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Hindi Section ( 18 May 2017, NewAgeIslam.Com)

Atrocious Use of Loudspeakers लाउडस्पीकरों का क्रूर उपयोग

 

मुफ्ती तक़ी उस्मानी

अत्याचार केवल यह नहीं है कि किसी का माल छीन लिया जाए, या उसे शारीरिक परेशानी पहुंचाने के लिए उस पर हाथ उठाया जाए, बल्कि अरबी भाषा में '' अत्याचार '' की परिभाषा की गई है कि '' कुछ भी बे जगह का उपयोग कर न गलत है ''क्योंकि किसी चीज का बे महल उपयोग बेशक किसी न किसी को चोट पहुँचाने का सबब होता है, इसलिए हर ऐसा उपयोग '' अत्याचार '' की परिभाषा में प्रवेश है। और अगर इससे किसी इंसान को तकलहीफ पहुंचती है,तो वह धर्म आधार पाप कबीरा है। लेकिन हमारे समाज में इस तरह के बहुत से पाप कबीरा,ऐसे रिवाज पा गए हैं कि अब आम तौर पर उनके पाप होने का भी एहसास बाकी नहीं रहा।

'' धमकी '' इन अनगिनत मामलों में से एक छोर कोई दर्दनाक स्थिति लाउडस्पीकरों का क्रूर ासपमा लिमिटेड। अब कुछ दिन पहले एक अंग्रेजी दैनिक में एक साहब ने शिकायत की है कि कुछ शादी हॉल में रात तीन बजे तक लाउडस्पीकर पर गाने बजाने का सिलसिला जारी रहता है,और आसपास के रहने वाले बेचैनी की हालत में करवटें बदलते रहते हैं,और एक शादी हॉल क्या थामने?हर जगह देखने में यही आता है कि जब कोई व्यक्ति कहीं लाउडस्पीकर स्थापित करता है, तो उसे इस बात की परवाह नहीं होती कि उसकी आवाज बस जरूरत सीमा तक सीमित रखा जाए, और आस-पास के इन बुड्ढे और बीमारों पर दया जाए जो यह आवाज सुनना नहीं चाहते।

गाने बजाने का सिलसिला तो अलग रहा,उसे जोर से फैल दोहरी बुराई है,अगर कोई शुद्ध देना और धार्मिक कार्यक्रम हो तो उसे भी लाउडस्पीकर के माध्यम से ज़बरदस्ती साझा कर ना शरई आधार हरगिज़ जा यज़ नहीं है , लेकिन खेद है कि हमारे समाज में राजनीतिक और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करने वाले लोग भी व्यवस्था इस महत्वपूर्ण आदेश बिल्कुल विचार नहीं करते। राजनीतिक और धार्मिक सभाओं के लाउडस्पीकर भी दूर तक मार करते हैं,और उनकी उपस्थिति में कोई व्यक्ति अपने घर में न आराम से सो सकता है न एकाग्रता के साथ अपना कोई काम कर सकता है। लाउडस्पीकर द्वारा अज़ान की आवाज़ दूर तक पहुंचाना तो बुर अधिकार है,लेकिन मस्जिदों में जो उपदेश और भाषण या चर्चा और सुनाना लाउडस्पीकर पर होती हैं,उनकी आवाज दूर तक पहुंचाने का कोई औचित्य नहीं है। अक्सर देखने में आता है कि मस्जिद में बहुत थोड़े से लो जी उपदेश या शिक्षण सुनने के लिए बैठे हैं जिन्हें आवाज पहुंचाने के लिए लाउडस्पीकरों की सिरे से जरूरत ही नहीं है,या केवल आंतरिक हॉर्न से आसानी काम चल सकता है,लेकिन बाहरी लाउडस्पीकरों पूरी ताकत से खुला होता है और फलस्वरूप यह आवाज पड़ोस घर घर जैसे पहुंचती है कि कोई व्यक्ति इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।

दीन सही समझ रखने वाले विद्वानों चाहे किसी विचारधारा से संबंध रखते हैं,कभी यह काम नहीं कर सकते, लेकिन ऐसा उनकी मस्जिदों में होता है, जहां का प्रबंधन इल्मे दीन से अपरिचित सज्जनों के हाथ में है। कभी-कभी यह सज्जनों पूरी नेकनीयत से यह काम करते हैं,वे उसे धर्म प्रचार का एक स्रोत समझते और उसे दीन सेवा बताते हैं,लेकिन हमारे समाज में यह नियम भी बहुत गलत प्रसिद्ध हो गया है,कि इरादा अच्छा कोई से कोई गलत काम भी जायज़ और सही हो जाता है,घटना है कि किसी काम सही होने के लिए केवल नेकनीयत ही प्रति नहीं,उसका तरीका भी सही होना चाहिए, और लाउडस्पीकर ऐसा क्रूर प्रयोग न केवल कि निमंत्रण और प्रचार के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है,बल्कि इसके उल्टे नतायज सामने आते हैं।

