना की सजा और उससे संबंधित विस्तृत आयतों पर विचार करेंतो हम पाते हैं कि जिना को इस्लाम में सबसे गंभीर अपराध माना जाता हैहत्या से भी अधिक गंभीरक्योंकि यदि पीड़ित का परिवार दीयत को स्वीकार करता हैतो दीयत दे कर हत्या की सजा से बचा जा सकता है इस प्रकार क्योंइस्लाम में जिना को इतना गंभीर क्यों माना जाता हैयदि हम तार्किक रूप से बात करेंतो जिना को सबसे गंभीर अपराध माना जा सकता है जब यह पीड़ितों और अपराधियों को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा होया यदि गंभीर रूप से दंडित न होने पर समाज के लिए एक बड़ी तबाही का खतरा हो। जिना एक गलती है जिसे दीयतमुआवजा या जुर्माना देकर ठीक नहीं किया जा सकता है। दूसरों की खातिर जिना के लिए अनुकरणीय दंड देना आवश्यक है।

एक ऐसे युग में जहां सहमति से यौन संबंध न केवल अनुमेय है बल्कि सामान्य भी हैवहाँ जिना पर सख्त इस्लामी कानून का अर्थ समझना आसान नहीं है। इस्लामी कानून ज्यादातर लोगों को स्वीकार्य नहीं है जो सोचते हैं कि असीमित यौन स्वतंत्रता होना स्वाभाविक हैऔर लोग इस तरह की स्वतंत्रता के साथ किसी भी समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त परिपक्व हैं।

इस्लामिक देशों में भी जिना का कानून केवल मुसलमानों पर लागू होता हैगैर-मुसलमानों पर नहीं। इस्लाम गैर-मुसलमानों पर अपनी यौन नैतिकता नहीं थोपता। इस्लाम यौन व्यवहार में संयम के लिए विभिन्न सिद्धांतोंदृष्टिकोणों और विश्वासों को मान्यता देता है। आज भी कई आदिवासी समाज हैं जहां एक महिला कई पुरुषों के साथ रहती है। उनकी मान्यता के अनुसार पुरुष के शुक्राणु से संतान का जन्म नहीं होताबल्कि स्त्री के गर्भ में बहुत अधिक शुक्राणु जमा हो जाने पर संतान का जन्म होता है। इसलिए एक महिला बहुत सारे पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाने की कोशिश करती हैखासकर जब वह गर्भवती हो क्योंकि वह चाहती है कि उसके शरीर में बच्चा पैदा करने के लिए पर्याप्त शुक्राणु जमा हो जाएं। ऐसे समाज में स्त्री के लिए अलग-अलग पुरुषों के साथ सोना अच्छा माना जाता है। ऐसे समाज मेंलोगों की गलत धारणाएं इस तरह के व्यवहार के कारण होती हैंन कि यौन विविधता और स्वतंत्रता के कारण। ऐसे समाज पर इस्लाम के यौन सिद्धांत को लागू करना व्यर्थ होगा।कुरआन में वर्णित जिना का कानून भी ऐसे समाज को अपने दायरे से बाहर कर देता है जहां जिना अपराध नहीं है। इसलिएजिना चोरी जैसे अन्य अपराधों की तरह नहीं हैक्योंकि चोरी को सार्वभौमिक रूप से दंडनीय और असहनीय माना जाता है।

हालाँकिहमें यह समझने की आवश्यकता है कि अधिकांश सभ्यताओं मेंएकांगी संबंध (पुरे जीवन में एक साथी के साथ रहना) और एकल परिवार आदर्श हैंपुरुष और महिलाएं अपने साथी और बच्चों के बारे में बहुत सकारात्मक होते हैं। ऐसे समाज में यौन विविधता की चाहत ही व्यक्ति को अपने साथी को धोखा देने पर मजबूर करती है। फिर भीदुनिया के अधिकांश हिस्सों मेंदो वयस्कों के बीच सहमति से सेक्स को वैध कर दिया गया है।

