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Hindi Section ( 17 Dec 2017, NewAgeIslam.Com)

Can We Trust Our Common Sense? क्या हम अपने कॉमन सेंस पर भरोसा कर सकते हैं?

 

 

 

नसीर अहमद, न्यू एज इस्लाम

24 अगस्त, 2017

कॉमन सेंस हमारे उस हिससी सलाहियत का नाम है जिसकी बुनियाद पर हम अपने समाज में लगभग सभी लोगों के बीच साझा मामलों पर गौर करते हैं, उन्हें समझते हैं और उनके बारे में निर्णय करते हैं और बिना किसी बहस के समाज के लगभग सभी व्यक्तियों से बजा तौर पर इसकी उम्मीद भी की जा सकती हैl (आंशिक रूप से यह परिभाषा विकिपीडिया से ली गई है)

अमली तौर पर हम एक हमजिंस गिरोह के बीच किसी साझा मामले के बारे में बात चीत कर सकते हैं जो कोई कौम, नस्ली गिरोह या कोई मजहबी बिरादरी पर भी आधारित हो सकती हैl दुनिया के सभी लोगों के बीच जो मामला साझा है उसके बारे में बात करने से हमारी अज्ञानता और उस विशेष के आधार पर जो हमारे लिए सामान्य है व्यापकता पैदा करने की हमारी साझा कमजोरी ख़तम होती हैl चोरी और हत्या अधिकतर संस्कृतियों  में कॉमन सेंस के आधार पर एक आपराधिक काम है, लेकिन धोका देने वालों और उन दुसरे अपराधी कबीलों के लिए कोई अपराध नहीं जो इसे अपने देवताओं की एक पवित्र खिदमत मानते हैंl और दोसरों के लिए भी यह कोई कॉमन सेंस नहीं तहा जब तक कि मज़हब ने सही और गलत का मापदंड नहीं दिया थाl

ख्याल, समझ और निर्णय सामान्य तौर पर समाज के मूल्यों, ख्यालात, उसूल और कल्पनाओं पर आधारित होते हैं जो कि हर समाज में अलग अलग हैंl सामान्य तौर पर जिसे कॉमन सेंस समझते हैं वह आम तौर पर हमारे दृष्टिकोण का प्रतिबिम्ब होता हैl

अगर आप लोगों के मूल्य, सिद्धांत और कल्पनाओं को प्रभावित कर सकते हैं तो आप उनके व्यवहार को भी परिवर्तित कर सकते हैंl यह उनका प्रयोग करके होता है और इसके माध्यम से उनका “कॉमन सेंस” बदलता है, और इस प्रकार ताकतवर स्वर्थी गिरोह लोगों की प्रतिक्रिया और क्रिया को बदल देती हैंl उदाहरण के तौर पर, हर साजिशी दृष्टिकोण को गलत कल्पना से कुछ अधिक ना समझना एक “कॉमन सेंस” बन चुका थाl इसलिए हम सरकारी स्टैंड का भरोसा करते हैं और बाक़ी सब अस्वीकार कर देते हैंl सरकार और दुसरे शक्तिशाली स्वर्थी गिरोह वह सब कुछ कर सकती हैं जिनसे उनको खुशी मिले और वह सच्चाई के नाम पर हम से अपनी “सरकारी कहानियाँ” बेचते हैंl लोग सरकारी झूट को स्वीकार कर लेंगे, क्योंकि उनका कॉमन सेंस उन्हें यह बताया है कि साजिशी दृष्टिकोण केवल दृष्टिकोण हैं, वास्तविकता नहींl केवल एक बुद्धिमान चाल के आधार पर सरकार खुद को किसी भी गलत काम या साज़िश के शक व शुबह के दायरे से बाहर कर देती है! यह कैसे संभव है? उनको इस वास्तविकता से मदद मिलती है कि बहुत सारे साजिशी दृष्टिकोण वास्तव में गलत कल्पना हैं और उनमें से बहुत कम ही का संबंद सच्चाई के साथ हैl एक अच्छी साज़िश की कहानी केवल एक ही होगी जो हकीकत से करीब होगी जबकि इसी घटना के बारे में 99 दूसरी गलत कहानियां भी होंगीl हुकूमत इस एक अच्छी कहानी का उल्लेख नहीं करेगी लेकिन 99 अन्य कहानियों को प्रभावी तरीके से अस्वीकार कर देगी और लोगों को इस बात पर राजी करेगी कि सभी साजिशी दृष्टिकोण गलत हैंl गलत के खिलाफ बेहतरीन साबुत के सामने एक वास्तविक कहानी आसानी के साथ गम हो जाती हैl

