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Hindi Section ( 2 Jan 2018, NewAgeIslam.Com)

Is It Possible To Logically Derive A Single Meaning Of Every Verse Of The Quran? क्या कुरान के एक आयत से केवल एक ही अर्थ लेना संभव है?

 

 

 

नसीर अहमद, न्यू एज इस्लाम

14 नवंबर, 2017

कुरआन मजीद की हर आयत का केवल एक अर्थ लेना संभव नहीं बल्कि मेरे सभी लेखों से यह प्रदर्शित भी होता है कि कैसे इस कार्य को अंजाम दिया जा सकता हैl और वह एक अर्थ हमेशा दुसरे सभी ताबीरात और स्पष्टीकरण पर ग़ालिब केवल इस लिए होगा कि हर वह तफसीर जो अर्थ नहीं है वह कुरआन करीम की एक या एक से अधिक आयतों से परस्पर विरोधी होगी और केवल एक वास्तविक अर्थ कुरआन करीम की सभी आयतों के साथ संगत होगाl इस किताब को किताबे मुबीन करार दिए जाने की मुराद बिलकुल यही हैl इसका एक मतलब यह भी है कि कुरआन की कोई आयत किसी दुसरी आयत के साथ परस्पर विरोधी नहीं हैl इसलिए, अक्सर भुत और वर्तमान के ऐसे इस्लामी उलेमा के लिए जिनकी समझ कुरआन पर नहीं बल्कि हदीस जैसी सूत्रों और संदर्भ पर आधारित है, और जो कुरआन की आयतों से हदीसों की तस्दीक व ताईद करने के लिए कुरआन मजीद की कुछ आयतों को मनसूख मानते हैं उनके लिए कुरआन ना तो किताबे मुबीन है, और न विरोधाभास से खाली एक किताब है, बल्कि यह ऐसे विरोधाभास से भारी हुई एक किताब है जो इस बात को लाज़िम करता है कि कुरआन की कुछ आयतों को मनसूख माना जाए! जो हर झगड़े में कुरआन को एक अंतिम निर्णय नहीं मानते और जिनकी समझ दुसरे सूत्रों पर आधारित है उनके साथ कोई मानी खेज़ बहस व तम्हीस संभव नहीं है, हालाँकि वह इस बात को कभी स्वीकार नहीं करेंगेl और वह इस वजह से केवल कुरआन पर आधारित किसी भी बहस से गुरेज़ करेंगे कि उन्हें मालुम है कि कुरआन की तालीम और कुछ हदीसों पर आधारित उनके अकीदों के बीच क्या अंतर हैl

उन सभी व्याख्याओं को आसानी के साथ अस्वीकार किया जा सकता है जो अर्थ नहीं हैं, उधाहरण के तौर पर शैख़ अल बानी का फतवा “हर शिर्क कुफ्र है और हर कुफ्र शिर्क है”l और इसके लिए आवशयकता केवल इस बात को ज़ाहिर करने की है कि एक इंसान जिसे सच जनता है और जिसके बारे में सच होने का विश्वास रखता है कुफ्र इसका एक अतिरिक्त कल्पना हैl कुफ्र बुद्धि के विरुद्ध एक बेजा हस्तक्षेप और हक़ के विरुद्ध कोई अमल अंजाम देना या किसी ऐसे अमल का प्रतिबद्ध करना है जिसे गलत माना जाता होl कुफ्र के “छिपाने” के शाब्दिक अर्थ के साथ अगर कोई इस अर्थ को संबंधित करना चाहे तो उस स्तिथी में कुफ्र का लागू होना उस समय होगा जब आप हक़ के एहसास को दबाने या छिपाने के लिए किसी भी जज़्बात को इजाज़त देंगेl मैंने अपने लेख में कुफ्र को एक अतिरिक्त कल्पना सिद्ध किया है:

Who Is A Kafir In The Quran? (Part 3): Why Kufr Is A Relative Concept While Shirk, Idol Worship Etc. Have Fixed Meanings

