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Hindi Section ( 11 Feb 2018, NewAgeIslam.Com)

Revisiting the Meaning of Kafir काफिर के अर्थ पर नए सिरे से विचार

 

 

नसीर अहमद, न्यू एज इस्लाम

27 दिसंबर 2017

शब्द काफिर के माद्दा (कुफ्र) के अर्थ अस्वीकार करने, रद्द करने, छिपाने, ढांपने, मिटाने और विकृत करने के हैंl कौन इनकार करने वाला है और किस बात का इनकार किया जा रहा है यह इसके अर्थ का हिस्सा नहीं हैl अल्लाह हमारे गुनाहों को मिटने के कारण काफिर है, किसान बीज को मिटटी से ढांपने की वजह से काफिर है, एक मोमिन झूठे माबुदों का इनकार करने की वजह से काफिर है, मूसा अपने पूर्वजों फिरऔन को इबादत किये जाने के हक़ से महरूम करने की वजह से काफिर हैंl कुरआन के अंदर शब्द काफिर का प्रयोग उन सभी अर्थ में हुआ हैl जहाँ जहाँ शब्द काफिर का प्रयोग हुआ है उन सभी स्थानों पर उसके माद्दा कुफ्र का अर्थ मौजूद हैl

शब्द काफिर के अर्थ की समझ

शैतान सबसे पहला काफ़िर थाl किस बात ने उसे काफिर बना दिया? वह कोई गैर मोमिन नहीं था और ना ही उसने ईमान का या हक़ का इनकार किया थाl उसने आदम अलैहिस्सलाम को सजदा करने के अल्लाह के हुक्म की ना फ़रमानी कीl वह अल्लाह के हुकुक की खिलाफ वर्जी करने वाला नाशुकरा बाग़ी (काफिर) बन गयाl

وَإِذْ قُلْنَا لِلْمَلَائِكَةِ اسْجُدُوا لِآدَمَ فَسَجَدُوا إِلَّا إِبْلِيسَ أَبَىٰ وَاسْتَكْبَرَ وَكَانَ مِنَ الْكَافِرِينَ

“और (उस वक्त क़ो याद करो) जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो तो सब के सब झुक गए मगर शैतान ने इन्कार किया और ग़ुरूर में आ गया और काफ़िर हो गया” (2:34)

अब किसी चीज़ को छिपाने के अर्थ में कुफ्र के असल अर्थ पर वापस आते हैं? उसने अल्लाह की इताअत व फरमा बरदारी और उसका शुक्रगुजार बनने की खुदा दाद बौद्धिक क्षमता, दलील और फितरत को छिपाया, या उस पर उसके तकब्बुर और आदम से दुश्मनी और इर्ष्या का गलबा हो गया जिनहें उसने खुद से कमतर समझाl

قَالَ رَبِّ بِمَا أَغْوَيْتَنِي لَأُزَيِّنَنَّ لَهُمْ فِي الْأَرْضِ وَلَأُغْوِيَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ

“उन शैतान ने कहा ऐ मेरे परवरदिगार चूंकि तूने मुझे रास्ते से अलग किया मैं भी उनके लिए दुनिया में (साज़ व सामान को) उम्दा कर दिखाऊँगा और सबको ज़रुर बहकाऊगाl” (15:39)

केवल यही नहीं बल्कि उसने आदम और उनकी औलाद से क़यामत तक दुश्मनी निभाने और उनहें अल्लाह के रास्ते पर चलने से रोकने का वादा कियाl इसलिए, अपने घमंड, इर्ष्या, नफ़रत और दूसरी बुरी लक्षणों से अपनी प्राकृतिक अच्छाइयों, तार्किक सोच और बौद्धिक सलाहियतों को छिपा लेना, और शैतान की तरह, सक्रिय रूप से केवल ईमान की बुनियाद पर और इस वजह से कि वह नेकी की दावत देते हैं और बुराई से रोकते हैं मोमिनों का विरोध करना और उनकी राह में रुकावट डालना कुफ्र हैl ईमान से इनकार की वजह से लोग काफिर हैं, वह ईमान कुबूल ना करने वाले या “काफिर” नहीं हैं और ना ही अपनी जाती ज़िन्दगी में वह गुनाहगार हैं, बल्कि वह अच्छे ईमान वालों के सक्रीय दुश्मन, उन पर ज़ुल्म व सितम करने वाले और शैतान की तरह खुदा के दुश्मन हैंl

मुसा (अलैहिस्सला) को फिरऔन ने काफिर कहा!

قَالَ أَلَمْ نُرَبِّكَ فِينَا وَلِيدًا وَلَبِثْتَ فِينَا مِنْ عُمُرِكَ سِنِينَ ۔ وَفَعَلْتَ فَعْلَتَكَ الَّتِي فَعَلْتَ وَأَنتَ مِنَ الْكَافِرِينَ

“(चुनान्चे मूसा गए और कहा) फिरऔन बोला (मूसा) क्या हमने तुम्हें यहाँ रख कर बचपने में तुम्हारी परवरिश नहीं की और तुम अपनी उम्र से बरसों हम मे रह सह चुके हो (18) और तुम अपना वह काम (ख़ून क़िब्ती) जो कर गए और तुम (बड़े) नाशुक्रे हो” (19) (26:18-19)

