मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम
11 सितम्बर, 2012
सह लेखक (अशफाक अल्लाह सैयद के साथ), इस्लाम का असल पैग़ाम, आमना पब्लिकेशन, यूएसए 2009
(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)
ये राय ब्राउन के लेखः 'ओ.आई.सी. को समलैंगिकता को बढ़ावा देने और समलैंगिकों के मानवाधिकारों के लिए संघर्ष के बीच अंतर को समझना चाहिए' के जवाब में लिखा गया लेख है।
पहली बुनियाद के रूप में, कुरान आस्था और विचारधारा में विविधता को स्वीकार करता है, जब तक कि दुनिया के विभिन्न वर्गों के लोग आपस में अच्छे कामों में एक दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं यानि वो ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं होते हैं जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दूसरों को शारीरिक नुक्सान पहुंचाती हो। ये सिद्धांत किसी के विश्वास पर ध्यान दिये बिना पूरी मानवता के लिए न्याय के बारे में खुदा के मानदंड पर कुरान की अहम आयतों (2:62, 2:112, 4:124, 5:69, 64:9, 65:11) में शामिल है और इसे स्पष्ट रूप से क़ुरान के एक महत्वपूर्ण ऐलान (5:48) में कहा गया है, ये आयत कुरान के नाज़िल होने के अंतिम चरण से संबंध रखती हैः
“बेशक मुसलमानों और यहूदियों और नसरानियों और ला मज़हबों में से जो कोई खुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान लाए और अच्छे-अच्छे काम करता रहे तो उन्हीं के लिए उनका अज्र व सवाब उनके खुदा के पास है और न (क़यामत में) उन पर किसी का ख़ौफ होगा न वह रंजीदा दिल होंगे"(2:62)।
"हाँ अलबत्ता जिस शख्स ने खुदा के आगे अपना सर झुका दिया और अच्छे काम भी करता है तो उसके लिए उसके परवरदिगार के यहाँ उसका बदला (मौजूद) है और (आख़ेरत में) ऐसे लोगों पर न किसी तरह का ख़ौफ़ होगा और न ऐसे लोग ग़मग़ीन होगे"(2:112)।
”और जो शख्स अच्छे अच्छे काम करेगा (ख्वाह) मर्द हो या औरत और ईमानदार (भी) हो तो ऐसे लोग बेहिश्त में (बेखटके) जा पहुंचेंगे और उनपर तिल भी ज़ुल्म न किया जाएगा" (4:124)।
“इसमें तो शक ही नहीं कि मुसलमान हो या यहूदी हकीमाना ख्याल के पाबन्द हों ख्वाह नसरानी (गरज़ कुछ भी हो) जो ख़ुदा और रोज़े क़यामत पर ईमान लाएगा और अच्छे (अच्छे) काम करेगा उन पर अलबत्ता न तो कोई ख़ौफ़ होगा न वह लोग आज़ुर्दा ख़ातिर होंगे"(5:69)।
“इसमें शक नहीं कि जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया (मुसलमान) और यहूदी और लामज़हब लोग और ईसाई और मजूसी (आतिशपरस्त) और मुशरेकीन (कुफ्फ़ार) यक़ीनन खुदा उन लोगों के दरमियान क़यामत के दिन (ठीक ठीक) फ़ैसला कर देगा इसमें शक नहीं कि खुदा हर चीज़ को देख रहा है"(22:17)।
"जब वह क़यामत के दिन तुम सबको जमा करेगा फिर यही हार जीत का दिन होगा और जो शख़्श ख़ुदा पर ईमान लाए और अच्छा काम करे वह उससे उसकी बुराइयाँ दूर कर देगा और उसको (बेहिश्त में) उन बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें जारी हैं वह उनमें अबादुल आबाद हमेशा रहेगा, यही तो बड़ी कामयाबी है"(64:9)।
"जो तुम्हारे सामने वाज़ेए आयतें पढ़ता है ताकि जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम करते रहे उनको (कुफ़्र की) तारिक़ियों से ईमान की रौशनी की तरफ़ निकाल लाए और जो ख़ुदा पर ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम करे तो ख़ुदा उसको (बेहिश्त के) उन बाग़ों में दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरें जारी हैं और वह उसमें अबादुल आबाद तक रहेंगे ख़ुदा ने उनको अच्छी अच्छी रोज़ी दी है"(65:11)।