अल्लाह अपने सभी प्राणियों को सामान रूप से एक समानांतर मौका देता हैl किसी भी व्यक्ति को मुसलमान पैदा होने का शर्फ़ प्राप्त नहीं है, या किसी इंसान के ऊपर इस बात का वबाल नहीं है कि वह गैर मुस्लिम पैदा हुआ हैl वरना, अल्लाह एक न्यायप्रिय खुदा नहीं होगाl इसलिए, केवल शैख़ अल बानी के फतवा ही नहीं बल्कि मुसलमानों के हर फिरके की स्पष्ट फिकही शिक्षाओं की रौशनी में मुसलामानों का अकीदा इसके उलट है जो सभी मुशरेकीन को काफिर समझते हैं, और इस वजह से खुदा के बारे में उनकी कल्पना एक ज़ालिम खुदा का है और इस प्रकार वह खुदा की तौहीन के मुर्तकिब हैंl इस प्रकार की कल्पना केवल कुरआन के खिलाफ एक जुर्म है, बल्की यह अकाल के भी खिलाफ है, और इस कारण से कुफ्र हैl इसी प्रकार इसाई और यहूदी भी उस झूठे कल्पना के हामिल हैं कि उन्हें खुदा की मदद प्राप्त हैl जबकि, मुशरेकीन के पास केवल उनके अकीदों की बुनियाद पर खुदा की नुसरत व हिमायत या उसकी नाराजगी की कोई अवधारणा नहीं है और इस हद तक वह अपने अकल के विरुद्ध नहीं करतेl “मोमिनों” का एक झूठा अकीदा और उनका सहिह अकीदा जिन्हें हम “काफिर” कहते हैं, मुशरेकीन और मुवह्हेदीन के बीच संतुलन को बहाल करता हैl मुवह्हिद एक ऐसे जालिम्खुदा के अकीदे से खुदा की तौहीन करते हैं जिसका उन पर इनाम है, जबकि इस बारे में मुशरेकीन विनम्र साबित हुए हैं जो किसी ख़ास मज़हबी हलके के अन्दर अपनी पैदाइश के हादसे की बुनियाद पर किसी को अल्लाह की जानिब से इनाम याफ्ता या उसके इनाम से महरूम नहीं समझतेl

हर व्यक्ति का फैसला उसकी उस तरक्की की रौशनी में किया जाएगा जो उसने हकीकत के रास्ते पर हासिल की हैl जो लोग उस मकाम पर कायम हैं जिस पर वह पैदा हुए थे वह एक जैसे हैं, वह लोग जो सकारात्मक प्रगति करते हैं वह सच के खोजकर्ता हैं और जो लोग कदम पीछे कर लेते हैं वह अंधविश्वास का शिकार हैंl अधिकतर मुसलमान केवल उस फिरके की पैरवी करते हैं जिसमें वह पैदा हुए हैं, और इस कारण से वह दुसरे मज़हब के उन व्यक्तियों से अलग नहीं हैं जिन्होनें केवल अपने फिरके की पैरवी की हैl अंतर केवल उनके व्यक्तिगत कार्यों में हैl अगर उनमें से किसी भी व्यक्ति ने सच्चाई का ज्ञान प्राप्त करके अपने अकीदों के सुधार के लिए कुछ भी नहीं किया, या दोनों नें सच से वाकिफियत हासिल होनें के बावजूद केवल इस लिए उसे अस्वीकार कर दिया कि वह उनके फिरके की शिक्षाओं के खिलाफ है, तो अपने अकीदों के मामले में दोनों बराबर हैंl वह सभी व्यक्ति जो केवल अपने हालात की पैदावार हैं अपने अकीदों के मामले में बराबर हैं, लेकिन उन अकीदों के साथ अपने आमाल में वह अलग हैं और उनका निर्णय उसी आधार पर किया जा सकता हैl जिन्होनें चेतना के साथ ज्ञान प्राप्त किया और खुद की इस्लाह की उनका मकाम उच्च है और जिन्होनें कदम पीछे कर लिए उनका मकाम निम्न हैl