इस आयत में काफिर का शब्द नाशुकरी और बगावत के अर्थ में हैl उसका इमानौर अकीदे के साथ कोई संबंध नहीं हैl मुसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के हुक्म की पैरवी कर रहे थे, लेकिन फिरऔन के दृष्टिकोण से, जिसने एक बेटे के तौर पर उनकी परवरिश की थी; वह वास्तव में एक बाग़ी थे जो फिरऔन के खिलाफ खड़े हुए और आपने अपने बेटे पर इताअत के एक बाप के हुकुक से इनकार कियाl

मोमिनों का ज़िक्र बतौर काफिर

وَجَاءَ الْمُعَذِّرُونَ مِنَ الْأَعْرَابِ لِيُؤْذَنَ لَهُمْ وَقَعَدَ الَّذِينَ كَذَبُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۚ سَيُصِيبُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ

“और (तुम्हारे पास) कुछ हीला करने वाले गवार देहाती (भी) आ मौजदू हुए ताकि उनको भी (पीछे रह जाने की) इजाज़त दी जाए और जिन लोगों ने ख़ुदा और उसके रसूल से झूठ कहा था वह (घर में) बैठ रहे (आए तक नहीं) उनमें से जिन लोगों ने कुफ़्र एख्तेयार किया अनक़रीब ही उन पर दर्दनाक अज़ाब आ पहुँचेगाl” (9:90)

इस आयत में शब्द काफिर उन लोगों के लिए प्रयोग किया गया है जिन्होंने ईमान का इकरार किया था और खुद को मुसलमान बतातेl वह ना फरमान बागी थेl

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَنفِقُوا مِمَّا رَزَقْنَاكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَ يَوْمٌ لَّا بَيْعٌ فِيهِ وَلَا خُلَّةٌ وَلَا شَفَاعَةٌ ۗ وَالْكَافِرُونَ هُمُ الظَّالِمُونَ

“ऐ ईमानदारों जो कुछ हमने तुमको दिया है उस दिन के आने से पहले (ख़ुदा की राह में) ख़र्च करो जिसमें न तो ख़रीदो फरोख्त होगी और न यारी (और न आशनाई) और न सिफ़ारिश (ही काम आयेगी) और कुफ़्र करने वाले ही तो जुल्म ढाते हैंl” (2:254)

इस आयत में काफिर और ज़ालिम कौन हैं? जो खुदा की नेमतों को खर्च नहीं करते हैंl इस आयत में काफिरून और जालिमून से वह मोमिनीन मुराद हैं जो अल्लाह की नेमतों को खर्च ना करके अल्लाह की ना शुकरी का प्रदर्शन करते हैंl वह ना शुकरे बाग़ी हैंl

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُبْطِلُوا صَدَقَاتِكُم بِالْمَنِّ وَالْأَذَىٰ كَالَّذِي يُنفِقُ مَالَهُ رِئَاءَ النَّاسِ وَلَا يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۖ فَمَثَلُهُ كَمَثَلِ صَفْوَانٍ عَلَيْهِ تُرَابٌ فَأَصَابَهُ وَابِلٌ فَتَرَكَهُ صَلْدًا ۖ لَّا يَقْدِرُونَ عَلَىٰ شَيْءٍ مِّمَّا كَسَبُوا ۗ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ

“ऐ ईमानदारों आपनी खैरात को एहसान जताने और (सायल को) ईज़ा (तकलीफ) देने की वजह से उस शख्स की तरह अकारत मत करो जो अपना माल महज़ लोगों को दिखाने के वास्ते ख़र्च करता है और ख़ुदा और रोजे आखेरत पर ईमान नहीं रखता तो उसकी खैरात की मिसाल उस चिकनी चट्टान की सी है जिसपर कुछ ख़ाक (पड़ी हुई) हो फिर उसपर ज़ोर शोर का (बड़े बड़े क़तरों से) मेंह बरसे और उसको (मिट्टी को बहाके) चिकना चुपड़ा छोड़ जाए (इसी तरह) रियाकार अपनी उस ख़ैरात या उसके सवाब में से जो उन्होंने की है किसी चीज़ पर क़ब्ज़ा न पाएंगे (न दुनिया में न आख़ेरत में) और ख़ुदा काफ़िरों को हिदायत करके मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचाया करता l” (2:264)

बल्कि इस आयत में काफिरीन से मुराद ईमान वाले हैं, जो अपने माल को नाम व नुमूद के लिए खर्च करते हैंl ऐसे लोग हिदायत से महरूम रहेंगेl

الَّذِينَ يَبْخَلُونَ وَيَأْمُرُونَ النَّاسَ بِالْبُخْلِ وَيَكْتُمُونَ مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ ۗ وَأَعْتَدْنَا لِلْكَافِرِينَ عَذَابًا مُّهِينًا

“ये वह लोग हैं जो ख़ुद तो बुख्ल करते ही हैं और लोगों को भी बुख्ल का हुक्म देते हैं और जो माल ख़ुदा ने अपने फ़ज़ल व (करम) से उन्हें दिया है उसे छिपाते हैं और हमने तो कुफ़राने नेअमत करने वालों के वास्ते सख्त ज़िल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा हैl” (4:37)

आयत 4:29 का आगाज़ मोमिनों से खिताब के साथ होता है और आयत 4:37 में भी 4:29 मोमिनों के लिए इसी पैगाम का ज़िक्र हैl

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَأْكُلُوا الرِّبَا أَضْعَافًا مُّضَاعَفَةً ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ ۔وَاتَّقُوا النَّارَ الَّتِي أُعِدَّتْ لِلْكَافِرِينَ

“ऐ ईमानदारों सूद दनादन खाते न चले जाओ और ख़ुदा से डरो कि तुम छुटकारा पाओl और जहन्नुम की उस आग से डरो जो काफ़िरों के लिए तैयार की गयी है” (3:130-131)