दुनिया की अधिकांश आबादी में जिना प्रचलित और आम हैऔर इसके विभिन्न रूप हैंजैसे कि सिर्फ एक बार की मुलाक़ातएक रात की मुलाक़ातसामाजिक सेक्स या एक उपयोगी दोस्तगनीमत कॉल (बूटी कॉल)मनोरंजन सेक्ससेक्स के लिए मिलनाजो अब डेटिंग में बदल गया है। हालांकिऐसे समाज में भी जहां एक व्यक्ति कई भागीदारों के साथ रहता हैभले ही दो लोग बिना शादी के एक साथ रहते होंदोनों चाहते हैं कि एक-दूसरे अपने साथी के साथ ईमानदार रहें। भले ही उनमें से एक का इस रिश्ते के बाहर सामान्य रोमांटिक मुलाक़ात भी करे तो मामला इतना गंभीर हो जाता है कि यह ब्रेक-अप तक की नौबत आ जाती हैजब तक कि दोनों स्विंगर हों और आनंद के लिए मज़ेदार सेक्स करने को तैयार हों। इसलिएरिश्ते में ईमानदारी की कमी एक गंभीर समस्या बनी हुई हैजिससे ब्रेकअप और प्रेम अपराध होते हैं। ब्रेकअप हमेशा दोनों के लिए दर्दनाक होता है और दोनों पर गहरी छाप छोड़ता है। जिस समाज में जिना आम बात हैउस समाज में तनाव होता हैऔर लोग एक-दूसरे को संदेह की नजर से देखते हैंऔर भागीदारों का आपसी विश्वास लंबे समय तक नहीं रहता है और जल्द ही टूट जाता है। यह महामारी के पैमाने पर मानसिक रोगों के लिए भोजन प्रदान करता है। चीजें इतनी खराब हो गई हैं कि सेक्स अब प्यार और अंतरंगता की परिणति नहीं रहे, बल्कि केवल एक शारीरिक क्रिया हो कर रह गए हैंबिलकुल वैसे ही जैसे वैश्याओं और उनके ग्राहकों के बीच होता हैसिवाय इसके कि ये दो वयस्क अपनी मर्जी से सेक्स करते हैं और इनमें से कोई भी वेश्या नहीं है। यह हुक-अप वाली पीढ़ी है। ऐसे समाज में गंभीर मानसिक बीमारी और आत्महत्या और अपराध दर में वृद्धि होने की उम्मीद है।

कुरआन में वर्णित जिना का कानून आज भले ही सड़ा हुआ लग रहा होलेकिन सच्चाई यह है कि प्यारनिकटतास्थिरता और वफादारी अपने रिश्तों में रहने वाले हर प्राणी को प्रिय है। लेकिन ऐसी स्थिति में जहां बेवफाई आम हैजो आधुनिक समय की पहचान हैतलाक की दर तेजी से बढ़ रही हैविभिन्न मानसिक बीमारियां पैदा हो रही हैंजिससे रिश्ते में बिखराव के कारण बच्चे और युवा दोनों के जूझ रहे हैं। वहां के हर समाज को इस्लामी सिद्धांतों की आकांक्षा करनी चाहिए। हालांकिएक गैर-धार्मिक समाज के लिए वयस्कों के बीच सहमति से सेक्स को दंडित करने वाले कानूनों का व्यापक समर्थन करना लगभग असंभव है। हमारी सभी नैतिकता धर्म से निकली है और चोरीहत्याबलात्कार आदि कृत्यों के संबंध में नैतिक कानून बनाने के लिए समाज में आम सहमति हैलेकिन सहमति से यौन कृत्यों पर कोई सहमति नहीं है।

इसलिए इस्लाम की नजर में जो सबसे गंभीर अपराध है वह गैर-धार्मिक समाजों में बिल्कुल भी अपराध ही नहीं है। मुसलमान यदि चाहें तो इस्लामी सिद्धांतों को स्वीकार करके और उनका पालन करके इस्लाम के दायरे में रह सकते हैंया यदि वे चाहें तो इस्लामी समाज को छोड़ कर ऐसे समाज में शामिल हो सकते हैं जहां इस तरह के सिद्धांतों का सख्ती से पालन नहीं किया जाता है। इस संबंध मेंकुरआन स्पष्ट रूप से मुसलमानों को जीना करने वालों से शादी करने के खिलाफ चेतावनी देता है।