कोई और क्यों नहीं यह कहता कि कुरआन की कुरआन की हर आयत का केवल एक अर्थ तार्किक तौर पर लिया जा सकता है? इसका विशेष कारण यह है कि वह हदीसों की रौशनी में कुरआन की “व्याख्या”, करते हैं और यह महसूस करते हैं कि उन्हें इसके स्पष्ट अर्थ से मुंह मोड़ने और उसके “अर्थ” को अपने अकीदे के साथ हम आहंग करने के लिए कुरआन मजीद की विभिन्न आयतों को मनसूख करने की जरुरत हैl वह अहले किताब की तरह जान बुझ कर कुरआन के अर्थ में उलटफेर करते हैं (2:75) और असल अर्थ के बजे उसके अनुपूरक अर्थ का प्रयोग करके उसकी व्याख्या करते हैंl क्या अर्थ के लिए उन्हें हदीसों पर निर्भर होने की आवश्यकता है? नहीं कुरआन स्पष्ट तौर पर ऐसी ज़रूरत का इनकार करता हैl “यह आपके पास (ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जो कोई उदाहरण लाएंगे हम उसका सच्चा जवाब और बेहतर तौजीह आपको बता देंगे”(25:33)l और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर कुरआन मजीद, हक़ और बेहतरीन तौजीह नाज़िल हुई हैl कुरआन करीम की तौजीह और किसी प्रश्न के उत्तर की स्थिति में इसके अलावा जो कुछ नबी सल्लल्लाहु अलाही वसल्लम से मंसूब किया गया है, वह कुरआन के इस दावे को मुस्तरद करने वाला है कि कुरआन करीम में हर प्रकार के सवालों का हर मुमकिन तरीके से बेहतरीन जवाब फराहम कर दिया गया हैl कुरआन की वजाहत बल्कि इसके अर्थ में मामूली परिवर्तन भी पैदा करने वाली नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मंसूब सभी हदीसें बातिल और बिलकुल झूठ पर आधारित हैंl वह सभी हदीसें जो कुरआन के अर्थ को परिवर्तित नहीं करतीं या जिन से उसके अर्थ की खिलाफ वर्जी नहीं होती कुबूल की जा सकती हैंl और इस हदीसों का संबंध नमाज़ जैसी केवल रस्मी रिवायतों से होगाl

रद्दीकरण पर यकीन करने वालों का क्या? रद्दीकरण जैसा कि कुरआन स्पष्ट तौर पर बयान करता है किसी चीज को उससे बेहतर स्थानापन्न से बदलना हैl उदाहरण के तौर पर अगले पृष्ठों में सहिफों में किसास के उसूल (दूसरों के साथ ऐसा ही करो जैसा उनहोंने तुम्हारे साथ किया है) को ‘अहसन’ या बेहतर बदले के उसूल से परिवर्तित करनाl जैसे मारपीट का बदला क्षमा से देनाl तनसीख का संबंध कुरआन से बिलकुल नहीं है, और अगर हो तब भी बेहतर को बुरे पर तरजीह दी जाएगीl “मज़हब में जबरदस्ती की कोई गुंजाईश नहीं है” के उसूल को “लोगों को ईमान लाने पर मजबूर किया जाए” के उसूल से परिवर्तित नहीं किया जा सकता जो कि कुरआन में तो बिलकुल नहीं है, लेकिन बहुत उलेमा यह बातिल अकीदा रखते हैंl जो कुरआन की मनसूख आयातों पर ईमान रखते हैं वह कुरआन के एक भाग पर ईमान लाने और दुसरे हिस्से से इनकार करने के जुर्म के मुर्तकिब हैं:

“(ऐ रसूल) उन कुफ्फारों पर इस तरह अज़ाब नाज़िल करेगें जिस तरह हमने उन लोगों पर नाज़िल किया (89) जिन्होंने क़ुरान को बॉट कर टुकडे टुकड़े कर डाला (90) (बाज़ को माना बाज को नहीं) तो ऐ रसूल तुम्हारे ही परवरदिगार की (अपनी) क़सम (91) कि हम उनसे जो कुछ ये (दुनिया में) किया करते थे (बहुत सख्ती से) ज़रुर बाज़ पुर्स (पुछताछ) करेंगे (92) पस जिसका तुम्हें हुक्म दिया गया है उसे वाजेए करके सुना दो (93)” (15:89-93)

जो लोग मक्की कुरआन की बात करते हैं गो कि वह अलग थे मनमाने तरीके से कुरआन के टुकड़े कर रहे हैंl जिन्होंने कुरआन को टुकड़ों में बांटा वह वही हैं जो इसकी कुछ आयतों को मनसूख मानते हैंl और ऐसे लोग सभी संबंधित आयातों को नज़र में रख कर उसका एक अर्थ नहीं लेते हैंl कुरआन एक आयत की तौजीह किसी दूसरी आयत की मदद से पेश करता है और इसी लिए सभी आयतों पर गौर करते हुए उसका अर्थ निकलना जरुरी हैl सुरह अल बकरा की आयत 85 में यहूदियों को इसी तरह खबरदार किया गया हैl “लेकिन फिर भी तुमने आपस में कतल किया और आपस के एक फिरके को जिला वतन भी किया और गुनाह और ज्यादती के कामों में उनके खिलाफ दुसरे की तरफदारी की, हाँ जब वह कैदी हो कर तुम्हारे पास आए तो तुमने उनके फिद्ये दिए, लेकिन उनका निकलना जो तुम पर हराम था (उसका कुछ ख्याल ना किया) क्या कुछ अहकाम पर ईमान रखते हो और कुछ के साथ कुफ्र करते हो? तुममें से जो भी ऐसा करे, उसकी सज़ा इसके सिवा क्या हो कि दुनिया में रुसवाई और क़यामत के दिन सख्त अज़ाब की मार, और अल्लाह पाक तुम्हारे आमाल से बे खबर नहीं”l यह इन्तेबाह मोमिनों को खबरदार करने के लिए है कि उन्हें उन यहूदियों के इबरतनाक अंजाम से सबक हासिल करना चाहिए जो अल्लाह के इस इन्तेबाह को नज़र अंदाज़ करके अपने गलत तरीकों पर कायम रहे, गोया: “तुम यहूदियों के इबरतनाक अंजाम को देख रहे हो और क्या तुम अल्लाह के इन्तेबाह को नज़र अंदाज़ करके उसी अंजाम तक पहुंचना चाहते हो?

इसके अलावा कुरआन में एक और मक़ाम पर इस अम्र की तस्दीक होती है कि यह चीजों की पूर्ण रूप से परिभाषित करता है और ख़ारिज से किसी भी एकाधिकार के बिना यह अपने अर्थ को खूब स्पष्ट करके बयान करता है:

“(ऐ रसूल) वही के जल्दी याद करने वास्ते अपनी ज़बान को हरकत न दो (16) उसका जमा कर देना और पढ़वा देना तो यक़ीनी हमारे ज़िम्मे है (17) तो जब हम उसको (जिबरील की ज़बानी) पढ़ें तो तुम भी (पूरा) सुनने के बाद इसी तरह पढ़ा करो (18) फिर उस (के मुश्किलात का समझा देना भी हमारे ज़िम्में है) (19)” (75:16-19)

उपर्युक्त आयत यह बताती है कि कुरआन अहले किताब का निपटान उन मामलों में करता है जिनमें उन्हें मतभेद हैl अगर ऐसा है तो, फिर इसके किसी भी भाग को मुसलमानों को समझे बिना छोड़ने का सवाल कहाँ से पैदा होता है?