मोमिनीन ही सूद खाते हैं जिनहें आग से डरने के लिए कहा गया है और जो मोमिनीन सूद खाते हैं काफिरीन हैंl

उपर्युक्त सभी आयतों में अकसर अनुवादकों नें काफिरीन का अनुवाद “ईमान का इनकार करने वाले” या “काफिरुन” किया है जो गलत है क्योंकि उनमें खिताब मोमिनों से है और वह ईमान लेन वाले और ईमान का इनकार करने वाले और ईमान का इनकार करने वाले या काफिर दोनों नहीं हो सकतेl मामले की हकीकत यह है कि, चूँकि इस आयत के मुखातिब मोमिन हैं, इसी लिए सूद आदि उनके लिए कुफ्र है लेकिन काफिरों के लिए नहींl या यह कि इसमें सभी आदमियों या “आदम अलैहिस्सलाम की सारी औलाद” का ज़िक्र हैl

जो लोग आखिरत में झूठे खुदाओं को झुठलाएंगे उनहें काफिरीन कहा गया है

وَلَمْ يَكُن لَّهُم مِّن شُرَكَائِهِمْ شُفَعَاءُ وَكَانُوا بِشُرَكَائِهِمْ كَافِرِينَ

और उनके शरीकों में से एक भी उनका सिफारिशी ना होगा और (खुद यह भी) अपने शरीकों के मुनकिर हो जाएँगेl

निम्नलिखित आयत के अनुसार शिर्क को अस्वीकार करने के कारण कोई काफिर हो सकता हैl दरअसल बातिल को अस्वीकार करने की वजह से भी कोई काफिर बन सकता हैl

काफिर का अर्थ किसान है

كَمَثَلِ غَيْثٍ أَعْجَبَ الْكُفَّارَ نَبَاتُهُ ثُمَّ يَهِيجُ فَتَرَاهُ مُصْفَرًّا ثُمَّ يَكُونُ حُطَامًا

“जान रखो कि दुनियावी ज़िन्दगी महज़ खेल और तमाशा और ज़ाहिरी ज़ीनत (व आसाइश) और आपस में एक दूसरे पर फ़ख्र क़रना और माल और औलाद की एक दूसरे से ज्यादा ख्वाहिश है (दुनयावी ज़िन्दगी की मिसाल तो) बारिश की सी मिसाल है जिस (की वजह) से किसानों की खेती (लहलहाती और) उनको ख़ुश कर देती थी फिर सूख जाती है तो तू उसको देखता है कि ज़र्द हो जाती है फिर चूर चूर हो जाती है और आख़िरत में (कुफ्फार के लिए) सख्त अज़ाब है और (मोमिनों के लिए) ख़ुदा की तरफ से बख़्शिस और ख़ुशनूदी और दुनयावी ज़िन्दगी तो बस फ़रेब का साज़ो सामान हैl” (57:20)

शब्द कुफ्र का प्रयोग हमारे गुनाहों को मिटाने की वजह से खुदा के लिए प्रयोग किया गया है

رَبَّنَا فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَكَفِّرْ عَنَّا سَيِّئَاتِنَا وَتَوَفَّنَا مَعَ الْأَبْرَار

“ऐ हमारे पालने वाले (जब) हमने एक आवाज़ लगाने वाले (पैग़म्बर) को सुना कि वह (ईमान के वास्ते यूं पुकारता था) कि अपने परवरदिगार पर ईमान लाओ तो हम ईमान लाए पस ऐ हमारे पालने वाले हमें हमारे गुनाह बख्श दे और हमारी बुराईयों को हमसे दूर करे दे और हमें नेकों के साथ (दुनिया से) उठा लेl” (3:193)

فَالَّذِينَ هَاجَرُوا وَأُخْرِجُوا مِن دِيَارِهِمْ وَأُوذُوا فِي سَبِيلِي وَقَاتَلُوا وَقُتِلُوا لَأُكَفِّرَنَّ عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَلَأُدْخِلَنَّهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ثَوَابًا مِّنْ عِندِ اللَّهِ

“तो उनके परवरदिगार ने दुआ कुबूल कर ली और (फ़रमाया) कि हम तुममें से किसी काम करने वाले के काम को अकारत नहीं करते मर्द हो या औरत (उस में कुछ किसी की खुसूसियत नहीं क्योंकि) तुम एक दूसरे (की जिन्स) से हो जो लोग (हमारे लिए वतन आवारा हुए) और शहर बदर किए गए और उन्होंने हमारी राह में अज़ीयतें उठायीं और (कुफ्फ़र से) जंग की और शहीद हुए मैं उनकी बुराईयों से ज़रूर दरगुज़र करूंगा और उन्हें बेहिश्त के उन बाग़ों में ले जाऊॅगा जिनके नीचे नहरें जारी हैं ख़ुदा के यहॉ ये उनके किये का बदला है और ख़ुदा (ऐसा ही है कि उस) के यहॉ तो अच्छा ही बदला हैl”( 3:195)

وَلَوْ أَنَّ أَهْلَ الْكِتَابِ آمَنُوا وَاتَّقَوْا لَكَفَّرْنَا عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَلَأَدْخَلْنَاهُمْ جَنَّاتِ النَّعِيمِ

“और अगर अहले किताब ईमान लाते और (हमसे) डरते तो हम ज़रूर उनके गुनाहों से दरगुज़र करते और उनको नेअमत व आराम (बेहिशत के बाग़ों में) पहुंचा देतेl” (5:65)

