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Hindi Section ( 7 May 2013, NewAgeIslam.Com)

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Islam Presents a Fine Balance between Individualism and Collectivism इस्लाम व्यक्तिवाद और सामूहिकतावाद के बीच एक अच्छा संतुलन पेश करता है

 

मोहम्मद बुर्दबार खान

1 मार्च, 2013

पिछले 100 सालों के दौरान दुनिया ने पूंजीवाद और साम्यवाद की दो विचारधाराओं के बीच एक अनोखा संघर्ष देखा है। सिर्फ एक नस्ल पहले, शायद ही कोई ये सोच सकता था कि ये संघर्ष एक दशक के भीतर खत्म हो जाएगा।

लेकिन ऐसा ही हुआ है। आम धारणा ये है कि पूंजीवाद और साम्यवाद व्यक्तिवाद और सामूहिकतावाद में क्रमशः विश्वास के द्वारा स्थापित थी। इसके अलावा, इन दोनों व्यवस्थाओं ने इन विरोधी विश्वासों में शामिल ज्यादतियों की भी नुमाइंदगी की। इसके अलावा दोनों प्रकृति में धर्मनिरपेक्ष थे, और किसी भी धार्मिक आस्था से उन्होंने खुद को दूर रखा था।

दूसरी सदी के मध्य और इसके आखरी हिस्से के दौरान पश्चिमी समाजों में धर्म और राज्य के बीच संघर्ष में हर धार्मिक चीज़ को धार्मिक कुलीन वर्ग के सिद्धांत और विश्वास और दुनिया के इस हिस्से में उनकी मनमानी की प्रवृत्ति के साथ जोड़ा गया। हालांकि राज्य के साथ धर्म के करीबी सम्बंध ने इसी वक्त मुस्लिम समाज को आगे बढ़ने से नहीं रोक सके, जब पश्चिमी सभ्यता को "अंधकार युग" में होना माना जाता था।

जो हम इस व्यवस्था में पाते हैं उससे अहुत अधिक अंतर रखते हुए इस्लाम व्यक्तिवाद और सामूहिकतावाद के बीच एक अच्छा संतुलन पेश करता है।

ब्रह्मांड की इस्लामी अवधारणा में, इंसान इस ज़मीन पर ख़ुदा की तरफ से ख़लीफा नियुक्त किया गया है, और हर चीज़ अमानत के रूप में उसे दी गई है। समाज के हिस्से के रूप में, उसे अपनी ज़िम्मेदारियों को उस विश्वास से बाखबर होते हुए अदा करनी है।

जैसा कि पैग़म्बर मोहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने कहा है: "तुम में से हर एक शख्स हाकिम है, और तुम में से हर एक से उसकी रैय्यत के बारे में पूछताछ की जाएगी" (बुखारी और मुस्लिम)।

पहले के इस्लामी विद्वानों ने धार्मिक और सेकुलर के बीच किसी रुकावट को जगह नहीं दी। इसके अलावा शिक्षा पर ज़ोर दिया गया है, जो कि न सिर्फ व्यक्तिगत विकास की ओर ले जाती है बल्कि एक सभ्य समाज के विकास में भी सहायक होती है।

इस्लामी नज़रिए से तीन अवधारणाएं ऐसी हैं जिस पर व्यक्ति और उसके विकास के संदर्भ में हमें ध्यान देने की ज़रूरत है। एक व्यक्ति और उसके विकास को प्रशिक्षण, अनुशासन और शिक्षा के साथ समाज की समझ और सही सामाजिक व्यवहार को अपना कर और क्रमशः इल्म (ज्ञान) हासिल करने और उसे दूसरों तक पहुँचाने की सही प्रक्रिया के द्वारा हासिल किया जा सकता है।

इस्लाम एक व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता है। ये हर व्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करता है, और ख़ुदा के सामने सबको व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार और जवाबदेह ठहराता है। हमने क़ुरान में इसकी तरफ इशारा करती हुई आयतें पाईं।

इस्लाम का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बढ़ावा देना है, जो समाज में सद्भाव और समुदाय में बेहतरी लाने की दिशा में तेज़ी लाता है। इस्लाम एक ऐसे आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता, जो कि समुदाय के फायदे के लिए व्यक्तिगत पहचान को दबा दे, जैसा कि कम्युनिस्ट सामाजिक व्यवस्था में होता है।

और न ही इसके विपरीत ये बेलगाम आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की व्यवस्था का समर्थन करता है, जैसा कि वर्तमान पश्चिमी पूंजीवादी व्यवस्था में है, जो लोगों को अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए व्यापक समुदाय की क़ीमत पर खुली छूट देता है।

