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Hindi Section ( 4 Jun 2012, NewAgeIslam.Com)

Reign of Hasrat Ali (KW) हज़रत अली अलैहिस्सलाम का अहदे हुकूमत


मुज्तबा आब्दी

04जून, 2012

(उर्दू से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

हज़रत अली अलैहिस्सलाम की विलादत 13 रजब 30आम अलफ़ेल मुताबिक़ 600 ईस्वी बरोज़ जुमा बमुक़ाम अंदरून ख़ानए काबा हुई। आप के दादा अब्दुल मुत्तलिब और वालिदा माजिदा फ़ातिमा बिंते असद थीं। आप दोनों तरफ़ से हाश्मी हैं। मोइर्रेखीने आलम ने आपके ख़ानए काबा में पैदा होने के बारे में कभी किसी तरह का इख़्तिलाफ़ नहीं किया बल्कि बिलइत्तिफ़ाक़ कहते हैं कि लम यूलद क़िबला वल्द मौलूद फ़ी बैतिल हराम। (मसतदरक हाकिम जिल्द सोम सफ़्हा- 483)

आपकी कुनिय्यत व अलक़ाब बेशुमार हैं। कुनिय्यत अबुलहसन, अबु तोराब और अलक़ाब अमीरुल मोमिनीन, अलमुर्तज़ा, असदुल्लाह, यदुल्लाह, हैदरे कर्रार, नक़्शे रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और साक़ईए कौसर मशहूर हैं।

मौलाना अबुलहसन नदवी रहमतुल्लाह अलैहि हज़रत अली अलैहिस्सलाम की ख़िलाफ़त के बारे में रक़म तराज़ हैं:

ख़िलाफ़त की पूरी मुद्दत को एक मुसलसल मुजाहिदा, एक कश्मकश, एक मुसलसल सफ़र में गुज़ारना, लेकिन ना थकना, ना मायूस होना, ना बददिल होना, ना शिकायत करना, ना राहत की तलब, ना मेहनत का शिकवा, ना दोस्तों का गिला ना दुश्मन की बदगोई, मदह से बेपरवाह, जान से बेपरवाह, अंजाम से बेपरवाह, माज़ी का ग़म ना मुस्तक़बिल का अंदेशा,  फ़र्ज़ का एक एहसास मुसलसल सई का एक सिलसिला ग़ैर मुनक़ते, दरिया का क़हर, सूरज और चांद की सी पाबंदी, हवाओं और बादलों जैसी फ़र्ज़ शनासी।

मालूम होता है कि जिस तरह ज़ुल्फ़ेक़ार उनके हाथ में सरगर्म और बेज़बान है उसी तरह वो किसी और हस्ती के दस्ते क़ुदरत में सरगर्मे अमल और शिकवा व शिकायात से ना आश्ना हैं। ईमान व एताअत का वो मोक़ाम जो सद फ़ीसद यक़ीन का हासिल होता है लेकिन इसका पहचानना और उन नज़ाकतों और मुश्किलात से वाक़िफ़ होना बड़े साहिबे नज़र और साहिबे ज़ौक़ का काम है। इसलिए उनकी ज़िंदगी और उनकी अज़ीम शख़्सियत का पहचानना बड़ा इम्तिहान है। (अलमुर्तज़ा)

अली अलैहिस्सलाम की सख़ावत और तबीयत की ख़ुदमुख़तारी का ये आलम था कि इफ़्लास और फ़ाक़ा के दिनों में भी जो कुछ वो दिन भर की मज़दूरी के बाद हासिल करते थे उसका एक बड़ा हिस्सा ग़रीब और फ़ाक़ाकश लोगों में तक़्सीम कर दिया करते थे। हज़रत उस्मान बिन अफ्फान रज़ियल्लाहू अन्हा के बाद उम्मते मुस्लिमा ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के हाथों पर बैअत करने पर इत्तेफ़ाक़ किया। जज़्बात में भरे लोग हज़रत अली अलैहिस्सलाम की जानिब दौड़ पड़े लेकिन आपने उनकी बात ठुकराते हुए फ़रमाया मुझे छोड़ दो किसी और के पास जाओ। हज़रत अली अलैहिस्सलाम जज़्बात का असीर होना नहीं चाहते थे। जज़्बात की शिद्दत में किया जाने वाला फ़ैसला पसंद नहीं था। हज़रत अली अलैहिस्सलाम उन लोगों में से थे जिन्हें ओहद फ़रेब में मुब्तेला नहीं कर सकता। वो उन लोगों में से नहीं थे जो करंसी की चाह में दीवाने हो जाते हैं। उनकी नज़र में हुकूमत और ख़िलाफ़त की बात तो दौरान के नज़दीक पूरी दुनिया बकरी की छींक की तरह थी। आपने फ़रमाया कि मेरी नज़र में ऐसी हुकूमत की कोई हैसियत नहीं जो हक़ को क़ायम करने और बातिल के ख़ात्मा से क़ासिर हो।