शत्रु को मिटाने के लिए और उसका अपमान करने के लिए जंग का रास्ता अपनाया जाता हैl जापानी लोग्प्न को हैवान समझा गया इसी लिए उन पर न्यूकिलियर हमले को स्वीकार किया गया हालाँकि इसका कोई सैनिक उद्देश्य नहीं थाl बल्कि इसका उद्देश्य केवल एटमी बम की विनाशकारी शक्ति को आज़माना और सोवियत यूनियन को खबरदार करना थाl इससे दोसरे विश्व युद्ध का अंत हुआ और सर्द जंग का प्रारंभ हुआl हमें मालुम है कि अफगानिस्तान और ईराक के खिलाफ जंग और शाम और लीबिया में हस्तक्षेप पर सरकार ने किसी प्रकार अमेरीकी जनता को सहमत कियाl

हो सकता है कि अतीत में समलैंगिकों की शादी के खिलाफ दलील में कॉमन सेंस का भी सहारा लिया गया हो लेकिन आज यह पश्चिमी समाज में मुमकिन नहीं हो सकता क्योंकि एलजीबीटी कम्युनिटी के बारे में उनका कॉमन सेंस अब परिवर्तित हो चुका हैl

हम अपने कॉमन सेंस पर भरोसा करते हैं, क्योंकि यह हमारे प्रतिदिन की बहुत सारी समस्याओं को हल करता हैl हकीकत यह है कि लोग बहुत चिंतित हैं जो अपने कॉमन सेंस पर आँखें बंद करके भरोसा करते हैं जिसका अय्यारों और अवैध लाभ उठाने वालों ने अपने लाभ के लिए गलत प्रयोग किया हैl

मुस्लिम समाज को ही देख लेंl इस समाज के अंदर दलील से ऊपर उठ कर जिन चीजों का “कॉमन सेंस” मजहबी दृष्टिकोण समझा जाता है वह एक गलती के सिवा और कुछ नहीं है और कभी कभी यह गलत और खुद उन के लिए अत्धिक हानिकारक दोनों होते हैंl

काफिर = गैर मुस्लिम (कुरआन की एक भी आयत में काफिर का अर्थ गैर मुस्लिम नहीं हैl कुरआन हमेशा काफिर के लिए शब्द ला युमिनुन का प्रयोग करता है)

एक मुसलमान वह भी है जो कलमा पढता होl (यह इस्लामी दृष्टिकोण है कुरआन का नहींl कुरआन के अनुसार, इस्लाम अल्लाह पाक के सामने सरे तस्लीम झुकाने का नाम है, चाहे हम अल्लाह पाक को किसी भी नाम से पुकारें और जो अल्लाह की बारगाह में सरे तस्लीम झुकाता है वह मुसलामन है)

शहीद= शहीद (कुरआन में इस शब्द का प्रयोग केवल गवाह के लिए है, अल्लाह की राह में मारे जाने वालों के लिए कुरआन में कभी इस शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है)

अमर आत्मा (कुरआन में कोई भी ऐसा शब्द मौजूद नहीं है जिसका अर्थ एक अमर आत्मा हो)

गुनाहगार के लिए कब्र में अज़ाब (एक मुर्दा इंसान क़यामत के दिन ही ज़िंदा किया जाएगा इसलिए कब्र में किसी को सज़ा नहीं हो सकती है और लोग जिस अमर आत्मा की बात करते हैं जो मौत के बाद जीवित रहती है इसका  कोई वजूद नहीं है)