बीच के रास्ते पर अमल करते हुए, इस्लाम लोगों को आदेश देता है कि वो समाज के हित में कुछ प्रतिबंधों को स्वीकार करें, इससे पहले कि वो उनके अपने मामलों से निपटने के लिए आज़ाद छोड़ दिए जाएं।

जैसा कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने कहा: "एक साथ रहो, एक दूसरे के खिलाफ़ मत जाओ, चीजों को दूसरों के लिए आसान बनाओ और एक दूसरे की राह में रुकावटें न डालो" (अहमद)।

इस्लाम ने समझदारी से लोगों के व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा करने के बाद समाज के प्रति लोगों के लिए कुछ कर्तव्य प्रस्तावित किये हैं। इसके अलावा व्यक्ति के अधिकार को पूरा करते हुए इस्लाम व्यक्तियों से बदले में समुदाय की सेवा करने की मांग करता है। इस सम्बंध में लोगों को दूसरों के बारे में सोचने की ज़रूरत है और कोई भी इस्लामी समाज में ऐश व आराम की ज़िंदगी उस स्थिति में नहीं गुज़ार सकता जबकि दूसरे लोग गरीबी और मोहताजी की ज़िंदगी गुज़ार रहे हों। पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने एक बार कहा: "वो मोमिन नहीं है जो अपना तो पेट भर लेता है, जबकि उसका पड़ोसी फाका (भूखा) करता हो" (बुखारी)।

और न ही एक सच्चा मुसलमान दूसरों की क़ीमत पर या दूसरों के शोषण के द्वारा तरक्की कर सकता है जैसा कि ये आज का चलन है। जैसा कि एक और हदीस है जिसमें नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने कहा कि, एक मुसलमान वो है जिसकी ज़बान और हाथ से मुसलमान महफूज़ (सुरक्षित) हैं। (बुखारी और मुस्लिम)

व्यक्तिवाद और सामूहिकतावाद की कल्पना खूबी के साथ इस्लाम के पांच स्तंभों या कर्तव्यों में पेश की गयी है। ईमान  का एलान, नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज। सामाजिक पेशवाई और रुकावटों को हटाकर ये पांच कर्तव्य मुसलमानों की ज़िम्मेदारियों और कर्तव्यों को प्रकट करता है।

इसके अलावा लोगों के सम्बंध और उनके अधिकारों पर ज़ोर देते हुए एक ही वक्त में ये व्यक्तियों और समुदाय के आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक विकास को प्रोत्साहित करता हैं। पांच वक्त की नमाज़ इस धरती पर खुदा के सामने के उसके सम्बंधों पर मोमिन को अपने स्थान की याद दिलाता है। फर्ज़ (अनिवार्य) रोज़ा न सिर्फ इंसानों में धैर्य की आदतें डालता है, बल्कि उन्हें भूख और प्यास के एहसास से भी आगाह करता है, जो ग़रीब लोग महसूस करते हैं। इस तरह वो सामाजिक हमदर्दी की भावना पैदा करता है।

इसी तरह ज़कात की कल्पना इस बात की मांग करता है कि मुसलमान अपने माल से आवश्यक हिस्सा अलग कर लें, और उसे गरीबों के बीच बाँट दें, और इस तरह वो सामाजिक कल्याण का प्रतिनिधित्व करते हैं। जैसा कि क़ुरान में बयान किया गया है: ''और उनके माल में मांगने वाले और निर्धन लोगों (दोनों) का हक़ (अधिकार) है'' (51:19)

हज एक छोटी दुनिया है कि किस तरह इंसानों को इस दुनिया में रहना चाहिए। हज के दौरान मक्का में लाखों मुसलमान दुनिया के कोने कोने से काबा के आसपास जमा होते हैं, जहां वो बयान किये गये दिनों तक, खुदा से दुआ करते हुए, और दूसरों के लिंग, जाति, वर्ग, स्थान आदि के बारे में सोचे बिना दूसरों के साथ पूरे तालमेल के साथ रहते हुए बिताते हैं।

इन सभी पांच कर्तव्यों का इच्छित परिणाम व्यक्तिगत और सामाजिक विकास है। इस तरह इस्लाम हमेशा व्यक्तिवाद और सामूहिकतावाद के बीच एक अच्छे संतुलन को बनाए रखने की कोशिश करता है।

मोहम्मद बुर्दबार खान, स्टर्लिंग मैनेजमेंट स्कूल, स्टर्लिंग युनिवर्सिटी, स्कॉटलैंड में एडजंक्ट फैकेल्टी (adjunct faculty) के सदस्य हैं।

स्रोत: http://dawn.com/2013/03/01/individualism-collectivism

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