जिना के कानून में व्यापक पृष्ठभूमि

जिना के कानून पर इस्लाम का व्यापक दृष्टिकोण है। ऐसा लगता है कि यौन नैतिकता के बिना कोई नैतिक सिद्धांत संभव नहीं है। आदम और हव्वा को स्वर्ग से केवल इसलिए निकाल दिया गया क्योंकि उन्होंने कुछ ऐसा किया जिससे उन्हें अपने गुप्तांगों के बारे में पता चला और उन्हें इसे छिपाना पड़ा।

فَقُلْنَا يَآ اٰدَمُ اِنَّ هٰذَا عَدُوٌّ لَّكَ وَلِزَوْجِكَ فَلَا يُخْرِجَنَّكُـمَا مِنَ الْجَنَّـةِ فَتَشْقٰى۔ اِنَّ لَكَ اَلَّا تَجُوْعَ فِيْـهَا وَلَا تَعْرٰى۔  وَاَنَّكَ لَا تَظْمَاُ فِيْـهَا وَلَا تَضْحٰى ۔ فَوَسْوَسَ اِلَيْهِ الشَّيْطَانُ قَالَ يَآ اٰدَمُ هَلْ اَدُلُّكَ عَلٰى شَجَرَةِ الْخُلْـدِ وَمُلْكٍ لَّا يَبْلٰی۔فَاَكَلَا مِنْـهَا فَبَدَتْ لَـهُمَا سَوْاٰتُـهُمَا وَطَفِقَا يَخْصِفَانِ عَلَيْـهِمَا مِنْ وَّرَقِ الْجَنَّـةِ ۚ وَعَصٰٓى اٰدَمُ رَبَّهٝ فَغَوٰى(سورہ طہ آیت نمبر۱۱۷ سے  ۱۲۱ تک)

अनुवाद: तो मैंने (आदम से कहा) कि ऐ आदम ये यक़ीनी तुम्हारा और तुम्हारी बीवी का दुशमन है तो कहीं तुम दोनों को बेहिश्त से निकलवा न छोड़े तो तुम (दुनिया की) मुसीबत में फँस जाओ (117) कुछ शक नहीं कि (बेहिश्त में) तुम्हें ये आराम है कि न तो तुम यहाँ भूके रहोगे और न नँगे (118) और न यहाँ प्यासे रहोगे और न धूप खाओगे (119) तो शैतान ने उनके दिल में वसवसा डाला (और) कहा ऐ आदम क्या मैं तम्हें (हमेशगी की ज़िन्दगी) का दरख्त और वह सल्तनत जो कभी ज़ाएल न हो बता दूँ (120) चुनान्चे दोनों मियाँ बीबी ने उसी में से कुछ खाया तो उनका आगा पीछा उनपर ज़ाहिर हो गया और दोनों बेहिश्त के (दरख्त के) पत्ते अपने आगे पीछे पर चिपकाने लगे और आदम ने अपने परवरदिगार की नाफ़रमानी की (121)

दूसरी जगह इसी कहानी को कुछ इस तरह बयान किया गया है:

فَوَسْوَسَ لَهُمَا ٱلشَّيْطَـٰنُ لِيُبْدِىَ لَهُمَا مَا وُۥرِىَ عَنْهُمَا مِن سَوْءَٰتِهِمَا وَقَالَ مَا نَهَىٰكُمَا رَبُّكُمَا عَنْ هَـٰذِهِ ٱلشَّجَرَةِ إِلَّآ أَن تَكُونَا مَلَكَيْنِ أَوْ تَكُونَا مِنَ ٱلْخَـٰلِدِينَ۔ وَقَاسَمَهُمَآ إِنِّى لَكُمَا لَمِنَ ٱلنَّـٰصِحِينَ۔ فدَلَّىٰهُمَا بِغُرُورٍ ۚ فَلَمَّا ذَاقَا ٱلشَّجَرَةَ بَدَتْ لَهُمَا سَوْءَٰتُهُمَا وَطَفِقَا يَخْصِفَانِ عَلَيْهِمَا مِن وَرَقِ ٱلْجَنَّةِ ۖ وَنَادَىٰهُمَا رَبُّهُمَآ أَلَمْ أَنْهَكُمَا عَن تِلْكُمَا ٱلشَّجَرَةِ وَأَقُل لَّكُمَآ إِنَّ ٱلشَّيْطَـٰنَ لَكُمَا عَدُوٌّ مُّبِينٌ۔ قَالَا رَبَّنَا ظَلَمْنَآ أَنفُسَنَا وَإِن لَّمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ ٱلْخَـٰسِرِينَ۔ (سورہ الاعراف، آیت نمبر ۲۰ سے ۲۳ تک)