“इसमें भी शक नहीं कि ये क़ुरान बनी इसराइल पर उनकी अक्सर बातों को जिन में ये इख्तेलाफ़ करते हैं ज़ाहिर कर देता है” (27:76)

लोग तार्किक तौर पर हासिल किये हुए एक अर्थ पर ईमान इस लिए भी नहीं रखते क्योंकि उन्हें इस बात का कोई ज्ञान नहीं है कि तार्किक तौर पर एक एकल अर्थ निकलने का मतलब क्या हैl कुरआन के अलावा ऐसी कोई दूसरी किताब नहीं जिसके अंदर यह खुसूसियत हो कि इस सभी आयतों का तार्किक तौर पर केवल एक अर्थ प्राप्त किया जा सकता हैl अधिकतर लोग गणित या भौतिकी में आम समस्याओं का इस्तिदलाल करने के भी काबिल नहीं हैंl वह नहीं जानते की कब वाहिद या मुनफ़रिद हल तलाश करने के लिए मवाद अपर्याप्त हैl अगर वह एक हल की तलाश में समुन्द्र की गोताखोरी करते हैं तो हमेशा वह यही कहते हैं कि मवाद अपर्याप्त है या जो कुछ सवाल किया जा रहा है वह स्पष्ट नहीं है, जबकि समस्या उनमें से कुछ भी नहीं हैl जवाब तलाश करने के लिए अकाल और इस्तिदलाल का प्रयोग बहुत गैर मामूली हैl लोग अपने कॉमन सेंस का प्रयोग करते हैं और उनका कॉमन सेंस उन्हें नेकनामी, इज्माअ और रिवायत पर एतेमाद करने की तरगीब देता है, यही कारण है कि मौलवियों और मुफ्तियों को ऐसी गिरफ्त हासिल है जो भविष्य में भी जारी रहेगीl

इसलिए इस बड़े खाई की वजह यही है और उस समय तक पूरा नहीं किया जा सकता जब तक कि मुसलमान पुरे कुरआन पर ईमान रखना शुरू नहीं कर देते और इस किताब की ताबीर व तशरीह के लिए दुसरे सूत्रों के प्रयोग  को तर्क नहीं कर देतेl “और पुख्ता व मजबूत ज्ञान वाले यही कहते हैं कि हम तो उन पर ईमान ला चुके, यह हमारे रब की तरफ से हैं और नसीहत तो केवल बुद्धिमान लोग प्राप्त करते हैं”l ऐसा मालुम होता है कि “मोमिनों” और “काफिरों” के बीच बुद्धिमान लोग बहुत कम हैं जी कि इस बात का सुबूत है कि मौके सभी लोगों के लिए बराबर हैं, और लोगों के बिच बहुत कम फर्क है उनके कर्मों के सिवाl बातिल अक़ीदे सभी लोगों के बीच साझा हैं, और “मोमिनीन” भी अपने बातिल अकीदों की बुनियाद पर अपने खुदा, अपने नब़ी और अपने किताब कुरआन की यकसां तौर पर तौहीन करते हैंl

URL for English article: http://www.newageislam.com/islamic-ideology/naseer-ahmed,-new-age-islam/is-it-possible-to-logically-derive-a-single-meaning-of-every-verse-of-the-quran?-or,-does-allah-provide-a-level-playing-field-to-all-the-people?/d/113219

URL for Urdu article: http://newageislam.com/urdu-section/naseer-ahmed,-new-age-islam/?is-it-possible-to-logically-derive-a-single-meaning-of-every-verse-of-the-quran--کیا-قرآن-مجید-کی-ایک-آیت-سے-صرف-ایک-معنی-اخذ-کرنا-ممکن-ہے؟/d/113234

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/is-it-possible-to-logically-derive-a-single-meaning-of-every-verse-of-the-quran?--क्या-कुरान-के-एक-आयत-से-केवल-एक-ही-अर्थ-लेना-संभव-है?/d/113789

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