कुरआन मजीद में काफिर का अर्थ वही है जो उसके माद्दा कुफ्र का हैl काफिर एक गैर जानिबदार इस्तेलाह है और इससे मुराद वह लोग हैं जो:

छिपाते हैं, महव करते हैं, मिटाते हैं, हटाते हैं, रद्द करते हैं या अस्वीकार करते हैंl

इसलिए जिन आयतों में भी कुफ्र, काफेरीन, काफिरून आदि शब्द मजकुर हों, आवश्यक है कि उनमें कुफ्र की प्रकृति का लिहाज़ किया जाए, और वह आयतें केवल उनहीं लोगों को शामिल होंगी जो इस कुफ्र में लिप्त हैंl हालाँकि काफिर का मतलब ईमान को अस्वीकार करने वाला भी हो सकता है, लेकिन कुरआन मजीद में किसी भी आयत में इसका मतलब काफिर नहीं है क्योंकि काफिर का लाजमी अर्थ वह नहीं है जिसने ईमान का इनकार किया होl

इंसान को काफिर करार देना (अर्थात) ईमान का ना होना क्या खुद कुफ्र नहीं है?

“ईमान लाने” का उलटा “ईमान को अस्वीकार” करना है जो कि कुफ्र है और इससे इंसान काफिर हो जाता हैl किसी बात को अस्वीकार करना अस्वीकृति के बराबर नहीं है और इसका इर्तेकाब दुश्मनी पर आधारित किसी अमल के माद्ध्यम या ईमान की हक्कानियत स्पष्ट हो जाने के बाद भी किया जाता है और खुद उनका नफ्स उनके कुफ्र के खिलाफ गवाह बन सकता हैl निम्नलिखित आयतों में इस हद का निर्धारण किया गया है जिससे ऊपर उठने के बाद मुशरिक ईमान कुबूल ना करने की वजह से काफिर हो जाता हैl

سَنُرِيهِمْ آيَاتِنَا فِي الْآفَاقِ وَفِي أَنفُسِهِمْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُ الْحَقُّ ۗ أَوَلَمْ يَكْفِ بِرَبِّكَ أَنَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ

“हम अनक़रीब ही अपनी (क़ुदरत) की निशानियाँ अतराफ (आलम) में और ख़़ुद उनमें भी दिखा देगें यहाँ तक कि उन पर ज़ाहिर हो जाएगा कि वही यक़ीनन हक़ है क्या तुम्हारा परवरदिगार इसके लिए काफी नहीं कि वह हर चीज़ पर क़ाबू रखता हैl” (41:53)

وَجَحَدُوا بِهَا وَاسْتَيْقَنَتْهَا أَنفُسُهُمْ ظُلْمًا وَعُلُوًّا ۚ فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُفْسِدِينَ

“और बावजूद के उनके दिल को उन मौजिज़ात का यक़ीन था मगर फिर भी उन लोगों ने सरकशी और तकब्बुर से उनको न माना तो (ऐ रसूल) देखो कि (आखिर) मुफसिदों का अन्जाम क्या होगाl” (27:14)

وَشَهِدُوا عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ أَنَّهُمْ كَانُوا كَافِرِينَ

“तो जो शख्स ख़ुदा पर झूठ बोहतान बॉधे या उसकी आयतों को झुठलाए उससे बढ़कर ज़ालिम और कौन होगा फिर तो वह लोग हैं जिन्हें उनकी (तक़दीर) का लिखा हिस्सा (रिज़क) वग़ैरह मिलता रहेगा यहाँ तक कि जब हमारे भेजे हुए (फरिश्ते) उनके पास आकर उनकी रूह कब्ज़ करेगें तो (उनसे) पूछेगें कि जिन्हें तुम ख़ुदा को छोड़कर पुकारा करते थे अब वह (कहाँ हैं तो वह कुफ्फार) जवाब देगें कि वह सब तो हमें छोड़ कर चल चंपत हुए और अपने खिलाफ आप गवाही देगें कि वह बेशक काफ़िर थेl” (7:37)

हक्कानियत उनके बातिन में ज़ाहिर हुई या नहीं केवल खुदा ही उसकी खबर दे सकता हैl एक मुशरिक केवल सन्देश को अस्वीकार कर देने से काफिर नहीं बनता जब तक कि हक्कानियत उसके ऊपर स्पष्ट ना हो जाए और खुद उसका नफ्स ईमान के इनकार पर उसके खिलाफ गवाही ना देl मुनकिर के कुफ्र का फैसला केवल अल्लाह के ऊपर है और दुसरे वयक्ति उसके लिए किसी को सज़ा नहीं दे सकते और ना ही कुफ्र के आधार पर काफिरों के खिलाफ लड़ने की इजाज़त किसी को हैl

काफेरीन गैर मोमिन नहीं है बल्कि वह हैं जो ईमान नहीं लाएँगे

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ قُلْ يَا أَيُّهَا الْكَافِرُونَ