"और (ऐ रसूल) हमने तुम पर भी बरहक़ किताब नाज़िल की जो किताब (उसके पहले से) उसके वक्त में मौजूद है उसकी तसदीक़ करती है और उसकी निगेहबान (भी) है जो कुछ तुम पर ख़ुदा ने नाज़िल किया है उसी के मुताबिक़ तुम भी हुक्म दो और जो हक़ बात ख़ुदा की तरफ़ से आ चुकी है उससे कतरा के उन लोगों की ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो और हमने तुम में हर एक के वास्ते (हस्बे मसलेहते वक्त) एक एक शरीयत और ख़ास तरीक़े पर मुक़र्रर कर दिया और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम सब के सब को एक ही (शरीयत की) उम्मत बना देता मगर (मुख़तलिफ़ शरीयतों से) ख़ुदा का मतलब यह था कि जो कुछ तुम्हें दिया है उसमें तुम्हारा इमतेहान करे बस तुम नेकी में लपक कर आगे बढ़ जाओ और (यक़ीन जानो कि) तुम सब को ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है"(5:48)।
इन स्पष्ट और बार बार के बयानों के आधार पर ये निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वरीय योजना उन सभी शारीरिक गतिविधियों (अमल), इशारों और अभिव्यक्तियों को जो इंसानियत का भला करती हैं, उन्हें पसंद करता है और वो काम जो इंसानियत का नुक्सान करते हैं, उन्हें नापसंद करता है। इसी तरह कुरान अपने संदेश के विभिन्न पहलुओं पर जोर देने के साथ ही विशेष रूप से सामाजिक बुराइयों (बुरे कार्यों और व्यवहार) जो वही के नाज़िल होने के समय मौजूद थीं जैसे कि गुलामी, व्याभिचार, गरीबों का आर्थिक शोषण, गबन, रिश्वत, सूदख़ोरी, नागरिकों पर युद्ध का खतरा, एक व्यक्ति के रूप में और वैवाहिक जीवन में औरतों पर अत्याचार और उन्हें अपने अधीन रखना, न्याय के बिगड़े हुए रूप का विचार, अमानवीय आदिवासी रस्मो रिवाज, वर्ग और मानवता के साथ किसी भी दिलचस्पी की कमी, आदि। लेकिन सांस्कृतिक विकास के बावजूद मानव प्रकृति पाश्विक रूप में ही बनी रही, जैसा कि उस समय की बुराईयों और नाइंसाफियों में ये ज़ाहिर हुआ। प्रतिद्वंद्वी संस्कृतियों के बीच बढ़ती हुई नफरत, पैसे के लिए बढ़ती लालच, शक्ति और सत्ता की बढ़ती भूख, उपभोग की बढ़ती इच्छा, आतंकवाद की खतरनाक कार्यवाईयाँ, सांप्रदायिक/ जातीय हिंसा, नरसंहार, आय और खपत के स्तर में बढ़ती हुई खाई, युद्ध और खून खराबे के कारण भारी नुक्सान को दूसरों की पीड़ा समझ कर नज़रअंदाज़ करना और उन्हें आम उदाहरण और रोज़ान की खबर के रूप में हवाला देना। इसलिए, कुरान का पैग़ाम जितना मुसलमानों के लिए महत्वपूर्ण है उतनी ही आज मानवता के लिए अहमियत रखता है। इसके साथ ही हमने लेख के शीर्षक में पेश समस्या पर शोध किया।
इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि कुरान समलैंगिकता के व्यवहार के सार्वजनिक प्रदर्शन की निंदा करता है। पैगम्बर लूत अलैहिस्सलाम (15:58-77, 26:160-175, 27:54-58, 29:28 - 35) के उम्मतियों के साथ कुरान का रवैया जो अपनी बस्तियों सहित मारे गए। लेकिन जिस सवाल का जवाब दिए जाने की आज जरूरत है वो ये कि क्या 21वीं सदी में दो वयस्क गैर शादीशुदा लोगों के बीच आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध ' बुरा या शैतानी काम 'या एक अपराध है, और क्या अपराधी को सज़ा और उसके साथ हिंसक व्यवहार किए जाने की जरूरत है या बिना रुकावट के उन लोगों को अपनी ज़िंदगी जीने देने की इजाज़त दी जा सकती है।