अनुवाद: फिर शैतान ने उन दोनों को वसवसा (शक) दिलाया ताकि (नाफरमानी की वजह से) उनके अस्तर की चीज़े जो उनकी नज़र से बेहश्ती लिबास की वजह से पोशीदा थी खोल डाले कहने लगा कि तुम्हारे परवरदिगार ने दोनों को दरख्त (के फल खाने) से सिर्फ इसलिए मना किया है (कि मुबादा) तुम दोनों फरिश्ते बन जाओ या हमेशा (ज़िन्दा) रह जाओ (20) और उन दोनों के सामने क़समें खायीं कि मैं यक़ीनन तुम्हारा ख़ैर ख्वाह हूँ (21) ग़रज़ धोखे से उन दोनों को उस (के खाने) की तरफ ले गया ग़रज़ जो ही उन दोनों ने इस दरख्त (के फल) को चखा कि (बेहश्ती लिबास गिर गया और समझ पैदा हुई) उन पर उनकी शर्मगाहें ज़ाहिर हो गयीं और बेहश्त के पत्ते (तोड़ जोड़ कर) अपने ऊपर ढापने लगे तब उनको परवरदिगार ने उनको आवाज़ दी कि क्यों मैंने तुम दोनों को इस दरख्त के पास (जाने) से मना नहीं किया था और (क्या) ये न जता दिया था कि शैतान तुम्हारा यक़ीनन खुला हुआ दुश्मन है (22) ये दोनों अर्ज क़रने लगे ऐ हमारे पालने वाले हमने अपना आप नुकसान किया और अगर तू हमें माफ न फरमाएगा और हम पर रहम न करेगा तो हम बिल्कुल घाटे में ही रहेगें (23)

हमारे जीन मरते नहीं हैंवे हमारे बच्चों में चले जाते हैं और हमेशा जीवित रहते हैं। उपरोक्त आयतों का अर्थ यह हो सकता है कि शैतान ने आदम और उसकी पत्नी हव्वा को यौन संबंध बनाने के लिए प्रलोभित किया क्योंकि वे अपने शरीर की यौन प्रकृति और आवश्यकताओं से अवगत हो गए थे। (हम आदम के वंशज हैंइसलिए हमारे जीन समान होंगे)