इस्लामी दारुल हकूमत मदीना मुनव्वरा के लोगों ने आप पर ख़िलाफ़त क़बूल करने के लिए इतना ज़ोर डाला कि आहिस्ता आहिस्ता इसने मुज़ाहेरा की शक्ल अख़्तियार कर ली। ये मुतालिबा जमाती हदों से निकल कर इज्तेमाई हदूद को छूने लगा जिसके बाद उम्मते मुस्लिमा की बैअत अपनी तरफ़ से आइद करदा शराइत के साथ क़बूल कर ली। अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि ये जान लो कि अगर तुम्हारी बात क़बूल कर भी ली तो वही करूंगा जिसका मुझे इल्म होगा। ना किसी कहने वाले की बात पर कान धरूंगा । और ना ही किसी सरज़निश करने वाले की परवाह करूंगा। उम्मत ने फ़ौरन इताअत के वादे के साथ बैअत के लिए हाथ बढ़ा दिए। अली अलैहिस्सलाम ने अपनी हुकूमत के गवर्नरों और सियासी ओहदेदारों के लिए उम्मते इस्लाम के निज़ाम को बेहतर तरीक़े से चलाने के लिए एक लाहे अमल तैय्यार किया। (नहजुल बलाग़ा)।

गवर्नर के लिए ये शाइस्ता नहीं कि वो मुसलमानों की औरतों, उनकी दौलतों से उम्मीदें लगा बैठे और ना उसे जाहिल होना चाहिए। इस तरह वो लोगों से ज़ुल्म की वजह से दूर हो जाएगा और ना इसे सरकारी दौलत की तक़्सीम में तरफदारी करनी चाहिए। इस तरह वो कुछ लोगों को अपने क़रीब करेगा और कुछ लोगों को दूर कर देगा और ना गवर्नर को रिश्वत लेना चाहिए कि इस तरह वो हुक़ूक़ ज़ाया कर देगा और ग़ैर मुस्तहिक़ को हुक़ूक़ अता कर देगा और ना इसे सुन्नतों को मुअत्तल करने वाला होना चाहिए कि इस तरह उम्मत हलाक हो जाएगी। (नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा नम्बर 131)

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने ज़मामे हुकूमत सँभालते ही दूसरा काम ये किया कि उन गवर्नरों और अम्माल को माज़ूल कर दिया जो लोगों पर ज़ुल्म करते थे और ग़लत ताकि उम्मते मुस्लिमा के साथ अता या और हक़ में वैसा ही बराबरी का बरताव किया जाय जैसा कि नबी करीम हज़रत मुस्तफा सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम किया करते थे। आपने ऐलान कर दिया कि अनक़रीब बैतुल माल से ग़सब किए गए तमाम अम्वाल को वापिस इस्लामी ख़ज़ाना में ले आऊँगा यहां तक कि अगर किसी ने इसके ज़रीए शादी कर ली हो या कनीज़ ख़रीद ली हो तब भी। (मोहम्मद अब्दह शरह नहजुल बलाग़ा जिल्द- 8 सफ़्हा- 269)

