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Hindi Section ( 3 Aug 2012, NewAgeIslam.Com)

The Quran's Broader Notion of Taqwa – An Irrefutable Testimony To Its Universalism तक़वा (परहेज़गारी) पर कुरान की व्यापक घारणा

 

मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम

10 जुलाई, 2012

ये लेख बुराई करने वाली जाहिल चौकड़ी- मुल्ला, रूढ़िवादी लोग, प्रोपगंडा फैलाने वाला पढ़ा लिखा वर्ग और इस्लामोपैथ (Islamopath) बुद्धिजीवी द्वारा इस्लाम के अलग थलग रहने को पसंद करने की फर्जी कहानी के प्रोपगंडा को दूर करने की एक कोशिश है।

इस काम को शायर मोहम्मद इकबाल के गुस्से के इज़हार से प्रेरणा मिली है। फूल की पत्ती से कट सकता है हीरे का जिगर, मर्दे नादाँ पर कलामे नर्मो नाज़ुक बेअसर

सह लेखक (अशफाक अल्लाह सैयद के साथ), इस्लाम का असल पैग़ाम, आमना पब्लिकेशन, यूएसए 2009 (अंग्रेजी से अनुवाद - समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

नेक आमाल और ज़कात की तरह तक़वा कुरान के बताए बुनियादी कार्यों में से एक है। जैसा नेक आमाल के साथ है वैसा ही मुत्तक़ी (परहेज़गार) लोगों के लिए खुदा की तरफ से ईनाम का यक़ीन दिलाया गया है। उस जन्नत का हाल जिसका परहेज़गारों से वादा किया है (ये है) कि उसके नीचे से नहरें बह रही हैं, उसका फल भी हमेशा रहने वाला है और उसका साया (13:35), इसमें (ऐसे) पानी की नहरें होंगी जिसमें कभी (बू या रंगत का) परिवर्तन नहीं आएगा, और (इसमें ऐसे) दूध की नहरें होंगी जिसका स्वाद और मज़ा कभी न बदलेगा, और (ऐसे) शराब (तहूर) की नहरें होंगी जो पीने वालों के लिए सरासर लज़्ज़त है, और खूब साफ किए हुए शहद की नहरें होंगी (47:15), बाग़ और चश्मे (51:15), बाग़ और नेमतें (52:17), बाग़ और नहरें (54:54), और छाया और झरने (77:41) – क़ुरान ने मुत्तक़ी लोगों को ईनाम के तौर पर इनका ज़िक्र किया है। इस तरह वही (क़ुरान के अवतरित होने) आने की शुरुआत से लेकर आखीर तक की प्रक्रिया तक (610-632) कुरान इंसानियत को धर्म और बिना धर्म वालों का ध्यान दिये बिना तक़वा की राह पर चलने का सबको निर्देश देता है। इस तरह मक्की ज़माने के शुरुआत की अवधि (610-612/613) की एक आयत ऐलान करती है।

"और इंसानी जान की क़सम और हर पहलू से संतुलन और समायोजन करने वाले की कसम, (91: 7) फिर उसने उसे उसकी बदकारी और परहेज़गारी (की तमीज़) समझा दी, (91: 8) बेशक वो शख्स फलाह पा गया जिसने इस (नफ्स) को (रज़ाइल से) पाक कर लिया (और इसमें नेकी की नशो नुमा की) (91: 9) और बेशक वो शख्स नामुराद हो गया जिसने उसे (गुनाहों में) शामिल कर लिया (और नेकी को दबा दिया) "(91: 10)

इसकी क्रिया और संज्ञा के प्रकार अत्तक़ा, मुत्तक़ी और उससे बने अन्य शब्द कुरानी आयात में सैकड़ों की संख्या में नज़र आते हैं। विश्लेषकों ने इसका अर्थ संदर्भ के अनुसार और व्यक्तिगत शब्द भंडार के मद्देनजर खुदा से डरने वाला, खुदा की परवाह करने वाला, उसकी हिदायत चाहने वाला, खुदा से वाकफियत (परिचय), बुराई के खिलाफ अपनी हिफाजत करने वाला, लिया है। जैसा कि कुरान खुद के बेहतरीन विश्लेषक होने का दावा करता है (25:33) कुरान क्या कहता है उसे समझने का सबसे अच्छा तरीका इसका शोध करना है, जिसके लिए कुरान बार बार जोर देता है (38: 29, 47:24) निम्नलिखित अभ्यास में इसे ही करने की कोशिश की गई है।