यौन हया और शर्म के बारे में आयतें

يَٰبَنِيٓ آدَمَ قَدۡ أَنزَلۡنَا عَلَيۡكُمۡ لِبَاسٗا يُوَٰرِي سَوۡءَٰتِكُمۡ وَرِيشٗا وَلِبَاسُ ٱلتَّقۡوَىٰ ذَٰلِكَ خَيۡرٞۚ ذَٰلِكَ مِنۡ آيَٰتِ ٱللَّهِ لَعَلَّهُمۡ يَذَّكَّرُونَ۔ یبَنِيٓ آدَمَ لَا يَفۡتِنَنَّكُمُ ٱلشَّيۡطَٰنُ كَمَآ أَخۡرَجَ أَبَوَيۡكُم مِّنَ ٱلۡجَنَّةِ يَنزِعُ عَنۡهُمَا لِبَاسَهُمَا لِيُرِيَهُمَا سَوۡءَٰتِهِمَآۚ إِنَّهُۥ يَرَىٰكُمۡ هُوَ وَقَبِيلُهُۥ مِنۡ حَيۡثُ لَا تَرَوۡنَهُمۡإِنَّا جَعَلۡنَا ٱلشَّيَٰطِينَ أَوۡلِيَآءَلِلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ۔ وَإِذَا فَعَلُواْ فَٰحِشَةٗ قَالُواْ وَجَدۡنَا عَلَيۡهَآ ءَابَآءَنَا وَٱللَّهُ أَمَرَنَا بِهَاۗ قُلۡ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَأۡمُرُ بِٱلۡفَحۡشَآءِ أَتَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ مَا لَا تَعۡلَمُونَ۔ قُلۡ أَمَرَ رَبِّي بِٱلۡقِسۡطِ وَأَقِيمُواْ وُجُوهَكُمۡ عِندَ كُلِّ مَسۡجِدٖ وَٱدۡعُوهُ مُخۡلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ كَمَا بَدَأَكُمۡ تَعُودُونَ۔ فَرِيقًا هَدَىٰ وَفَرِيقًا حَقَّ عَلَيۡهِمُ ٱلضَّلَٰلَة  إِنَّهُمُ ٱتَّخَذُواْٱلشَّيَٰطِينَ أَوۡلِيَآءَ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَيَحۡسَبُونَ أَنَّهُم مُّهۡتَدُونَ۔ (سورہ الاعراف، آیت نمبر ۲۶ سے ۳۰ تک)

अनुवाद: और उसी में से (और) उसी में से फिर दोबारा तुम ज़िन्दा करके निकाले जाओगे ऐ आदम की औलाद हमने तुम्हारे लिए पोशाक नाज़िल की जो तुम्हारे शर्मगाहों को छिपाती है और ज़ीनत के लिए कपड़े और इसके अलावा परहेज़गारी का लिबास है और ये सब (लिबासों) से बेहतर है ये (लिबास) भी ख़ुदा (की कुदरत) की निशानियों से है (26) ताकि लोग नसीहत व इबरत हासिल करें ऐ औलादे आदम (होशियार रहो) कहीं तुम्हें शैतान बहका न दे जिस तरह उसने तुम्हारे बाप माँ आदम व हव्वा को बेहश्त से निकलवा छोड़ा उसी ने उन दोनों से (बेहश्ती) पोशाक उतरवाई ताकि उन दोनों को उनकी शर्मगाहें दिखा दे वह और उसका क़ुनबा ज़रूर तुम्हें इस तरह देखता रहता है कि तुम उन्हे नहीं देखने पाते हमने शैतानों को उन्हीं लोगों का रफीक़ क़रार दिया है (27) जो ईमान नही रखते और वह लोग जब कोई बुरा काम करते हैं कि हमने उस तरीके पर अपने बाप दादाओं को पाया और ख़ुदा ने (भी) यही हुक्म दिया है (ऐ रसूल) तुम साफ कह दो कि ख़ुदा ने (भी) यही हुक्म दिया है (ऐ रसूल) तुम (साफ) कह दो कि ख़ुदा हरगिज़ बुरे काम का हुक्म नहीं देता क्या तुम लोग ख़ुदा पर (इफ्तिरा करके) वह बातें कहते हो जो तुम नहीं जानते (28) (ऐ रसूल) तुम कह दो कि मेरे परवरदिगार ने तो इन्साफ का हुक्म दिया है और (ये भी क़रार दिया है कि) हर नमाज़ के वक्त अपने अपने मुँह (क़िबले की तरफ़) सीधे कर लिया करो और इसके लिए निरी खरी इबादत करके उससे दुआ मांगो जिस तरह उसने तुम्हें शुरू शुरू पैदा किया था (29) उसी तरह फिर (दोबारा) ज़िन्दा किये जाओगे उसी ने एक फरीक़ की हिदायत की और एक गिरोह (के सर) पर गुमराही सवार हो गई उन लोगों ने ख़ुदा को छोड़कर शैतानों को अपना सरपरस्त बना लिया और बावजूद उसके गुमराह करते हैं कि वह राह रास्ते पर है (30)