لَا أَعْبُدُ مَا تَعْبُدُونَ

وَلَا أَنتُمْ عَابِدُونَ مَا أَعْبُدُ

وَلَا أَنَا عَابِدٌ مَّا عَبَدتُّمْ

وَلَا أَنتُمْ عَابِدُونَ مَا أَعْبُدُ

لَكُمْ دِينُكُمْ وَلِيَ دِينِ

सुरह अल काफिरून नुज़ुली तरतीब के एतेबार से 18 वीं और एक प्रारंभिक मक्की सूरत है और इसमें संबोधन मुशरेकीन के बीच काफिरून से हैl उन काफिरों को यह बताया गया है कि ना ही वह उसकी इबादत करते हैं और ना ही करेंगे जिसकी इबादत नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम करते हैंl यह सटीकता पर आधारित है और इस तरह काफिर ईमान नहीं लाएँगेl वह कौन हैं, हम उनमें से कुछ की शिनाख्त कर सकते हैंl नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को शुरुआती दिनों से ही अपने मिशन में मुखालिफत का सामना थाl हिंसक विरोधियों में विशेष नाम अबू जेहल का है जिसके रवय्ये का ज़िक्र सुरह 96 में है जो कि तरतीब नुज़ुली के एतेबार से पहली सूरत है, और वलीद बिन मुगैय्येरा का भी है जो सख्त मक्कार व अय्यार था और इसका ज़िक्र सुरह कलम 96 में है जो कि तरतीबे नुज़ुली के एतेबार से दूसरी सूरत हैl वह रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर बोहतान तराशी में सबका सरगना था जो जंगे बदर में ज़ख्मी होने की वजह से इसके बाद एक थोड़ी मुद्दत के अंदर ही जहन्नुम सिधार गयाl वलीद बिन मुगैय्येरा एक मालदार अय्याश तबीयत का इंसान था, और पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का बड़ा दुश्मन थाl वह और अबू जेहल दोनों ने मिल कर इस्लाम की तबलीग के आगाज़ से ही रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपने ज़ुल्म व सितम का निशाना बनाने, उनके अकीदों के रास्ते बंद करने और उन पर ईमान लेन वालों को तकलीफ पहुँचाने के लिए जो कर सकते थे वह सब कुछ करते थेl सुरह अल मसद 111 (जो कि तरतीब के एतेबार से छठी सूरत है) अबू लहब और उसकी बीवी का ज़िक्र है और यह दोनों भी पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दुश्मन थेl वह उनके सक्रीय साथी और मददगार काफिर हैं जिनसे कि सुरह अल काफिरून में खिताब हैl तरतीबे नुज़ुली के एतेबार यह 18 वीं सूरत है यह हिजरत से 8 साल पहले नाजिल हुई है जिस दौर में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम काफिरों के बजाए केवल मुशरेकीन के बीच ही दावती काम अंजाम दे रहे थेl

إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا سَوَاءٌ عَلَيْهِمْ أَأَنذَرْتَهُمْ أَمْ لَمْ تُنذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ

“बेशक जिन लोगों ने कुफ़्र इख़तेयार किया उनके लिए बराबर है (ऐ रसूल) ख्वाह (चाहे) तुम उन्हें डराओ या न डराओ वह ईमान न लाएँगेl” (2:6)

अगर काफिर का मतलब गैर मोमिन है तो फिर इस आयत का मतलब यह है कि यह गैर मोमिनों के बीच काम करना बेकार है स्पष्ट तौर पर यह गलत है इसलिए, स्पष्ट तौर पर काफिर का मतलब गैर मोमिन नहीं है, बल्कि इसका मतलब ऐसे व्यक्ति हैं जो अबू लहब के तर्ज़े अमल पर हों जो कभी ईमान नहीं लाएँगेl

فَلَا تُطِعِ الْكَافِرِينَ وَجَاهِدْهُم بِهِ جِهَادًا كَبِيرًا

“(तो ऐ रसूल) तुम काफिरों की इताअत न करना और उनसे कुरान के (दलाएल) से खूब लड़ों” (25:52)

उपर्युक्त आयत में काफ्रों के बीच दावती काम ना करने का हुक्म दिया गया इस लिए कि उनके बीच दावती काम अंजाम देना बेकार है, बल्कि उनके नापाक इरादों को शिकस्त देने के लिए उनके खिलाफ संघर्ष की जाएl

“और नूह के पास ये 'वही' भेज दी गई कि जो ईमान ला चुका उनके सिवा अब कोई शख़्श तुम्हारी क़ौम से हरगिज़ ईमान न लाएगा तो तुम ख्वाहमा ख्वाह उनकी कारस्तानियों का (कुछ) ग़म न खाओl” (11:36)

उपर्युक्त आयत नाजिल होने के बाद कोई भी ईमान नहीं लायाl यहाँ तक कि नुह अलैहिस्सलाम का बेटा भी ईमान से महरूम रहाl

आयत 11:36 की तुलना हिजरत के बाद नाजिल होने वाली आयत 8:32 से किया जाए जिनमें अल्लाह ने मुशरेकीन की अक्सरियत को काफिर नहीं गर्दाना है, बल्कि उनमें यह कहा गया है कि वह मानी तलब कर सकते हैं और ईमान कुबूल कर सकते हैंl

وَإِذْ قَالُوا اللَّهُمَّ إِن كَانَ هَٰذَا هُوَ الْحَقَّ مِنْ عِندِكَ فَأَمْطِرْ عَلَيْنَا حِجَارَةً مِّنَ السَّمَاءِ أَوِ ائْتِنَا بِعَذَابٍ أَلِيمٍ

وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَأَنتَ فِيهِمْ ۚ وَمَا كَانَ اللَّهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ

“और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब उन काफिरों ने दुआएँ माँगीं थी कि ख़ुदा (वन्द) अगर ये (दीन इस्लाम) हक़ है और तेरे पास से (आया है) तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा या हम पर कोई और दर्दनाक अज़ाब ही नाज़िल फरमा (32) हालॉकि जब तक तुम उनके दरमियान मौजूद हो ख़ुदा उन पर अज़ाब नहीं करेगा और अल्लाह ऐसा भी नही कि लोग तो उससे अपने गुनाहो की माफी माँग रहे हैं और ख़ुदा उन पर नाज़िल फरमाए (33)” (8:32-33)