1. जो लोग मुत्तक़ी हैं वो क़ुरान की रहनुमाई पर अमल कर सकते हैं।

दूसरी सूरे की दूसरी आयत (सूरे अलबकरा), जो एक शुरुआती दुआ (सूरे फातेहा) के बाद आती है और कुरान का इस प्रकार परिचय कराती हैः

"यो वो अज़ीम (महान) किताब है जिसमें किसी शक की गुंजाइश नहीं (ये) परहेज़गारों के लिए हिदायत (निर्देश) है" (2: 2)

बाद के चरण में कुरान दुहराता है कि, "ये कुरान लोगों के लिए स्पष्ट बयान है और मार्गदर्शन और परहेज़गारों के लिए नसीहत है" (3:138)" और (ये) परहेज़गारों के लिए नसीहत है" (24:34) इसलिए ये बताता है कि मुत्तक़ी वो लोग हैं जो कुरान की हिदायत पर अमल करने की सलाहियत रखते हैं। इस तरह क़ुरान ऐलान करता है खुदा के गुलाम उससे दरख्वास्त करते हैं कि और हमें परहेज़गारों का पेशवा बना दे (25:74 ) जो:

         "जो ग़ैब पर ईमान लाते और नमाज़ को (सभी नियमों के साथ) कायम करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें अता किया है उसमें से (हमारी राह) में खर्च करते हैं," (2: 3)

        "और वो लोग जो आपकी तरफ नाज़िल किया गया और जो आपसे पहले नाज़िल किया गया (सब) पर ईमान लाते हैं, और आखिरत (परलोक) भी (पूरा) यक़ीन रखते हैं" (2: 4)

        "ऐ ईमान वालो! अल्लाह के लिए मजबूती से क़ायम रहते हुए इंसाफ पर आधारित गवाही देने वाले हो जाओ और किसी क़ौम की सख्त दुश्मनी (भी) तुम्हें इस बात से हटा न सके" (5: 8)

        "जो अपनी पत्नियों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करते हैं यदि एक से अधिक हों तब भी" (4:129).

        "और अगर कोई औरत अपने पति से ज़्यादती का या उसकी ओर रूझान खत्म होने का भय रखती हो तो दोनों (पति पत्नी) पर कोई हर्ज नहीं कि आपस में किसी मुनासिब बात पर सुलह कर लें" (4: 128)

        "और अगर तुमने उन्हें छूने से पहले तलाक दे दिया, जबकि तुम उनका महेर तय कर चुके थे तो उस महेर का जो तुमने तय किया था आधा देना ज़रूरी है" (2: 237)

        "(औरते) जो अपना महेर खुद माफ कर दें अगर वो छूने से पहले अपने तलाक देती हैं" (2: 241)

        "(मर्द) जो अपनी तलाकशुदा बीवियों को उचित गुज़ारा खर्च देते हैं (2: 241)"

        "(मर्द और औरतें) जो कुछ माल रखते हों वो अपने माँ बाप और करीबी रिश्तेदारों के हक़ में अच्छे तरीके से वसीयत करें" (2:180)

        "इसलिए जिसने (अपना माल अल्लाह की राह में) दिया और परहेज़गारी अख्तियार की" (92: 5)

        "जो अपना माल (अल्लाह की राह में) देता है कि (अपने जान और माल की) पकीज़गी हासिल करे (92: 18) और किसी का उस पर कोई एहसान नहीं जिसका बदला दिया जा रहा हो (92: 19) लेकिन (वो) सिर्फ अपने रब की खुशी के लिए (माल खर्च कर रहा है) "(92: 20)

        "जो सरकशी नहीं करता, और ज़्यादतियाँ नहीं करता और दूसरों को उनके अपने तरीके से इबादत करने से नहीं रोकता" (96: 6-14)

कुरान अपने बुनियादी रूहानी सिद्धांतों में से कुछ के साथ जुड़े प्रतीकों के मुकाबले तक़वा को विशेषाधिकार देता है। इस तरह, ये हज पर जाने वाले मुसलमानों तथा क़ुर्बानी की रस्म अदा करने वालों को चेतावनी देता है: (1) "और (आखिरत के) सफर का सामान कर लो, बेशक सबसे बेहतर ज़ादे राह तक़वा है"(2: 197) (2)" हरगिज़ न (तो) अल्लाह को इन (क़ुर्बानियों) का गोश्त पहुँचता है और न उनका ख़ून मगर उसे तुम्हारी तरफ से तक़वा पहुंचता है..." (22: 37) ये रोज़ा रखने को तक़वा हासिल करने में मददगार के रूप में बयान करता है (2:183, 2:187) जबकि शर्मगाहों को ढँकने में व्यक्तिगत लिबास की भूमिका का हवाला देते हुए कुरान कहता है, तक़वा सबसे बेहतरीन लिबास है (7: 26) ये आगे बताता है कि खुदा की नज़र में परहेज़गारी करने वाले अफजल होंगे उन लोगों के मुकाबले जो दुनिया की बेहतरीन चीजों को जुनून के तौर पर हासिल करते हैं ( 2: 212, 47: 36)