जिन सज्जनों को इस संबंध में कोई गलतफहमी हो,उनकी सेवा में करुणा और दलसवज़ी के साथ कुछ बिंदुओं नीचे प्रदान करता हूँ।

(1) प्रसिद्ध मुहद्दिस हज़रत उमर बिन शक ने मदीना की तारीख पर चार संस्करणों में बड़ी विस्तृत किताब लिखी है जिसका संदर्भ बड़े उलमा व मोहद्देसीन देते रहते हैं। इस पुस्तक में उन्होंने एक घटना अपनी सनद सुनाई है कि एक प्रवचन साहब हज़रत आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा के मकान पूरी तरह से सामने बहुत जोर से उपदेश कहा करते थे जाहिर है कि उस ज़माने में ला उड वक्ता नहीं था, लेकिन उनकी ध्वनि बहुत ऊंची थी, और हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की एकाग्रता में अंतर आता था, यह हज़रत फारूक आजम रा की खिलाफत का ज़माना था, इसलिए हज़रत आयशा ने उमर से शिकायत की, कि यह साहब जोर मेरे घर के सामने उपदेश कहते रहते हैं,जो मुझे तकलीफ होती है और मुझे किसी और की आवाज सुना कोई नहीं देती,उमर ने इन साहब को संदेश भी ग कर उन्हें वहां से उपदेश कहने से मना किया,लेकिन कुछ समय के बाद प्रवचन साहब ने फिर वही सिलसिला फिर शुरू कर दिया। उमर को सूचना हुई तो उन्होंने खुद जाकर इन साहब को पकड़ा,और उन पर पज़ीरिय सजा जारी। (अखबार ालमदीनिय लिमर बन शक जवाब: 1, पी: 15)

(2) बात केवल यह नहीं थी कि हज़रत आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा अपनी असुविधा निवारण करना चाहता था, बल्कि दरअसल वह इस्लामी समाज के इस सिद्धांत को स्पष्ट और लागू करना चाहता था कि किसी को किसी परेशानी न पहुंचे, तथा यह बताना चाहती थीं कि दीन की दावत और प्रचार पर गरिमा तरीका क्या है?इसलिए इमाम अहमद ने अपनी गद्दी में परंपरा नकल है कि एक बार उम मोमेनीन हज़रत आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा ने मदीना के एक प्रवचन को उपदेश और प्रचार शिष्टाचार विवरण के साथ बता हुए और उनके शिष्टाचार में यह भी फर माया कि:

'' अपनी आवाज उन्हें लोगों की सीमा तक सीमित रखें जो तुम्हारी सभा में बैठे हैं और उन्हें भी उसी समय तक दीन बातें सुनाओ जब तक उनके चेहरे तुम्हारी आकर्षित हूँ,जब वह चेहरे बारी,तो आप भी बंद जाकर । और ऐसा कभी नहीं होना चाहिए कि लोग आपस में बातें कर रहे हों,और आप उनकी बात काटकर अपनी बात शुरू कर दो बल्कि ऐसे अवसर पर चुप रहो,फिर जब वह तुम्हें फर तिश तो उन्हें दीन बात सुनाओ ''(भीड़ ाल्सवायद, जवाब: 1, पी: 191)

हज़रत दी बिन अबी रबअह बड़े उच्च स्तरीय ताबेईन में हैं,ज्ञान टीका हदीस में उनका स्थान मुस्लिम है उनका मकोलह है कि ''आलम को चाहिए कि इक्की ध्वनि इस मजलिस से आगे न बढ़े '' (साहित्य ालामलाय और ालाज्यमलाय ललसमझनी, पी 5)

(4) यह सारे शिष्टाचार वास्तव खुद पवित्र सर्वर कोनीन (स.अ.व.) ने अपने कथनी और करनी से शिक्षा फर मा हुए हैं, प्रसिद्ध घटना है कि आप (स.अ.व.) उमर फारूक प्रधानमंत्री के पास से गुजरे, वह तहज्जुद की नमाज़ में जोर से पढ़ रहे थे, उमर ने कहा कि मैं '' सोते को जगाती हूँ और शैतान को भगा हूँ '' आँ हज़रत (स.अ.व.) ने फर माया कि अपनी आवाज को थोड़ा कम कर दो '' (मिशक़ात, सी 1 देखा: 107)

इसके अलावा हज़रत आयशा से ही परंपरा है कि आँ हज़रत (स।) जब तहज्जुद के लिए जागरूक होते तो अपने बिस्तर धीरज के साथ उठते थे (ताकि सोने वालों की नींद खराब न हो)