दीन= कुरआन सुन्नत समेत जिसका मतलब हदीसों की पैरवी करना है (नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत समेत पूरा दीन कुरआन में पैरवी से सम्बंधित है)

दो औरतों की गवाही एक मर्द की गवाही के बराबर हैl (दो औरतें साझा तौर पर एक दस्तावेज़ की गवाह बन सकती हैं और जब आवश्यक हो तो वह साझा तौर पर गवाही दे भी सकती हैंl उन्हें अलग लालग गवाही देने की आवश्यकता नहींl इसलिए यह एक साझा तौर पर दी गई दोनों गवाहीयां एक दुसरे की मुशावरत में एक ही गवाही मानी जाएगीl यह एक छूट है कोई कानूनी आवश्यकता नहींl)

कुरआन में तीन तलाक की अवधारणा मौजूद हैl (जबकि ऐसा नहीं है)

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जंग “काफिरों” और “कुफ्र” के खिलाफ थी मजहबी अत्याचार के खिलाफ नहींl (यह गलत अवधारणा शब्द कुफ्र/काफिर के गलत अनुवाद और इस आयतों को अनदेखा करने की वजह से है जिनसे इस अवधारणा की तरदीद होती है)

यहाँ तक कि वह शांतिपूर्ण मुशरेकीन भी जिन्होंने मुसलमानों से ना जंग की और ना ही उन्हें सताया, उन्हें भी अपने अकीदे को बरकरार रखने का अखत्यार नहीं है और उन पर जज़िया की अदायगी लाज़िम हैl (यह एक बे बुनियाद और बातिल अवधारणा है)

कॉमन सेंस पर गलत दलीलें

जो आम तौर पर सच है यह आवश्यक नहीं कि वह हमेशा सच ही होl जैसे कि निम्नलिखित दलीलों पर गौर करें:

उपरोक्त कॉमन सेंस के बारे में आम मुसलमानों और इनके उलेमा के बीच साझा अवधारणा यही है कि यह अवधारणाएं गलत हैं जिसका मतलब यह है कि कुरआन एक ऐसी किताब नहीं है जो चीजों को साफ़ करके ब्यान करती हैl

हालांकि हो सकता है कि कुरआन एक ऐसी किताब हो जो चीजों को साफ़ करती है, लेकिन मुसलमान तुक्ष राजनीतिक लाभ, दुश्मनी और प्रांतीय तंग नज़री के पेशे नज़र अब भी कुरआन से भटके ही हैं जो कि हर मज़हब के मज़हबी गिरोह में आम हैl मुसलमानों के बीच बहुत से गलत अवधारणा के कारण उनकी फिकह है जो कुरआन पर नहीं बल्कि अहादीस पर आधारित हैl हदीसें हर विषय पर कुरआन से अलग हैंl हदीसों की तदविन नबी सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम की वफात के दो सदियों बाद अमल में आई और इसका एक ही उद्देश्य ज़ाहिरी तौर पर इस्लाम को शक्तिशाली स्वार्थी समूहों की आवश्यकताओं तक ही सीमित रखना हैl जिस व्यक्ति को पहले हदीस की शिक्षा दी गई हो वह सच्चाई को मस्ख करने वाली ऐनक से देखे गा और सच्चाई तक पहुँच हासिल नहीं कर पाएगाl एक आम मुसलमान अपने फिरके की फिकह के आईने में ही अपने मज़हब की शिक्षा प्राप्त करता हैl जब वह कुरआन का अध्यन करता है और अपने अकीदे और कुरआन के बीच एक खलीपन पाटा है तो वह यह सोच कर कुरआन का अध्यन छोड़ देता है कि कुरआन उसकी समझ से बाहर हैl इन सभी गलत फहमियों में से हर एक पर मेरे लेख इस बात का प्रमाण हैं कि आसानी के साथ हकीकत की तहकीक की जा सकती है जो कि आम दृष्टिकोण के उलट हैl

कुरआन की बहुत सारी आयतें एक दुसरे से विपरीत हैं इसलिए उलेमा कई आयतों को मनसुख करार देते हैंl