इमाम अली अलैहिस्सलाम ने इस्लामी हयात की इस्लाह और नेज़ाम को दुरुस्त करने के लिए ऐसे गवर्नरों का तक़र्रुर किया जो रुहानी, फ़िक्री और अहकामाते ख़ुदावंदी के लिहाज़ से नमूना की हैसियत रखते थे जैसे उस्मान बिन हनीफ़ रज़ियल्लाहू अन्हा , हज़रत अबूबकर रज़ियल्लाहू अन्हा के साहबज़ादे मुहम्मद बिन अबी बकर रज़ियल्लाहू अन्हा और मालिक अश्तर वग़ैरह।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम के इन इस्लाही इक़दामात की वजह से जो हक़ीक़ी इस्लाम की अक्कासी करते थे कुछ लोगों ने आपसे साज़ बाज़ करने की भरपूर कोशिश भी की। उन्होंने वलीद बिन अबी मोईत को अपना नुमाइंदा बना कर अली अलैहिस्सलाम के पास भेजा। उसने आप से कहा कि ऐ अबुलहसन अलैहिस्सलाम! तुमने हम सब को एक दम छोड़ दिया हालाँकि हम तुम्हारे भाई और अब्द मुनाफ़ के ख़ानदान से होने की बिना पर तुम्हारे बराबर हैं। हम तुम्हारी बैअत इस शर्त पर करेंगे कि तुम उस्मान रज़ियल्लाहू अन्हा के ज़माने में हमें मिलने वाली दौलत हमारे ही पास रहने दो। अगर हमें तुमसे ख़ौफ़ महसूस होगा तो हम तुम्हें छोड़कर शाम चले जाऐंगे और ये धमकी भी दी कि अगर उन के मुतालिबे को ना माना गया तो वो शाम के बाग़ीयों से जा मिलेंगे लेकिन अली अलैहिस्सलाम ने उनकी धमकी पर कोई तवज्जोह ना दी। आपका जवाब था मेरे नज़दीक आल इस्माईल अलैहिस्सलाम को इस माल में आल इस्हाक़ अलैहिस्सलाम पर कोई फ़ज़ीलत नहीं।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपनी ख़िलाफ़त में जिस तरह के नमूना अमल आमिलों और गवर्नरों का तक़र्रुर क्या वो सबके सब फ़िक्री, अदारती और फ़ौजी मुआमलात में क़ुदरत रखते थे। आपने गवर्नरों को हमेशा नसीहत की कि बंदगाने ख़ुदा के दरमियान अद्ल व इंसाफ़ के रिवाज और ज़ुल्म व जोर से परहेज़ करने की फ़िज़ा क़ायम करना। इसके इलावा अपने आमिलों और गवर्नरों को ये नसीहत की कि वो उन चीज़ों से दूर रहें जो मंसब हासिल होने के बाद ख़ुदबख़ुद पैदा होती हैं जबकि मक़ाम व मनसफ़ एक आरिज़ी हैसियत का नाम है। आपने मोहम्मद इब्न अबूबकर रज़ियल्लाहू अन्हा के नाम ख़त लिखा जब उन्हें मिस्र का गवर्नर मुक़र्रर किया था जिसमें हिदायत थी कि लोगों से इन्किसारी और तवाज़ो से मिलना। इनसे नरमी का सुलूक करना। चेहरे को हश्शाश बश्शाश रखना। सबको एक नज़र से देखना ताकि बड़े लोग तुमसे अपनी तरफदारी की तवक़्क़ो ना रखें और छोटे लोग तुम्हारी अद्ल से मायूस ना हों क्योंकि ख़ुदा हर छोटे बड़े, ज़ाहिरी और ढके छिपे अमल का हिसाब लेगा। इसके बाद अगर उसने सज़ा दी तो तुम ख़ुद ज़ालिम थे और अगर उसने माफ़ कर दिया तो वो करीम तो है ही (नहजुल बलाग़ा बाब मकतूत)।

बसरा के गवर्नर उस्मान बिन हनीफ़ रज़ियल्लाहू अन्हा को बसरा की कुछ शख़्सियतों ने खाने पर मदऊ किया। इमाम अली अलैहिस्सलाम को जब इसकी इत्तेला मिली तो उन्हें ख़ौफ़ महसूस हुआ कि कहीं ये चीज़ें उन्हें अपनी तरफ़ माइल करके इस्लामी अदालत की राह से ना हटा दें जिसकी बिना पर वो अहकामाते ख़ुदा से दूर हो कर फ़ैसलों में ज़ुल्मो सितम रवा रखें। अली अलैहिस्सलाम को ख़त लिखा।

इब्न हनीफ़! मुझे इत्तेला मिली है कि बसरा के एक नौजवान ने तुम्हें खाने पर मदऊ किया और तुम फ़ौरन दौड़ पड़े। तुम्हारे लिए मुख़्तलिफ़ किस्म के अनवा इक़साम के खाने लाए गए और खानों से पुर सीनियाँ रखी गईं। मैं ये नहीं समझता कि तुम ऐसे लोगों की दावत क़बूल करोगे जो फ़क़ीरों से दूर हों और अमीर मदऊ हों लिहाज़ा तुम जो खाते हो उस पर ध्यान दो। जिस चीज़ के बारे में तुम्हें शुबा हो उसे थूक दो और जिसकी पाकीज़गी के बारे में तुम्हें यक़ीन हो उसे खा लो। जान लो कि हर मामूम के लिए एक ऐसा इमाम लाज़िम होता है जिसकी वो पैरवी करे। उसके इल्म के नूर से रौशनी हासिल करे। आगाह हो जाओ कि तुम्हारे इमाम ने अपनी दुनिया में दो बोसीदा कपड़ों और दो रोटियों पर ही क़नाअत कर ली है। जान लो कि तुम ऐसा नहीं कर सकते लेकिन तुम्हें तक़वा, जद्दो जहद और पाकदामनी और इस्तेहकाम के ज़रिए मेरी मदद करना चाहिए।

इसी तरह अली अलैहिस्सलाम ने अपने (उर्दू शेर ख़र्क़ के) गवर्नर के पास धमकी आमेज़ ख़त भेजा:

मुझे तुम्हारे बारे में एक बात मालूम हुई है। अगर तुमने उसे अंजाम दिया होगा तो इसका मतलब ये होगा कि तुमने अपने परवरदिगार को नाराज़ कर दिया। अपने इमाम की नाफ़रमानी की है। तुम मुसलमानों के अम्वाल को अपने अरब अक़रबा में बांटते हो जिनको मुसलमानों के नेज़ों और घोड़ों ने अपने क़ब्ज़े में किया था और उनके लिए उनके ख़ून बहे थे।( 14 नहजुल बलाग़ा मकतूब- 45, 15 नहजुल बलाग़ा मकतूब- 43)

आप की ख़ालिस इस्लामी तर्ज़े हुकूमत ने कुछ ऐसे लोगों के मफ़ादात को बिलवास्ता नुक़्सान पहुंचाया जो क़राबत और खानदानी फ़ज़ीलतों की बिना पर हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहू अन्हा के दौरे ख़िलाफ़त में एक इम्तेयाज़ी हैसियत के मालिक थे जिसके नतीजा में ज़ाती मफ़ादात को नुक़्सान पहुंचने की वजह से आप की ज़ात से कीना रख कर साज़िशों का जाल बुनना शुरू कर दिया जिसके नतीजे में आपकी शहादत वाक़े हुई।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम का इरशाद है कि जो शख़्स लोगों की क़यादत की अहम ज़िम्मेदारी क़ुबूल करे सबसे पहले अपनी ज़ात की तालीम शुरू करनी चाहिए इससे पहले कि वो दूसरों को तालीम दे। उसका फ़र्ज़ है कि वो इससे पहले ज़बान से अदब सिखाये ख़ुद अपनी सीरत और अपने किरदार को अदब सिखाता है। वो शख़्स इससे कहीं ज़्यादा इज्जत व एहतराम का हक़दार होता है जो दूसरों को तालीम देता है और अदब सिखाता है।

अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं परहेज़गार और नेकोकार इंसानों को चाहिए कि गुनहगारों पर रहम करें और हक़ ताला का शुक्र अदा करते हुए उनसे चश्मपोशी करें। अपने भाई की ग़ीबत ना करें और वो जिस जिस बला में गिरफ़्तार हुआ है उस पर उसको सरज़निश ना करें। ये सोच लेना चाहिए कि ख़ुद वो भी एक बड़े गुनाह का मुर्तक़िब होते हैं। ऐ बंदए ख़ुदा! बंदों के गुनाह पर मलामत करने में जल्दी ना कर। शायद ख़ुदा ने इनको बख़्श दिया हो।

एक ख़ुत्बा में आपने इरशाद फ़रमाया क़ब्ल इसके कि तुम्हारी आज़माईश की जाय तुम ख़ुद अपना जायज़ा लो, क़ब्ल इसके कि तुमसे हिसाब लिया जाय तुम ख़ुद अपना मुहासिबा करो, क़ब्ल इसके कि तुम्हारा गला घोंटा जाय सांस ले लो, क़ब्ल इसके कि तुम नाक के बल खींचे जाओ ख़ुद ही फ़रमां बरदारी अख़्तियार करो और जान लो कि जिस शख़्स का दिल व दिमाग़ ख़ुद वाइज़ व नासेह ना हो उस पर दूसरे की पंद व नसीहत असर नहीं करती।

सन् 40हिज्री में 19 रमज़ानुल मुबारक की तारीख़ में अली अलैहिस्सलाम को मस्जिदे कूफ़ा में हालते सज्दा में एक ख़ारिजी अबदुर्रहमान बिन मुलजिम ने ज़हर से डूबी हुई तलवार का वार सर मुबारक पर किया। 21 रमज़ान को हज़रत अली अलैहिस्सलाम नजफ़ में दफ़न हुए।

कूफ़ा से चार मील के फ़ासले पर नजफ़ अशरफ़ वाक़े है। यहां हज़रत आदम अलैहिस्सलाम और हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की क़ब्रें पहले से मौजूद थीं। आम लोग इस बात से नावाक़िफ़ हैं कि नजफ़ का नाम नजफ़ क्यों पड़ा? रवायात में मिलता है कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने तूफ़ान से मुक़ाबला के लिए किश्ती बनाई थी और उनका नाख़लफ़ बेटा पहाड़ पर चढ़ गया था जो बहुक्म ख़ुदा रेज़ा रेज़ा हो गया और वहां एक दरिया जारी हो गया इस जगह को कूए जफ़ कहा जाने लगा जिसके मानी होते हैं ख़ुश्क दरिया, मगर अरबी में नजफ़ के मानी ऊंचा मक़ाम होता है।

04जून 2012 बशुक्रियाः रोज़नामा सहाफ़त, नई दिल्ली

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