(5) उन्हें हदीसों प्रकाश सभी फ़ुक़्हा अमित इस बात पर सहमत हैं कि तहज्जुद की नमाज़ में इतनी जोर से पढ़ कर न,जो किसी की नींद खराब हो,हरगिज़ जा यज़ नहीं फ़ुक़्हा ने लिखा है कि यदि कोई व्यक्ति अपने घर की छत पर जोर से तिलावत करे जबकि लो जी सो रहे हो तो सुनाना कर वाला गुनाहगार है '' (रिासतह ाल्फ़तावी, जवाब: 1, पी 103, सीरिया, सी 1, पी 403,444)

एक मर तबह एक साहब ने यह सवाल एक ाज्यफ़्ताय की स्थिति में सेट किया था कि कुछ मस्जिदों में तरावीह की मेलबलि आवृत्ति लाउडस्पीकरों पर इतनी जोर से है कि इससे मोहल्ले की महिलाओं के लिए घरों में नमाज़ पढ़ना कठिन हो जाता है तथा जिन रोगी और कमजोर लोगों को इलाज जल्दी सोना चाहिए वह सो नहीं सकते,इसके अलावा बाहर के लोग कुरान की तिलावत साहित्य से सुनने में सक्षम नहीं होते, और कई बार ऐसा भी होता है कि पाठ के दौरान कोई सजदे कविता आती है, सुनने वालों पर गिराया वाजिब हो जाता है, और या तो उन्हें पता ही नहीं चलता, या वह वुज़ू नहीं होते, और बाद में भूल जाते हैं, कि इन स्थितियों में तरावीह के दौरान बाहरी लाउडस्पीकर जोर से खोलना शरअन वैध है?

यह सवाल अलग विद्वानों के पास भेजा गया और सबने एकमत जवाब यही दिया कि इन स्थितियों में तराीह सुनाना बाहरी लाउडस्पीकरों कोई जरूरत जोर से खोलना शरअन जा यज़ नहीं है, यह फतवा मासिक ''बलाग़ 'की मुहर्रम 1407 आह प्रकाशन में प्रकाशित हुआ है .और यह घटना है कि यह कोई अंतर समस्या नहीं है पर सभी मतों के उलेमा सहमत हैं।

अब रमजान का पवित्र महीना शुरू होने वाला है,इस महीने हमसे शरई अहकाम की सख्ती के साथ पा करने की मांग करता है,और यह इबादतों का महीना है और इसमें प्रार्थना सुनाना और उल्लेख जितना भी हो सके, जिससे पुण्य लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि यह सारी इबादतें इस तरह अंजाम दी जायें कि उनसे किसी को चोट न पहुंचे,और ना जा यज़ तरीकों की बदौलत इन इबादतों का इनाम बर्बाद न हो। लाउडस्पीकर का उपयोग बोकत जरूरत और थ्रूपुट जरूरत किया जाए, इससे आगे नहीं।

उपरोक्त प्रस्तुतियाँ से अनुमान लगाया जा सकता है कि व्यवस्था ने दूसरों को परेशानी से बचाने के लिए कितना व्यवस्था क्या है?जब कुरान की तिलावत और नसीहत जैसे पवित्र कार्यों के बारे में भी व्यवस्था के निर्देश है कि उनकी आवाज जरूरत स्थानों से आगे नहीं बढ़ना चाहिए,तो संगीत वाद्ययंत्र और दूसरी ठगना के बारे में खुद अंदाज़ा लगा लीजिए कि उन्हें लाउडस्पीकर पर अंजाम देने का कितना दोहरा ाोबाल है। 6 फरवरी 1994
(समाप्त शुद)

(रमजान के महीने में सहरी के समय शुरू होने से लेकर समय होने तक स्थायी रूप से हर 20 मिनट या आधा घंटा पहले घोषणा करने वाले सज्जनों या मस्जिद मतोलियान और ज़िम्मेदारों उपरोक्त मामलों के प्रकाश में जा यज़ह लें कहीं ऐसा न हो कि वह इनाम समझ कर यह काम कर रहे हैं और उनके कार्यों में पाप लिखे जाएंगे।)

नोट: यह लेख उपमहाद्वीप प्रसिद्ध विद्वान मुफ्ती मोहम्मद तक़ी उस्मानी है जो उन्होंने लिखा है ाफ़ाइदा आम के लिए उसे उर्दू,हिंदी और इंग्लिश तीनों भाषा में अनुवाद करके वितरित किया जा रहा है ताकि लो जी इस अनजाने पाप बच सकें। और तमामन लोगों से अनुरोध है कि इस लेख को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं। और अ:छात्र प्रार्थना। डॉक्टर अब्दुल वहाब एमडी (िलीग)आधारित हाल स्वागत बिल्डिंग के पास जामा मस्जिद गांधीनगर बस्ती यूपी

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/mufti-taqi-usmani/atrocious-use-of-loudspeakers--लाउडस्पीकरों-का-क्रूर-उपयोग/d/111197

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