2. तक़वा का व्यापक विचार

उपरोक्त में दर्ज आयात 2: 3-4 और हज व रोज़े से संबंधित आयात को छोड़कर शेष विशेष रूप से धार्मिक नहीं हैं। ये सभी लोगों के, धार्मिक विश्वास को ध्यान में रखे बिना पूरी इंसानियत पर लागू होने के काबिल हैं। वही नाज़िल होने के आखरी बरसों में, कुरान स्पष्ट रूप से इसके वैश्विक भूमिका के (49: 13, 5: 93) के विषय में सूचित करता है, और इसक ध्यान दिये बिना कि कौन क्या खाता या पीता है, ये अच्छे कार्यों को जोरदार अंदाज़ में खुदा की खुशनूदी (आर्शीवाद) हासिल करने के लिए अधिकतम गुणवत्ता के रूप में पेश करता है (5: 93)

"ऐ लोगो हमने तुम्हें मर्द और औरत से पैदा किया और हमने तुम्हें (बड़ी बड़ी) क़ौमों और क़बीलों में (विभाजित) किया ताकि तुम एक दूसरे को पहचान सको। बेशक अल्लाह के पास तुम में से ज़्याद बाइज़्ज़त वो है जो तुम में अधिक परहेज़गार हो, बेशक अल्लाह खूब जानने वाला खूब खबर रखने वाला है" (49: 13)

"उन लोगों पर जो ईमान लाये और नेक काम करते रहे इस (हराम) में कोई गुनाह नहीं है जो वो (हुक्मे हुर्मत उतरने से पहले) खा पी चुके हैं जबकि वह (बाक़ी मामलों में) बचते रहे और (खुदा के दूसरे आदेशों पर) ईमान लाये और नेक काम पर अमल करते रहे, फिर (एहकामे हुर्मत के आ जाने के बाद भी इन सब हराम चीज़ों से परहेज करते रहे और (उनकी हुर्मत पर सिदके दिल से ईमान लाये, फिर साहिबाने तक़वा हुए (आखीर में) साहेबाने एहसान ( यानी अल्लाह के खास महबूब नेकोकार बंदे) बन गए, और अल्लाह एहसान वालों से प्यार करता है" (5: 93)

इस अहम कल्पना के किसी भी खिलवत पसंद तशरीह (गोपनीयता पसंद व्याख्या) से बचने के लिए, कुरान (ईसाइयों और यहूदियों) अहले किताब में से कुछ को मुत्तक़ी लोगों के रूप में परिभाषित करता है (3: 113-115)

"ये सब बराबर नहीं हैं, अहले किताब में से कुछ लोग हक़ पर (भी) क़ायम हैं वे रात के वक्त में अल्लाह की आयतों की तिलावत करते हैं और सिर बसजूद रहते हैं, (3:113), वो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान लाते हैं और भलाई का हुक्म देते हैं और बुराई से मना करते हैं और नेक कामों में तेजी से बढ़ते हैं और यही लोग नेकोकारों में हैं (114) और ये लोग जो नेक काम भी करें उसकी नाक़दरी नहीं की जायेगी और अल्लाह परहेज़गारों को खूब जानने वाला है"(3: 115)

3. मनुष्य धार्मिक हो या अधार्मिक तक़वा का खजाना है।

कुरान अल्लाह को तक़वा और माफी के बुनियादी स्रोत के रूप में परिभाषित करता है (74: 56), और कहता है कि खुदा ने  इंसान की रचनात्मक प्रक्रिया के अंतिम चरण में कुछ अलौकिक शक्ति डाली (15:29, 32 : 7-9, 38:72) इस तरह कुरानी दृष्टिकोण से, हर इंसान धार्मिक या  मुल्हिद (विधर्मी) होने के दावे के बावजूद तक़वा का  खज़ाना हैं जो उनकी चेतना में गहराई से प्रवेश किया हुआ रहता है और इस तरह नैतिक मूल्यों खुद की निंदा करने वाली नफ्से लव्वामा के रूप में रहती है (75: 2) लेकिन ख़ुदा की रचनात्मक योजना भी इंसान को नफ़्स अम्मारह अता करती है जो गुनाहों की तरफ ले जाने वाली नफ्स है (12: 53) इस तरह धर्म से अलग हर इंसान मुत्तक़ी के स्तर तक पहुँच सकता है या अनैतिकता या बुराई की सबसे गहरी खाई में गिर सकता हैं जैसा कि लेख की शुरूआत में आयत 91: 8 में बयान किया गया है। कुरान इसे अपने गुप्त, संक्षिप्त और व्यापक रूप से इस तरह पेश करता है:

"बेशक हमने इंसान को बेहतरीन (उदार और संतुलन वाली) साख्त में पैदा किया है(95:4) फिर हमने इसे पस्त से पस्त तर हालत में लौटा दिया (95: 5) सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाये और नेक काम करते रहे तो उनके लिए खत्म न होने वाला (पुराने) अजर (बदला) है" (95: 6)

तक़वा का व्यापक विचार और सभी मानवता के साथ उसकी गहरी सम्बद्धता धार्मिक लोगों के विशेषाधिकार को को समाप्त करता है। एक मुसलमान व्यक्ति (उसके लिंग को ध्यान में रखे बिना) सबसे ज़्यादा नज़र आने वाले धार्मिक प्रतीकों के साथ या धार्मिक संस्कार के मामले में समर्पित व्यक्ति तक़वा में पीछे या नाकाम भी हो सकता है और खुदा की खुशनूदी (आर्शीवाद) प्राप्त करने के अयोग्य हो सकता है जबकि एक गैर मुसलमान, यहां तक ​​कि वो मुल्हिद हो, जिसमें खुदी की अता की हुई शक्ति उसके चेतना में किसी तरह कम न हो, वह तक़वा में आगे जा सकता है और धार्मिक प्रतीकों की अनुपस्थिति और दिखने वाली इबादत में कम हो लेकिन वो खुदा की खुशनूदी (आर्शीवाद) हासिल कर सकता है, हालांकि ख़ुदा बेहतर जानता है कि कौन उसकी खुशनूदी हासिल करेगा।

 4. क्या मुसलमान, गैर मुसलमानों की मग़फ़िरत और उनकी भलाई के लिए दुआ कर सकते हैं?

तक़वा और माफी के ईश्वरीय स्रोत का संगम (74:56) जो पूरी इंसानियत की देखभाल करता है अपनी दया दृष्टि को सिर्फ मुसलमानों तक सीमित करने के किसी भी विचार को दूर करता है। इसलिए, मुस्लिम इमामों को नमाज़ या कुरान की तिलावत के बाद होने वाली दुआओं में खुदा का फज़ल मांगते समय इन लोगों को इसमें पूरी इंसानियत को शामिल करना चाहिए। सिर्फ शाब्दिक अर्थ लेने वाले इस्लामी विद्वान / इमाम हज़रात ही उसके खिलाफ बहस कर सकते हैं और बिना किसी संदर्भ के आयत 9:84 और 9:80 का हवाला देगें। सीधे तौर पर पढ़ने पर आयत 9:84 जो लोग कुफ्र की हालत में मर गए उनकी कब्र पर दुआ करने से मुसलमानों को मना करती है। आयत 9:80 यहां तक ​​कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को चेतावनी देते हुए कहती है, यहाँ तक कि अगर वो उन (मुनाफिकों जो कुफ्र की हालत में मर गए) लोगों के लिए सत्तर बार भी मग़फ़िरत की दुआ करेंगे तो खुदा उन्हें माफ नहीं करेगा। आयत 9: 80- 84 को साथ पढ़ें तो ये अकाट्य गवाही देती है कि ये एक विशिष्ट संदर्भ वाली आयतें हैं। इस तरह कुरान के स्पष्ट आदेश (3: 7) और इसके बेहतरीन अर्थ (39:18, 39:55) को लेने के बारे में निर्देश की भावना से उन्हें मानवता के लिए कुरान के वैश्विक संदेश का हिस्सा बमुश्किल ही गिना जा सकता है।

निष्कर्ष

आसान शब्दों में अगर कोई इस बहुआयामी कल्पना को समझना चाहे तो तक़वा किसी व्यक्ति के चेतना के सार्वभौम सामाजिक और नैतिक दायित्व, या उसकी नैतिकता का प्रतीक है। धर्म से अलग ये सभी इंसानों में पायी जाने वाली एक सामूहिक घारणा है, यहाँ तक कि उनमें भी जो जान बूझ कर  या अशिक्षा के कारण खुदा का इंकार करते हैं। क्योंकि खुदा की मज़ूरी, इसानों के काम और तक़वा का मूल्यांकन केवल भगवान ही कर सकता है, कोई किसी भी धर्म का मानने वाला हो किसी दूसरे के मुकाबले ज़्यादा परहेज़गारी का दावा नहीं कर सकता हैः