सभी गैर मोमिन ऐसे काफिर हैं जो ईमान नहीं लाएँगेl ऐसे लोग भी हैं जो इल्म की कमी की वजह से गैर मोमिन हैं( ला यालमुन 9:6) या जो लोग काफिरों के ज़ुल्म व सितम से खौफ करते हैं अगर वह ईमान कुबूल करें, जैसा की निम्न में 10:83 से स्पष्ट है:

“अलग़रज़ मूसा पर उनकी क़ौम की नस्ल के चन्द आदमियों के सिवा फिरऔन और उसके सरदारों के इस ख़ौफ से कि उन पर कोई मुसीबत डाल दे कोई ईमान न लाया और इसमें शक़ नहीं कि फिरऔनरुए ज़मीन में बहुत बढ़ा चढ़ा था और इसमें शक़ नहीं कि वह यक़ीनन ज्यादती करने वालों में से थाl” (10:83)

वह गैर मोमिनीन जो काफिर हैं उस समय ईमान कुबूल कर लेंगे जब उनहें ईमान की कुबूलियत से रोकने वाले काफिरों का पेशवा हटा दिए जाएँ या जब उनहें सच्चा इल्म हासिल हो जाएl

जब कुरआन इ खुदा पर ईमान ना रखने वाले और ईमान को अस्वीकार करने वाले किसी व्यक्ति के लिए शब्द काफिर प्रयोग करता है तो ऐसा व्यक्ति ज़ालिम, मुजरिम, फासिक, मुसरफ, मुफसिद और मुतकब्बिर भी होता हैl

जब शब्द काफिर किसी ऐसे व्यक्ति के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिसने ईमान को अस्वीकार कर दिया है जो ईमान नहीं जाएगा तो वह एक काफिर नहीं है बल्कि शैतान, फिरऔन, अबू जेहल या अबू लहब जैसा को व्यक्ति हैl और वह ज़ालिम, मुजरिम, फासिक, मुसरीफ, मुफसिद, मुतकब्बिर और मगरूर भी हैl पीकथाल का एक उद्धरण इस संबंध में पाठकों के नज़र है, “ कुरआन में शब्द काफिर के मैं नें दो अर्थ पाए, और जब हम इलाही दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करते हैं तो उनहें एक ही पाते हैंl पहला अर्थ यह है कि काफिर किसी भी मज़हब का अनुयाई नहीं हैl वह लोगों के लिए अल्लाह की खैर अंदेश मर्ज़ी और मकसद के खिलाफ हैl और इस बिना पर वह सभी धर्मों की हक्कानियत का मुनकिर, सभी आसमानी सहिफों का मुनकिर, और उन सभी अंबिया (अलैहिमुस्सलाम) की सरगर्म मुखालिफत की हद मुनकिर है जिनके बीच किसी भी अंतर के बिना मुसलमानों का ईमान लाना वाजिब हैl”

“और जो शख़्श ख़ुदा पर झूठ बोहतान बॉधे या उसकी आयतों को झुठलाए उससे बढ़के ज़ालिम कौन होगा और ज़ालिमों को हरगिज़ नजात न होगीl” (6:21)

“तो क्या तुम (इतना भी) नहीं समझते तो जो शख़्स ख़ुदा पर झूठ बोहतान बॉधे या उसकी आयतो को झुठलाए उससे बढ़ कर और ज़ालिम कौन होगा इसमें शक़ नहीं कि (ऐसे) गुनाहगार कामयाब नहीं हुआ करते” (10:17)

“और जो शख्स ख़ुदा के साथ दूसरे माबूद की भी परसतिश करेगा उसके पास इस शिर्क की कोई दलील तो है नहीं तो बस उसका हिसाब (किताब) उसके परवरदिगार ही के पास होगा (मगर याद रहे कि कुफ्फ़ार हरगिज़ फलॉह पाने वाले नहीं)” (23:117)

“और तुम उसके लाने में (ख़ुदा को) आजिज़ नहीं कर सकते (ऐ रसूल तुम उनसे) कहो कि ऐ मेरी क़ौम तुम बजाए ख़ुद जो चाहो करो मैं (बजाए ख़ुद) अमल कर रहा हूँ फिर अनक़रीब तुम्हें मालूम हो जाएगा कि आख़ेरत (बेहश्त) किसके लिए है (तुम्हारे लिए या हमारे लिए) ज़ालिम लोग तो हरगिज़ कामयाब न होंगेl” (6:135)

“(और यही दीन ईसा लेकर आए थे) फिर (काफिरों के) फ़िरकों ने बहम एख़तेलाफ किया तो जिन लोगों ने कुफ्र इख़्तियार किया उनके लिए बड़े (सख्त दिन खुदा के हुज़ूर) हाज़िर होने से ख़राबी हैl जिस दिन ये लोग हमारे हुज़ूर में हाज़िर होंगे क्या कुछ सुनते देखते होंगे मगर आज तो नफ़रमान लोग खुल्लम खुल्ला गुमराही में हैं” (19:37-38)

“(ऐ रसूल उनसे कह दो कि) ये तो खुदा की ख़िलक़त है कि (भला) तुम लोग मुझे दिखाओं तो कि जो (जो माबूद) ख़ुदा के सिवा तुमने बना रखे है उन्होंने क्या पैदा किया बल्कि सरकश लोग (कुफ्फ़ार) सरीही गुमराही में (पडे) हैंl” (31:11)