माफी की शर्त के साथ इस विषय पर कुरान का एक बहुत आम है, लेकिन अस्पष्ट बयान है: "और तुम लोगों में से जिनसे बदकारी सरज़द हुई हो उनको मारो पीटो फिर अगर वह दोनों (अपनी हरकत से) तौबा करें और इस्लाह कर लें तो उनको छोड़ दो बेशक ख़ुदा बड़ा तौबा कुबूल करने वाला मेहरबान है (16)। मगर ख़ुदा की बारगाह में तौबा तो सिर्फ उन्हीं लोगों की (ठीक) है जो नादानिस्ता बुरी हरकत कर बैठे (और) फिर जल्दी से तौबा कर ले तो ख़ुदा भी ऐसे लोगों की तौबा क़ुबूल कर लेता है और ख़ुदा तो बड़ा जानने वाला हकीम है "(4:17)। कुरान न तो इनकी व्याख्या करता है, और न ही किसी सज़ा के प्रोटोकॉल को प्रस्तावित करता है, और न ही ये बताता है कि इन दोनों के खिलाफ समलैंगिकता के आरोप की शुरुआत कौन करेगा। इस्लामी कानून सार्वजनिक रूप से समलैंगिकता के प्रदर्शन पर विभिन्न शर्तों के साथ कैद से लेकर मौत की सजा तक का प्रस्ताव पेश करता है और फुकहा (धर्मशास्त्री) ने इसे बदकारी (व्याभिचार) के बराबर बताकर पेश किया है, लेकिन इस तरह की समानता का आधार आपत्तिजनक है। बदकारी में धोखाधड़ी, भावनात्मक चोट पहुँचाना और अपने वैवाहिक जीवन के साथी के साथ किए गए समझौते का उल्लंघन करना शामिल होता है जबकि आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध में इस तरह का कोई हानिकारक परिणाम नहीं हैं। शायद इस्लामी फुकहा की राय बाइबल के ऐलान के मुताबिक है, "अगर कोई एक व्यक्ति एक आदमी के साथ यौन संबंध रखता है जैसा कि एक व्यक्ति एक महिला के साथ रखता है, तो इन दोनों को मौत की सजा दी जानी चाहिए"(20:13, Levictus)।
'समलैंगिकों के अधिकारों के समर्थक ये तर्क देते हैं कि ये स्वाभाविक व्यवहार और जन्मजात विसंगति है और इसलिए इसे आपराधिक रूप का व्यवहार नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे पूरी तरह सामान्य व्यवहार मानकर इसके साथ व्यवहार किया जाना चाहिए। जैविक तथ्य ये है कि जीवन में बहुत जल्दी यौन चेतना उजागर हो जाती है। अगर समलैंगिकता को पूरी तरह से स्वीकार्य व्यवहार के रूप में गिना जाता है तो ये किसी भी आदत की तरह प्राइमरी स्कूल स्तर पर बच्चों में फैल जाती, फिर वो बेहयाई से इस लत पर अमल करते हुए वयस्क होते और जो गंभीर सांस्कृतिक और आबादी की समस्याएं खड़ी करता और सामाजिक व्यवस्था में खराबी पैदा करता। लेकिन, जहां तक दो समलैंगिक गैर-शादीशुदा वयस्क लोगों का सम्बंध है, अगर वो इस तरह का जीवन जीने का फैसला करते हैं तो कुरान उन्हें सजा देने का स्पष्ट आधार प्रदान नहीं करता है। कुरान सही रास्ता चुनने में स्वतंत्र इच्छाशक्ति के विचार को स्वीकार करता है "और उसको (अच्छी बुरी) दोनों राहें भी दिखा दीं "(90:10) यानि किसी काम को करने या न करने का चयन करने की आज़ादी जो कि चयनित रास्ता या अमल किसी व्यक्ति को शारीरिक रूप से नुक्सान पहुंचाने का कारण नहीं बनता है।
इसलिए ये निष्कर्ष निकलता है कि वयस्क समलैंगिकों को अपने मुताबिक जीवन जीने के लिए छोड़ने में इस्लामी पैग़ाम का कोई उल्लंघन नहीं होगा और इसलिए उनके साथ हिंसा या भेदभावपूर्ण व्यवहार किए जाने की जरूरत नहीं है। वो लोग जो समलैंगिकता से नफरत करते हैं, समलैंगिकों के साथ दोस्ती न करें या उनकी मिसाल की पैरवी न करें, लेकिन उन्हें दुश्मन न मानें या समलैंगिक होने के नाते उनके साथ भेदभाव न करें और उनके व्यवहार को स्वीकृत या उसकी नकल किए बिना उनके व्यक्तिगत मानवाधिकारों का सम्मान करें।
मोहम्मद यूनुस ने आईआईटी से केमिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की है और कार्पोरेट इक्ज़ीक्युटिव के पद से रिटायर हो चुके हैं और 90 के दशक से क़ुरान का गहराई से अध्ययन और उसके वास्तविक संदेश को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी किताब ‘इस्लाम का असल पैग़ाम’ को साल 2000 में अलअज़हर अलशरीफ, काहिरा की मंज़ूरी प्राप्त हो गयी थी और इसे यूसीएलए के डॉ. खालिद अबुल फ़ज़ल का समर्थन भी हासिल है। मोहम्मद यूनुस की किताब ‘इस्लाम का असल पैग़ाम’ को आमना पब्लिकेशन मेरीलैण्ड, अमेरिका ने साल 2009 में प्रकाशित किया।
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