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Hindi Section ( 1 Apr 2012, NewAgeIslam.Com)

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Uncertainties and Karachi’s Falling Environment कराची अनिश्चितताओं के साये में


मुजाहिद हुसैन, न्यु एज इस्लाम

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

'' इंतेज़ार करो और आखिरी हद तक अपने हितों की प्राप्ति के लिए सौदेबाज़ी का प्रदर्शन करो, इस दौरान ज़बान व बयान पर काबू रखो और इस संकट के अंतराल में जो भी आड़े आए उसे ध्यान में रखो ताकि बवक्त जरूरत उसके साथ मामला किया जा सके'' ये वो कुछ मुख्तसर और बुनियादी सिद्धांत हैं जिनकी पासदारी के सहारे राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और उनके प्रयासों से ऐतिहासिक व्यक्ति का रूप धारण करते हुए प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने पाकिस्तान और उसके लोगों के जीवन पर किसी तरह का सकारात्मक असर डाले बिना अपनी सरकार की अवधि लगभग पूरी कर ली है। पाकिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार ने कभी सपने में भी ये सोचा नहीं होगा कि आईएसआई को चारों ओर से चित कर देगी लेकिन यह उपलब्धि सरकार ने हंसते खेलते हुए अंजाम दे डाला है। आईएसआई के पूर्व प्रमुख हाथ मलते हुए विदा हो चुके हैं और नये प्रमुख तहे दिल से प्रधानमंत्री के आभारी हैं कि उन्हें इस पद के लिए चुना गया है। अदालतें परेशान हैं कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को कैसे शिकंजे में लाएं क्योंकि दोनों शख्सियतें किसी तरह से आसान शिकार साबित नहीं हो सकीं। आर्मी चीफ (सेनाध्यक्ष) अपने पूर्ववर्तियों के अंजाम से अच्छी तरह परिचित हैं और ख़ामोशी इनके लिए हमेशा बहुत उपयोगी साबित हुई है।

एक नई तब्दीली अलबत्ता ये है कि देफाए पाकिस्तान और देफाए इस्लाम के शीर्षकों से कामयाब जलसे करने वाली शक्तियां इस्लामाबाद की निर्णय करने वाली शक्तियों को आकर्षित करने की भरपूर कोशिशों में लगी हैं। मौलाना फजलुर्रहमान, हफ़िज़ सईद और मुनव्वर हसन के बीच मुकाबला जारी है कि कौन किस कदर ताकत का प्रदर्शन करता है। प्रारंभिक परिणाम ये बताते हैं कि मौलाना फजलुर्रहमान कमजोर प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं जबकि हाफ़िज़ सईद आसानी से मुनव्वर हसन को मात दे चुके हैं। मुनव्वर हसन जमाते इस्लामी के राजनीतिक पतन की अंतिम निशानी साबित हुए हैं क्योंकि वो अपने पूर्ववर्ती (पेश रौ) काजी हुसैन अहमद की तरह सक्रिय नहीं। कुछ सूत्रों का मानना ​​है कि देफाए पाकिस्तान कौंसिल,  देफाए इस्लाम के नाम मौलाना फजलुर्रहमान और तहरीके इंसाफ के जनाब इमरान खान को पाकिस्तान के रवायती खुफिया हाथों की मदद हासिल है ताकि देश में 'वैकल्पिक नेतृत्व' के विचार को अमली जामा पहनाया जाए। दूसरी तरफ केंद्र में सत्ताधारी पीपुल्स पार्टी और देश के सबसे बड़े सूबे पंजाब में सत्ता की मालिक मुस्लिम लीग नवाज़ पारंपरिक चुनावी राजनीति में अपने को मजबूत बना रही हैं। जिसके बाद शक्तिशाली संस्थाओं का '' वैकल्पिक नेतृत्व का खयाल''  किसी किस्म की चुनावी राजनीति में धुंधलाता नजर आ रहा है। इमरान खान की तहरीके इंसाफ ऐसे किसी चुनावी मुकाबले में बुरी तरह हार का सामना करेगी जबकि खास इलाकों से बाहर मुल्लाओं के पास कोई चुनावी शक्ति नहीं है। देफाए पाकिस्तान कौंसिल की कर्ताधर्ता जमातुद्दावा वैसे ही लोकतंत्र को कुफ़्र समझती है और हाफ़िज़ सईद साहब जब तक जम्हूरियत की तकफ़ीर वाले अपने फतवे से रुजु नहीं करते इनकी जमात की तरफ से चुनावी मुकाबले में भाग लेना कयास से बाहर है। तहरीके इंसाफ के एक 'इल्हामी'  साथी और प्रसिद्ध लेखक श्री हारून रशीद की तरफ से अलबत्ता ''खतरे'' की बू पहले ही सूंघ लेने की कूव्वत की दाद देना पड़ेगी कि उन्होंने कहना शुरू कर दिया है कि पाकिस्तान को लोकतंत्र और लोकतांत्रिक सरकारों ने कुछ नहीं दिया। पाकिस्तान और पाकिस्तान की जनता के सारे विकास में तानाशाहों का हाथ है। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि चुनाव की स्थिति में पाकिस्तान में कौन से राजनीतिक दल फिर मैदान मारने के लिए तैयार खड़े हैं।