“और जब उन (कुफ्फ़ार) से कहा जाता है कि (माले दुनिया से) जो खुदा ने तुम्हें दिया है उसमें से कुछ (खुदा की राह में भी) ख़र्च करो तो (ये) कुफ्फ़ार ईमानवालों से कहते हैं कि भला हम उस शख्स को खिलाएँ जिसे (तुम्हारे ख्याल के मुवाफ़िक़) खुदा चाहता तो उसको खुद खिलाता कि तुम लोग बस सरीही गुमराही में (पड़े हुए) होl” (36:47)

“मगर जिन लोगों को (ख़ुदा की तरफ से) इल्म अता हुआ है उनके दिल में ये (क़ुरान) वाजेए व रौशन आयतें हैं और सरकशी के सिवा हमारी आयतो से कोई इन्कार नहीं करताl” (29:49)

“और जब उन्हें मौज (ऊँची होकर) साएबानों की तरह (ऊपर से) ढॉक लेती है तो निरा खुरा उसी का अक़ीदा रखकर ख़ुदा को पुकारने लगते हैं फिर जब ख़ुदा उनको नजात देकर खुश्की तक पहुँचा देता है तो उनमें से बाज़ तो कुछ देर एतदाल पर रहते हैं (और बाज़ पक्के काफिर) और हमारी (क़ुदरत की) निशानियों से इन्कार तो बस बदएहद और नाशुक्रे ही लोग करते हैंl” (31:32)

“और (ऐ रसूल जिस तरह अगले पैग़म्बरों पर किताबें उतारी) उसी तरह हमने तुम्हारे पास किताब नाज़िल की तो जिन लोगों को हमने (पहले) किताब अता की है वह उस पर भी ईमान रखते हैं और (अरबो) में से बाज़ वह हैं जो उस पर ईमान रखते हैं और हमारी आयतों के तो बस पक्के कट्टर काफिर ही मुनकिर हैl” (29:47)

“और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया तो चूंकि बदकारी करते थे (हमारा) अज़ाब उनको पलट जाएगा” (6:49)

“क्या उन लोगों ने इस पर भी नहीं ग़ौर किया कि वह ख़ुदा जिसने सारे आसमान और ज़मीन बनाए इस पर भी (ज़रुर) क़ादिर है कि उनके ऐसे आदमी दोबारा पैदा करे और उसने उन (की मौत) की एक मियाद मुक़र्रर कर दी है जिसमें ज़रा भी शक़ नहीं उस पर भी ये ज़ालिम इन्कार किए बग़ैर न रहे” (अल काफिरून 17:99)

“और उससे बढ़ कर ज़ालिम कौन होगा जो ख़ुदा पर झूठ (मूठ) इफ़तेरा करके कहे कि हमारे पास वही आयी है हालॉकि उसके पास वही वगैरह कुछ भी नही आयी या वह शख़्श दावा करे कि जैसा क़ुरान ख़ुदा ने नाज़िल किया है वैसा मै भी (अभी) अनक़रीब (जल्दी) नाज़िल किए देता हूँ और (ऐ रसूल) काश तुम देखते कि ये ज़ालिम मौत की सख्तियों में पड़ें हैं और फरिश्ते उनकी तरफ (जान निकाल लेने के वास्ते) हाथ लपका रहे हैं और कहते जाते हैं कि अपनी जानें निकालो आज ही तो तुम को रुसवाई के अज़ाब की सज़ा दी जाएगी क्योंकि तुम ख़ुदा पर नाहक़ (नाहक़) झूठ छोड़ा करते थे और उसकी आयतों को (सुनकर उन) से अकड़ा करते थेl” (6:93)

(165) सो जब वह उसको भूल गए जो उनको समझाया जाता था तो हम ने उन लोगों को तो बचा लिया जो इस बुरी आदत से मना किया करते थे और उन लोगों को जो कि ज्यादती करते थे एक सख्त अज़ाब में पकड़ लिया इस वजह से कि वह बे हुकमी किया करते थेl

“फिर हमने उन्हें (अपना अज़ाब का) वायदा सच्चा कर दिखाया (और जब अज़ाब आ पहुँचा) तो हमने उन पैग़म्बरों को और जिस जिसको चाहा छुटकारा दिया और हद से बढ़ जाने वालों को हलाक कर डालाl” (21:9)

“अलग़रज़ मूसा पर उनकी क़ौम की नस्ल के चन्द आदमियों के सिवा फिरऔन और उसके सरदारों के इस ख़ौफ से कि उन पर कोई मुसीबत डाल दे कोई ईमान न लाया और इसमें शक़ नहीं कि फिरऔनरुए ज़मीन में बहुत बढ़ा चढ़ा था और इसमें शक़ नहीं कि वह यक़ीनन ज्यादती करने वालों में से थाl” (10:83)

बतौर काफिर फिरऔन की विशेषताएं:

मुसरेफीन (इसराफ, ज्यादती) 10:83, 44:31

फासिक (बाग़ी, बदकार, हद से आगे बढ़ने वाला) 28:32,

मुफसिदीन (फसाद बरपा करने वाला) 28:4, 7:103

खातेईन (गुनाहगार) 28:8

आलिया, लआल (सरकश, ज़ालिम) 10:83, 44:31

मुतकब्बिर (मगरूर, घमंड करने वाला) 10:75, 29:39

कफरू बी आयातिल्लाह (अल्लाह की निशानियों का इनकार करने वाला) 8:52

ज़ालिम (ज़ुल्म करने वाला) 8:54

एक काफिर केवल एक मुनकिर नहीं है, बल्कि वह उपर्युक्त लक्षण और विशेषताओं के आधार पर ईमान नहीं लेन वाला हैl