जैसे वस्त्र हमारे गुप्तांगों को ढँक देते हैं और हमारे लिए श्रंगार बन जाते हैंवैसे ही आखिरत में तक्वा हमारा वस्त्र होगा जो हमारे गुप्तांगों को ढँक देगा और हमारा श्रंगार बन जाएगा। जो मुत्तकी नहीं हैं वे लज्जा से आच्छादित होंगे। तक्वा का अर्थ है अल्लाह के आदेशों और निषेधों का सर्वोत्तम तरीके से पालन करना।

पति-पत्नी एक दूसरे के कपड़े हैं

أُحِلَّ لَكُمۡ لَيۡلَةَ ٱلصِّيَامِٱلرَّفَثُ إِلَىٰ نِسَآئِكُمۡهُنَّ لِبَاسٞ لَّكُمۡ وَأَنتُمۡ لِبَاسٞ لَّهُنَّ۔(سورہ البقرہ آیت نمبر ۱۸۷)

अनुवाद: रोज़ों की रातों में अपनी बीवियों के पास जाना हलाल कर दिया गया औरतें (गोया) तुम्हारी चोली हैं और तुम (गोया उन के दामन हो)

पति-पत्नी के बीच कोई शर्म नहीं हैजैसे हमारे और हमारे पहनावे में कोई शर्म नहीं है। हमारी पत्नियां हमारे वस्त्र हैं जो हमें विवाहेतर संबंधों से मुक्त रखती हैंजबकि वैवाहिक संबंधों के दायरे में हमें पूर्ण यौन स्वतंत्रता की अनुमति है।

अपनी निगाहों की हिफाज़त

قُلْ لِّلْمُؤْمِنِيْنَ يَغُضُّوْا مِنْ اَبْصَارِهِـمْ وَيَحْفَظُوْا فُرُوْجَهُـمْ ذٰلِكَ اَزْكـٰى لَـهُـمْ، اِنَّ اللّـٰهَ خَبِيْـرٌ بِمَا يَصْنَعُوْنَ۔ وَقُلْ لِّلْمُؤْمِنَاتِ يَغْضُضْنَ مِنْ اَبْصَارِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوْجَهُنَّ وَلَا يُبْدِيْنَ زِيْنَتَهُنَّ اِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْـهَا ، وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلٰى جُيُوْبِهِنَّ ، وَلَا يُبْدِيْنَ زِيْنَتَهُنَّ اِلَّا لِبُعُوْلَتِهِنَّ اَوْ اٰبَآئِهِنَّ اَوْ اٰبَآءِ بُعُوْلَتِهِنَّ اَوْ اَبْنَآئِهِنَّ اَوْ اَبْنَآءِ بُعُوْلَتِهِنَّ اَوْ اِخْوَانِهِنَّ اَوْ بَنِىٓ اِخْوَانِهِنَّ اَوْ بَنِىٓ اَخَوَاتِهِنَّ اَوْ نِسَآئِهِنَّ اَوْ مَا مَلَكَتْ اَيْمَانُهُنَّ اَوِ التَّابِعِيْنَ غَيْـرِ اُولِى الْاِرْبَةِ مِنَ الرِّجَالِ اَوِ الطِّفْلِ الَّـذِيْنَ لَمْ يَظْهَرُوْا عَلٰى عَوْرَاتِ النِّسَآءِ ۖ وَلَا يَضْرِبْنَ بِاَرْجُلِهِنَّ لِيُعْلَمَ مَا يُخْفِيْنَ مِنْ زِيْنَتِهِنَّ ۚ وَتُوْبُـوٓا اِلَى اللّـٰهِ جَـمِيْعًا اَيُّهَ الْمُؤْمِنُـوْنَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُوْنَ(سورہ النور آیت نمبر۳۰ سے ۳۱)