"और अल्लाह ही के लिए है जो कुछ आसमानों और जो कुछ ज़मीन में है ताकि जिन लोगों ने बुराईयां कीं उन्हें उनके काम का बदला दे और जिन लोगों ने नेकियाँ कीं उन्हें अच्छा फल प्रदान करे (53: 31) जो लोग छोटे गुनाहों ( और लगज़िशों) के अलावा बड़े गुनाहों और बेहयाई के कामों से परहेज़ करते हैं, बेशक आपका रब माफी की बड़ी गुंजाइश रखने वाला है, वो तुम्हें खूब जानता है जब उसने तुम्हारी ज़िंदगी की शुरुआत और विकास (यानी मिट्टी) से की थी और जबकि तुम अपनी माँ के पेट में भ्रूण (यानी गर्भावस्था) की स्थिति में थे, इसलिए तुम अपने आपको बड़ा पाक व साफ मत जताया करो, वो खूब जानता है कि (असल) परहेज़गार कौन है" (53: 32 )

ये बुनियादी कुरानी सिद्धांत किसी भी मुसलमान को किसी भी अन्य व्यक्ति को काफ़िर बुलाने से रोकता है और दुनिया को मुस्लिम और गैर मुस्लिम, एक नैतिक रूप से शुद्ध और दूसरे को नैतिक रूप से खराब के हिस्से में बांटने का विरोध करता है। मुसलमानों का औरों से अलग थलग रहने का व्यवहार उनके और उनके विश्वास और नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की तौहीन (अनादर) और ज़िल्लत (अपमान) का कारण बन रहा है, और एक सांस्कृतिक रुकावट पैदा कर रहा है जो संस्कृति और धार्मिक बहुलवाद के कुरान के अंतिम संदेश के परस्पर विरोधी है (5: 93, 49: 13, ऊपर 2 में दिया गया हवाला) [1] जितनी जल्दी मुसलमान इस कल्पना को दूर करेंगे, और कुरान के वैश्विक संदेशों को अपनाएंगे ये गलोब्लाईज़्ड दुनिया में उनके लिए बेहतर होगा। और अंत में, कुरान संदेश के वास्तविक गवाह के रूप में, जैसा कि हमारे विद्वान इसके संरक्षक होने का दावा करते हैं, को अपनी सभी दुआओं में सिर्फ मुसलमानों तक ही सीमित नहीं नहीं रहना चाहिए जैसा कि पारंपरिक रूप से वो करते हैं बल्कि इसमें पूरी इंसानियत को शामिल करना चाहिए।

नोट:

[1] तक़वा पर केंद्रित ये लेख नेक काम और अन्य विषयों पर कुरान की बहुत सी आयतों के हवालों की अनदेखी करता है (जो कुरान के बहुलतावाद का प्रदर्शन करता है)। जो लोग इसमें रुचि रखते हैं वो इसी वेबसाइट पर लेखक के निम्नलिखित लेखों को देख सकते हैं।

1. Any punishment for apostasy - let alone capital punishment is anti-Islamic

http://www.newageislam.com/islamic-sharia-laws/any-punishment-for-apostasy,-let-alone-capital-punishment,-is-anti-islamic-/d/5998

2. The Qur'an espouses harmonious inter-faith relations with the Christians and the Jews and all other faith communities.

http://newageislam.com/islam-and-pluralism/muhammad-yunus,-new-age-islam/the-qur’an-espouses-harmonious-inter-faith-relations-with-christians-and-jews-and-all-other-faith-communities/d/7722.

मोहम्मद यूनुस ने आईआईटी से केमिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की है और कार्पोरेट इक्ज़ीक्युटिव के पद से रिटायर हो चुके हैं और 90 के दशक से क़ुरान का गहराई से अध्ययन और उसके वास्तविक संदेश को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी किताब इस्लाम का असल पैग़ामको साल 2000 में अलअज़हर अलशरीफ, काहिरा की मंज़ूरी प्राप्त हो गयी थी और इसे यूसीएलए के डॉ. खालिद अबुल फ़ज़ल का समर्थन भी हासिल है। मोहम्मद यूनुस की किताब इस्लाम का असल पैग़ामको आमना पब्लिकेशन मेरीलैण्ड, अमेरिका ने साल 2009 में प्रकाशित किया।

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http://www.newageislam.com/islamic-ideology/the-quran-s-broader-notion-of-taqwa-–-an-irrefutable-testimony-to-its-universalism/d/7889

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