“(यानि) आसमानों के रसतों पर फिर मूसा के ख़ुदा को झांक कर (देख) लूँ और मैं तो उसे यक़ीनी झूठा समझता हूँ, और इसी तरह फिरऔन की बदकिरदारयाँ उसको भली करके दिखा दी गयीं थीं और वह राहे रास्ता से रोक दिया गया था, और फिरऔन की तद्बीर तो बस बिल्कुल ग़ारत गुल ही थींl” (40:37)

जब इंसान के अकीदे के संदर्भ में शब्द काफिर का प्रयोग किया जाता है, तो इसका अर्थ बहुत ऐब वाल और मकरूह होता हैl इस संदर्भ में शब्द काफिर जिस के लिए प्रयोग किया जाता है ज़ालिम, मुजरिम, फासिक, मुसरिफ, मुफसिद और मुतकब्बिर भी होता है तो वह सभी प्रकार की नेकियों और भलाइयों की खिलाफ वर्जी करने वाला और एक फसाद मचाने वाला भी होता हैl इस संदर्भ में यह वास्तव में शब्द काफिर समानार्थी हैंl वह केवल एक मुनकिर ही नहीं बल्कि फितरी तौर पर ईमान से महरूम भी हैl वह गुरुर व तकब्बुर, सरकशी, खुद गरजी और तमार्रुद व खुद्सरी का मुजस्समा हैl ऐसे शख्स को अल्लाह कभी भी ईमान की दौलत अता नहीं करेगाl इस शब्द का इतलाक किसी आम गैर मुस्लिम या गैर मोमिन पर नहीं होताl

यहाँ तक कि कुरआन की नाजिल होने वाली आखरी आयतों में भी शब्द काफिर का प्रयोग मुनकरीन के लिए नहीं किया गया हैl

आयत 9:5 के अंदर मुशरेकीन मक्का के बारे में आखरी आयतों में भी, कि जिन में अल्लाह ने उन गुमराह मुशरेकीन के लिए मौत की सज़ा का एलान किया है जिन्होंने अपने समझौते की खिलाफ वर्जी करते हुए मुसलमानों से जंग की थी, जो इस्लाम कुबूल किये बिना अमन के चार महीने गुज़र जाने के बाद भी हिजाज़ में रहेंl इस आयत में भी उनहें काफिर या कभी इस्लाम कुबूल ना करने वाला नहीं कहा गया, क्योंकि आयत में उस संभावना को बरकरार रखा गया है कि वह इस्लाम कुबूल कर सकते हैंl और वास्तव में उन सब ने इस्लाम को कुबूल किया और आयत 9:5 के मुताबिक़ किसी को क़त्ल नहीं किया गयाl

किसी को इसके अकीदे की बुनियाद पर काफिर कहना इस पर फैसला कायम नहीं किया जिनके दरम्यान नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने 13 साल तक दावत व तबलीग का काम अंजाम दिया था, जिनकी वजह से आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मक्का से हिजरत करनी पड़ी, जिन्होंने मुसलमानों को नेस्त व नाबूद करने के लिए उनसे जंगें कीं, जिन्होंने अपने समझौतों की खिलाफ वर्जी की, जिनहें आठ साल बाद मफ्तुह कर लिया गया, जिनसे उनकी शिकस्त (हार) के अट्ठारह महीनों के बाद भी इन्तेकाम नहीं लिया गया, और उसके बाद भी वह मुनकिर ही रहेl ऐसे लोगों के लिए भी ईमान का इमकान रखा गया और इसी बिना पर उनहें काफिर नहीं कहा गया है या उनहें कभी ईमान ना लाने वाला नहीं करार दिया गयाl अगर कुरआन में ऐसे लोगों को काफिर नहीं कहा गया है तो फिर किसी मुनकिर को उसके अकीदों के आधार पर काफिर क्यों कर माना जा सकता है? केवल अल्लाह ही किसी शख्स को काफिर करार दे सकता और केवल गैर मुस्लिम के बारे में ही फैसला नहीं किया जाए गा, बल्कि मुसलमानों मेंस इ भी वह लोग काफिरों की साफ में शामिल होंगे ज ज़ालिम, गुनाहगार, हद से आगे बढ़ने वाले, फसाद बरपा करने वालेl बे शक हम ने कुरआन करीम की आयतों में यह अध्यन किया कि एक काफिर मोमिनों समेत कोई भी हो सकता हैl केवल अकीदों की बुनियाद पर किसी ऐसे शख्स को काफिर कहना तौहीन व तजलील, बोहतान और झूठा इलज़ाम है जिस के अंदर काफिरों की उपरोक्त बातें ना पाई जाती होंl जो लोग ऐसा करते हैं वह ज़ालिम, मुजरिम, फासिक और मुफसिद और फसाद मचाने वाले हैंl

URL for English article: http://www.newageislam.com/islamic-ideology/naseer-ahmed,-new-age-islam/revisiting-the-meaning-of-kafir/d/113715

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/naseer-ahmed,-new-age-islam/revisiting-the-meaning-of-kafir--کافر-کے-معنی-و-مفہوم-پر-ازسر-نو-غور-و-فکر/d/113900

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/naseer-ahmed,-new-age-islam/revisiting-the-meaning-of-kafir--काफिर-के-अर्थ-पर-नए-सिरे-से-विचार/d/114240

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