अनुवाद: (ऐ रसूल) ईमानदारों से कह दो कि अपनी नज़रों को नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें यही उनके वास्ते ज्यादा सफाई की बात है ये लोग जो कुछ करते हैं ख़ुदा उससे यक़ीनन ख़ूब वाक़िफ है (30) और (ऐ रसूल) ईमानदार औरतों से भी कह दो कि वह भी अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें और अपने बनाव सिंगार (के मक़ामात) को (किसी पर) ज़ाहिर न होने दें मगर जो खुद ब खुद ज़ाहिर हो जाता हो (छुप न सकता हो) (उसका गुनाह नही) और अपनी ओढ़नियों को (घूँघट मारके) अपने गरेबानों (सीनों) पर डाले रहें और अपने शौहर या अपने बाप दादाओं या आपने शौहर के बाप दादाओं या अपने बेटों या अपने शौहर के बेटों या अपने भाइयों या अपने भतीजों या अपने भांजों या अपने (क़िस्म की) औरतों या अपनी या अपनी लौंडियों या (घर के) नौकर चाकर जो मर्द सूरत हैं मगर (बहुत बूढे होने की वजह से) औरतों से कुछ मतलब नहीं रखते या वह कमसिन लड़के जो औरतों के पर्दे की बात से आगाह नहीं हैं उनके सिवा (किसी पर) अपना बनाव सिंगार ज़ाहिर न होने दिया करें और चलने में अपने पाँव ज़मीन पर इस तरह न रखें कि लोगों को उनके पोशीदा बनाव सिंगार (झंकार वग़ैरह) की ख़बर हो जाए और ऐ ईमानदारों तुम सबके सब ख़ुदा की बारगाह में तौबा करो ताकि तुम फलाह पाओ (31)

बुराई का मार्ग लज्जा और अपमान से होकर गुजरता हैपहले शैतान हमसे हमारी लज्जा या वस्त्र छीनता है और फिर बुराई शुरू होती है। बुराई से बचने के लिए शर्म की भावना का होना बहुत जरूरी है। शर्म और शालीनता से रहित व्यक्ति आसानी से सभी बुराई और नफ्स के धोखे में आ जाता है। इसलिए नैतिकता की शुरुआत पाक दामनी से ही होती है। अगर लज्जा उतरेगी तो मनुष्य झूठ भी बोलेगाछल करेगागबन करेगाचोरी करेगाबलात्कार करेगा और स्वयं के मोह में पड़ जाएगा।

जिना सबसे बड़ी बुराई है। जिना न केवल हराम हैबल्कि अपने सच्चे जीवनसाथी के साथ धोखा और चोरी करना भी है। यह शुद्ध विश्वास के साथ विश्वासघात है। मनुष्य अपने नाजायज संबंधों को छिपाने के लिए तरह-तरह के झूठ और धोखे का भी इस्तेमाल करता है। यह स्वार्थी और नफ्स परस्ती भी है।इसके बुरे प्रभाव न केवल पति या पत्नी बल्कि बच्चों और पूरे परिवार पर पड़ते हैं। जब राज खुलते हैं तो समाज के बिगड़ने का खतरा रहता है। इसलिए इस्लाम मुस्लिम समाज को ऐसी बुराइयों से बचाता है। कुरआन में वर्णित इस्लामी कानूनों पर आधारित इस्लामी नैतिकता एक पूर्ण धर्म है जो सामाजिक न्यायखुशीसंतोषमानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को भी सुनिश्चित करता है।

الَّذِينَ يَسْتَمِعُونَ الْقَوْلَ فَيَتَّبِعُونَ أَحْسَنَهُ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ هَدَاهُمُ اللَّهُ وَأُولَٰئِكَ هُمْ أُولُو الْأَلْبَابِ(سورہ الزمر آیت نمبر ۱۸)

अनुवाद: तो (ऐ रसूल) तुम मेरे (ख़ास) बन्दों को खुशख़बरी दे दो जो बात को जी लगाकर सुनते हैं और फिर उसमें से अच्छी बात पर अमल करते हैं यही वह लोग हैं जिनकी खुदा ने हिदायत की और यही लोग अक्लमन्द हैं

नसीर अहमद न्यू एज इस्लाम डॉट कॉम के नियमित स्तंभकार हैं।उन्होंने आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग की है। लगभग तीन दशकों तक सरकारी और निजी क्षेत्रों में काम करने के बादवह अब एक स्वतंत्र आईटी सलाहकार के रूप में काम करते हैं। उन्होंने वर्षों तक कुरआन का बहुत गहराई से अध्ययन किया है और इसकी तफसीर में कई मूल्यवान इज़ाफे किये हैं।

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