मतलब एक ऐसी स्थिति सबके सामने है जिसमें स्पष्ट नज़र आ रहा है कि अगर चुनाव होते हैं तो 'वैकल्पिक नेतृत्व''  कुछ भी हासिल नहीं कर पाएगा और राज्य को एक अन्य प्रकार की अराजकता का सामना करना पड़ सकता है। क्योंकि तहरीके इंसाफ के नेता जनाब इमरान खान ये ऐलान कर चुके हैं कि उनकी पार्टी की हार सिर्फ़ चुनावी धांधली से मुमकिन होगी और ऐसी स्थिति में वो अपनी विशेष 'सुनामी' का रुख इस्लामाबाद की ओर मोड़ देंगे। देफाए पाकिस्तान कौंसिल किसी प्रकार के चुनावी मुकाबले में कामयाब होती नजर नहीं आतीं अलबत्ता मौलाना फज़लुर्रहमान दोबारा उतनी सीटें जीत लेंगे जिनके बल बूते पर वो आसानी के साथ सौदेबाज़ी कर सकते हैं। ऐसी ही स्थिति एम.क्यू.एम. की है जिसे कराची में किसी बड़े चुनावी प्रतिद्वंद्वी का सामना नहीं और उसकी सशस्त्र ताकत हर किस्म की आवश्यक सफलता पाने के लिए काफी है।

कराची में पिछले हफ्ते से जारी हत्याएं इस बात को ज़ाहिर करती है कि पाकिस्तान के आर्थिक केंद्र में असुरक्षा का स्तर कितना ऊंचा है और मुकाबले में शामिल राजनीतिक दल और गिरोह कितने शक्तिशाली हैं। एम.क्यू.एम. के नेता अल्ताफ हुसैन स्पष्ट रूप से धमकी देते नजर आ रहे हैं जबकि दूसरी ओर ए.एन.पी. का नेतृत्व अपने मौकफ पर कायम है और कराची में उसकी दुश्मनी और भी ज्यादा खूँ रेज़ होती जा रही है। आम राय ये है कि कराची के लड़ाकू गिरोह भत्ते और राजनीतिक बढ़त की जंग में व्यस्त हैं, जिसमें एक दूसरे के कार्यकर्ताओं की हत्या सामान्य बात है। लेकिन गृहमंत्री का बार बार यह खुलासा किसी को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सका कि कराची की बदअमनी में हिंसक धार्मिक संगठनों,  अलकायदा के साथी गिरोहों,  तहरीके तालिबान के विभिन्न धड़ों और स्थानीय स्तर पर तेजी के साथ सशस्त्र होती हुई सुन्नी तहरीक के बदले की आग में जलते नौजवानों की तरफ से जो कुछ सामने आ रहा है उसको भी नज़र में रखना चाहिए। गृहमंत्री चूंकि स्वयं अस्पष्ट बयान का शिकार हुए और उन पर किसी स्तर पर भी एतबार नहीं किया जाता इसलिए उनकी इस अहम बात को भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया है। ये एक तस्लमीशुदा हकीकत है कि कराची अब हर प्रकार के हिंसक संगठनों का सबसे बड़ा केंद्र है जो न सिर्फ उन्हें शरण देता है बल्कि इनको आर्थिक लाभ भी देता है।

हाल ही में लिखी "पंजाबी तालिबान" सहित नौ पुस्तकों के लेखक, मुजाहिद हुसैन अब न्यु एज इस्लाम के लिए एक नियमित स्तंभ लिखेंगेَ। वो लगभग दो दशकों से इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के तौर पर मशहूर अखबारों में लिख रहे हैं। उनके लेख पाकिस्तान के राजनीतिक और सामाजिक अस्तित्व, एक देश के इसकी शुरुआत के कम समय गुजरने के बाद से ही मुश्किल दौर से गुजरने से सम्बंधित क्षेत्र को व्यापक रुप से शामिल करते है। हाल के वर्षों में स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक आतंकवाद और सुरक्षा से संबंधित मुद्दे इनके अध्ययन के विशेष क्षेत्र रहे है। मुजाहिद हुसैन के पाकिस्तान और विदेशों के संजीदा हल्कों में काफी पाठक हैं। स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग की सोच में विश्वास रखने वाले लेखक मुजाहिद हुसैन, बड़े पैमाने पर तब्कों, देशों और इंसानियत को पेश चुनौतियों का ईमानदाराना तौर पर विश्लेषण पेश करते हैं।

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