विरोधाभास कुरआन की शिक्षा और हदीस की शिक्षा के बीच हैंl जो हदीसों को ठीक से समझते हैं उन्हें बहुत सरे विरोधभास मिल जाएँगेl कुरआन बा उसूल और किसी भी विरोधाभास से पुर्णतः पाक हैl

मक्की कुरआन और मदनी कुरआन के बीच एक अंतर हैl मक्की कुरआन कहता है “तुम्हारे लिए (इस्लाम के शांतिपूर्ण नकारने वाले) तुहारे लिए तुम्हारा दीन और हमारे लिए हमारा दीनl मदनी दौर इस उसूल की तनसीख और काफिरों के खिलाफ उस समय तक जंग का दौर है जब तक वह कुफ्र तर्क ना कर देंl

तुम्हारे लिए (इस्लाम का शांतिपूर्ण इनकार करने वाला) तुम्हारा दीन और हमारे लिए हमारा दीन” के उसूल की खिलाफ वर्जी कभी नहीं की गई थीl जो लोग अमन पसंद थे उन्हें अपनी ज़िन्दगी की सुरक्षा और अपने अकीदे को बरक़रार रखने का हक़ हासिल थाl जंग इस्लाम के पुर अमन इन्कारियों के खिलाफ कभी नहीं थीl आयतों 9:12 और 9:5 में उन मुशरेकीन के फैसले उनके जुर्मों का ज़िक्र है जो ज़ालिम व जाबिर थे और जिन्होंने मुसलमानों के खिलाफ जंगे की हैं, और जहाँ तक पुर अमन मुशरिकों की बात है तो उनका फैसला आयत 9:29 में उल्लेखित हैl

जिसे हम अपना कॉमन सेंस करार देते हैं उसका झूट, आधी सच्चाई और तहरीफ़ के माध्यम से गलत इस्तेमाल किया जा सकता है और वह इनसे प्रभावित भी हो सकता है और इस प्रकार की साजिशों के माध्यम से शक्तिशाली समूह हमारे उपर और हमारे रवैये पर अपना वर्चस्व कायम कर लेती हैंl जो बात हमारे कॉमन सेंस के अनुसार नहीं होती है हम उसे खिलाफे बदीही करार देते हैंl खिलाफे बदीही इतना आम है कि हमें हमेशा कॉमन सेंस के बारे में सावधान रहने की आवश्यकता पेश आती हैl हो सकता है कि विज्ञान एक मुद्दत के बाद कॉमन सेंस बन जाए लेकिन हमारे कॉमन सेंस के नतीजे में कोई नई दरयाफ्त कम ही थीl सहीह और गलत का मानक जो कि हमारे कॉमन सेंस का हिस्सा बन चुका है वह उस समय ऐसा नहीं था जब हमनें उसे सबसे पहले मज़हब से प्राप्त किया थाl हर कीमती ख्याल कॉमन सेंस नहीं बल्कि इल्हामी सोच की पैदावार हैl

धर्मों नें हमें सहीह और गलत का अत्यधिक महत्वपूर्ण पैमाना दिया है लेकिन इंसानों की बने हुई फिकह के कारण इसका अधिकतर भाग खराब हो गया है जिसके कारण इसके पैरुकारों के कॉमन सेंस को बढ़ते हुए पूर्वाग्रह, संकीर्णता और अलगाववाद की दिशा में फेर दिया गयाl हमें अपनी फिकह को अपने आसमानी सहिफा कुरआन की रौशनी में नये सिरे से तशकील देने और उन सभी गलत दृष्टिकोण व विचारों को अस्वीकार करने की आवश्यकता है जो हमारी फिकह ने हमें दिया हैl

URL for English article: http://www.newageislam.com/spiritual-meditations/naseer-ahmed,-new-age-islam/can-we-trust-our-common-sense?/d/112316

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URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/naseer-ahmed,-new-age-islam/can-we-trust-our-common-sense?--क्या-हम-अपने-कॉमन-सेंस-पर-भरोसा-कर-सकते-हैं?/d/113599

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